सोमवार, 18 जनवरी 2010

गद्य के कुछ नमूने

गद्य के कुछ नमूने


1 ईश्‍वर रेडियम, ईथर अथवा कोई वैज्ञानिक योग है। ईश्‍वर एक रासायनिक प्रतिक्रिया है।

2 आप यह बता सकते हैं कि आपने क्‍या स्‍वप्‍न देखा और तोते ने क्‍या कहा क्‍योंकि पक्षी एक अयोग्‍य गवाह है।

3 उनके चेहरे पत्‍थरों पर नमक से बने चेहरों के समान थे।

4 न्‍यूयॉर्क किसी के भी लिए इतने प्रलोभन पैदा कर देता है कि कोई भी अपव्‍ययी हो जाता है।

5 मैं कपड़ों में आश्‍चर्यजनक सौदेबाजी और सुई-धागे से किया गया चमत्‍कार देखता आया हूं।

6 उसने चटखे हुए दर्पण में स्‍वयं को देखा। प्रतिबिम्‍ब संतोषजनक था।

7 जीवन अपने रहस्‍यमय घूंघट का एक कोना उसके लिए उठाने जा रहा था ताकि वह इसके आश्‍चर्य देख सके।

8 वह ऐसा दिखता था मानो एक रहस्‍यमय दुख में हो और उसकी शानदार मूंछें एक स्‍वप्‍न की तरह थीं।

9 वह उसे ऐसे देखता रहा जैसे रेगिस्‍तान में स्थित स्फिंक्‍स की मूर्ति तितली को देखती, यदि रेगिस्‍तान में तितलियां होतीं।

गद्य के ये नौ बिंदुओं में उदाहरण, ये कुछ वाक्‍य ओ हेनरी की एक कहानी में से चुने गए हैं।
कभी 'एक अधूरी कहानी' पढ़ते हुए मुझे ये वाक्‍य गद्य के अविस्‍मरणीय नमूनों की तरह लगे थे और उन्‍हें मैंने डायरी में लिख लिया था, यह सोचकर कि इन सब पर, पृथक पृथक कहानियां या कविताएं लिखूंगा। सं‍दर्भित कहानी के शीर्षक की तरह मेरे लिए यह बात अभी अधूरी ही है। लेकिन इनको यहां पढने का सुख तो सब तक पहुंचाया ही जा सकता है।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

एक सिम्‍फनी है

अकेली गहराती रात में एक खिडकी के पीछे एक अनाम लैम्‍प जल रहा है। जैसे इस लैम्‍प के जलने से ही यह रात इतनी गहरी है। लगता है कि मैं जगा हुआ हूं, अंधेरे में अपनी कल्‍पनाओं में डूबा, बस इसी वजह से ही उधर, वहां रोशनी है।

शायद हर चीज इसलिए जीवित है क्‍योंकि कुछ और भी है जो साथ में जीवित है।
00000

कोहरा या धुआं।
क्‍या यह धरती से उठ रहा था या आकाश से गिर रहा था। जैसे यह वास्‍तविकता नहीं है, अपनी आंखों की ही कोई पीड़ा है। जैसे कुछ ऐसा घटित होनेवाला है, जिसे हर चीज में अनुभव किया जा सकता है, उसी घटना की आशंका में दृश्‍यमान संसार ने अपने आसपास कोई परदा खींच लिया है।

दरअसल, आंखों के लिए यह कोहरा शीतल है लेकिन छूने पर ऊष्‍ण, जैसे दृष्टि और स्‍पर्श किसी एक ही अनुभव को जानने के लिए नितांत दो अलग तरीके हैं।
00000

उदास प्रसन्‍नता के साथ कभी-कभी मैं सोचता हूं कि मेरे ये वाक्‍य जिन्‍हें मैं लिखता हूं, भविष्‍य में किसी एक दिन, जिसका मैं हिस्‍सेदार भी नहीं होऊंगा, प्रंशसा के साथ पढे जाएंगे, आखिर मैं उन लोगों को पा सकूंगा जो मुझे 'समझ' सकेंगे, मेरे अपने लोग, एक मेरा वास्‍तविक परिवार जो अभी पैदा होना है और जो मुझे प्‍यार करेगा। लेकिन उस परिवार में मैं पैदा नहीं होऊंगा बल्कि मैं तो मर चुका होऊंगा। मैं किसी चौराहे की प्रतिमा की तरह रहकर समझा जाऊंगा, और इस तरह मिला कोई भी प्रेम, उस प्रेम के अभाव की भरपाई नहीं कर पाएगा जिसका अनुभव मुझे अपने जीवनकाल में होता रहा।
00000

मेरी आत्‍मा एक अजाना आर्केस्‍ट्रा है। मैं नहीं जानता कि कौन से वाद्ययंत्र, कौन सी सारंगी और वीणा के तार, नगाड़े और ढपलियां मैं अपने भीतर बजाता हूं या उनको झंकृत करता हूं।
कुल मिलाकर जो मैं सुनता हूं वह एक सिम्‍फनी है।
00000

फर्नेन्‍दो पेसोआ की चर्चित डायरी और मेरी प्रिय किताब 'द बुक ऑफ डिस्‍क्‍वाइट' की अनेक पंक्तियां ऐसी हैं जो बार-बार पढता हूं। अपने नाम के अनुरूप ही यह किताब व्‍याकुल बनाने में सक्षम है। एक सर्जनात्‍मक व्‍याकुलता इसमें व्‍याप्‍त है। उन सैंकडों पंक्तियों में से कुछ यहां लिख दी हैं।
यों ही। टूटे-फूटे अनुवाद में। नए साल की शुभकामनाओं के साथ।

रविवार, 29 नवंबर 2009

फूल रखो तो फूलदान की तरह

डायरी अंश

कमरे में एक सुराही रखी है। शो पीस की तरह। उसमें फूल भी रखे जा सकते हैं। फूल रखो तो फूलदान की तरह है। यह उतनी सुंदर नहीं है। इसे देख कर सुंदर, सुघड़ और पूर्णाकार की सुराहियाँ याद आती हैं। सुराही को देखना एक कला को देखना है। जब-जब भी मैं सुराही को देखता हूँ उसे उड़ती हुई निगाह से नहीं देख पाता। मेरी निगाह उस पर टिक ही जाती है। शायद एक आकर्षण सुराही को ले कर मन में बन गया है। चित्रों में देखी गई सुराहियों से शायद यह आकर्षण बना हो। या बचपन में गाँव में देखी गई किसी सुराही के कारण। कुछ याद नहीं पड़ता। सुराही की जरा लंबी ही गर्दन सबसे पहले ध्यान खींच लेती है। काम्य स्त्रियों के लिए सुराहीदार गर्दन की आकांक्षा अकसर ही साहित्य में, श्रृंगार की बातचीत में प्रकट है। लेकिन मुझे लगता है कि सुंदर सुराही की जितनी लंबी गर्दन होती है, आनुपातिक रूप से उतनी लंबी गर्दन किसी भी स्त्री को सुंदर नहीं बना सकती। बहरहाल, यह तो एक उपमा ही हुई !

