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मंगलवार, 29 सितंबर 2009

जनगीत

अशोक नगर इप्‍टा और प्रलेस के साथी, जिनमें हरिओम राजौरिया, पंकज दीक्षित, राजेश खैरा, विनोद शर्मा जैसे दसियों साथी शामिल हैं, वे जनगीत गायन में इतनी भावना, हार्दिकता और ऊर्जा भरते हैं कि वह सुनने का एक अनुभव हो जाता है। उसी तरह के अनुभवों को स्‍मरण करते हुए यह कविता उन्‍हें समर्पित है। सादर और सप्रेम।


जनगीत
(`इप्टा´ अशोक नगर के साथियों के लिए)


जिन तीन लोगों का स्वर अच्छा नहीं है
और वे दो जो बेसुरे हैं
ये सब दूसरी तमाम आवाज़ों के साथ मिलकर
कितने सुरीले लग रहे हैं
और अब एक तूफान खड़ा कर रहे हैं
उनकी उठान देखिए, वे नक्षत्रों तक पहुँच गए हैं
एक शब्द के फेंफड़ों में कितने लोग फूँक रहे हैं अपनी साँस
उस शब्द की छिपी ताकत दिखने लगी है
सोयी हुई पंक्तियों की अँगड़ाइयों ने रच दी है नयी देहयष्टि

एक पान की दुकान से निकलकर आया है
दूसरे की आवाज़ में सीमेंट की धूल की खरखराहट है
और एक बाँसुरी जैसे शरीर में से
नगाड़े की आवाज़ पैदा कर रहा है
जिंदगी ने खरोंच दी है उसकी आवाज
और उसे पता ही नहीं अब वह क्या कमाल कर रहा है

चीजों पर जमा धूल गिर गई है
और वे चमक रही हैं धातुओं की तरह

मनुष्य ही है जो गा सकता है गीत
दुर्दिनों के बरअक्स रखता हुआ अपने स्वप्न
कि बस अब सब कुछ ठीक होने को ही है
और इसे कोई ईश्वर वगैरह ठीक नहीं करेगा
आरोह में यह पुकार जो प्रार्थना की खाई में नहीं गिरती
यहाँ याद आती है अनायास ही गोर्की की यह बात :
`अगर तुममें वह शक्ति नहीं
और वह कुछ करने की तीव्र इच्छा नहीं
जिसकी शिक्षा देता है यह गीत
तो इसे गाने भर से कुछ नहीं मिलनेवाला !´

संगीत और शब्दों की जुगलंबदी के बहाने
यह याद दिलाने के लिए शुक्रिया
कि उठकर चलने का एक और मौका
ठीक हमारे सामने है।
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