गुरुवार, 1 जनवरी 2009
डर
लंबे समय के बाद एक बार फिर ब्लॉग पर हूं।
नये वर्ष की शुभकामनाएं।
रिल्के की तमाम सुंदर कविताओं में से यह एक कविता
मनुष्य के मनोजगत के भय और आशंका की दिलचस्प
पड्ताल करती है।
डर
रिल्के
मैं पाँचवी मंजिल पर अपने बिस्तर में लेटा हूँ और मेरा दिन
जिसमें कोई रोक-टोक नहीं है, एक ऐसी घडी के चेहरे की तरह
है जिसके हाथ नहीं हैं। जैसे कुछ जो बहुत पहले खो गया था,
एक सुबह यकायक वापस मिलता है सुरक्षित और सकुशल अपनी
पुरानी जगह पर- जैसा गुम हुआ था उससे भी बेहतर- जैसे इस बीच
कोई उसकी रक्षा करता रहा, इसलिए अब मेरे कंबल पर यहाँ-वहॉं
बचपन की खोई हुईं अनुभूतियॉं हैं- जैसे एकदम नयी और ताजा।
खोये हुए सारे डर भी यहॉं जमा हो गये हैं।
जैसे यह डर कि मेरे कंबल की मगजी में से निकलता हुआ ऊन
का धागा अचानक कठोर हो सकता है, कठोर और नुकीला, जैसे सूई
का सिरा। यह डर कि रात की पोषाक का यह छोटा-सा बटन यकायक
बडा होता चला जायेगा, मेरे सिर से भी बडा और भारी और यह डर
कि बिस्तर से गिरता ब्रेड का यह टुकडा किसी कॉंच में बदलकर फर्श
से टकराते ही चूर-चूर हो जायेगा और यह भयानक चिंता कि ऐसा
होते ही हर एक चीज हमेशा के लिए टूट-फूट जायेगी और यह डर कि
फटे हुए लिफाफे के भीतर चिट्ठी रह जायेगी यों ही अनदेखी, जैसे कोई
बेशकीमती चीज जिसके लिए कमरे में कोई भी जगह महफूज नहीं- यह
डर कि यदि मैं सो गया तो सिगडी के सामने पडा अंगार निगल सकता
हूँ या यह कि कोई संख्या मेरे मस्तिष्क में बढती ही चली जाएगी
जब तक कि मेरे दिमाग के कोने-कोने को न भर दे, और यह डर कि
मैं एक ग्रेनाईट पर, भूरे ग्रेनाईट पर सोया हुआ हूँ या यह डर कि मैं
अचानक चीखना शुरू कर सकता हूँ- लोग दौडे आऍंगे, तोड देंगे मेरे
कमरे का दरवाजा और यह डर कि मैं खुद को ही दे दूँगा एक दिन
धोखा और सब कुछ कह दूँगा- मैं डरता हूँ कि कहीं मैं कुछ भी कहने
लायक न रहूँ क्योंकि सब कुछ अंतत: अकथनीय है- और भी डर हैं-
डर ही डर।
मैंने अपने बचपन को पाने के लिए की थी प्रार्थना और वह वापस
सामने है और उतना ही मुश्किलों से भरा है जितना हुआ करता था-
और आज तक मेरे वयस्क होते जाने का कोई मतलब नहीं रह गया है।
00000
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008
आज की रात लिख सकता हूं मैं
पॉब्लो नेरुदा की 20 प्रेम कविताओं में से इस कविता के संसार में अनेक भाषाओं में अनगिन अनुवाद हुए हैं। हिन्दी में ही इसके कम से कम दस से अधिक अनुवाद किए गए हैं। इससे जाहिर है कि यह कविता अछोर व्यंजना, प्रेम, उदासी और हार्दिकता से भरी है। यह कविता बता सकती है कि कविता का अनुवाद नहीं, उसका पुनर्लेखन ही संभव होता है। बहरहाल।
सबसे उदास पंक्तियॉं
पाब्लो नेरुदा
आज की रात लिख सकता हूँ मैं सबसे उदास पंक्तियाँ।
लिख सकता जैसे- यह तारों भरी रात है
और तारे नीले हैं सुदूर और कांपते हैं।
रात की हवा चक्कर खाती है आसमान में और गाती है।
आज की रात मैं लिख सकता सबसे उदास पंक्तियाँ
मैंने उससे प्यार किया और कभी-कभी उसने भी मुझे प्यार किया।
ऐसी आज की तरह की रातों में वह मेरी बाहों में रही
मैंने उसे अनंत आकाश के नीचे बार-बार चूमा।
उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया
आखिर कोई उसकी सुंदर निश्चल आखों को प्यार कैसे न करता।
आज की रात मैं लिख सकता सबसे उदास पंक्तियॉं
यह ख्याल करते हुए कि अब वह मेरे पास नहीं
यह सोचते हुए कि मैंने उसे खो दिया।
इस असीम रात को सुनते हुए, जो उसके बिना और असीम है
और कविता गिरती है आत्मा पर जैसे घास पर ओस।
क्या हुआ जो मेरा प्रेम उसे रोक नहीं पाया
यह तारों भरी रात है और वह मेरे साथ नहीं है।
बस। दूर कोई गा रहा है। बहुत दूर।
मेरी आत्मा बेचैन है कि वह मुझसे खो गयी।
मेरी निगाह उसे खोजती है कि उसे मैं पास ला सकूँ
मेरा हृदय उसके लिए विकल है, और वह मेरे साथ नहीं है।
वैसी ही रात उसी तरह, उन्हीं पेड़ों को चाँदनी का बना रही है
हम ही, जैसे थे, अब वैसे नहीं रह गए हैं।
तय है, अब मैं उसे प्यार नहीं करता, मगर मैंने उसे कितना प्यार किया।
मेरी आवाज उस हवा को खोजती है कि उसकी आवाज को छू सके।
किसी और की। वह किसी और की होगी।
जैसे पहले वह मेरे चुंबनों के लिए थी।
उसकी आवाज। उसकी उज्जवल देह। उसकी वे असीम आँखें।
सच है कि अब मैं उसे प्यार नहीं करता
पर मुमकिन है कि अब भी करता होऊँ
प्रेम इतना ही संक्षिप्त होता है और विस्मृति में इतना लंबा वक्त।
ऐसी ही रातों में भरता रहा मैं उसे बाहों में
मेरी आत्मा अशांत है कि उसे मैंने खो दिया।
मुमकिन है कि यह आखिरी वेदना है जो वह मुझे दे रही है
और मुमकिन है, ये आखिरी पंक्तियाँ हैं जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ । 00000
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008
सब तुम्हें नहीं कर सकते प्यार
यह मुमकिन ही नहीं कि सब तुम्हें करें प्यार
यह जो तुम बार-बार नाक सिकोड़ते हो
और माथे पर जो बल आते हैं
हो सकता है किसी एक को इस पर आए प्यार
लेकिन इसी वजह से ही कई लोग चले जाएंगें तुमसे दूर
सड़क पार करने की घबराहट खाना खाने में जल्दबाजी
या ज़रा-सी बात पर उदास होने की आदत
कई लोगों को तुम्हें प्यार करने से रोक ही देगी
फिर किसी को पसंद नहीं आएगी तुम्हारी चाल
किसी को ऑंख में ऑंख डालकर बात करना गुज़रेगा नागवार
चलते-चलते रुक कर इमली के पेड़ को देखना
एक बार फिर तुम्हारे खिलाफ जाएगा
फिर भी यदि तुमसे बहुत से लोग एक साथ कहें
कि वे सब तुमको करते हैं प्यार तो रुको और सोचो
यह बात जीवन की साधारणता के विरोध में जा रही है
देखो, इस शराब का रंग नीला तो नहीं हो रहा
यह होगा ही
कि तुम धीरे-धीरे अपनी तरह का जीवन जीओगे
और अपने प्यार करने वालों को
अजीब मुश्किल में डालते चले जाओगे
जो उन्नीस सौ चौहत्तर में और जो उन्नीस सौ नवासी में
करते थे तुमसे प्यार
उगते हुए पौधे की तरह देते थे पानी
जो थोड़ी-सी जगह छोड़ कर खड़े होते थे कि तुम्हें मिले प्रकाश
वे भी एक दिन इसलिए दूर जा सकते हैं कि अब
तुम्हारे होने की परछाईं उनकी जगह तक पहुँचती है
तुम्हारे पक्ष में सिर्फ यही उम्मीद हो सकती है
कि कुछ लोग तुम्हारे खुरदरेपन की वज़ह से भी
करने लगते हैं तुम्हें प्यार
जीवन में उस रंगीन चिडिया की तरफ देखो
जो किसी एक का मन मोहती है
और ठीक उसी वक्त एक दूसरा उसे देखता है
