शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भुनगा भी कुछ बड़ा होता है


एक घर, एक शहर


रहने के लिए एक घर चाहिए।
यह एक अधूरा वाक्य है।
दरअसल, पूरा वाक्य यह हो सकता है कि रहने के लिए शहर चाहिए और उस शहर में एक घर चाहिए। होता भी यही है कि हम पहले एक शहर खोजते हैं। किसी उल्लास में और किसी आकांक्षा के साथ हम उसे खोज लेते हैं। या कभी-कभी हमें शहर यों भी मिल जाता है कि हमने भी सोचा भी न था कि हम वहाँ, उस शहर में जाएँगे। वहाँ जाने का हम विरोध करते हैं, मातम मनाते हैं और लाख जतन करते हैं कि हम वहाँ न जाएँ। लेकिन तमाम अनिच्छा, तमाम अनमनेपन से हम वहाँ जाते हैं और कुछ समय तक लगातार खुद को दिलासा देते रहते हैं कि शायद यहीं का अन्न-पानी कुछ दिनों के लिए बदा है। फिर हम भूलते चले जाते हैं कि यह वही शहर है, जहाँं हम आना ही नहीं चाहते थे और इसके लिए हमने बहुत सारी ताकत, बहुत सारे संबंधों का जोर लगा दिया था। कभी-कभार कोई पूछे या याद करें तो ही यह सब याद आता है। इस तरह भी कोई शहर हमें खोज लेता है, समाहित कर लेता है या एक तरह से हमें बंधक बना लेता है। हम ही उस शहर को नहीं छोड़ना चाहते। फिर हमें पता चलता है कि शहर में रहना चाहते हैं तो किसी घर में ही रहना होगा। इस तरह हम एक शहर में और एक घर में एक साथ रह पाते हैं।

कुछ मुश्किल तब होती है जब शहर बढ़ता ही चला जाता है। इतना कि उसके नक्शे में आपका घर एक छोटे-से धब्बे की तरह दिखता है। फिर वह धब्बा एक बिंदुनुमा छींटे में बदल जाता है और फिर वह छींटा भी गायब हो जाता है और उसका एक हल्का सा निशान दिखता है जो दरअसल नक्शे में नहीं आपकी स्मृति में कहीं होता है। फिर आप खुद गायब होना शुरू होते हैं। धीरे-धीरे आप लुप्त होते चले जाते हैं। कहीं आपकी निशानी भी नहीं रहती है। केवल आपको ही पता रहता है कि आप इस शहर में हैं। लेकिन अकसर ही लग सकता है कि यह आपका कोई भ्रम है। मनोरोग जैसा है कि आप नहीं हैं लेकिन अपने होने को अनुभव करते हैं। फिर कुछ चीजों से आप इस भ्रम को दूर करने की कोशिश करते हैं और आखिर जानकर गहरी साँस लेते हैं कि आप वाकई हैं और यह कोई सायकी नहीं है।

राशन कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली बिल या फिर ड्राइविंग लायसेंस, बैंक पास-बुक, पासपोर्ट या पेन कार्ड आपके पास हैं। इनमें से कुछ चीजों पर तो आपकी तस्वीर भी है, पता-ठिकाना है। यह आपके होने का सच्चा प्रमाण है। इतना कि हर कोई इस पर विश्वास करता है। जो आपको जानता नहीं, जिसका आपसे किसी तरह का रिश्ता नहीं, वह भी मान लेता है कि आप इस शहर में हैं और इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता। इस समय ये सब प्रमाण, जो आप अपने घर में देख रहे हैं, आपके लिए संतोष और आश्वस्ति का विषय हैं। सबसे अधिक तो यही कि इनसे एक भ्रम, एक संशय दूर होता है। लेकिन कुछ चीजें नए सिरे से गडड्मड्ड होना शुरू होती हैं। जैसे यही कि यदि ये नहीं होंगे तो क्या आप वाकई नहीं रहेंगे! कि आपका होना इतना कागजी और इतना वायवीय है। कि हवाएँ आपको उड़ाकर ले जा सकती हैं, पानी आपको गला सकता है और अग्नि आपको भस्म कर सकती है। और गीता का ज्ञान अजीब लौकिक अर्थ में आपको याद आने लगता है। कि ये चीजें चोरी हो जाएँ तो कई दिनों तक आपका होना स्थगित हो जाए। और शहर में आपकी वापसी बेहद कठिन साबित हो।

शहर इतना विशाल, विस्तृत और अलभ्य हो चुका है कि आपको रोज-रोज अचरज होता है कि यह वही शहर है जिसे हमने इतना छोटा और कुलाँचे भरते हुए देखा था। जब इसने पहली बार अपनी देह बढ़ाई थी तो आपने भी अपनी सक्रियता के बल पर अपनी देह फुला ली थी। लेकिन जल्दी ही पता चल गया था कि यह कोई मिथकीय खेल नहीं है। आपने जब लघु रूप धारण किया तो फिर वापस अपने रूप में आ नहीं सके। और अब आप दरअसल भुनगे हैं।

नहीं, भुनगा भी कुछ बड़ा होता है।
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मंगलवार, 29 जनवरी 2013

पाठ्य पुस्‍तकें और राष्‍ट्रीय कविता


असुविधा ब्‍लॉग पर यह आलेख कवि अशोक कुमार पांडे ने दिया था।
यहॉं अपने ब्‍लॉग पर महज दस्‍तावेजीकरण के लिए और
उन साथियों के लिए जिन्‍होंने इसे पूर्व में नहीं पढ़ा है।

पाठ्य पुस्तकें और राष्ट्रीय कविता

(एक)
‘राष्ट्रीय कविता’ के बारे में शिक्षा प्रणाली के समकालीन सनातन स्वरूप और पाठ्य पुस्तकों के जरिए, एक विशिष्ट लेकिन संकीर्ण समझ प्रदान की जाती रही है। इस पूरी समझ में राष्ट्रवाद का उठान और उससे राजनैतिक लाभ लेने की नीयत हमेशा ही शामिल रही है। दरअसल, ‘राष्ट्रीय कविता’ की अनुदार व्याख्या और परिभाषाओं ने आजादी आंदोलन के दौरान रची गई तत्कालीन प्रासंगिक और अंग्रेज शासन के खिलाफ लिखी कविता को कुछ इस तरह अनवरत विराटता और औचित्य प्रदान किया गया मानो एक खास तरह की कविता ही राष्ट्रीय कोटि की होती है। बाद में पाकिस्तान और चीन से हुए युद्धों और फिर कारगिल संघर्ष ने जैसे बार-बार वातावरण बनाकर पुष्टि की कि सीमा पर लड़ रहे जवानों की यशोगाथा कहनेवाली, उनके संकटों का बयान, उनका हौसला बढ़ानेवाली, भौगोलिक सीमा पर आँच न आने देने की कसमें खानेवाली कविता ही राष्ट्रीय कविता है। यही वह अधूरी समझ है जो स्थापित करना चाहती है कि भौगोलिक सीमाएँ ही राष्ट्र बनाती हैं, उसके भीतर रह रहा समाज राष्ट्र नहीं है।
जैसे राष्ट्र सिर्फ सीमाओं से बनता है, किसी मनुष्य समाज से नहीं।