एक अत्यंत सादा बनावट में भी सुराही की यह गर्दन अपनी रहस्यात्मकता के साथ मुझे खींचती है। उसके भीतर का सीधा-सादा अँधेरा मुझे अलौकिक लगता है। और सुराही पर अकसर ही की जाने वाली नक्काशियाँ और डिज़ायनें। हर बार वे एक दूसरे से किंचित भिन्न होती हैं। यह किंचित भिन्नता उन्हें और सुंदर बनाती है। लोक कला की यह एक अनिवार्य विलक्षणता ही है कि एक आदमी जितनी बार मोर या धनुष बनाएगा वह हर बार एक नयी कृति बना देगा। एक जैसा बनाने के लिए वह उतना सजग, उतना प्रवीण नहीं है। वैसा आकांक्षी भी नहीं। कभी-कभी सुराही के एक तरफ या दोनों तरफ हेण्डिल उसे एक बार फिर आकर्षक और अधिक उपयोगी बनाते हैं। पानी भरने के अन्य मिट्टी के पात्रों से वह कितनी अलग है। उसे देखना, उसके पास होना एक शीतलता के पास होना है। एक कला के पास होना है। वह एक अनघड़ कलाकार के लिए भी कला है और सुघड़ कलाकार के लिए कलात्मक चुनौती। वह कितनी साधारण है और कितनी अनुपम! कमरे में रखी यह छोटी-सी सुराही इसी मायने में सुंदर है कि यह एक बड़ी सुंदरता का, कला का आत्मीय स्मरण दिलाती है।
`सुराही´ - यह शब्द भी कितना सुंदर है ! जो सुंदर लगता है, उसका नाम भी सुंदर लगने लगता है। नहीं, यही एक मात्र कारण नहीं। सुराही शब्द है ही सुंदर। लयात्मक भी। मैं एक कविता सुराही पर लिखना चाहता था और यह सब लिख गया हूँ। कविता लिख पाता तो अधिक संतोष मिलता। मैं एक कविता इस पर लिखूँगा।
कभी।
0000

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

जैसा समाज होगा वैसा परिवार

पिछले वर्षों में कुछ नयी-पुरानी अवधारणाओं और नैतिकताओं पर विचार करता रहा हूं। फलस्‍वरूप छोटे-छोटे लेख/टिप्‍पणियां संभव हुईं। उनमें से विचारार्थ कुछ यहां दे रहा हूं। उस क्रम में यह पहला लेख।


जैसा समाज होगा वैसा परिवार
पूँजीवादी समाज में परिवार का स्वरूप

हम जानते हैं कि जब समाज अपनी प्रारंभिक अवस्था में था तो परिवार की शुरूआती अवधारणायें और परिणतियाँ अपने मूल व्यवहार में तमाम आडंबरों से रहित थीं। उनमें खुलापन, आजादी और यायावरी थी। सामंती समाज तक आते-आते परिवार पितृसत्तात्मक हो गया और पुष्ट हो गये सामंती समाज ने ही उस बंद, कट्टर, सुरक्षित, रागात्मक परिवार की नींव डाली जिसकी चिंता आज की जा रही है। जाहिर है कि इस समाज के परिवार में एक पुरुष मुखिया (या सामंत) होता है और उसकी इस अवस्थिति को बनाये रखने में समाज, परंपरा, कानून और धार्मिक व्याख्यायें शक्ति और सहायता प्रदान करती हैं। इस व्यवस्था में एक दास का होना आवश्यक है तभी परिवार का सामंती रूप पूर्ण हो सकता है। दासता के इस कार्यभार के लिये स्त्री को चुना गया। स्त्री को यह दासता गरिमापूर्ण लगे, इसके प्रति उसके मन में विद्रोह न हो इसलिये ममता, स्नेह, प्रेम, दायित्व, धर्म, कर्तव्य, शील आदि से उसे जोड़ा जाता रहा। लेकिन उसके नियम कभी भी स्त्री के लिये अनुकूल नहीं रहे। उसके लिये तो कैसे भी पति को प्रेम करना कर्तव्य और धर्म के अंतर्गत है। इस परिवार में स्त्री के शोषण के अनेक मान्य, प्रचलित और कठोर रूप रहे हैं।

स्त्री पर शासन आसान रहे इसलिये ही विवाहों में उम्र और शिक्षा को लेकर एक बेमेल पंरपरा कायम की गयी है जिसके तहत स्त्री का आयु में पुरुष से कम और शिक्षा में कमतर होना ही उचित मान लिया गया है। यदि वह आयु और शिक्षा में पुरुष से बड़ी या बराबर हुयी तो इस बात के आसार ज्यादा हैं कि उसे आसानी से शासित न किया जा सके। यद्यपि घरेलू, सामाजिक, औपचारिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा में इस बात की ग्यारंटी कर दी गयी है कि स्त्री, समाज की `पहली इकाई´ में प्रवेश करते ही किसी पुरुष का स्थायी उपनिवेश हो जाये। इसी तरह के संदर्भों में कहा जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है। इस `सामंती परिवार´ में पुरुष का जीवन सर्वाधिक आनंद में गुजरता है। गृहस्थी में उसकी जो मुश्किलें हैं वे एक नागरिक, मनुष्य और मुखिया की मुश्किलें तो हैं लेकिन गुलाम या शासित की उन मुश्किलों से बिलकुल अलग हैं जो किसी मनुष्य की तमाम संभावना, प्रतिभा, स्वतंत्रता और चेतना को बाधित, कुंठित और प्राय: असंभव कर देती हैं।