अपने शिकार की तरह।
0000
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।
'पहल-71' में जो डायरी प्रकाशित हुई थी, उसमें से यह एक अंश यहाँ दे रहा हूँ। इसमें केवल एक पंक्ति अभी तीन महीने पहले और शामिल हुई है। शायद यह दिलचस्प लगे।
मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।
27-06-98
रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है।
जिस तरह एक मौलिक मनुष्य असंभव है उसी तरह एक मौलिक रचना नामुमकिन है। मौलिकता एक अवस्थिति भर है। (जैसे शतरंज के चौसठ खानों में बत्तीसों या कम ज़ादा मोहरों के रहते, तमाम स्थितियॉं बनती-बिगड़ती रह सकती हैं और एक मोहरा इधर-उधर करने से भी एक नितांत नई अवस्थिति बन जाती है।) एक दी हुई दुनिया है जिसमें आपको अपनी एक दुनिया को जन्म देना है। अपनी अवस्थिति का निर्माण करना है। दी हुई दुनिया का अतिक्रमण भी करना है। यही रचनाशीलता है। यह अवस्थिति मौलिकता है।
सर्जक अपनी रचनाशीलता में कुछ ऐसा ही करते हैं कि एक मोहरे को, कुछ मोहरों को इस तरह रखते हैं कि वह एक नया संयोजन हो जाए। पूरा जीवन विस्तृत खानों से भरा संसार है। शब्द मोहरे हैं। विचार, संयोजन की आधारशिलाऍं हैं। कारक हैं। गणित में संख्याऍं हैं। उनसे असीमित संभावनाओं को, अनगिन संयोजनों को जन्म दिया जाना संभव है। वह सब कुछ अगण्य है। इस सब कुछ में से रचनाकार अपनी सर्जनात्मकता के जरिए, एक परिप्रेक्ष्य देता है। यह परिप्रेक्ष्य कुछ हद तक `मौलिकता´ जैसा समझा जा सकता है।
मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है। मेरी चाल में मेरे पितामह हैं। और मेरी जल्दबाजी मुझे मेरे नाना से मिली है। यही मेरी मौलिकता है। एक नया संयोजन। मैं इसमें कुछ अपनी तरफ से भी जोड़ रहा होउँगा। जिसके बारे में यह दावा भी हास्यास्पद होगा कि वह वस्तुत: सिर्फ मेरा ही है। लेकिन उससे एक नयी अवस्थिति बनती है। यह मौलिकता का मिथ है।
अवयव मौलिक नहीं हो सकते। वे हमारे माध्यम के हिस्से हैं। संयोजन नया हो सकता है। तथाकथित मौलिकताऍं यदि कुछ हैं भी तो वे समाज में, जीवन में बनती हैं, साहित्य में उनकी छायाओं को दर्ज भर किया जा सकता है। इसी सब के बीच रचना की कोई मौलिकता, यदि वह वाकई हो सकती है तो, छिपी हो सकती है। यही सर्वाधिक नैसर्गिक है। एक रचनाकार सबका कर्ज़दार होता है। उसके आसपास की हर जीवित-अजीवित चीज का। दृश्य-अदृश्य का। वही उसकी पूँजी है। कर्ज की पूँजी मौलिक नहीं होती। और यह पूँजी समाज में लंबे कालखंड से विद्यमान है। उसके निवेश और उसके उपयोग का तरीका अलग हो सकता है। यही मौलिकता का मिथ है।
मैं और मेरी रचना उतनी ही मौलिक है जितना कि इस संसार में मेरा अस्तित्व मौलिक है। मेरी मौलिकता पूरे जड़-चेतन से सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं। इसलिए ही वह किसी शुद्ध मौलिकता की तरह मौलिक नहीं।
हॉं, एक बात और: हमारी अज्ञानता भी कई चीजों को, मौलिकता के पद (Term) में `मौलिक´ घोषित कर सकती है।
00000
पुन:
17 जुलाई 2008
रचनाशीलता में मौलिकता दरअसल एक तरह का अंधविश्वास है।
कुमार अम्बुज
सोमवार, 13 अक्टूबर 2008
मैं क्यों लिखता हूँ ?