(दो)
धर्माधारित राजनैतिक पार्टियों के लिए तो राष्ट्रवाद एक शानदार ‘लांचिंग स्टेशन’ है। इस समझ को व्यापक करते हुए फिर हर चीज का वर्गीकरण किया गया। एक राष्ट्रीय। और दूसरा जिसे तथाकथित अर्थ में राष्ट्रीय न कहा जा सके। कविता में भी यही हुआ! इस ‘राष्ट्रीय कविता’ को कविता और कला और साहित्य की कसौटी पर कभी कसा ही नहीं गया। इस समझ के साथ देखा जाये तो फिर कबीर, तुलसी, मीर, गालिब राष्ट्रीय कविता लिख ही नहीं रहे थे और निराला, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय से लेकर चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल और अमित उपमन्यु तक तमाम कवियों की कविताएँ राष्ट्रीय कोटि में नहीं आ सकेंगी। जबकि वास्तविकता यह है कि तमाम कवि कहीं अधिक गहरे अर्थ में राष्ट्रीय कविता लिखते रहे हैं। समूची समकालीन कविता व्यापक रूप से राष्ट्रीय कविता है क्योंकि वह पूरे समाज, जनपद और आत्म को भी लक्ष्य करती है। बेहतरी का स्वप्न देखती है और इसके लिए वह धरती पर खींची गईं रेखाओं का गुणगान अथवा कल्पित गौरवशाली अतीत और जोश का वर्णन करना कतई जरूरी नहीं समझती। वह इन सबसे पार जाती है। दरअसल, हमारी राष्ट्र की समझ जब एक सामूहिक मनुष्य समाज के आधार पर, उसकी मुश्किलों और उपलब्धियों और चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए बनेगी तो कई संकटों का हल आसान होगा।

(तीन)
लेकिन यह समझ बनना तब कुछ आसान होगा जब कविता की जातीय श्रेष्ठता और योद्धाओं के गुणगान या प्राकृतिक भौगोलिक सीमाओं के यशोगान के शब्द-समूहों को कविता की विशेष कोटि में तबदील किए जाने का उपक्रम कुछ थमे। अभी भी हालत यह है कि पाठ्य पुस्तकों और अन्यथा शिक्षा में बच्चों को ‘देशभक्तिपूर्ण कविता’ या ‘राष्ट्रीय कविता’ के नाम से एक खास तरह की कविता का परिचय कराया जाता है। फिर सहज ही मान लिया जाता है कि समकालीन राजनीति, अन्याय, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, मीडिया, प्रदूषण, प्रशासन, शोषण या घर-परिवार की वृहत्तर मुश्किलों और हमारे समय की वास्तविकताओं को लक्ष्य कर लिखी गई कविता ‘देशभक्ति रहित’ है या ‘गैर राष्ट्रीय’ है। मानो राष्ट्र के दायरे में समाज की ये बातें और समाज के ये लोग आते ही नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ यही निकलेगा कि राष्ट्रीय कविता का काम सामाजिक विसंगतियों, अभावों, दुरवस्थाओं को विषय बनाने की बजाय सैनिकों की, स्मारकों की, सत्ता की और राष्ट्रीय प्रतीकों की प्रशंसा करना है। तब तो निश्चित ही ‘राष्ट्रीय कविता’ की यह एक सामंती समझ है जिसका पर्दाफाश किया जाना जरूरी लगता है। जबकि ऐसी कविता महज विरुदावली तक सीमित रह सकने को अभिशप्त है।

(चार)
पाठ्य पुस्तकों, तथाकथित राष्ट्रीय फिल्मी गानों से प्रारंभ होनेवाली यह समझ हमें राष्ट्र की एक गलत और अधूरी अवधारणा तक पहुँचाती है, इससे राष्ट्रवाद के झाँसे में आना कुछ आसान हो जाता है। फिर देश ‘माँ’ की जगह ले लेता है और आस्था का ऐसा केंद्र बन जाता है जिसके बारे में, जिसके प्रतीकों के बारे में, सेनाओं के बारे में कोई भी तार्किक बातचीत या ऐतिहासिक समझ के साथ बात करना लगभग देशद्रोह जैसा प्रतीत हो सकता है। इसी समझ का नवीनीकरण आजादी के बाद समय-समय पर आकाशवाणी, दूरदर्शन, मीडिया के अन्य स्वरूपों और शासकीय प्रतिष्ठानों द्वारा साल में कम से कम दो बार तो किया ही जाता है। इसीके चलते राष्ट्र को एक शाश्वत प्रकृति का तथ्य मान लिया जाता है और महज पचास या सौ या दो सौ साल पुरानी सीमाओं की हम याद भी नहीं करते हैं और मानते हैं कि ये जो वर्तमान राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएँ हैं, वे ही स्थायी हैं और रक्षा योग्य हैं। इन्हीं वजहों से ‘कविता की राष्ट्रीयता’ और ‘कविता की सामाजिकता’ की समझ गड़बड़ होते-होते यहाँ तक आ गई है कि जो कविता राज्य की सीमाओं की, नीतियों की, युद्धोन्मादी हिंसा की, तत्संबंधी नीतियों, पूर्वज राजनेताओं, युद्धकाल में सेनाओं की प्रशंसा करे वही राष्ट्रीय कविता है। फिल्मों और गीतकारों ने इस समझ का खासा व्यावसायिक उपयोग भी किया है।


(पाँच)
अर्थात सुभाष चंद्र बोस, भगतसिंह, महात्मा गाँधी या जवाहरलाल नेहरू पर लिखी कविता राष्ट्रीय होगी और रवीन्द्रनाथ टैगोर, दिलीप कुमार, पीटी ऊषा या मदर टेरेसा पर लिखी कविता राष्ट्रीय नहीं होगी। भाखड़ा नंगल बाँध पर लिखी कविता राष्ट्रीय होगी लेकिन नर्मदा बाँध की समस्याओं या विस्थापन को लेकर लिखी कविता राष्ट्रीय नहीं होगी। फिर यह भी सहज है कि खेल पर राष्ट्रीय कविता लिखना है तो हाॅकी पर लिखें और पक्षी चुनना है तो मोर को चुनें। अंततः यह समझ वहाँ जाएगी ही कि राजनैतिक या युद्ध के मोर्चे पर काम कर रहे हैं तो राष्ट्रीय काम हैं लेकिन साहित्य, समाज, संस्कृति, विज्ञान या अन्य मोर्चे पर किए जानेवाले काम राष्ट्रीय नहीं हैं। तब तो थल सेनाध्यक्ष को ही सर्वाधिक ‘राष्ट्रीय कार्य’ कर रहा व्यक्ति घोषित किया जाना उचित होगा। देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, न्यायाधीश, डाॅक्टर, इंजीनियर लेखक, उद्योगपति या समाजसेवी के काम उस तरह राष्ट्रीय नहीं हैं। फिर उस बेचारे की क्या बिसात जो मिस्त्री है, कंडक्टर है, दुकानदार है या फेरी लगाकर सामान बेच रहा है।