इस तरह के परिवार में कुछ अन्य लक्षण सहज ही परिलक्षित होंगे, जो दरअसल सामंती व्यवस्था के सामाजिक-नागरिक लक्षणों से उत्पन्न हैं : जैसे स्त्री संपत्ति की तरह है और उसे अर्जित किया जा सकता है। उसे रक्षित करना जरूरी है अन्यथा घुसपैठ संभव है। वह पुरुष की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी इसी वजह से है। चूँकि वह चल-संपत्ति है इसलिये उसे अपने पास बनाये रखने के लिये हिंसा भी जायज है। इस परिवार में हिंसा के तमाम रूपों की उपस्थिति सहज रहती आयी है। करुणा, दया, प्रेम, कृतज्ञता, नैतिकता, धार्मिकता और अभिनय का इस्तेमाल भी होता रहा है। आदि-इत्यादि। हर स्थिति में उसका अधिकार दोयम है, कर्तव्य प्राथमिक और अनिवार्य। पारिवारिक इकाई के इसी स्वरूप को तरह-तरह से विकसित, महिमामंडित और दृढ़ किया गया। अब इसकी रागात्मकता, सहजता, कार्यकुशलता और व्यवस्था खतरे में है।

यहाँ ध्यान देना होगा कि अब हमारा समाज राजनीतिक, औपचारिक शिक्षा, तकनीकी, न्यायिक, संवैधानिक और स्वप्नशीलता के क्षेत्रों में सामंती नहीं रह गया है, भले ही रूढ़ियों, परंपराओं, सामाजिक आचरणों, मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों आदि में सामंतीपन का ही बोलबाला है। बल्कि इन्हीं वजहों से अभी तक परिवारों में सामंती परिवेश बना रह सका है। लेकिन धीरे-धीरे पूँजीवाद ने शासन और तंत्र के वर्चस्ववादी इलाकों में अपनी ध्वजा फहरायी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके लिये सर्वाधिक सहायक हो सकती है। लोकतंत्र की आड़ ही उसे तानाशाह होने की सीधी बदनामी से रोकती है। लेकिन लोकतंत्र की उपस्थिति अपना काम करती है और परिवार में किसी एक की तानाशाही अथवा सामंती प्रवृत्ति के खिलाफ भी वातावरण बनाती है। जाहिर है कि यह पूँजीवादी, उत्तर-आधुनिक समाज भी अपने जैसा ही परिवार बनायेगा। जैसा समाज, वैसा परिवार। क्या हम भूल रहे हैं कि परिवार समाज की पहली इकाई है! ऐसा हो ही नहीं सकता कि समाज पूँजीवादी होता जाये और परिवार का चरित्र सामंती बना रहे।

पूँजीवादी समाज में अर्थवाद, संबंधों की स्वार्थपरकता, मनुष्य से मनुष्य की हृदयहीनता, हर क्रिया में छिपा निवेश तत्व, प्रदर्शनकारिता, उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद और आत्मकेंद्रिकता के लक्षण प्रमुख हैं। इन लक्षणों को सब रोज-रोज अनुभव कर ही रहे हैं। इन्हीं विलक्षणताओं के कारण पूँजीवाद में प्रेम, मनुष्यता, रागात्मकता आदि का ही नहीं बल्कि तद्जन्य संगीत, कला, साहित्‍य, अध्यवसाय का लोप होता जाता है। इन्हीं सब बिंदुओं को आप परिवार पर लागू करें तो पायेंगे कि आज के परिवार का संकट यही है। अर्थात वहाँ स्वार्थ, उपयोगितावाद, निवेश मन:स्थिति, आत्मकेंद्रिकता का प्रवेश हो गया है और जीवन की रागात्मकता, हार्दिकता, सामूहिकता, और संगीतात्‍मकता गायब है। यह होना ही है। इसे प्रस्‍तुत समाज व्‍यवस्‍था में रोका नहीं जा सकता।

अभी जो `पुराने परिवार´ के रूपक हैं और उदाहरणों की तरह टापू की तरह दिखते हैं वे सामंती अवशेष हैं। गाँवों और कस्बों के जीवन में सामंती रीतियाँ जाति, वंश, परिवार परंपरा, धार्मिकता के प्रभाव बाकी हैं अतएव वहाँ इन परिवारों का ध्वंस अभी उतना नजर नहीं आता लेकिन `पूँजीवादी समाज से उद्भूत और प्रभावित परिवार´ शहरों तथा मेट्रोज में आसानी से मिल जायेंगें। आगामी कुछ ही समय में ये `पूँजीवादी समाज के परिवार´ बड़ी संख्या में तबदील होते जायेंगे। विवाह के लिये औपचारिक संस्कार गौण होते जायेंगे और करार के विधिक, मौखिक या सहमति के अन्य प्रकार स्वीकार्य होंगे। यह पूँजीवाद के चरित्र का ही हिस्सा है। इसीके चलते संभव है कि परिवार `आजीवन संस्था´ न रहकर `अल्पकालीन या आवश्यकतानुसार अनुबंध´ तक सीमित होती चली जाये।

यहाँ एक बात गौर करने लायक है। पूँजीवादी समाज की निर्मिति से बन रहे इन परिवारों में स्त्री का पारिवारिक शोषण तो रुक जायेगा लेकिन मनुष्य की अस्मिता, गरिमा, स्वतंत्रता और उड़ान से वे काफी हद तक वंचित ही रहेंगी क्योंकि पूँजीवाद, स्त्री को `उपयोगी´ और `उपभोक्तावादी´ वस्तु में ही न्यून करता है। वह स्वतंत्र तो होगी लेकिन फिलहाल नियामक या निर्णायक नहीं। उसका `स्त्री´ होना उसके लिये नयी मुश्किलें और कुछ तात्कालिक आसानियाँ पेश करेगा। पूँजीवादी व्यवस्थायें और उसके गण उसका तदानुसार उपयोग करेंगे। यह आजादी विडंबनामूलक समस्या है। वह सामंती पिंजरे से निकलकर एक अथाह समुद्र में गिरेगी। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को परिवार का सामंती रूप अधिक सुरक्षित और विकल्पहीन लगता है। इन परिवारों के विघटन और विनाश से पुरुषों का डर तो स्वाभाविक है क्योंकि उनका साम्राज्य इससे नष्ट होता है किंतु स्त्रियों का डर, अपने नरक से प्रेम करने और उसके पालन-पोषण के तरीकों में छिपा हुआ है। प्रसन्न इस बात पर तो हुआ ही जा सकता है कि स्त्री, सामंती परिवार के कारागार से बाहर निकल पायेगी एवं नितांत नयी समस्याओं के बीच स्वतंत्रचेता और स्वावलंबी होने के लिये विवश होगी। बहरहाल, यह संक्रमणकाल है और इसके बाद कुछ राहें निकलेंगी।

