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शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

जैसा समाज होगा वैसा परिवार

पिछले वर्षों में कुछ नयी-पुरानी अवधारणाओं और नैतिकताओं पर विचार करता रहा हूं। फलस्‍वरूप छोटे-छोटे लेख/टिप्‍पणियां संभव हुईं। उनमें से विचारार्थ कुछ यहां दे रहा हूं। उस क्रम में यह पहला लेख।


जैसा समाज होगा वैसा परिवार
पूँजीवादी समाज में परिवार का स्वरूप

हम जानते हैं कि जब समाज अपनी प्रारंभिक अवस्था में था तो परिवार की शुरूआती अवधारणायें और परिणतियाँ अपने मूल व्यवहार में तमाम आडंबरों से रहित थीं। उनमें खुलापन, आजादी और यायावरी थी। सामंती समाज तक आते-आते परिवार पितृसत्तात्मक हो गया और पुष्ट हो गये सामंती समाज ने ही उस बंद, कट्टर, सुरक्षित, रागात्मक परिवार की नींव डाली जिसकी चिंता आज की जा रही है। जाहिर है कि इस समाज के परिवार में एक पुरुष मुखिया (या सामंत) होता है और उसकी इस अवस्थिति को बनाये रखने में समाज, परंपरा, कानून और धार्मिक व्याख्यायें शक्ति और सहायता प्रदान करती हैं। इस व्यवस्था में एक दास का होना आवश्यक है तभी परिवार का सामंती रूप पूर्ण हो सकता है। दासता के इस कार्यभार के लिये स्त्री को चुना गया। स्त्री को यह दासता गरिमापूर्ण लगे, इसके प्रति उसके मन में विद्रोह न हो इसलिये ममता, स्नेह, प्रेम, दायित्व, धर्म, कर्तव्य, शील आदि से उसे जोड़ा जाता रहा। लेकिन उसके नियम कभी भी स्त्री के लिये अनुकूल नहीं रहे। उसके लिये तो कैसे भी पति को प्रेम करना कर्तव्य और धर्म के अंतर्गत है। इस परिवार में स्त्री के शोषण के अनेक मान्य, प्रचलित और कठोर रूप रहे हैं।

स्त्री पर शासन आसान रहे इसलिये ही विवाहों में उम्र और शिक्षा को लेकर एक बेमेल पंरपरा कायम की गयी है जिसके तहत स्त्री का आयु में पुरुष से कम और शिक्षा में कमतर होना ही उचित मान लिया गया है। यदि वह आयु और शिक्षा में पुरुष से बड़ी या बराबर हुयी तो इस बात के आसार ज्यादा हैं कि उसे आसानी से शासित न किया जा सके। यद्यपि घरेलू, सामाजिक, औपचारिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा में इस बात की ग्यारंटी कर दी गयी है कि स्त्री, समाज की `पहली इकाई´ में प्रवेश करते ही किसी पुरुष का स्थायी उपनिवेश हो जाये। इसी तरह के संदर्भों में कहा जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है। इस `सामंती परिवार´ में पुरुष का जीवन सर्वाधिक आनंद में गुजरता है। गृहस्थी में उसकी जो मुश्किलें हैं वे एक नागरिक, मनुष्य और मुखिया की मुश्किलें तो हैं लेकिन गुलाम या शासित की उन मुश्किलों से बिलकुल अलग हैं जो किसी मनुष्य की तमाम संभावना, प्रतिभा, स्वतंत्रता और चेतना को बाधित, कुंठित और प्राय: असंभव कर देती हैं।

इस तरह के परिवार में कुछ अन्य लक्षण सहज ही परिलक्षित होंगे, जो दरअसल सामंती व्यवस्था के सामाजिक-नागरिक लक्षणों से उत्पन्न हैं : जैसे स्त्री संपत्ति की तरह है और उसे अर्जित किया जा सकता है। उसे रक्षित करना जरूरी है अन्यथा घुसपैठ संभव है। वह पुरुष की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी इसी वजह से है। चूँकि वह चल-संपत्ति है इसलिये उसे अपने पास बनाये रखने के लिये हिंसा भी जायज है। इस परिवार में हिंसा के तमाम रूपों की उपस्थिति सहज रहती आयी है। करुणा, दया, प्रेम, कृतज्ञता, नैतिकता, धार्मिकता और अभिनय का इस्तेमाल भी होता रहा है। आदि-इत्यादि। हर स्थिति में उसका अधिकार दोयम है, कर्तव्य प्राथमिक और अनिवार्य। पारिवारिक इकाई के इसी स्वरूप को तरह-तरह से विकसित, महिमामंडित और दृढ़ किया गया। अब इसकी रागात्मकता, सहजता, कार्यकुशलता और व्यवस्था खतरे में है।