(छह)
किसी भी देश में धीरे-धीरे यह राष्ट्रीय समझ, बहुसंख्यक जातीयता की समझ में तबदील हो जाती है। जैसे हमारे यहाँ ‘हिन्दुत्व’ को ही ‘राष्ट्रीयता’ की समझ में संयोजित किया जा रहा है। यही समझ अंधे राष्ट्रवाद की तरफ ले जाती है। यदि मान ही लिया जाए कि राष्ट्र मूलतः सिर्फ एक भौगोलिक सीमा है तो फिर जाहिर है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ गहरे अर्थों में एक राष्ट्रविरोधी नारा है या फिर एक साम्राज्यवादी स्वप्न। इस समझ के आधार पर फिर उचित है कि एक सैनिक की बेईमानी तो देशद्रोह मानी जाए लेकिन एक उद्योगपति, राजनेता, संस्सकृतिकर्मी या प्रशासक की बेईमानी को देशद्रोह न माना जाए। तात्पर्य यह कि एक गलत समझ को सही मान लेने से सारी सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक-नैतिक परिभाषाएँ भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो जाएँगी। इस राष्ट्रीय समझ के कारण ही कह दिया जाता है कि माक्र्सवादी विचार से प्रभावित भारतीय लोग देशभक्त नहीं हैं क्योंकि वे एक विदेशी विचारक से संचालित हैं। तब कहना प्रासंगिक होगा कि श्रीलंका या जापान के लगभग सभी निवासी देशद्रोही हैं क्योंकि वे एक विदेशी विचारक ‘महात्मा बुद्ध’ से प्रेरित होकर धार्मिक हैं। रिचर्ड एटनबरो अपने देश के प्रति द्रोही हैं कि उन्होंने तमाम देशज महापुरुषों का त्याग करते हुए गाँधी पर फिल्म बनाई। और कम्बोडिया, इंडोनेशिया वगैरह में रामलीला आयोजित करनेवाले और वे जो वहाँ रहकर महावीर, नानक या विवेकानंद आदि के विचारों के समर्थक हैं लेकिन भारतीय नहीं हैं, उन्हें भी उनके देशों द्वारा राष्ट्रविरोधी मान लिया जाना चाहिए। जाहिर है कि यह समझ पर्याप्त अराजक, अपरिपक्व और मानव विरोधी है। ज्ञान विरोधी तो है ही।
चिकित्सा, कंप्यूटर और यांत्रिकी विज्ञान की तमाम अवधारणाएँ तत्काल स्वीकार करते समय भी फिर यही विचार आना चाहिए कि ये तो अन्य राष्ट्रों से प्रसूत हुई हैं और इन्हें अपनाकर राष्ट्रविरोधी हो जाएँगे।

(सात)
कहना यह है कि सच्ची कविता अपने स्त्रोत से, उद्गम से और प्रस्थान से ही मनुष्य और समाज सापेक्ष होती है, जितनी स्थानीय होती है उतनी है वैश्विक होती है और वही उसकी सच्ची राष्ट्रीयता है। उसकी अलग से कोई ‘राष्ट्रीय’ कोटि नहीं होगी क्योंकि राष्ट्र मूलतः एक मनुष्य समाज होता है। इसलिए राष्ट्रीय कविता का अर्थ सुजलाम सुफलाम तक या वीरों की स्तुतिगान तक सीमित नहीं किया जा सकता। ऐसी कविता भी यदि कविता है तो सिर्फ कविता ही होगी। जातिप्रथा, रंग भेद, लिंग भेद, कुरीतियों, अंधवश्विासों, कूपमण्डूपताओं, सांप्रदायिकता और असमानताओं पर लिखी गई कविताएँ भी राष्ट्र सापेक्ष और राष्ट्रीय होती हैं यदि वे एक बेहतर, मानवीय, स्वस्थ, वैज्ञानिक और अन्याय रहित समाज के पक्ष में खड़ी होती हैं, अपने राष्ट्र के भीतर-बाहर उठनेवाले राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों और हलचलों से टकराती हैं, उनसे प्रतिकृत होती हैं और तथाकथित ‘राष्ट्रकवियों’ की कविता से अलग कहीं अधिक वास्तविक सवालों को उठाती हैं या उन पर विमर्श संभव करती हैं। अपनी काव्यकला के साथ और संवेदना और भाषा की शक्तियों के साथ। या यों ही अपनी गहन व्याकुल प्रखरता के साथ।
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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

जीवन का चुनाव

पुष्‍यमित्र की टिप्‍पणी और उनका एक अनुवाद- संपादित रूप

मेरे कौमार्य से कीमती मेरा जीवन है : सोहेला अब्दुलाली
वाया-पुष्यमित्र


किसी भी व्यक्ति की यौन स्वतंत्रता के अतिक्रमण को एक सर्वाधिक घृणित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिये, और उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी ही चाहिये. मगर साथ ही इस क्षति के आकलन पर पुनर्विचार भी करने की जरूरत है. क्योंकि यह पुनर्विचार उसके लिए अपराध का सामना करते वक्त और उसके बाद के जीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. अधिकांश पीड़ित महिलाएं विरोध करते वक्त बड़ा शारिरिक नुकसान झेलती हैं, जैसा कि इस केस में हमने देखा कि उस युवती को जान तक गंवानी पड़ी. कई पीड़ित बाद में जान दे देती हैं, क्योंकि उनकी और समाज की नजर में बलात्कार का अर्थ उनकी इज्जत का चला जाना है. और इसके बाद जीना निर्रथक होता है. मगर क्या सचमुच यह इतना निर्रथक है. इस दुनिया में स्टीफन हाकिंग्स जैसा शारिरिक तौर पर अक्षम व्यक्ति अपनी हर महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते हुए जी सकता है, वहां एक दफा किसी यौन कुंठित अपराधी के हमले के बाद कोई भला ऐसा क्या हो जाता है कि कोई व्यक्ति जीने लायक नहीं बचता है.

इज्जत, यह जो शब्द है. बहुत पुराना और सर्वव्यापी शब्द है. हमारी दुनिया में बलात्कार ही एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें दोषी की इज्जत का तो पता नहीं, पीड़ित की इज्जत निश्चित तौर पर चली जाती है. देश में चल रहे महिला आंदोलनों ने कभी इस सवाल को बहुत गंभीरता से नहीं देखा, आज भी वे बलात्कार के बाद पीड़ित को हुई मानसिक क्षति को काफी बड़ा मानकर उसके लिए सजा की मात्रा बढ़ाने की मांग कर रही हैं. मगर वे कतई यह नहीं सोचतीं कि इस अपराध को सबसे पहले इज्जत के ठप्पे से मुक्त करने की जरूरत है. यह जो इज्जत इस अपराध के बाद जाती है, वह किसकी है? उस औरत की कतई नहीं जो शादी के बाद इस इज्जत को अपने पति को समर्पित कर देती है. यह इज्जत उस पुरुष की है, जिसे समाज पिता-भाई और पति के तौर पर स्त्री का स्वामी समझता है. इस समाज में औरतों का यौन संक्रमण उसकी इज्जत से जुड़ा है, जबकि पुरुषों का यौन संक्रमण हाल-हाल तक घर की औरतों द्वारा ही नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है.

