तुर्की लेखक ओरहान पामुक ने नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय `माय फादर्स सूटकेस´ शीर्षक से अपना `नोबेल लेक्चर´ दिया था। इस लंबे भाषण का एक हिस्सा पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें लिखने के लिए जो आस्था, कारण और प्रतिबद्धता प्रकट की गई है, वह कुछ खास मायनों में अधिसंख्य लेखकों की आकांक्षा से मेल खा सकती है। उनके अपने औचित्य के साथ भी खड़ी हो सकती है।
पैराग्राफिंग बदलते हुए मैंने इसका अनुवाद किया है। यह छोटा सा गद्य मुझे बहुत प्रिय है। इसे रुचिवान लोगों के बीच रखते हुए मुझे खुशी हो रही है।
मैं क्यों लिखता हूँ ?
मैं लिखता हूँ क्योंकि लिखना मेरी एक आंतरिक आवश्यकता है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं वे सारे साधारण कामकाज नहीं कर सकता जो अन्य दूसरे लोग करते हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं आप सबसे नाराज हूँ, हर एक से नाराज हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं इसी तरह वास्तविक जीवन में बदलाव लाने में अपनी हिस्सेदारी कर सकता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे कागज, कलम और स्याही की गंध पसंद है।
मैं लिखता हूँ क्योंकि अन्य किसी भी चीज से ज्यादा मुझे साहित्य में विश्वास है। मैं लिखता हूँ क्योंकि यह एक आदत है, एक जुनून है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं विस्मृत कर दिये जाने से डरता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं उस यश और अभिरुचि को चाहता हूँ जो लिखने से मिलती है।
मैं अकेला होने के लिये लिखता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह मैं समझ सकूँगा कि मैं आप सबसे, हर एक से, बहुत, बहुत ज्यादा नाराज क्यों हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पढ़ें। मैं लिखता हूँ क्योंकि जब एक बार कुछ लिखना शुरू कर देता हूँ तो मैं उसे पूरा कर देना चाहता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि हर कोई मुझसे लिखने की अपेक्षा करता है।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे पुस्तकालयों की अमरता में एक नादान-सा विश्वास है, और मेरी उन पुस्तकों में, जो अलमारी में रखी हुई हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि जीवन की सुंदरताओं और वैभव को शब्दों में रूपायित करना एक उत्तेजक अनुभव है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका हूँ।
मैं खुश होने के लिये लिखता हूँ।
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ओरहान पामुक
नोबेल लेक्चर से एक संपादित अंश:
अनुवाद: कुमार अम्बुज
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