यहाँ ध्यान देना होगा कि अब हमारा समाज राजनीतिक, औपचारिक शिक्षा, तकनीकी, न्यायिक, संवैधानिक और स्वप्नशीलता के क्षेत्रों में सामंती नहीं रह गया है, भले ही रूढ़ियों, परंपराओं, सामाजिक आचरणों, मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों आदि में सामंतीपन का ही बोलबाला है। बल्कि इन्हीं वजहों से अभी तक परिवारों में सामंती परिवेश बना रह सका है। लेकिन धीरे-धीरे पूँजीवाद ने शासन और तंत्र के वर्चस्ववादी इलाकों में अपनी ध्वजा फहरायी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके लिये सर्वाधिक सहायक हो सकती है। लोकतंत्र की आड़ ही उसे तानाशाह होने की सीधी बदनामी से रोकती है। लेकिन लोकतंत्र की उपस्थिति अपना काम करती है और परिवार में किसी एक की तानाशाही अथवा सामंती प्रवृत्ति के खिलाफ भी वातावरण बनाती है। जाहिर है कि यह पूँजीवादी, उत्तर-आधुनिक समाज भी अपने जैसा ही परिवार बनायेगा। जैसा समाज, वैसा परिवार। क्या हम भूल रहे हैं कि परिवार समाज की पहली इकाई है! ऐसा हो ही नहीं सकता कि समाज पूँजीवादी होता जाये और परिवार का चरित्र सामंती बना रहे।

पूँजीवादी समाज में अर्थवाद, संबंधों की स्वार्थपरकता, मनुष्य से मनुष्य की हृदयहीनता, हर क्रिया में छिपा निवेश तत्व, प्रदर्शनकारिता, उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद और आत्मकेंद्रिकता के लक्षण प्रमुख हैं। इन लक्षणों को सब रोज-रोज अनुभव कर ही रहे हैं। इन्हीं विलक्षणताओं के कारण पूँजीवाद में प्रेम, मनुष्यता, रागात्मकता आदि का ही नहीं बल्कि तद्जन्य संगीत, कला, साहित्‍य, अध्यवसाय का लोप होता जाता है। इन्हीं सब बिंदुओं को आप परिवार पर लागू करें तो पायेंगे कि आज के परिवार का संकट यही है। अर्थात वहाँ स्वार्थ, उपयोगितावाद, निवेश मन:स्थिति, आत्मकेंद्रिकता का प्रवेश हो गया है और जीवन की रागात्मकता, हार्दिकता, सामूहिकता, और संगीतात्‍मकता गायब है। यह होना ही है। इसे प्रस्‍तुत समाज व्‍यवस्‍था में रोका नहीं जा सकता।

अभी जो `पुराने परिवार´ के रूपक हैं और उदाहरणों की तरह टापू की तरह दिखते हैं वे सामंती अवशेष हैं। गाँवों और कस्बों के जीवन में सामंती रीतियाँ जाति, वंश, परिवार परंपरा, धार्मिकता के प्रभाव बाकी हैं अतएव वहाँ इन परिवारों का ध्वंस अभी उतना नजर नहीं आता लेकिन `पूँजीवादी समाज से उद्भूत और प्रभावित परिवार´ शहरों तथा मेट्रोज में आसानी से मिल जायेंगें। आगामी कुछ ही समय में ये `पूँजीवादी समाज के परिवार´ बड़ी संख्या में तबदील होते जायेंगे। विवाह के लिये औपचारिक संस्कार गौण होते जायेंगे और करार के विधिक, मौखिक या सहमति के अन्य प्रकार स्वीकार्य होंगे। यह पूँजीवाद के चरित्र का ही हिस्सा है। इसीके चलते संभव है कि परिवार `आजीवन संस्था´ न रहकर `अल्पकालीन या आवश्यकतानुसार अनुबंध´ तक सीमित होती चली जाये।