सबसे पहले तो इज्जत के इस दोहरे मानदंड को खत्म करने की जरूरत है. रेप एक हादसा है इससे अगर किसी की इज्जत जाने की संभावना होनी चाहिये तो उस रेपिस्ट की जो किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करता है. ठीक उसी तरह जैसे एक चोर, एक पाकेटमार, एक घोटालेबाज की इज्जत चली जाती है. एक बार यह तथ्य स्थापित हो जाये तो फिर स्त्री जाति के लिए बलात्कार के हमले का सामना और उसके बाद का जीवन आसान हो जायेगा. फिर स्त्रियां यौन हमलों का सामना दृढ़ता से कर पायेंगी.

अब आपके सामने पेश है सोहेला का यह आलेखः

“मैं अपनी जिंदगी के लिए लड़ी... और जीत हासिल की”-सोहेला अब्दुलाली


तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.

मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.

यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.

वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.

जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.

मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.

बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.

उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.

इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.

मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.

जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.

रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.

पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं।
अभी रांची से प्रकाशित "पंचायतनामा" में कार्यरत हैं।
इनसे संपर्क का पता pushymitr@gmail.com है

रविवार, 6 जनवरी 2013

प्यारी लड़कियो

मनीषा पांडेय ने कुछ बिंदु कबाड़खाना ब्लॉग पर लिखे हैं।

ये दिलचस्प हैं और विचारणीय भी।

 

प्‍यारी लड़कियो!

लड़कियो!

1- अपने घरों से बाहर निकलो.

2- पब्लिक स्‍पेस पर कब्‍जा करो. यकीन करो, धरती की हर इंच जगह तुम्‍हारी है और तुम्‍हें कहीं भी जाने-होने-रहने-जीने से कोई रोक नहीं सकता.
 
3- जान लगाकर पढो, टॉप करो और अपना कॅरियर बनाओ. (करियर टॉप प्रायोरिटी पर रखो.)
 
4- अपने पैसे कमाओ, अपना घर बनाओ. अपना कमरा और अपना स्‍पेस.
 
5- एक गाडी खरीदो, दो पहिया या चार पहिया, कुछ भी चलेगा. और उस पर सवार होकर पूरे शहर ... में घूमो, दूर दराज के शहरों में भी. चाहो तो पूरे देश भर में.

6- अपनी जिंदगी की जिम्‍मेदारी अपने हाथों में लो. अपने फैसले खुद करो.
 
7- अमीर पति का ख्‍वाब छोड दो. अमीर पति से मिलने वाली सुविधाओं के साथ गुलामी भी आती है. ये पैकेज डील है. सिर्फ एक चीज नहीं मिलेगी.
 
8- प्रेम करो, अपना सेक्‍चुअल पार्टनर खुद अपनी मर्जी से चुनो.
 
9- किताबें पढो और अच्‍छा सिनेमा देखो. (प्‍लीज लड़कियों, सलमान खान को देखकर आहें भरना बंद करो.)
 
10- अपने कमाए पैसे जमा करो और उस पैसों से पूरी दुनिया घूमो. सुंदरवन के जंगलों और कन्‍याकुमारी के समुद्र तट पर अकेले जाओ. मेरी यकीन करो, अगर हम समझदार, बुद्धिमान और आत्‍मविश्‍वास से भरे हैं तो हमारे साथ कुछ नहीं होगा. और यदि कुछ बुरा हो भी गया तो इसका ये मतलब नहीं कि अगली बार हम सुंदरवन नहीं जाएंगे.
 
हम जो घरों से एक बार बाहर निकले हैं तो अब वहां लौटकर नहीं जाएंगे

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

फिर


फिर


यहॉं बैरीकेड्स लगे हैं

इससे आगे जाना लाठीचार्ज के लिए आमंत्रण है


प्रधानमंत्री से आप मिल नहीं सकते

आपको बता दिया गया है कि ज्ञापन

उधर चौकीदार को भी दिया जा सकता है

 

हर चीज की एक मर्यादा है

यदि आपको लगता है कि आप ज्‍यादा योग्‍य हैं

तो फिर सांसद का चुनाव क्‍यों नहीं लड़ते हैं

वैसे भी ऑंसूगैस ही पहले छोड़ी जाएगी

 

हम कहना चाहते हैं कि हम पर अत्‍याचार हुआ है

हमें नहीं मिला है न्‍याय

और हमें खदेड़ दिया गया है हर जगह से

 

ठीक है। हम भी उतने ही दुखी हैं

हमारा भी परिवार है, लड़के हैं, लड़कियॉं हैं

लेकिन रैली के लिए जगह नहीं है सड़कों पर

अनशन के लिए बसाया गया है बीस मील दूर

एक उजड़ा गॉंव

 

फिर। फिर।

क्‍या करें हम फिर।

 

दिमाग फिर गया है तुम्‍हारा

अब गोली चलाई जाएगी।

00000

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

अँधेरे में से अपने हक़ की रोशनी

'कविता की स्मृति' शीर्षक से एक स्‍तंभ कुछ अंकों में 'वसुधा' में कमला प्रसाद जी ने लिखवाया। उस क्रम में देवताले जी की एक कविता के संदर्भ में करीब दो बरस पहले यह नोट प्रकाशित हुआ था, जो अब उन्‍हें साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार दिए जाने के प्रसंग में यहॉं भी दे रहा हूँ। शुरू में वह भूमिका है जो स्‍तंभ शुरू करते समय लिखी गई थी। नोट के अंत में संदर्भित कविता है।

कुछ कविताएं स्मृति में अटक जाती हैं। उनमें से भी बहुत थोड़ी कविताएं आपके साथ रहने लगती हैं। साहित्य के दृश्य में प्रायः कोई उनकी याद नहीं दिलाता।उन्हें आप भी याद नहीं रखना चाहते थे लेकिन वे आपके संग हो जाती हैं। जगमगाती। कभी अंधेरे में गुमसुम। अपने संगीत और संगति में मग्न। अपनी कोमलता और पत्थरपन के साथ। सपनों और इच्छाओं की तरह। आपके तहखाने में भी वे रह लेती हैं। आपकी पंसद और शास्त्रीय समझ से परे वे आपका पीछा करती हैं। अनाक्रामक और शांत। उनका विपय, विन्यास, दुस्साहस, उत्कंठित सरलता, गुस्सा, धीरज, औचकपन या अकबकापन आपको कहीं भी, किसी भी जगह, किसी भी समय में अचानक घेर लेता है। वे आपको अपनी जद में लिए रहती हैं।
हालांकि, विस्मृति बहुत अधिक भेद नहीं करती है। वह अच्छी औ
र कम अच्छी चीजों के साथ एक सा व्यवहार कर सकती है। लेकिन स्मृति भी अपना काम करती है। चुपचाप। यह प्रक्रिया मारक है और जीवनदायी भी।
और इसी प्रक्रिया में कुछ कविताएं आपके भीतर, अपनी स्थायी नागरिकता प्राप्त कर लेती हैं। इसी में एक लेखक का, साहित्यिक का, पाठक का अकथनीय जीवन बनता जाता है।