यह उम्मीद करना बेमानी और काल्पनिक नहीं है कि पूँजीवादी समाज अंतत: उस मानवीय, समतावादी और सामाजिक न्यायपूर्ण व्यवस्था से प्रतिस्थापित हो सकता है, जिसे `साम्यवादी व्यवस्था´ के स्वप्न में देखा जाता है। इस आकांक्षी व्यवस्था में ऐसे परिवार की कल्पना की जा सकती है जो अपने गठन, निर्माण और परिचालन में कहीं अधिक लोकतांत्रिक, समतावादी, रागात्मक और प्रेम भरा होगा, जिसमें स्त्री को मनुष्य का गरिमापूर्ण दर्जा मिलेगा और बच्चों के पालन-पोषण में अत्याचार, क्रूरता और इजारेदारी का हिस्सा खतम हो जायेगा। मार्क्‍स-एंगेल्स आज से 155 वर्ष पहले लिखे `कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र´ में यदि `बुर्जुआ सामंती परिवार´ के संकटों का जिक्र करते हुये उसे खारिज करना चाहते हैं तो वह कोई अराजक प्रस्ताव नहीं है। अब ऐसी परिवार व्यवस्था मुश्किल में आ रही है तो यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का हिस्सा है, भले ही अभी यह हमारी श्रेष्ठ मानवीय आकांक्षाओं के अनुकूल नहीं है मगर यह अपनी प्रकृति में ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक है।
000000

बुधवार, 4 नवंबर 2009

मेरा प्रिय कवि

पुरातत्व कविता के कवि साथी शरद कोकास सहित अनेक मित्रों के आदेश और विशेष तौर पर नव्‍यतम पीढ़ी के चर्चित कथाकार और मेरे प्रिय चंदन पाण्‍डेय के आग्रह को रेखांकित करते हुए, संकोच के साथ ही सही, अब अपनी कुछ कविताएं यदा-कदा लेकिन नियमित तौर पर यहाँ देता रहूँगा।


मेरा प्रिय कवि

वह हिचकिचाते हुए मंच तक आया
उसके कोट और पैंट पर शहर की रगड़ के निशान थे
वह कुछ परेशान-सा था लेकिन सुनाना चाहता था अपनी कविता
लगभग हकलाते हुए शुरू किया उसने कविता का पाठ
मगर मुझे उसकी हकलाहट में एक हिचकिचाहट सुनाई दी
एक ऐसी हिचकिचाहट
जो इस वक्‍त में दुनिया से बात करते हुए
किसी भी संवेदनशील आदमी को हो सकती है
लेकिन उसने अपनी कविता में वह सब कहा
जो एक कवि को आखिर कहना ही चाहिए

वह हिचकिचाहट धीरे-धीरे एक अफसोस में बदल गई
और फिर उसमें एक शोक भरने लगा
उसकी कविता में फिर बारिश होने लगी
उसके चश्मे पर भी कुछ बूँदें आईं
जिन्हें मेरे प्यारे कवि ने उँगलियों से साफ़ करने की कोशिश की
लेकिन तब तक और तेज हो गई बारिश
फिर कविता में अचानक रात हो गई
अब उस गहरी होती रात में हो रही थी बारिश
बारिश दिख नहीं रही थी और बारिश में सब कुछ भीग रहा था
कवि के आधे घुँघराले आधे सफेद बालों पर फुहारें थीं
होठों पर धुएँ के साँवले निशानों को छूकर
कविता बह रही थी अपनी धुन में
एक मनुष्य होने के गौरव के बीच
संकोच झर रहा था उसमें से
वह एक आत्मदया थी वह एक झिझक थी
जो रोक रही थी उसकी कविता को शून्य में जाने से

कविता पढ़ते हुए वह
बार-बार वज़न रखता था अपने बाएँ पैर पर
बीच-बीच में किसी मूर्ति-शिल्प की तरह थिर होता हुआ
(एक शिल्प जो काव्य-पाठ कर सकता था)
उसके माथे पर साढ़े तीन सलवटें आती थीं
और बनी रहती थीं देर तक

मैं अपने उस कवि से कुछ निशानी -
जैसे उसका कोट माँगना चाहता था
लेकिन अचानक उसने मुझे एक गिलास दिया
और मेरे साथ बैठ गया कोने में
उसने कहा तुम्हें मैं राग देस सुनाता हूँ
फिर उसने शुरू किया गाना
वह एक कवि का गाना था
जिसे गा रही थी उसकी नाजुक और अतृप्त आत्मा

एक घूँट लेकर उसने कहा
कि तुम देखना मैं अगला आलाप लूँगा
और सुबह हो जाएगी

अचानक मेरा कवि मेरे करीब और करीब आया
कहने लगा मैं बहुत कुछ न कर सका इस संसार को बदलने के लिए
मैं शायद ज्‍यादा कुछ कर सकता था
मुझे छलती रहीं मेरी ही आराम-तलब इच्छाएँ
जिम्मेवारी की निजी हरकतों ने भी मुझे कुछ कम नहीं फँसाया
दायीं आँख का कीचड़ पोंछते हुए वह फिर कुछ गुनगुनाने लगा
कोई करुण संगीत बज रहा था उसमें
मैंने कभी न सुनी थी ऐसी मारक धुन
मेरे भीतर एक लहर उमड़ी और मैं रोने लगा

उधर मेरा प्रिय कवि
मंच से उतर कर
चला आ रहा था अपनी ही चाल से।
00000


दस बरस पहले की इस कविता के बारे में अनेक पाठकों-मित्रों-आलोचकों की राय रही है कि यह हिन्‍दी के किसी कवि विशेष को केन्‍द्र में रखकर लिखी गई है। आज कुछ मुखर होने का जोखिम लेकर मैं कहना चाहता हूँ कि यह कविता किसी कवि को केन्‍द्र में रखकर नहीं है बल्कि उसके बहाने 'समकालीन कविता के पाठ' -रिसाइटल- के पक्ष में लिखी गई है।

कविता को गाकर, चीखकर या अभिनय के साथ पढ़ने की पक्षधरता के बरअक्‍स यह मानवीय दुर्बलताओं के पाठ के साथ कविता का पक्ष रखने की भी एक कोशिश है। दूसरे, इसमें किसी कवि विशेष की नहीं बल्कि हमारे समय के अनेक कवियों की काव्‍यपाठ करने की स्‍म़तियॉं और बुदबुदाहटें है।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

ट्रेड यूनियनों के भूले हुए काम और चुनौतियॉं

पिछले लेख से किंचित सम्‍बद्ध लेकिन स्‍वायत्‍त और स्‍वतंत्र तरीके से कुछ वैचारिक बिंदु प्रस्‍तुत करने वाला यह एक लेख और दे रहा हूं। आशा है, गंभीर पाठकों के लिए यह आवश्‍यक उत्‍तेजना दे सकेगा।