यहाँ एक बात गौर करने लायक है। पूँजीवादी समाज की निर्मिति से बन रहे इन परिवारों में स्त्री का पारिवारिक शोषण तो रुक जायेगा लेकिन मनुष्य की अस्मिता, गरिमा, स्वतंत्रता और उड़ान से वे काफी हद तक वंचित ही रहेंगी क्योंकि पूँजीवाद, स्त्री को `उपयोगी´ और `उपभोक्तावादी´ वस्तु में ही न्यून करता है। वह स्वतंत्र तो होगी लेकिन फिलहाल नियामक या निर्णायक नहीं। उसका `स्त्री´ होना उसके लिये नयी मुश्किलें और कुछ तात्कालिक आसानियाँ पेश करेगा। पूँजीवादी व्यवस्थायें और उसके गण उसका तदानुसार उपयोग करेंगे। यह आजादी विडंबनामूलक समस्या है। वह सामंती पिंजरे से निकलकर एक अथाह समुद्र में गिरेगी। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को परिवार का सामंती रूप अधिक सुरक्षित और विकल्पहीन लगता है। इन परिवारों के विघटन और विनाश से पुरुषों का डर तो स्वाभाविक है क्योंकि उनका साम्राज्य इससे नष्ट होता है किंतु स्त्रियों का डर, अपने नरक से प्रेम करने और उसके पालन-पोषण के तरीकों में छिपा हुआ है। प्रसन्न इस बात पर तो हुआ ही जा सकता है कि स्त्री, सामंती परिवार के कारागार से बाहर निकल पायेगी एवं नितांत नयी समस्याओं के बीच स्वतंत्रचेता और स्वावलंबी होने के लिये विवश होगी। बहरहाल, यह संक्रमणकाल है और इसके बाद कुछ राहें निकलेंगी।

यह उम्मीद करना बेमानी और काल्पनिक नहीं है कि पूँजीवादी समाज अंतत: उस मानवीय, समतावादी और सामाजिक न्यायपूर्ण व्यवस्था से प्रतिस्थापित हो सकता है, जिसे `साम्यवादी व्यवस्था´ के स्वप्न में देखा जाता है। इस आकांक्षी व्यवस्था में ऐसे परिवार की कल्पना की जा सकती है जो अपने गठन, निर्माण और परिचालन में कहीं अधिक लोकतांत्रिक, समतावादी, रागात्मक और प्रेम भरा होगा, जिसमें स्त्री को मनुष्य का गरिमापूर्ण दर्जा मिलेगा और बच्चों के पालन-पोषण में अत्याचार, क्रूरता और इजारेदारी का हिस्सा खतम हो जायेगा। मार्क्‍स-एंगेल्स आज से 155 वर्ष पहले लिखे `कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र´ में यदि `बुर्जुआ सामंती परिवार´ के संकटों का जिक्र करते हुये उसे खारिज करना चाहते हैं तो वह कोई अराजक प्रस्ताव नहीं है। अब ऐसी परिवार व्यवस्था मुश्किल में आ रही है तो यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का हिस्सा है, भले ही अभी यह हमारी श्रेष्ठ मानवीय आकांक्षाओं के अनुकूल नहीं है मगर यह अपनी प्रकृति में ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक है।
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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

एक स्‍त्री मेरा इं‍तजार करती है

अमेरिकी कवि वॉल्‍ट व्हिटमैन ने अपने जीवनकाल में कुल एक ही कविता संग्रह 'लीव्‍ज ऑव ग्रास' प्रकाशित कराया और इसे ही वे जीवन भर अद्यतन करते रहे।
प्रस्‍तुत कविता दैहिकता से शुरू होकर गहरी सामाजिकता में बदलती जाती है। इसमें स्‍त्रीवाद के वे सूत्र भी देखे जा सकते हैं, जो आगे जाकर समाजशास्त्रियों और विचारकों ने विकसित किए। इसमें वे अग्रगामी स्त्रियों की कामना करते हैं और उस गुणधर्म को संतत‍ि की नयी पीढि्यों में देखना चाहते हैं।
इसे कुछ हद तक विडम्‍बना कह सकते हैं कि अमेरिकी राजनैतिक संततियॉं उतनी उदात्‍त और मानवीय नहीं हो सकीं, जितनी एक कवि की आकांक्षा में रहती हैं। इस कविता में अनेक विमर्श विन्‍यस्‍त हैं।
- कुमार अंबुज

एक स्‍त्री मेरा इंतजार करती है

वॉल्‍ट व्हिटमैन

एक स्त्री मेरा इंतजार करती है, वह हर तरह से परिपूर्ण है,
उसमें कुछ भी कमी नहीं है
लेकिन सब कुछ व्यर्थ है यदि वहाँ रति नहीं
सब कुछ की कमी है यदि उसके पास एक सच्चे पुरुष की नमी नहीं।

रति में सब कुछ समाया है, शरीर, आत्माऍं,
अर्थ, प्रमाण, पवित्रताऍं, कोमलताऍं, परिणाम, घोषणाएँ,
गीत, आज्ञाएँ, स्वास्थ्य, गौरव, मातृात्मक रहस्य, वीर्य
संसार की सभी आशाएँ, परोपकार, तोहफे, वासनाएँ, प्रेम,
सुंदरताएँ, प्रसन्नताएँ,
दुनिया की सभी सरकारें, न्यायाधीश, ईश्वर, आगत मनुष्य
ये सब शामिल हैं रति में
उसके अपने अंश की तरह और अपने ही औचित्य की तरह।