अँधेरे में से अपने हक़ की रोशनी

करीब 15 साल पहले चंद्रकांत देवताले दैनिक भास्कर में स्तंभ लिखते थे और उसमें उन्होंने एक बार अपनी कविता प्रकाशित करायी, जो बाद में उनके कविता संग्रह ‘उजाड़ में संग्रहालय’ में संकलित हुई है। उस स्तंभ में पहली बार पढ़ी इस कविता की स्मृति जब-तब पीछा करती है।

देवताले जी की कुल कविता जीवन के अनंत प्रसंगों से बनती है और आसपास की, रोजमर्रा की छोटी-बड़ी घटनाएँ उनके काव्य विषय हैं। उनके पास अपेक्षाकृत लंबी कविताओं की सहज उपस्थिति है। शब्द स्फीति भी जैसे वहॉं काव्य उपकरण बन जाती है और उनके शिल्प का, कवि की नाराजगी, असंतोष, व्यग्रता और सर्जनात्मक बड़बड़ाहट का हिस्सा होती है। एक कवि जो अकथनीय को भी कह देना चाहता है, इसके अप्रतिम उदाहरण चंद्रकांत देवताले की कविता में देखे जा सकते हैं। परंपरागत आलोचकीय समझ एवं औजार यहॉं अपर्याप्त और कमजोर सिद्ध हो सकते हैं।

पुस्तक मेले के प्रसंग से किताबों, पुस्तकालयों, पाठकों और लेखकों के साथ बदलते समाज की प्राथमिकताओं तथा विडम्बनाओं को समेटती इस कविता का फलक व्यापक है और लगभग हर पैराग्राफ में यह अपने को नए आयामों में विस्तृत करती चली जाती है, बिना अपने केन्द्रीय विषय को विस्मृत किए।

पहली दो पंक्तियाँ ही कविता का प्रसंग और वातावरण तैयार कर देती हैं और फिर आवेग से कविता आगे बढ़ती चली जाती है। वे शब्दों और किताबों की महत्ता को, मुश्किलों को नए सिरे से काव्यात्मकता में आविष्कृत करते हैं। इस उपभोक्तावादी, प्रदर्शनकारी, महॅंगे जमाने में इन किताबों तक पहुँचना आसान नहीं रहा और इसलिए  ‘मजबूत और प्राणलेवा बन्द दरवाजे हैं/ अॅंधेरे के जैसे, वैसे ही रोशनी के भी’। किताबें, जो ज्ञान, मुक्ति और इसलिए रोशनी का घर हैं। जो अनेक तालों की चाबियॉं हैं।

पुस्तकालयों की दुर्दशा और वहाँ का विजुअल दृष्टव्य है, जिनकी जगह या जिनके आसपास अब शराबघर, जुए के अड्डे, जूतो-मोजों की दुकानें हैं या फिर इस कदर ठसाठस भरी पार्किंग है कि किताबों तक पहुँचना नामुमकिन है। लेकिन किताबें हैं कि इस युग में भी छपती ही चली जा रही हैं, अपने ताम-झाम और उत्तर आधुनिकता के साथ कदमताल करतीं। अंतर्विरोध और हतभाग्य यही कि हमारे जैसे महादेश के अधिसंख्य लोग आजादी के अर्धशतक के बावजूद इन पुस्तक मेलों में नहीं जा सकते हैं और फैले हुए विराट अॅंधेरे में से अपने हक की रोशनी नहीं उठा सकते। चाहे फिर वह कफन या गोदान के नाम से हो या किसी अन्य संज्ञा से उसे पुकारें। यह फ्रेक्चर भीतरघात से हुआ है।

इन्हीं के बीच एक अधिक सक्षम, लोकप्रिय खण्ड है जो सफलता और धन कमाने के उपायों के लिए किताबें रचता है, दुनिया को जीतने के रहस्य, अंग्रेजी जानने के तरीके बताता है और फिर साज-सज्जा से लेकर मोक्ष, व्यंजन पकाने की विधियॉं और बागवानी तक की किताबों की श्रंखला है, जिसमें बच्चों की किताबें भी हैं लेकिन वे चमक-दमक और रईसी का जीवन जी रहे मध्यवर्ग या उच्चवर्ग के बच्चों को ही नसीब हो सकती हैं। वंचित बच्चों की संख्या विशाल है। यह कविता बारीक तरीके से सबल और निर्बल, सक्षम और अक्षम, सुविधासंपन्न और वंचितों के बीच में लगातार एक तनाव रचती है। यह दो किनारों को मिलाती नहीं है, लगातार याद दिलाती है कि दो सिरे हैं और इनका होना हमारे समय का एक अविस्मरणीय लक्षण है। ये दो सिरे अनेक रूपों में दिखते हैं। औद्योगिक मेला और पुस्तक मेला, ताकतवर आवाज और कमजोर का रोना, अॅंधेरा और रोशनी, हाथी और कनखजूरे, इतिहास और भविष्य, पुच्छलतारा और आत्मा, किताबें जो तैरा सकती हैं दुनिया को लेकिन खुद डूब रही हैं, साक्षरता अभियान और निरक्षरता, लोकप्रिय और साहित्यिक पुस्तकें जैसे अनेक विलोम-संदर्भों से यह कविता अपना वितान, अपना आग्रह संभव करती है।

हमारे करीब फैली पुस्तकों-पाठकों की समस्या के रैखिक से दिखते यथार्थ को यह कविता तमाम जटिलताओं और करुण हास्यास्पदता के बीच रखकर जाँचती परखती है। कविता अपने अंत में कवि, कथाकार, विचारक, लेखकों, प्रकाशकों को भी सवालों के घेरे में लेती है और इधर के एक सामान्य लेकिन बार-बार उठाये जानेवाले प्रश्न को रखती हैः ‘इन्हें जो लिखेंगे क्या वे ही पढ़ेंगे? कहेंगे जो वे ही सुनेंगे?’ और वे तमाम लोग जो फिर पीछे छूट गए हैं, क्या वे कभी जान पाएँगे कि उनका भी कोई घर भाषा के भीतर हो सकता है? इस कविता का विशिष्ट पहलू यह भी है कि यह सीधे-सीधे अपने वर्तमान से, समकालीनता से टकराती है और अपनी परिधि को संकुचित नहीं रहने देती।
एक कवि अपने समय-समाज के शब्दों और किताबों के साथ होनेवाली दुर्घटना को लेकर, अन्यथा उसकी उपलब्धियों पर विचार करते हुए कितना बेचैन और सजग हो सकता है, यह कविता इसी का विमर्श तैयार करती है। विचार करें तो यह विमर्श अभी भी प्रासंगिक बना हुआ है।


करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें



चन्द्रकांत देवताले
 
औद्योगिक मेले के बाद अब यह पुस्तकों का
मेला लगा है अपने महानगर में,
और भीड़ टूटेगी ही किताबों पर
जबकि रो रहे हैं बरसों से हम, कि नहीं रहे
किताबों को चाहने वाले, कि नहीं बची अब
सम्मानित जगह दिवंगत आत्माओं के लिए घरों में
कहते हैं छूंछे शब्दों के विकट शोर-शराबे में
हाशिए पर चली गई है आवाज़ छपे शब्दों की
यह भी कहते हैं कि संकट में फँसे समाज और जीवन की
छिन्न-भिन्नताओं के दौर में ही
उपजती है ताकतवर आवाज़ जो मथाती है
धरती की पीड़ा के साथ, पर इन दिनों सुनाई नहीं देती
मज़बूत और प्राणलेवा बन्द दरवाज़े हैं
अँधेरे के जैसे, वैसे ही रोशनी के भी
इन पर मस्तकों के धक्के मारते थे मदमस्त हाथी कभी
अब किताबें हाथी बनने से तो रहीं
पर बन सकती हैं चाबियाँ-
कनखजूरे निकल कर
इनमें से हलकान कर सकते हैं मस्तिष्कों को
फूट सकती है पानी की धारा इनमें से
और हाँ! आग भी निकल सकती है
इन्हीं में है अपनी पुरानी बन्द दीवार घड़ी
बमुश्किल साँस लेता हुआ
मनुष्यों का इकट्ठा चेहरा
हमारे युद्ध और छूटे हुए असबाब
हवाओं के किटकिटाते दाँतों में फँसे हमारे सपने
रोज़मर्रा के जीवन में धड़कती हमारी अनन्तता
और उन रास्तों का समूचा इतिहास
जिनसे गुज़रते यहाँ तक आए
और हज़ारों सूरज की रोशनी के नीचे
धुन्ध और धुएँ के बिछे हुए वे रास्ते भी
भविष्य जिनकी बाट जोहता है
पता नहीं अब कौन सा पुच्छलतारा
आकाश से गुजरा
कि विचारों के गर्भ-गृह के सबसे निकट होने की
ज़रूरत थी जब
आदमी पेट और देह से सट गया
और अपनी प्रतिभा के चाकुओं से जख्मी करने लगा
अपनी ही आत्मा
जो पवित्र स्थानों को मंडियों में बदल सकते हैं
उनके सामने पुस्तकों-पुस्तकालयों की क्या बिसात
जहाँ पुस्तकालय थे कभी, वहाँ अब शराबघर हैं
जुए के अड्डे, जूतों-मोजों की दुकानें हैं
और जहाँ बचे हैं पुस्तकालय वहाँ बाहर
पार्किंग ठसाठस वाहनों की
जिनसे होकर किताबों तक पहुँचना लगभग असम्भव है
भीतर सिर्फ आभास है पुस्तकालय होने का
और किताबें डूब रही हैं और जाहिर है कह नहीं सकतीं
'बचाओ! बचाओ-दुनियावालों तुम्हारे
पाँव के नीचे की धरती और चट्टान खिसक रही है।‘
अपने उत्तर आधुनिक ठाटबाट के साथ
धड़ल्ले से छपती हैं फिर भी किताबें
सजी-धजी बिकती हैं थोक बाजार में गोदामों के लिए
करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें
सर्कस का-सा भ्रम पैदा करते खड़ी हो सकती हैं
उनमें से निकल सकते हैं जेटयान, गगनचुम्बी टॉवर
कारखाने, खेल के मैदान, बगीचे, बाघ-चीते
और लकड़बग्घा हायना कहते हैं जिसे
पुस्तकें ऐसी भी जिनसे तकलीफ न हो आँखों को
खुद-ब-खुद बोलने लग जाए
चाहो जब तक सुनते रहो
दबा दो फिर बटन-अँधेरा और आवाज़ बन्द हो जाए
जिन्हें अपनी पचास साला आज़ादी ने
नहीं छुआ अभी तक भी इतना
कि वे घुस सकें पुस्तक-मेले में
उठा लें अपने हक की रोशनी 'कफन’, 'गोदान’
या मुक्तिबोध के 'अँधेरे में’ से
और वे भी जो फँसे हैं
साक्षरता-अभियान के आँकड़ों की
भूल-भुलैया में नहीं जानते
कि करोड़ों के नसीब के भक्कास अँधेरे
और गूँगेपन के खिलाफ कितना ताकतवर गुस्सा
छिपा है किताबों के शब्दों में
और दूसरे घटिया तमाशों के लिए हज़ारों के
टिकट बेचने-खरीदने वालों की जि़न्दगी में
चमकते ब्रांडों के बीच गर होती जगह थोड़ी-सी
सही किताबों के लिए
तो वे खुद देख लेते छलनाओं की भीतरघात से
हुआ फ्रेक्चर
घटिया गिरहकट किताबों के हमले से
जख्मी छायाओं की चीख सुन लेते
अपने फायदे या जीवन की चिन्ता की
जिस सीढ़ी पर होंगे जो
खरीदेंगे-ढूंढ़ेंगे वैसी ही रसद अपने लिए
सफलता और धन कमाने
और दुनिया को जीतने के रहस्यों के बाद
अंग्रेज़ी सीखने और इसका ज्ञान बढ़ाने वाली
किताबों पर टूटेगी भीड़
इन्हीं पुस्तकों में छिपा होगा कहीं न कहीं
अपनी आबादी और मातृभाषा को
विस्मृत करने का अदृश्य पाठ
फिर प्रतियोगी परीक्षाएँ, साज-सज्जा
स्वास्थ्य, सुन्दरता, सैक्स, व्यंजन पकाने की
विधियाँ, कम्प्यूटर से राष्ट्रोत्थान
धार्मिक खुराकों से मोक्ष और फूहड़ मनोरंजन
टाइम पास-जैसी किताबों के बाद भी
बचेगी लम्बी फेहरिस्त जो होगी
क्रिकेट, खेलकूद, बागवानी, बोनसाई,
अदरक, प्याज, लहसुन, नीम इत्यादि-इत्यादि के
बारे में रहस्यों को खोलने वाली
बीच में होगा आकर्षक बगीचा बच्चों के लिए
चमकती, बजती, महकती और बोलती पुस्तकों का
मुट्ठी भर बच्चे ही चुन पाएँगे जिसमें से
और जो बाहर रह जाएँगे असंख्य
उनके लिए सिसकती पड़ी रहेंगी
चरित्र-निर्माण की पोथियाँ
और अन्तिम सीढ़ी पर प्रतीक्षा करते रहेंगे
दिवंगत-जीवित कवि, कथाकार, विचारक
वहाँ भी होंगे चाहे संख्या में बहुत कम
जिनके लिए सिर्फ संघर्ष है आज का सत्य
इन्हें जो लिखेंगे क्या वे ही पढ़ेंगे?
कहेंगे जो वे ही सुनेंगे?
और जिनके लिए जीवन के महासागर से
भरी गई विराट मशकें
साँसों की धमन भट्टी से दहकाए शब्द
क्या वे कभी जान पाएँगे कब जान पाएँगे
कि उनका भी घर है भाषा के भीतर!!

सोमवार, 19 नवंबर 2012

एक कवि ऋणग्रस्‍त ही होता है


यह साक्षात्‍कार आईसाहित्‍य http://isahitya.com  द्वारा करीब एक साल पहले लिया गया था। इसे आज अचानक पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसे ब्‍लॉग पर रखा जाए। किंचित संपादित रूप में यह यहॉं हैं। पूरी बातचीत के लिए इसका लिंक है- http://isahitya.com/index.php/2011-09-20-18-35-32/interviews/222-talk-to-isahitya

 कैसा रहा आपका अब तक का सफर एक कवि , एक लेखक के तौर पर? शायद रचनाकर के लिए कभी संतुष्टि होना संभव नहीं हैं लेकिन फिर भी आप अब तक के सफर को किस तरह देखते हैं?