ट्रेड यूनियनों के
भूले हुये काम और चुनौतियाँ


ट्रेड यूनियनों के जन्म, कार्य और सक्रिय उपस्थिति ने संसार में क्या कुछ कर दिया है, वह एक गर्वीला इतिहास है। इस संबंध में हजारों पृष्ठ हमारे सामने हैं। संक्षेप में यह कि औद्योगिक क्रांति ने पूँजी के हृदयहीन शासन और उसकी तानाशाही का जो पहिया घुमाया, उसे अपने लहुलुहान हो गए हाथों से थामने का, उसकी दिशा को बाध्यकारी रूप से मानवोन्मुखी करने का काम ट्रेड यूनियनों की वजह से भी संभव हुआ। श्रम-संगठनों ने शोषण के चक्र को ऐतिहासिकता में समझते हुए, उसके खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से जुझारू संघर्ष किया और श्रमिकों को वे सारे अधिकार दिलाने का काम जारी रखा जिनसे वे एक बेहतर मनुष्य का जीवन जी सकने का स्वप्न देखते रहे और अनेक अधिकारों को पा सके। भारत में श्रमिक आंदोलन का इतिहास देश की स्वतंत्रता से काफी पहले का है। वह पूँजीपतियों और उनकी शोषक नीतियों के विरुद्ध रहा है इसलिए ही वह अंग्रेजों के जमाने में भी था और आज भी है।

उत्पादक पूँजीधारकों की मंशाओं को जो तािर्कक, ठोस चुनौती श्रम-संगठनों से मिलती रही है उससे अब पूँजीपतियों को स्पष्ट होता गया है कि उन्हें श्रम को हथियाने के लिए कुछ नए तरीके खोजने होंगे ताकि वे पूंजी के खेल और अपने लाभ को अबाध गति से आगे बढ़ाते हुये श्रमिकों का हद दर्जे तक दोहन कर सकें। वैश्वीकरण और उदारवाद की हवा ने उन्हें यह मौका दिया है। कंप्यूटर की पेन्टियम सीरीज, इंटरनेट, ई-बिजनेस और ऑनलाइन तकनीक तक आते-आते उन्हें श्रमिकों से मुक्ति मिलने की आस बँध गई है। इससे ट्रेड यूनियनों के सामने नयी समस्याएँ और चुनौतियाँ भी पैदा हुई हैं। यद्यपि अनेक समस्याएँ, प्रजनन करती हुईं पुरानी समस्याओं में से ही निकलकर आई हैं और यदि अभी भी श्रम-संगठनों ने कुछ मूलभूत बातों की तरह पुन: ध्यान नहीं दिया तो यह क्रम आगे भी जारी रहने वाला है। यह पुरानी बीमारियों के लौटने का समय है। जिनमें नौकरी की अनिश्चितता, श्रम कानूनों का हनन, कार्यघंटों को बढ़ाकर असीमित किया जाना, कार्यालयीन दुव्र्यवहार, श्रमिकों से असंभव किस्म की अपेक्षाएँ, सेवाशर्तों में सुधार न करना एवं जो सेवाशर्तें हैं उन्हें व्यवहार में लागू न करना आदि। इसलिए उन मूलभूत बिंदुओं और सवालों की तरह यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए जो भले ही अब किंचित पुराने क्यों न लगने लगे हों लेकिन इनसे ही वे कुछ भूले हुये काम भी याद आयेंगे जो ट्रेड यूनियन के लिए जरूरी हैं, जिन्हें कतई दरकिनार नहीं किया जा सकता।

संगठनकारी आंदोलन का केंद्र और वैचारिक शिक्षा
सबसे पहले हम माक्र्स के `मजदूरी, दाम और मुनाफा´ शीर्षक लेख में कही गई बात याद करते हैं: `ट्रेड यूनियन मजदूरों के तात्कालिक हितों की रक्षा का साधन ही नहीं है बल्कि पूँजीवाद के उन्मूलन के लिए संघर्ष में, सर्वहारा के संगठनकारी आंदोलन का केंद्र भी है।´ जाहिर है कि ट्रेड यूनियन को व्यापक, दूरगामी और महत्वपूर्ण जिम्मेवारी से ओतप्रोत माना गया था। इस उद्देश्य को पाना तब तक ही संभव है, जब तक ट्रेड यूनियनें अपने सदस्य साथियों को पूँजीवाद से संघर्ष के लिए बौद्धिक रूप से तैयार करने का काम और आंदोलन एक साथ करती रह सकें। प्रारंभ में यह हुआ लेकिन जल्दी ही ट्रेड यूनियनों ने `मजदूरों के तात्कालिक हितों´ की रक्षामात्र को ही अपना कार्यभार मान लिया। लेकिन जब आप दो पतवारों में से एक पतवार फेंक देते हैं तो नाव की दिशा, गति और संतुलन भी डिग जाता है इसलिए यह हुआ कि `मजदूरों के तात्कालिक हित´ क्या हैं एवं क्या हो सकते हैं, इसी प्रश्न पर चीजें गड़बड़ाने लगीं। ट्रेड यूनियन के सदस्य-साथियों में वैचारिकता के अप्रसार ने उस चेतना को ही समाप्त कर दिया है जो किसी आंदोलन के लिए श्रमिक में उत्साह, लगन, समझ और जुझारूपन पैदा कर सकती है।

यह वैचारिकता ही है जो श्रमिकों के बहाने एक विशाल `सर्वहारा वर्ग´ को शोषण-मुक्ति, समता, न्याय, स्वतंत्रता और मनुष्य की अस्मिता के पाठ पढ़ा सकती है। उनकी सोच को व्यवहार बुद्धि के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न कर सकती है। श्रमिक साथी के रूप में उन्हें अपने व्यक्तिगत कार्यभार और चुनौतियों के प्रति सजग बनाते हुए एक सक्रिय कार्यकर्ता में बदल सकती है। श्रम-संगठनीय शिक्षा के अभाव में आम सदस्य (या कार्यकर्ता) बेहद स्वार्थी, व्यक्तिगत परिधि में घिरे आदमी के रूप में ही तबदील हो सकता है और दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है। इस समय में भी वैचारिक शिक्षा ही वह गंगोत्री हो सकती है जिससे आगे जाकर नदी का पाट चौडा हो सके, बहाव तेज हो, चट्टानों, मैदानों, बीहड़ों को पार किया जा सके और आबादियों को खुशहाल करते हुए एक विशाल समतामूलक डेल्टा का निर्माण हो।