जो मुझे पसंद है, वह पुरुष जानता है और बेझिझक स्वीकारता है
अपनी रति का स्वाद
वह स्त्री भी, जो मुझे पसंद है, जानती है और स्वीकार करती है।

अब मैं नहीं जाऊँगा उत्साहहीन स्त्रियों के पास
मैं उस स्त्री के पास जाऊँगा और रहूँगा जो मेरी प्रतीक्षा करती है
और उन स्त्रियों के पास जो मेरे लिए पर्याप्त ऊष्ण हैं
मैं समझता हूँ कि वे मुझे समझेंगी और मुझे इनकार नहीं करेंगी
मैं देखूँगा कि वे मेरे लायक हैं, मैं उनका बलिष्ठ पति साबित होऊँगा।

वे मुझसे जरा भी कम नहीं होंगी
उनके चेहरे तेज धूप और हवाओं से ताँबई होंगे
उनके शरीर में प्राचीन दैवीय कोमलता और ताकत होगी
वे तैरना जानती होंगी और नाव खेना, घुड़सवारी, कुश्ती, निशानेबाजी,
दौड़ना, वार करना, बचना, आगे बढ़ना, प्रतिरोध करना,
अपनी रक्षा करना जानती होंगी
वे शांत, स्पष्ट, आत्मनियंत्रित होंगी- अपने आप में संपूर्ण।

स्त्री, तुम्हें मैं अपने करीब खींचता हूँ
मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा, तुम्हारे लिए मैं अच्छा करूँगा,
मैं तुम्हारे लिए हूँ, तुम हो मेरे लिए, केवल हमारी अपनी खातिर नहीं,
शेष सभी की खातिर
तुम्हारे भीतर सोए हुए हैं महान नायक और कवि,
जो किसी पुरुष के स्पर्श से नहीं जागेंगे, सिवाय मेरे।

यह मैं हूँ, ऐ स्त्री, मैं अपनी राह बनाता हूँ,
मैं दृढ़ हूँ, कठोर हूँ , बड़ा हूँ, अडिग हूँ लेकिन तुम्हें प्यार करता हूँ ,
मैं तुम्हें उससे ज्यादा चोट नहीं पहुँचाऊँगा जितनी तुम्हारे लिए जरूरी है
मैं अपना सत् उँडेलता हूँ कि इन राष्ट्रों के लिए
उपयुक्त बेटे और बेटियाँ मिल सकें
मैं धीमे से, सख्त माँसपेशी से तुम्हें दबाता हूँ
निर्णायक ढंग से आबद्ध होता हूँ, मैं कोई अनुनय नहीं सुनूँगा,
मैं तब तक अलग नहीं होऊँगा जब तक कि अपने भीतर
जो कुछ लंबे समय से संचित है, उसे तुम्हें सौंप नहीं दूँगा।

तुम्हारे जरिये मैं अपनी रुकी हुयी नदियों को रिक्त करता हूँ
तुम्हें मैं आनेवाले हजारों वर्षों से आच्छादित करता हूँ
तुममें मैं अपनी सर्वाधिक प्रिय और अमेरिका की कलमों को रोपता हूँ
जो बूँदें मैं तुममें सींचता हूँ वे लड़ाकू और कसरती लड़कियों में बदलेंगी,
नये कलाकारों में, संगीतकारों और गायकों में बदलेंगी,
जो संततियाँ मैं तुम्हें दूँगा वे भी संततियाँ पैदा करेंगी
मैं अपने संसर्ग से पूर्ण पुरुषों और पूर्ण स्त्रियों की चाह रखता हूँ
मैं उनसे अपेक्षा करूँगा कि वे भी एक-दूसरे में अंत:प्रवेश करें
जैसे तुम और मैं अभी एक-दूसरे के भीतर तक प्रवेश कर रहे हैं
मैं उन फलों की आशा करता हूँ जो उनकी तेज बौछारों से प्रकट होंगे
जैसे अभी मैं आश्वस्त हूँ उन फलों के लिए
जो इन प्रवाही धाराओं से फलेंगे जिन्हें मैं तुम पर न्यौछावर करता हूँ।

मैं आगत प्यारी फसल की
जन्म, जीवन, मृत्यु और अनश्वरता में प्रतीक्षा करता हूँ ,
जिसे मैं इतने प्रेम से यहाँ रोपता हूँ।
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