मंगलवार, 16 जून 2009

वैज्ञानिकता को धोखा


धर्म पर पुनर्विचार करते हुए लिखे गए इस लेख की अंतिम किश्‍त।
इतने लंबे लेख को, किश्‍तों में ही सही, पढ़ने के लिए पाठकों के प्रति आभार। और संलग्‍न आशा कि इस विमर्श को वे अपने-अपने स्‍तर पर बढ़ाएंगे।


वैज्ञानिकता को धोखा
धर्म से जुड़े चमत्कार हमेशा व्यक्तिगत प्रमाणों और अनुभवों के आधार पर प्रचलित और मान्य होते हैं। यथा- मैंने प्रेत देखा, ध्यानावस्था में मुझे जमीन से ऊपर उठने की अनुभूति हुयी, कल रात हनुमानजी या प्रभु ईशु मेरे सपने में आये, संत के आशीर्वाद से हमारे यहाँ बच्चा हुआ, गुरूकृपा से या किसी मजार पर चादर चढ़ाने से मैं उत्तीर्ण हुआ आदि-इत्यादि। इन व्यक्तिगत अनुभवों (जो दरअसल कल्पनाओं, चिंताओं, उम्मीदों, दिवास्वप्नों के मनोभावों से जुड़ी हैं और कोई भी मनोवैज्ञानिक उनका ज्यादा अच्छा स्पष्टीकरण दे सकता है) का कोई अर्थ समाज की प्रगति में नहीं है। इन निजी अनुभवों के गुब्बारे सामूहिकता के स्तर पर, विज्ञान के मानदंडों की कसौटी पर कसते ही फुस्स होकर फूट जाते हैं। इन व्यक्तिगत अनुभवों में कितना झूठ, सम्मोहन, आस्था-श्रद्धा, मनोरोग और कितना भक्ति-मुग्धभाव शामिल हो सकता है, यह सहज ही समझा जा सकता है।
नि:संदेह विज्ञान की सीमायें हैं और रहेंगी क्योंकि प्रकृति असीम है, मनुष्य सहित समस्त प्राणी जगत की संरचना अत्यंत जटिल है लेकिन विज्ञान जो भी जानता-बताता है वह प्रयोगों और पुष्टि के आधार पर ही। किसी भी गलत अवधारणा को वह तत्काल संशोधित करता है और कतई अंधविश्वास नहीं फैलाता। जो लोग विज्ञान से हर बात का प्रमाण का माँगते हैं, उससे तार्किक होने की अपेक्षा रखते हैं (याद रखें कि वह प्रमाण और तर्क देता भी है), वे लोग धर्म से क्यों किसी बात का प्रमाण नहीं माँगते? उससे तार्किक रूप से पेश क्यों नहीं आते? सीधा-सादा जबाव है कि वे धर्म को लेकर अंधविश्वासी हैं। इसकी हद यह है कि वे जब विज्ञान के आधुनिकतम आविष्कार जैसे कार या मोटरसायकिल खरीदते हैं तो उसकी भी पूजा करते हैं और कंप्यूटर खरीदते हैं तो सबसे पहले मॉनीटर पर साँतिया बना देते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण या तार्किक जीवन प्रणाली के फैलाव को रोकने में विरोधी शक्तियाँ तो सक्रिय रहती ही हैं क्योंकि उनका काम ही यह ठहरा लेकिन प्रगतिशील- जनवादी-वामपंथी चेतना से जुडे़ लोग भी जाने-अनजाने यह भूमिका निभा देते हैं। परंपरा, संस्कृति और व्यवहारिकता के नाम पर वे काफी कुछ ढकोसले अपने जीवन में पाले रहते हैं। रैकी, टेलिपैथी जैसी चीजों के प्रति उनका आकर्षण और समझ ठीक वैसे ही काम करती है जैसे किसी अतार्किक व्यक्ति की। इसमें क्या और कितना वैज्ञानिक है, कितना ग्राह्य है और कितना अग्राह्य, इसका विश्लेषण भी वे प्राय: करते नजर नहीं आते। वे इन क्रियाओं को महज धार्मिक, आध्‍यात्मिक उपलब्धियों का अंग मानकर कुछ इस तरह पेश आते हैं कि उनका आचरण धर्म को, ईश्वर को, पुनरुत्थानवाद को सहायता पहुँचाता नजर आता है। टेलिपैथी जैसी धारणाएँ `संभाव्यता के नियम´ का लाभ उठाती हैं। जो आपका प्रिय है या संबंधी