दक्षिणपंथी और पूँजीपति पार्टियों की ट्रेड यूनियनें
किसी संगठन के कितने सदस्य हड़ताल पर जा रहे हैं, यह संख्या हड़ताल की सफलता की सूचना तो दे सकती है किंतु यदि उसके ये सदस्य शिक्षित और प्रतिबद्ध नहीं हैं तो निर्णायक आंदोलन में यह संख्या धोखादेह हो सकती है। बल्कि रोजमर्रा के कार्य-व्यापारों में, ऐसे सदस्य-साथी ट्रेड यूनियन के महती कार्यक्रमों और उद्देश्यों को चुपचाप तरीके से नष्ट करते चले जाएँगें। उनकी राजनीतिक समझ कच्ची ही नहीं रहेगी अपितु अवसरवादी भी हो जाएगी। इसलिए यह देखना आश्चर्य का विषय शायद नहीं होना चाहिए कि साम्यवादी ट्रेड यूनियनों तक के सदस्यों में उन लोगों की बहुतायत होती जा रही है जो राजनीतिक तौर पर दक्षिणपंथी या धुरदक्षिणपंथी पार्टियों के साथ खड़े हैं। यहाँ इस बात की तरफ ध्यान देना दिलचस्प होगा कि दक्षिणपंथी पार्टियाँ, श्रम-अधिकारों को स्थायी तौर पर नष्ट करने के लिए कमर कस चुकी हैं।

ट्रेड यूनियनों के निर्माण के मूलाधार में इस समझ का स्वीकार शामिल रहा कि समाज में कम से कम दो वर्ग हैं। एक पूँजीपति का, जो पूँजी या संस्थान का मालिक है और दूसरा सर्वहारा (श्रमिक) का, जो किसी भी पूँजी का स्वामी नहीं है और अपना श्रम बेचने के लिए विवश है। इस तरह वर्गीय विभाजन के आधार पर यह समझ भी साफ होती है कि पूँजी, श्रम का शोषण करने में सक्षम है अतएव समाज में `वर्ग संघर्ष´ एक आवश्यक परिघटना है जिसके जरिए न्याय और समता का स्वप्न देखा जाता है। किंतु यह विलक्षण है कि पिछले कुछ वर्षों में उन राजनीतिक पार्टियों के `श्रम संगठन´ भी मैदान में हैं जो दरअसल समाज में वर्ग-भेद के सिद्धांत से ही सहमत नहीं हैं, तब वर्ग-संघर्ष की समझ और स्वीकारोक्ति की बात कौन कहे। उनका काम अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट या अन्य प्रकार का समर्थन जुटाना एवं श्रमिकों के वेतन बढ़ाए जाने के नाम पर सतही आंदोलन करना रहा है। जाहिर है, ऐसी ट्रेड यूनियनों की उपस्थिति ने `वामपंथी ट्रेड यूनियनों´ के उद्देश्यों और दायित्वों को धूमिल करने में सहायक भूमिका निबाही है। `ट्रेड यूनियन आंदोलन के अर्थ एवं आवश्यकता´ की शिक्षा के अभाव ने ठीक वही काम किया है जो किसी समाज में निरक्षरता कर सकती है। और इसका लाभ पूँजीपतियों ने ठीक उस तरह ले लिया है जिसकी आशंका माक्र्स ने डेढ़ सौ साल पहले `कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा-पत्र´ में व्यक्त कर दी थी -`मजदूर अपनी ही होड़ और असंबद्धता के कारण, बँटे हुए जन-समुदाय होते हैं और कहीं वे एक संगठन बनाते भी हैं तो यह उनके सक्रिय एके का फल नहीं, पूँजीपति वर्ग के एके का फल होता है क्योंकि पूँजीपति वर्ग को अपनी राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूरे सर्वहारा वर्ग को गतिशील करना पड़ता है।´ हम देख सकते हैं कि आज की तारीख में सरकार या पूँजीपतियों के सामने ट्रेड यूनियनें एक तरह की सुविधा बनती जा रही हैं जिनके जरिए वे अपने पक्ष में कई चीजों को गतिशील कर पा रहे हैं। कहीं-कहीं तो पूँजीपतियों ने ही अपनी ट्रेड यूनियनें मैदान-ए-जंग में उतार दी हैं। इसका प्रभाव वैसा ही है जैसा सेना में दुश्मन के वेष बदलकर शामिल होने पर हो सकता है। इधर ऐसी धुर दक्षिणपंथी ट्रेड यूनियनों के साथ जो साझेदारियाँ बन रही हैं वे दूरगामी परिणामों की दृष्टि से खतरनाक हैं। मुश्किल यह भी है कि हमारी वर्तमान भारतीय संसदीय राजनीति ऐसे गठबंधनों का प्रेरणा स्त्रोत है लेकिन ध्यान रखना होगा कि संसदीय राजनीति का गंतव्य और उद्देश्य वे नहीं हैं जो श्रम-आंदोलन के होते हैं।

मजदूर वर्ग या तो क्रांतिकारी होता है या फिर कुछ नहीं
अपने सदस्यों को शिक्षित करने का अनवरत और जरूरी काम ट्रेड यूनियनों से छूटा हुआ है, जिसमें अनिवार्य शिक्षा का यह सूत्र शामिल होना चाहिये कि `मजदूर वर्ग की मुक्ति, स्वयं मजदूर वर्ग का कार्य ही हो सकता है।´ इस सूत्र ने संसार में नारीवादी आंदोलन और दलित आंदोलन को भी दिशा एवं स्फूर्ति दी है। यह शिक्षा ही वह संवाद पैदा कर सकती है जो किसी आंदोलन को रोज नया आयाम तथा चेतना प्रदान करते हुए, उसे अद्यतन बनाता है ताकि वह पूँजी, पूँजीवादी तकनीक और शोषण के नवीनतम रूपों को, मुखौटों को पहचान कर उनके विरुद्ध संघर्ष कर सके। इसके उलट यह देखना दिलचस्प और बिडंवनाजन्य है कि ट्रेड यूनियन के नेतृत्व में ऐसे क्रियाशील लोगों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिनका श्रम-संगठन की विचारधारा से लगभग कोई संबंध नहीं रह गया है। उन्हें पता ही नहीं है कि अंतत: ट्रेड यूनियन एक बड़ी वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक कार्यवाही भी है। विचारधारात्मक ज्ञान के अभाव में ये नेता, अपने-अपने संस्थानों की सेवा-शर्तों, नियमों की जानकारी भर रखते हैं ताकि वे क्षेत्रीय या शहरी स्तर पर अपना वर्चस्व कायम रख सकें और एक व्यक्तिगत किस्म की जमींदारी बनाकर उसके छत्रप हो सकें। कई बार उनकी योग्यता इतनी भर होती है कि वे अपने क्षेत्र या संस्थान के अराजक, तेज-तर्रार, महत्वाकांक्षी और प्रभावशाली व्यक्ति होते हैं। ट्रेड यूनियन की विचारधारा, दायित्व, विविधता, आंदोलन और हस्तक्षेप की सकारात्मकता से उनका दूर तक संबंध नहीं होता। ये नारे लगा सकते हैं और धौंस-दपट के सहारे समायोजन करते हुए अपनी नौकरी का जीवन गुजारते हैं। इन अपढ़ बल्कि कुपढ़ नेताओं की जमात हर ट्रेड यूनियन में बढ़ती जा रही है जबकि ट्रेड यूनियन का काम गहरी बौद्धिकता, पठनशीलता, स्वप्नशीलता, क्रांतिकारिता और जमीनी क्रियाशीलता की माँग करता है।