तुर्की लेखक ओरहान पामुक ने नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय `माय फादर्स सूटकेस´ शीर्षक से अपना `नोबेल लेक्चर´ दिया था। इस लंबे भाषण का एक हिस्सा पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें लिखने के लिए जो आस्था, कारण और प्रतिबद्धता प्रकट की गई है, वह कुछ खास मायनों में अधिसंख्य लेखकों की आकांक्षा से मेल खा सकती है। उनके अपने औचित्य के साथ भी खड़ी हो सकती है।
पैराग्राफिंग बदलते हुए मैंने इसका अनुवाद किया है। यह छोटा सा गद्य मुझे बहुत प्रिय है। इसे रुचिवान लोगों के बीच रखते हुए मुझे खुशी हो रही है।
मैं क्यों लिखता हूँ ?
मैं लिखता हूँ क्योंकि लिखना मेरी एक आंतरिक आवश्यकता है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं वे सारे साधारण कामकाज नहीं कर सकता जो अन्य दूसरे लोग करते हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं आप सबसे नाराज हूँ, हर एक से नाराज हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं इसी तरह वास्तविक जीवन में बदलाव लाने में अपनी हिस्सेदारी कर सकता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे कागज, कलम और स्याही की गंध पसंद है।
मैं लिखता हूँ क्योंकि अन्य किसी भी चीज से ज्यादा मुझे साहित्य में विश्वास है। मैं लिखता हूँ क्योंकि यह एक आदत है, एक जुनून है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं विस्मृत कर दिये जाने से डरता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं उस यश और अभिरुचि को चाहता हूँ जो लिखने से मिलती है।
मैं अकेला होने के लिये लिखता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह मैं समझ सकूँगा कि मैं आप सबसे, हर एक से, बहुत, बहुत ज्यादा नाराज क्यों हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पढ़ें। मैं लिखता हूँ क्योंकि जब एक बार कुछ लिखना शुरू कर देता हूँ तो मैं उसे पूरा कर देना चाहता हूँ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि हर कोई मुझसे लिखने की अपेक्षा करता है।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे पुस्तकालयों की अमरता में एक नादान-सा विश्वास है, और मेरी उन पुस्तकों में, जो अलमारी में रखी हुई हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि जीवन की सुंदरताओं और वैभव को शब्दों में रूपायित करना एक उत्तेजक अनुभव है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका हूँ।
मैं खुश होने के लिये लिखता हूँ।
000000
ओरहान पामुक
नोबेल लेक्चर से एक संपादित अंश:
अनुवाद: कुमार अम्बुज
नया मोबाईल नम्बर-09424474678
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008
एक स्त्री मेरा इंतजार करती है
अमेरिकी कवि वॉल्ट व्हिटमैन ने अपने जीवनकाल में कुल एक ही कविता संग्रह 'लीव्ज ऑव ग्रास' प्रकाशित कराया और इसे ही वे जीवन भर अद्यतन करते रहे।