है, उसके बारे में आप अथवा आपके बारे में वह, एक साथ-एक ही समय में विचार कर सकता है। ऐसा सैंकड़ों बार हो सकता है और इसकी संभावना है कि दो-चार बार कुछ विचार सटीक बैठ जाएँ। यह गणितीय दृष्टि से, संभावना के नियम से सहज अपेक्षित है। इसी तरह, प्राय: ही हम अपने किसी प्रियजन के लिए आशंका से भर जाते हैं, उसकी दुर्घटना या मृत्यु तक की कल्पना कर बैठते हैं। अनेक बार ऐसा सोचते हुये, एकाध बार यह आशंका सही भी हो सकती है लेकिन इसका अर्थ कतई दैवीय आभास नहीं है। यह सहज संभावित है क्योंकि ट्रैफिक बढ़ रहा है, अनुशासन कम हो रहा है और आप बार-बार दुर्घटनाओं के बारे में विचार किये चले जा रहे हैं। यहाँ आप उन हजारों अवसरों को इस प्रसंग में भुला दे रहे हैं कि जब आपने दुर्घटना की आशंकाएँ की थीं लेकिन कुछ भी बुरा घटित नहीं हुआ। तब आपका यह पूर्वाभास कहाँ था?
हमारे ऐसे ही जन साठ की उम्र के आसपास पहुँचने पर अचानक मृत्युपार के जीवन पर विचार करने लगते हैं, घबराये दिखते हैं और धार्मिक मान्यताओं में अपनी घबराहट शांत करते नजर आते हैं। रूढ़िगत, परंपरागत, धार्मिक कृत्य तो वे करते दिखते ही हैं। (जैसे, मेरे एक प्रिय लेखक और विद्वान, जिनसे हम मार्क्‍सवाद सीखते रहे, अचानक मुंडनावस्था में मिले। मालुम हुआ कि कोई बुजुर्ग रिश्तेदार नहीं रहे। कहने लगे, मजबूरी में कराना पड़ा, मेरी माँ का आदेश हो गया था और मैं नहीं चाहता था कि 72 साल की माँ को पीड़ा पहुँचाऊँ। मैंने उनसे इतना भर पूछा कि क्या आपने पहले कभी अपनी माँ को किसी प्रसंग में पीड़ा नहीं पहुँचायी? वे चुप हो गये क्योंकि सुरापान, परनारी प्रसंग, सहज दैनिक अवज्ञा आदि अनेक प्रकरणों में वे अपनी माँ को ही नहीं, पूरे घर भर को कष्ट पहुँचाते रहे हैं।) दरअसल, ये लोग वैज्ञानिकता के पक्ष में अपना कुछ भी दाँव पर नहीं लगाना चाहते, अपने परिजनों का शिक्षण नहीं करते, जीवन में प्रतिबद्धता नहीं बताते, जरूरी दैनिक लड़ाइयाँ नहीं लड़ते और अंतत: अंधविश्वासों, रूढ़ियों की रक्षा करते हैं। अपने व्यक्ति-स्वातंत्र्य और मनमानियों के लिए वे घर में बखेड़ा खड़ा कर देंगे लेकिन वैज्ञानिक सोच, प्रगतिशील आचरण और नवाचार के अवसरों पर समझौते कर लेंगे। वस्तुत: ये लोग वैज्ञानिकता के, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरोधी हैं। ये अधजल गगरी हैं, आंतरिक शत्रु हैं और अधिक घातक हैं। इनका यह आचरण भी उत्तरदायी है कि हमारे देश में वैज्ञानिकता के पक्ष में प्रबल वातावरण नहीं बन पा रहा है। यह दुर्भाग्य है कि भारत में वामपंथी विचार से जुड़े अधिसंख्य लोग, अपने निजी जीवन में ऐसे ही उदाहरण पेश कर रहे हैं। यही नहीं, जहाँ वामपंथी लोग सत्ता में हैं या अन्य रूप से शक्तिसंपन्न हैं, वे भी वैज्ञानिकता का सघन, व्यवस्थित, योजनाबद्ध प्रचार करते नजर नहीं आते। और जिन लोगों ने सचमुच कुछ काम किया है वह विपुल आवश्यकता के बरअक्स ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुआ है।

ऑपरेटिंग सिस्टम का सवाल
इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार के लिए, आज भी ऐसे दैनिक अखबारों की जरूरत है जो जनता को जागरूक बनायें, अंधविश्वासों से बाहर लायें, प्रगतिशील विचारों का प्रसार करे। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चार-छ: चैनल्स होने चाहिये जो वैज्ञानिकता का, बुद्धिवाद का, भौतिकवाद का, तार्किकता का प्रचार करे और लोगों को उनके शोषण के बारे में सजग करे। दुनिया-जहान के विकास की ऐतिहासिक जानकारी दे, आदि-आदि। इसी तरह की अनेक प्रगतिशील, जनवादी, प्रगतिगामी संस्थाओं की आवश्यकता है। जो सचमुच सक्रिय हों और लंबी योजना के साथ प्रस्तुत हों। अपने समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न किये बिना, कोई भी प्रगतिमूलक, समाजवादी बदलाव नहीं हो सकता, और यदि हो भी जाए तो टिक नहीं सकता। मार्क्‍स ने तो बार-बार जोर देकर कहा है कि समाज में, जनमानस में बदलाव करो, जनशिक्षा बढ़ाओ और बौद्धिक रूप से ताकतवर बनाओ। इसे कंप्यूटर के उदाहरण से समझें कि `ऑपरेटिंग सिस्टम´ ही ठीक नहीं होगा तो उस पर कोई `सॉटवेयर´ कैसे काम करेगा! या कहें कि जैसा `ऑपरेटिंग सिस्टम´ होगा, वैसा ही सॉटवेयर काम करेगा। जाहिर है कि धर्म को, अंधविश्वासों को हटाये बिना, वैज्ञानिक समाजवाद, साम्यवाद आ ही नहीं सकता। भारत में तो धर्म ने वर्ण और जाति के आधार पर और ज्यादा जटिल समस्यायें पैदा कर दी हैं। हमारे समाज में धर्म-ईश्वर नामक ऑपरेटिंग सिस्टम है इसलिए इस पर पूँजीवादी, सामंती और घालमेलवादी सॉटवेयर आसानी से चल रहे हैं।
यहाँ यह जान लेना उचित होगा कि वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासक, थलसेनाध्यक्ष या प्रधानमंत्री होने से जरूरी नहीं कि कोई मनुष्य वैज्ञानिक दृष्टि से भी लैस हो जाएँ इन पदों तक कोई भी आदमी अकादेमिक-तकनीकी शिक्षा, प्रशासन या राजनीति में रुचि और दक्षता के कारण पहुँचता है। जैसे सायकिल की मरम्मत करना एक तरह की दक्षता है और हवाईजहाज उड़ाना दूसरे प्रकार की दक्षता किंतु यह जरूरी नहीं कि इन कार्यों में निपुणता रखनेवाले वैज्ञानिक दृष्टि भी रखते हों। वैज्ञानिक दृष्टि का संबंध इस बात से है कि आपको बचपन से, घर-परिवार और समाज में तथा अकादमिक तौर पर आखिर सिखाया-पढ़ाया क्या गया है! यदि आप धर्म या अन्य अंधविश्वासों को लेकर वयस्क होने पर भी महज आस्थावान और श्रद्धालु बने रहे हैं तो वैज्ञानिक दृष्टि का विकास हो ही नहीं सकता। एक अनपढ़ किसान या मजदूर भी वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न हो सकता है, यदि उसने ऐसी दृष्टि पाने का वैचारिक, बौद्धिक उपक्रम किया है। यदि वह जिज्ञासु, संदेहशील होकर विचारशीलता की तरफ बढ़ा है।
जाहिर है कि विशाल स्तर पर प्रयास करने, वातावरण बनाने, तािर्ककता और बौद्धिकता के पक्ष में काम करते रहने पर समाज के वृहत्तर हिस्से को वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न बनाया जा सकता है। पाठ्यपुस्तकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का शिक्षण शामिल करने एवं अवैज्ञानिक सामग्री को बाहर करते हुये भी इस काम को आगे बढ़ाया जा सकता है। अखबारों में, दूरदर्शन पर ज्योतिष सहित अन्य प्रकार के अंधविश्वास फैलाने को रोकने की