ट्रेड यूनियन आंदोलन के लिए आवश्यक इस कथन को अब विस्मृत किया जा रहा है कि `मजदूर वर्ग या तो क्रांतिकारी होता है अथवा फिर कुछ नहीं होता है।´ जाहिर है कि यहाँ क्रांतिकारिता का अर्थ आंदोलन की स्पष्ट समझ और स्वप्नदृष्टि से है, जिसके मूल में वर्ग-संघर्ष की विचारधारा है। रोज-रोज की लड़ाइयों से भी इसका वास्ता होता है। अधिकांश श्रमिक नेताओं के जीवन को करीब से देखने पर यह सूचना मिलती है कि वे निजी विश्वासों और क्रियाकलापों में गैर-प्रगतिशील हैं, समझौतावादी ही नहीं अवसरवादी भी हैं, अवैज्ञानिकता से भरे हुए हैं फलस्वरूप उनका जीवन किसी तरह की प्रेरणा और संघर्ष का स्त्रोत नहीं बनता है। इस बीमारी को भी दूर करना होगा। संतोषप्रद है कि प्रमुख ट्रेड यूनियनों के उच्च्तम नेतृत्व के कुछ साथियों में अभी उस बुद्धिजीविता, आदर्श और समझ की कौंध दिख जाती है जिसकी अपेक्षा श्रम-आंदोलन को है लेकिन दूसरी-तीसरी पंक्ति में उसका गहरा अभाव है, जिसका खामियाजा पूरे श्रम आंदोलन को भुगतना पड़ रहा है। ट्रेड यूनियन में बौद्धिक तेजस्विता और वैचारिक प्रतिबद्धता को बचाये रखने का काम ठीक सामने है।


पूँजीवादी समाज में श्रमिक अधिकार वाष्पशील होते हैं
आज जबकि देश में वामपंथी राजनीति ह्रास का शिकार है तब ट्रेड यूनियन आंदोलन की सक्रियता ही इस खाली स्थान को भर सकती है। बल्कि वामपंथी राजनीति को सहारा और विश्वास देने का काम भी ट्रेड-यूनियन आंदोलन कर सकता है। श्रम कानूनों में विस्मित करने वाले परिवर्तन किए जा रहे हैं अथवा प्रस्तावित हैं, उसके विरोध में जो गतिशीलता और योजनाबद्ध संघर्ष चाहिए, वह अभी परिलक्षित नहीं हो रहा है। ज्ञातव्य है कि इन कानूनों से ऐसे अधिकार रक्षित हैं जो पूरे संसार के श्रमिकों को समवेत लड़ाई से एक शताब्दी में मिले हैं। इन अधिकारों में अनेक श्रमिकों के खून की चमक है और वे एक अग्रगामी, प्रगतिशील समाज के विकास के साथ-साथ अर्जित किए गए हैं। इन अधिकारों की रक्षा के लिये कठोर कदम उठाने की बजाय जैसे श्रम-संगठन स्तब्ध हैं। संभवत: इसका बड़ा कारण यही है कि वे अपने अधिसंख्य सदस्यों की समझ और गतिशीलता के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। इसके मूल में आम सदस्य-साथियों की अशिक्षा और उनकी प्रतिबद्धता पर संशय ही है।

`नौकरी की सुरक्षा´ पर सवाल खड़े करते हुए जैसे पूँजीपतियों ने ट्रेड यूनियनों के संघर्ष की दिशा ही मोड़ दी है और उन्हें बेहद रक्षात्मक तरीके अपनाने पर विवश कर दिया है। पूँजीवाद का यह आक्रमण अपने साथ बाजार का तर्क लेकर आया है। इसलिये यह वक्त ट्रेड यूनियनों के लिए कहीं अधिक व्यवस्थित और आक्रामक होने का है। अर्जित अधिकार, चाहे वे परंपरागत रूप में ही क्यों न मिल गए हों, उनकी रोज-रोज रक्षा करनी होती है क्योंकि किसी पूँजीवादी समाज में श्रमिक के अधिकारों से अधिक वाष्पशील कुछ नहीं होता। यह मान लेना कि कोई पा लिया गया अधिकार अब स्थायी है, भोलापन तो है ही, खुद को छलना भी है। कछुओं के साथ लगायी जा रही दौड़ में भी कोई खरगोश निश्चिंत नहीं रह सकता फिर यह दौड़ तो शेर और हिरणों के बीच की है।

श्रमिक होना अंतत: एक वर्ग में होना है
`वर्ग-विस्मृति´ एक दूसरी चुनौती है। संगठित क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए तनख्वाह और सुविधाएँ जैसे ही कुछ हद तक संतोषजनक और स्थायी होती हैं अथवा उनका जीवन-स्तर अन्य श्रमिकों की तुलना में जरा-सा ही बेहतर होता है, वे अपने `स्थायी वर्ग´ को विस्मृत करने लगते हैं। यह अपनी जड़ों को भूलना तो है ही, और यही पक्ष पूँजीवाद के लिए वरदान हो जाता है। इस तरह वे श्रमिकों के बीच दो फाड़ कर देते हैं। मानसिक कार्य करने वाले श्रमिकों के बीच यह विस्मृति और गफलत तेजी से फैलती है क्योंकि उन तक यह भ्रमपूर्ण प्रचार फैलाने में सफलता मिल रही है कि `मस्तिष्क-प्रमुख श्रमिक´ के रूप में वे अन्य श्रमिकों से अलग और श्रेष्ठ हैं। मस्तिष्क का श्रम और हाथ का श्रम, यह विभाजन मूलत: श्रमिकों की एकता को तोड़ने के लिये ही किया जाता रहा है। जबकि सभी प्रकार के श्रम करने वाले अंतत: श्रमिक हैं और सर्वहारा वर्ग में ही हैं। उनमें से किसी के पास वह पूँजी नहीं है जो उन्हें उत्पादक साधनों का मालिक बना सके और उनको वर्गांतरित कर दे। मस्तिष्क, हाथ, पैर, आँखें, कान ये सब इसी शरीर के हिस्से हैं, और कोई-सा भी हिस्सा श्रम में अधिक उपयोग में आये, अंतत: वह श्रम करना ही है। नौकरी छूटने की चिंता सब तरह के श्रमिकों में एक जैसी पायी जाती है क्योंकि वे साधनों के स्वामी नहीं है और अब तो वे `विकट बाजार´ के अधीन हैं।