प्रस्तुत कविता दैहिकता से शुरू होकर गहरी सामाजिकता में बदलती जाती है। इसमें स्त्रीवाद के वे सूत्र भी देखे जा सकते हैं, जो आगे जाकर समाजशास्त्रियों और विचारकों ने विकसित किए। इसमें वे अग्रगामी स्त्रियों की कामना करते हैं और उस गुणधर्म को संतति की नयी पीढि्यों में देखना चाहते हैं।
इसे कुछ हद तक विडम्बना कह सकते हैं कि अमेरिकी राजनैतिक संततियॉं उतनी उदात्त और मानवीय नहीं हो सकीं, जितनी एक कवि की आकांक्षा में रहती हैं। इस कविता में अनेक विमर्श विन्यस्त हैं।
- कुमार अंबुज
एक स्त्री मेरा इंतजार करती है
वॉल्ट व्हिटमैन
एक स्त्री मेरा इंतजार करती है, वह हर तरह से परिपूर्ण है,
उसमें कुछ भी कमी नहीं है
लेकिन सब कुछ व्यर्थ है यदि वहाँ रति नहीं
सब कुछ की कमी है यदि उसके पास एक सच्चे पुरुष की नमी नहीं।
रति में सब कुछ समाया है, शरीर, आत्माऍं,
अर्थ, प्रमाण, पवित्रताऍं, कोमलताऍं, परिणाम, घोषणाएँ,
गीत, आज्ञाएँ, स्वास्थ्य, गौरव, मातृात्मक रहस्य, वीर्य
संसार की सभी आशाएँ, परोपकार, तोहफे, वासनाएँ, प्रेम,
सुंदरताएँ, प्रसन्नताएँ,
दुनिया की सभी सरकारें, न्यायाधीश, ईश्वर, आगत मनुष्य
ये सब शामिल हैं रति में
उसके अपने अंश की तरह और अपने ही औचित्य की तरह।
जो मुझे पसंद है, वह पुरुष जानता है और बेझिझक स्वीकारता है
अपनी रति का स्वाद
वह स्त्री भी, जो मुझे पसंद है, जानती है और स्वीकार करती है।
अब मैं नहीं जाऊँगा उत्साहहीन स्त्रियों के पास
मैं उस स्त्री के पास जाऊँगा और रहूँगा जो मेरी प्रतीक्षा करती है
और उन स्त्रियों के पास जो मेरे लिए पर्याप्त ऊष्ण हैं
मैं समझता हूँ कि वे मुझे समझेंगी और मुझे इनकार नहीं करेंगी
मैं देखूँगा कि वे मेरे लायक हैं, मैं उनका बलिष्ठ पति साबित होऊँगा।
वे मुझसे जरा भी कम नहीं होंगी
उनके चेहरे तेज धूप और हवाओं से ताँबई होंगे
उनके शरीर में प्राचीन दैवीय कोमलता और ताकत होगी
वे तैरना जानती होंगी और नाव खेना, घुड़सवारी, कुश्ती, निशानेबाजी,
दौड़ना, वार करना, बचना, आगे बढ़ना, प्रतिरोध करना,
अपनी रक्षा करना जानती होंगी
वे शांत, स्पष्ट, आत्मनियंत्रित होंगी- अपने आप में संपूर्ण।
स्त्री, तुम्हें मैं अपने करीब खींचता हूँ
मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा, तुम्हारे लिए मैं अच्छा करूँगा,
मैं तुम्हारे लिए हूँ, तुम हो मेरे लिए, केवल हमारी अपनी खातिर नहीं,
शेष सभी की खातिर
तुम्हारे भीतर सोए हुए हैं महान नायक और कवि,
जो किसी पुरुष के स्पर्श से नहीं जागेंगे, सिवाय मेरे।
यह मैं हूँ, ऐ स्त्री, मैं अपनी राह बनाता हूँ,
मैं दृढ़ हूँ, कठोर हूँ , बड़ा हूँ, अडिग हूँ लेकिन तुम्हें प्यार करता हूँ ,
मैं तुम्हें उससे ज्यादा चोट नहीं पहुँचाऊँगा जितनी तुम्हारे लिए जरूरी है
मैं अपना सत् उँडेलता हूँ कि इन राष्ट्रों के लिए
उपयुक्त बेटे और बेटियाँ मिल सकें
मैं धीमे से, सख्त माँसपेशी से तुम्हें दबाता हूँ
निर्णायक ढंग से आबद्ध होता हूँ, मैं कोई अनुनय नहीं सुनूँगा,
मैं तब तक अलग नहीं होऊँगा जब तक कि अपने भीतर