मुहिम चलायी जा सकती है। (जैसे भाजपा द्वारा ज्योतिष को पढ़ाये जाने की मुहिम चलायी गयी।) जाहिर है कि इस तरह के सारे कदम और इसी क्रम में अन्य अनेक कदमों को योजनाबद्ध तरीकों से ही लागू किया जा सकता है। वैज्ञानिकता के प्रति सहज उत्सुकता नहीं होती क्योंकि वह बुद्धि-व्यापार के साथ एक तरह का आत्म-संघर्ष भी है, इसलिए नानाप्रकार के कदम उठाने होंगे। धर्म को `वैज्ञानिक दृष्टि´ से ही अपदस्थ किया जा सकता है। इसके पीछे राजनीतिक समर्थन और क्रियान्वयन भी जुटाना होगा। एक दिक्कत यह है कि हमारे देश में वामपंथ और वामपंथी आंदोलन संसदीय लोकतंत्र के जरिये चुनावी दलदल में फँस गया है और उसे लोकप्रियता की चिंता सताती है। वह डरता है कि धार्मिक मामले संवेदनशील हैं और जनता कहीं नाराज न हो जाएँ लेकिन इस तरह वह अपनी विचारधारा और जनता, दोनों के साथ धोखे कर रहा है। यह इतना बड़ा धोखा है कि आगे आने वाली नस्लों को वास्तविक काम करना दूभर हो जाएगा।
यदि
वैज्ञानिक दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह कल्पनाशील तो होती है लेकिन किसी भी अमूर्त चिंतन का विरोध करती है। वह विवेक, विश्लेषण, अन्वेषण, बौद्धिक साहस और मानवीय श्रम को प्रोत्साहन देती है। यह दृष्टि कहती है कि बेहतर समाज के लिए, अपने आसपास के वातावरण को और परिस्थितियों को भी बदलना होगा, तदानुसार खुद की मान्यताओं को भी। पूरा मार्क्‍सवाद, `ब्ल्यू प्रिंट´ के साथ इसकी सामाजिक- आर्थिक व्याख्या करता है। धर्म-सुधार आंदोलन करते हुये बुद्ध ने एक कदम आगे जाकर कहा था- `संसार में दुख है´, मार्क्‍स ने एक और डग आगे बढ़कर कहा- `इस दुख के कारण और इसकी जड़ें समाज में हैं´। बुद्ध ने कहा-`दुखों को दूर किया जा सकता है´। मार्क्‍स ने कहा- `हाँ, अन्याय और शोषण को दूर करके, दुखों को दूर किया जा सकता है। सामाजिक क्रांति सब तरह के दुख दूर करने में समर्थ है।´ इन 5-6 शब्दों ने सब कुछ बदल दिया। और इस तरह एक नयी, बेहतर दुनिया का विकल्प सामने रख दिया। यह वैज्ञानिक दृष्टि संपन्नता होने के कारण ही हो सका।
`धर्म´ हर समाज में लंबे समय (हजारों वर्षों) के बाद ही विकसित और मान्य हो सका। धर्म का विकल्प भी विकसित होने में कुछ समय लेगा लेकिन उस दिशा में गंभीर, विचारपरक, योजनाबद्ध और प्रतिबद्ध काम तो शुरू हो। यह काम राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर एक साथ शुरू करना होगा। भले ही हास्यास्पद लगे लेकिन मोटा अनुमान लगाते हुये कहा जा सकता है कि यदि आज से तमाम प्रगतिशील- जनवादी-वामपंथी-मानवतावादी शक्तियाँ जुट जाएँ तो 25-30 वर्षों में स्थिति काफी बेहतर हो सकती है और तब संभवत: `वैज्ञानिक दृष्टि´ धीरे-धीरे धर्म का विकल्प बनने लगे। यह `यदि´ महत्वपूर्ण है। और चुनौतीपूर्ण भी।
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बुधवार, 10 जून 2009

धर्म एक अंधविश्‍वास है


धर्म के विकल्‍प पर पु‍नर्विचार की श्रंखला में यह चौथी किश्‍त।
अंतिम किश्‍त जल्‍दी ही।


धर्म की अपराजेयता