 यह यात्रा है और जारी है। इसकी सुंदरता, उपलब्धि और संतुष्टि अनवरत होने में ही है। 
 हम आपके पुराने समय में लौटना चाहेंगे , क्या आप  हमेशा से लिखना चाहते थे क्या शुरुआत में ही आपने सोच लिया था की आप आगे चल कर साहित्य को गंभीरता से लेंगे ? उस कहानी के बारे में जानना चाहेंगे जिसने आपको एक रचनाकार बना दिया ?
 कहानी, कविता पढ़ना चौंकाता था, जीवन में कुछ अलग रसायन पैदा करता था। चीजों के बारे में विचार बनने लगते थे और लगता था कि अब अपने आसपास को लेकर, इस दुनिया-जहान के बारे में, मैं अन्य समवयस्कों की तुलना में कुछ अधिक वाक्य बोल सकता हूँ। लेकिन लिखना कठिन काम लगता था। लगभग 26 वर्ष की आयु में लगा कि साहित्य को कुछ गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साहित्य में मेरा प्रवेश कुछ उम्रदराज होकर ही हुआ है।
‘साक्षात्कार’ के कवितांक और ‘पहल’ के कुछ अंकों से जब परिचय हुआ तो बेहतर साहित्य से मुलाकात हुई। फिर अनेक पत्रिकाएँ और किताबें। लगभग चार-पाँच साल तक खूब पढ़ना हुआ। इसी के साथ लिखना भी हुआ। मेरे कस्बे के जीवन में मुझे अनेक अनुभव और दृश्य ऐसे लगते थे जिनका कविता में कोई इंद्राज नहीं हुआ था। मैं व्यग्रता से भरकर, संवेदित होकर लिखता चला गया। अनेक कविताएँ लिखीं और बरसों तक कहीं नहीं छपीं। जहाँ भी भेजो वहाँ से तीन-चार दिन में ही लौटकर आ जाती थीं, जैसे वे मुझे छोड़कर कहीं जाना ही नहीं चाहती थीं। एकाध अपवाद भी हुआ।
 1988 में ‘वसुधा’ ने मेरी चैबीस कविताओं की काव्य पुस्तिका ‘सुनेंगे हम फिर’ प्रकाशित की। और इसी वर्ष ‘हंस’,‘साक्षात्कार’ और ‘दस्तावेज’ ने भी कुछ कविताएँ छापीं। इससे दृश्य एकदम परिवर्तित हो गया। मुझे अनेक पत्र मिले। शायद पाँच-छह सौ से ज्यादा चिट्ठियाँ आई होंगी। और 1989 में इन्हीं कविताओं में से ‘किवाड़’ को, जो ‘साक्षात्कार’ में प्रकाशित हुई थी, श्री नेमिचंद्र जैन ने भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया। मैं तब एक बहुत छोटे कस्बे ‘मुँगावली’ में रहता था। साहित्य की दुनिया में मेरा कोई विशेष परिचय नहीं था। और इस एक पुरस्कार ने मेरे लिए काफी कुछ बदल दिया।
 कविता को चुनने के पीछे कोई विशेष कारण , प्रभाव ? एक कवि के तौर पर आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन कौन से रचनाकार रहे जिन्हें आपने अपने शुरुआती दिनो में  पढ़ा और उनसे बेहद प्रभावित हुये ?
 शायद मैं कविता ही लिख सकता था। एक संवेदना, एक विचार और एक दृश्य मुझ पर जैसे झपट्टा मारता था। उस आवेग का प्रतिफलन कविता में होता था।रामचरितमानस की अनेक भावप्रवण और उपमाओं, रूपकों से भरी पंक्तियों का प्रारंभ में मेरे ऊपर काफी प्रभाव रहा है। 
 प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ते हुए वामपंथ और मार्क्‍सवाद से गहरा परिचय हुआ। पच्चीस से अधिक रचना शिविरों में शिरकत की और खूब बहस हुई। इससे विचार, समझ और दृष्टि में व्यापकता आई। अपनी कमजोरियों और कमतरियों का अनुमान भी हुआ। फिर धीरे धीरे निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, नेरूदा, व्हिटमैन, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, विनोद कुमार शुक्ल, केदारनाथ सिंह, धूमिल, की कविताओं से गुजरते हुए कविता के वैविध्य और नयी ताकत का अहसास हुआ। चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, ज्ञानेंद्रपति, भगवत रावत, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश, अरुण कमल, राजेश जोशी, असद जैदी, विष्णु नागर के संग्रह  गुना की जिला शासकीय लायब्रेरी से पढ़े। दुष्यंत कुमार के संग्रह भी। इन जिला शासकीय पुस्तकालयों की स्थापना में अशोक वाजपेयी की प्रखर भूमिका थी। 
इनसे कविता के पक्ष में धारणा और प्रेम कुछ और दृढ़ हुआ होगा, ऐसा मुझे अब लगता है। किंचित असहमति भी पैदा हुई और लगा कि इन सबसे पृथक कुछ मेरे अनुभव में है जिसे मैं कविता में रूपायित कर सकता हूँ। असहमतियाँ भी प्रेरक होती हैं। लेकिन बाद में मुक्तिबोध की कविताओं के साथ उनकी डायरी ने काफी प्रभावित किया। इधर मेरे तमाम दूसरे समकालीन विमल कुमार, देवीप्रसाद मिश्र, एकांत श्रीवास्‍तव, बद्रीनारायण, कात्‍यायनी, सविता सिंह, अनीता वर्मा, आशुतोष दुबे, बोधिसत्‍व, हरिओम राजौरिया, नीलेश रघुवंशी सहित इधर आये अनेक कवियों की कविताएं दिलचस्‍पी और चुनौती का कारण बनती हैं।
एक रचनाकार पर अपने आसपास की हर चीज का, हर शब्द का और हर ध्वनि का प्रभाव पड़ता है। वह ऋणग्रस्‍त ही है। वह दस हजार तत्वों से मिलकर बनता है। रोज बनता रहता है। उसे किसी एक दो प्रभावों में न्यून नहीं किया जा सकता। सबसे ज्यादा प्रभाव तो अपने बचपन का, स्मृतियों का, अपनी असहायताओं, जिज्ञासाओं और असमर्थताओं का होता है। जैसे एक कवि कविता लिखते हुए इन सब पर विजय पाना चाहता है या इन्हीं में घुलकर कोई नया पदार्थ बन जाना चाहता है। मुझे लगता है कि एक कहानीकार, उपन्यासकार या आलोचक की तुलना में कवि इस संसार में कहीं अधिक मिस फिट और अवसादग्रस्त व्यक्ति होता है। अधिक संवेदित, स्पर्शग्राही, और कहीं अधिक भावुक और विश्वासी। एक कवि बार-बार धोखे खा सकता है, एक कवि को किसी अन्य रचनाकार की तुलना में कहीं अधिक आसानी से ठगा जा सकता है। यह उसकी कोई प्रशंसा, निंदा या प्रशस्ति नहीं है, बस एक स्वभाव और बनावट पर ध्यानाकर्षण है। हालाँकि सजग, चतुर और चालाक कवियों की भी उपस्थिति हो सकती है लेकिन मैं उन्हें आपवादिक मानता हूँ।