जो कुछ लंबे समय से संचित है, उसे तुम्हें सौंप नहीं दूँगा।
तुम्हारे जरिये मैं अपनी रुकी हुयी नदियों को रिक्त करता हूँ
तुम्हें मैं आनेवाले हजारों वर्षों से आच्छादित करता हूँ
तुममें मैं अपनी सर्वाधिक प्रिय और अमेरिका की कलमों को रोपता हूँ
जो बूँदें मैं तुममें सींचता हूँ वे लड़ाकू और कसरती लड़कियों में बदलेंगी,
नये कलाकारों में, संगीतकारों और गायकों में बदलेंगी,
जो संततियाँ मैं तुम्हें दूँगा वे भी संततियाँ पैदा करेंगी
मैं अपने संसर्ग से पूर्ण पुरुषों और पूर्ण स्त्रियों की चाह रखता हूँ
मैं उनसे अपेक्षा करूँगा कि वे भी एक-दूसरे में अंत:प्रवेश करें
जैसे तुम और मैं अभी एक-दूसरे के भीतर तक प्रवेश कर रहे हैं
मैं उन फलों की आशा करता हूँ जो उनकी तेज बौछारों से प्रकट होंगे
जैसे अभी मैं आश्वस्त हूँ उन फलों के लिए
जो इन प्रवाही धाराओं से फलेंगे जिन्हें मैं तुम पर न्यौछावर करता हूँ।
मैं आगत प्यारी फसल की
जन्म, जीवन, मृत्यु और अनश्वरता में प्रतीक्षा करता हूँ ,
जिसे मैं इतने प्रेम से यहाँ रोपता हूँ।
00000
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
उसके विशाल पहलू में किसी मनुष्य के लिए जगह खाली है।
लेकिन जल्दी ही अपना कुछ गद्य और दूंगा। और वॉल्ट व्हिटमैन की एक कविता का अनुवाद भी जो मुझे बहुत पंसद है। दरअसल, कविताओं के बिना तो मैं सिर्फ धुआं हो सकता हूं।
पियानो
उसका चेहरा हमेशा उस आदमी की तरह दिखता है
जो उसे बजाता है
उसके विशाल पहलू में किसी मनुष्य के लिये जगह खाली है
वह जगह दिन-रात तुम्हारी प्रतीक्षा करती है
उसे वही बजा सकता है
जिसे कुछ अंदाजा हो जीवन की मुश्किलों का
जो रात का गाढ़ापन, तारों का प्रकाश और चांद का एकांत याद रखता है
उसमें से, तुमने सुना होगा, मादक आवाज उठती है
जिसमें शामिल होता है एक रुंधा हुआ स्वर
जो किसी बेचैन आदमी का ही हो सकता है
जिसने कभी अपनी आवाज का सौदा नहीं किया
वही आवाज तुम्हें रोक लेती है बाजू पकड़कर
जैसे वह किसी धीरोदात्त का टूटता हुआ संयम है
अपनी कथा कह देने के लिये आखिर उद्यत
उसे सुनो और महसूस करो
उसके भीतर भी तुम्हारी तरह कोई संताप है
और धीरे-धीरे उठती हुयी उमंग
जिसने हरदम तुम्हारे लिये पके गले से उठते सुर
और एक कठिन नोट को संजोकर रखा है
उसे तमाम वाद्ययंत्रों के बीच देखो
वह उस राजा की तरह दिखेगा
जो संगीत के पक्ष में अपना राजपाट ठुकराकर यहां आ गया है
यह भी कह सकते हैं कि वह अपने होने में जंगल में शेर की तरह है
लेकिन मैं उसे हाथी कहना पसंद करूंगा
ध्यान दें, उसकी धीर गंभीर और बिलखती आवाज में
गुर्राहट नहीं, अपने को रोकती, खुद को पीती हुयी एक चिंघाड़ है
जो भीतर के विलाप और क्रोध को बदल देती है संगीत में
क्या तुमने वह दृश्य देखा है
जब उसके कंधे पर सिर रखकर कोई उसे बजाता है
और वह अपना सब कुछ अपनी आवाज को सौंपता है
यहां दिखाई दे सकती है समुद्र और हवा के खेल में उसकी दिलचस्पी
उसे कौन छुयेगा ?
वही, सिर्फ वही-
जो अपनी पहचान उसकी पहचान में खो सकता है।
0000