नया आयाम यह है कि संस्थानों के प्रबंधन से, मालिकों या पूँजीपतियों से, वर्ग के रूप में श्रमिकों का जो आवश्यक द्वैत बनना चाहिए था, वह अजीब से मैत्री-भाव में तबदील होता दिख रहा है। इससे ट्रेड यूनियन की धार ही कुंद पड़ती जा रही है। तब वह `सर्वहारा के संगठन का केंद्र´ कैसे बन सकता है, यह पड़ताल और आकांक्षा का विषय है क्योंकि बिना विचारधारात्मक उद्देश्य के कोई भी श्रम-संगठन केवल `तनख्वाह बढ़ाओ समूह´ में स्खलित हो जाएगा जबकि उसके पास बेहतर दुनिया का स्वप्न हमेशा रहना चाहिये। इसलिए अनिवार्य है कि ट्रेड-यूनियनों के स्तर पर अपने शीर्ष नेताओं तथा दूसरी-तीसरी पंक्तियों के नेतृत्वकारी साथियों के बीच विचारधारात्मक शिक्षा का नियमित प्रसार हो और प्रतिबद्धताओं का महत्व समझा जाए और अपने जीवन से उनका प्रमाण दिया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु तो यही समझना होगा कि ट्रेड यूनियन आंदोलन एक व्यापक और वैचारिक गतिविधि है। इसलिए वह गहरे अर्थों में राजनीतिक और क्रांतिकारी सक्रियता भी है। उसकी एक सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका भी है। वह अकेले में की जाने वाली अथवा किसी संस्थान विशेष के श्रमिकों के बीच घटित होने वाली कार्यवाही भर नहीं है। वह समाज में उत्पादन और सेवाओं के रिश्ते तय करते हुए, नए समाज को बनाने का भी एक कारखाना है। वह समाज से उपजी है, समाज सापेक्ष है और समाज में अपना पक्ष लेकर ही काम कर सकती है। यही पक्षधर दृष्टि उसके अस्तित्व का आधार है। इसलिये तेजी से बढ़ते जा रहे असंगठित क्षेत्रों यथा प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर कंपनियाँ, निजी वित्तीय संस्थानों, सेवा क्षेत्र की अनगिन कंपनियों, होटल-पर्यटन व्यवसायों आदि तक ट्रेड यूनियन आंदोलन को अपने प्रखर, वास्तविक और वैचारिक कार्यवाही के रूप में प्रसारित करने का काम भी, वर्तमान में सक्रिय ट्रेड यूनियनों तथा समानधर्मा वामपंथी संगठनों के सामने चुनौती की तरह है।

अंत में एक प्रांसगिक निरीक्षण।
उत्तर भारत में ट्रेड यूनियन संबंधी वैचारिक परिपत्रों और साहित्य का जो थोड़ा-बहुत वितरण होता है, अचरज की बात है कि वह ज्यादातर अंग्रेजी में होता है, इससे शिक्षा और सूचना के प्रचार में गहरा अवरोध आता है। ट्रेड यूनियनों को तत्काल ध्यान देना होगा कि भाषा का अंतराल किसी भी अभीष्ट को मुश्किल बनाते हुए धीरे-धीरे असंभव बना देता है और आम सदस्य साथियों को अपढ़ बनाए रखने में अपनी अनजानी भूमिका निबाहता है।
00000

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

जनगीत

अशोक नगर इप्‍टा और प्रलेस के साथी, जिनमें हरिओम राजौरिया, पंकज दीक्षित, राजेश खैरा, विनोद शर्मा जैसे दसियों साथी शामिल हैं, वे जनगीत गायन में इतनी भावना, हार्दिकता और ऊर्जा भरते हैं कि वह सुनने का एक अनुभव हो जाता है। उसी तरह के अनुभवों को स्‍मरण करते हुए यह कविता उन्‍हें समर्पित है। सादर और सप्रेम।


जनगीत
(`इप्टा´ अशोक नगर के साथियों के लिए)


जिन तीन लोगों का स्वर अच्छा नहीं है
और वे दो जो बेसुरे हैं
ये सब दूसरी तमाम आवाज़ों के साथ मिलकर
कितने सुरीले लग रहे हैं
और अब एक तूफान खड़ा कर रहे हैं
उनकी उठान देखिए, वे नक्षत्रों तक पहुँच गए हैं
एक शब्द के फेंफड़ों में कितने लोग फूँक रहे हैं अपनी साँस
उस शब्द की छिपी ताकत दिखने लगी है
सोयी हुई पंक्तियों की अँगड़ाइयों ने रच दी है नयी देहयष्टि

एक पान की दुकान से निकलकर आया है
दूसरे की आवाज़ में सीमेंट की धूल की खरखराहट है
और एक बाँसुरी जैसे शरीर में से
नगाड़े की आवाज़ पैदा कर रहा है
जिंदगी ने खरोंच दी है उसकी आवाज
और उसे पता ही नहीं अब वह क्या कमाल कर रहा है

चीजों पर जमा धूल गिर गई है
और वे चमक रही हैं धातुओं की तरह

मनुष्य ही है जो गा सकता है गीत
दुर्दिनों के बरअक्स रखता हुआ अपने स्वप्न
कि बस अब सब कुछ ठीक होने को ही है
और इसे कोई ईश्वर वगैरह ठीक नहीं करेगा
आरोह में यह पुकार जो प्रार्थना की खाई में नहीं गिरती
यहाँ याद आती है अनायास ही गोर्की की यह बात :
`अगर तुममें वह शक्ति नहीं
और वह कुछ करने की तीव्र इच्छा नहीं
जिसकी शिक्षा देता है यह गीत
तो इसे गाने भर से कुछ नहीं मिलनेवाला !´

संगीत और शब्दों की जुगलंबदी के बहाने
यह याद दिलाने के लिए शुक्रिया
कि उठकर चलने का एक और मौका
ठीक हमारे सामने है।
0000