 किवाड़ , क्रूरता , अतिक्रमण और अनिंतम , आपके प्रमुख कविता संग्रह रहे हैं । लेकिन एक प्रश्न जो सबसे पहले 
मन में आता हैं की इन शीर्षकों को चुनने के पीछे आपका कोई विशेष विचार ?
 पहले संग्रह का नाम तो पुरस्कृत, स्वीकृत और चर्चित कविता के नाम पर सहज ही हो गया। लेकिन ‘क्रूरता’, ‘अनंतिम’, ‘अतिक्रमण’ और अभी ‘अमीरी रेखा’ः इन संग्रहों के नाम समय विशेष के दौरान लिखी गई कविताओं के कुल चरित्र, प्रतिवाद और आकांक्षा को केंद्र में रखकर ही चुने हैं। एक तरह से वे अपने उस कालखण्ड पर टिप्पणी, विमर्श, प्रतिरोध, पराभव और प्रस्ताव को लक्षित करते हैं। इनमें समकालीन प्रवृत्त्यिों की पहचान की कोशिश है और हाशिए पर छूट गई कुछ चीजों को बीच बहस में शामिल करने की मंशा भी। संभव है कि इनका यही अर्थ और भावना पाठकों तक भी पहुँची हो।
 आपकी अतिक्रमण (2002) कविता संग्रह के बाद आपका एक गद्य इच्छाए (2008द) प्रकाशित हुआ। क्या इस बीच के समय कोआपने विशेष रूप से गद्य (कहानियो) को दिया ? आप गद्य हमेशा से लिखते थे लेकिन आपने अचानक से इन्हें प्रकाशित करने का निर्णय कैसे लिया ?  क्या लिखते समय आप प्रकाशन या किसी  निश्चित समय में इसे पूरा करने के बारे में सोचते हैं?
 मैं विनम्रता लेकिन दृढता से कहना चाहता हूँ कि कहानियाँ मैंने इसलिए लिखीं कि मैं पिछले दस-पंद्रह साल की अधिसंख्‍य हिंदी कहानियों के गद्य से बेहद निराश था। उनकी कृत्रिमता, नाटकीयता, इतिवृत्तामत्कता, अलौकिकता, इतिहास की कोई घटना या दुर्लभ बीमारियों के संदर्भ से बनाया गया कथासार, उनकी स्थूलता, विद्रूपता, शिल्प की अतिरिक्त सजगता, महीनता, काम चित्रावली और बौद्धिकता से मैं, अपनी तरह का एक पाठक, थक गया था। वे बहुत से शब्दों से बनी हुई विशाल, बड़बोली कहानियाँ थीं जिन्हें लिखनेवाला किसी उच्चतर जगह पर बैठा सृष्टा था। मुझसे वे पढ़ी भी नहीं जाती थीं। उनमें सब कुछ था बस सहजता, संबंध, जीवन का उत्स, सच्ची निराशा, अपराधबोध, मार्मिकता और अवसाद गायब था। वे महान कहानियाँ थीं और उनमें साधारण चीजें, रोजमर्रा का जीवन और आपाधापी अनुपस्थित थी। उनमें गद्य का एक अच्छा, स्वाभाविक पैराग्राफ खोजने पर भी नहीं मिलता था। यद्यपि ढर्रे में लिखा गया विपुल गद्य। प्रसंगों और घटनाओं के लिए आविष्कृत बरसों पुराना बासी गद्य। एक अच्छा वाक्य खोजने के लिए, कथा में जीवन, उत्साह, आलोचना, अस्वीकार और स्क्रीनिंग के लिए मुझे एक चैथाई सदी पीछे, ज्ञानरंजन के पास जाना पड़ता था। मैं महज अपना एक प्रतिवाद रखना चाहता था। एक शिकायत और एक इच्छा। मैं आलोचक की तरह यह काम करने में समर्थ नहीं था इसलिए मेरे पास इसका कोई सर्जनात्मक उपाय ही मुमकिन था। मैं नहीं कह सकता कि क्या कुछ मैं कर पाया लेकिन उसे एक रचनात्मक आकांक्षा और असहमति की तरह भी देखा जा सकता है। संभवतः इसलिए ही उनमें विषयों और विधागत अतिक्रमण का वैविध्य भी संभव हो सका। किस्सागोई के शाश्वत तरीके भी खास तरह की ऊब पैदा करते हैं।
 जानना दिलचस्प लग सकता है कि एक कहानी तो ‘पहल’ के लिए ज्ञानरंजन जी ने आग्रहपूर्वक लिखवा ली क्योंकि किसी अंक में वे कवियों का गद्य छापना चाहते थे। बाकी कहानियाँ फिर लिखी होती गईं लेकिन उन्हें कहीं प्रकाशन के लिए भी दो बरस तक नहीं भेजा। किसी प्रसंग में रवीन्द्र कालिया जी को तीन कहानियाँ भेजी गईं और उन्होंने तीनों कहानियों को ‘वागर्थ’ के लगातार अंकों में और फिर ‘ज्ञानोदय’ में चार-पाँच कहानियों को प्रकाशित किया। इस तरह वे संग्रहाकार लायक हो गईं।
 अपनी नयी कविता संग्रह  अमीरी रेखा के बारे में  कुछ बताइये । इसके शीर्षक के पीछे भी गहरी सामाजिक 
समस्या का अनुभव होता हैं । इस कविता संग्रह में आपकी किस तरह की कविताओ का संग्रह हैं? आज के समय आर्थिक विषमता,  भ्रष्टाचार , कमजोर होता लोक तंत्र और हमारे सामाजिक जीवन में संस्कृति व सभ्यता का पतन कुछ बुनियादी  मुद्दे हैं तो क्या ये कविता संग्रह इन  सब को सामने लाने की कोशिश हैं क्योंकि ये संग्रह आपका उस समय आया हैं जब वाकई हर जगह इन समस्याओ पर क्रोध हैं ।
जैसा कि मैंने ऊपर इंगित किया कि किसी कालखंड में लिखी कविताएँ अपने समय और समाज से प्रतिकृत होती ही हैं। अमीरी की रेखा कोई हो नहीं सकती और उसकी पड़ताल करना मुश्किल है। वह प्रवृत्तियों में, अमानुषिकता और पूँजीवादी विचार में कहीं खोजी जा सकती है। और ऐसे तमाम प्रत्यय हैं, विडंबनाएँ और विषमताएँ हैं जो इधर समाज में बढ़ती जा रही हैं लेकिन उन पर विमर्श गायब है। बहस के, विचार के गलियारों से भी वे बहिष्कृत हैं। मुझे अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते ये सब चीजें कहीं अधिक विचारणीय लगती हैं, संवेदित करती हैं, परिचालित करती हैं। याद रखने की बात है कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिकता, समानता और समाजवाद की चाह अभी अप्रासंगिक नहीं हुई है। इन सबको एक ग्लोबल ओट में रखा जा रहा है।