अभी तक धर्म अपराजेय चला आ रहा है। उसके कुछ प्रमुख कारणों पर, संक्षेप में विचार करें तो सबसे पहला बिंदु यही उभरकर आता है कि वह एक अंधविश्वास है और उसे कुछ भी सिद्ध नहीं करना है। उसे आस्थामूलक, तर्कातीत बनाया गया है। धर्म के अंतर्गत जो लिखा है, जिन ग्रंथों में लिखा है उन्हें अपार प्रतिष्ठा दी जा चुकी है इसलिए अब वे प्रश्नातीत हैं।
दूसरा, वह ऐसे वायवीय प्रश्नों पर अचूक उत्तर देने का भ्रम फैलाता है, जिनका उत्तर देना वस्तुत: किसी के लिए भी लगभग असंभव है। जैसे मृत्यु, मृत्यु के बाद का जीवन, स्वर्ग-नरक की अवधारणा, पुनर्जन्म आदि की कपोल कथायें। (इन उत्तरों के जरिये भी उसे कुछ सिद्ध नहीं करना है, सिर्फ कह देना है और सुनने-जानने वाले को मान लेना है।)
तीसरे, उसमें संस्थागत लक्षण है और प्रचारक का गुण है। श्रद्धा का विषय तो वह बना ही दिया गया है अतएव उसे सुनने, मानने का सहज क्रियाकलाप समाज में मौजूद होता गया है।
चौथा, हर परिवार में, प्रत्येक घर में बच्चा पैदा होते ही उसे धार्मिक वातावरण एवं शिक्षा देना शुरू हो जाता है। बच्चा अपनी अबोध अवस्था में ही, धीरे-धीरे, रोज-रोज धार्मिक और कर्मकांडी बना दिया जाता है। धर्म के खिलाफ कुछ भी सोचने के लिए उसका वंध्यकरण कर दिया जाता है। और अंत में यह कि धर्म को `विश्वास का विषय´ बनाकर पेश किया जाता है।
बर्टेण्‍ड रसेल ने विश्वास के बारे में ठीक ही इंगित किया है: विश्वास अर्थात् किसी चीज को बिना प्रमाण के मानना। ऐसा विश्वास आखिर अंधविश्वास तो है ही।
वास्तविकता यह है कि संसार के किसी भी धर्म के सूत्र, आदेश या नियम कतई ईश्वरीय नहीं हैं बल्कि वे प्रकरांतर से अपने युग के अभिजात्यों, सामंतों, पुरोहितों, सत्ताधारकों अथवा सत्ता का प्रतिरोध कर रहे विचारकों, विद्वानों के आदेश भर हैं जो उन्होंने अपने पीढ़ी दर पीढ़ी चल सकनेवाले वर्चस्व के लिए, यश कामना के लिए अथवा पंथनिर्माण के लिए बनाये, उन्हें महिमामंडित किया और दंड-विधान के साथ लागू किया। विद्वान दार्शनिकों ने भी बीच-बीच में धर्म में सुधारात्मक रवैया अपनाया और प्राय: अपना एक धर्म खड़ा कर दिया। इसलिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन ठीक ही निष्कर्ष निकालते हैं कि धर्म को ईश्वर से अलग करने पर वह महज एक बेहद पुराने जमाने के, अब अप्रासंगिक हो चुके आचरणसूत्र में विघटित और न्यून होकर रह जाएगा।
धर्म को ईश्वर से जोड़ देने के कारण ही वह आदेशात्मक और प्रभुत्ववादी हो उठता है। अब वह वैसा सर्प हो जाता है जिसमें मारक विष भी है। अब वह भयोत्पादक है और पूजनीय भी। इसी कारण वह परंपरा, स्मृति और संस्कृति से भी उच्चतर एवं अनुलघंनीय गरिमा प्राप्त कर लेता है। एक बार फिर मार्क्‍स का ही कथन यहाँ सहज याद आता है: `विश्व से परे किसी दर्शन का कोई अस्तित्व नहीं होता, जैसे कि मनुष्य के परे मस्तिष्क का कोई अस्तित्व नहीं होता।.....आप (धर्माचार्य) लोक-परलोक का आश्वासन देते हैं, दर्शन सत्य के अतिरिक्त किसी चीज का आश्वासन नहीं देता।´ जाहिर है कि यहाँ दर्शन का व्यापक भौतिकवादी अर्थ है और उसे इस उद्धरण की पहली पंक्ति में देखा जा सकता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण
मोती जैसा कोहरा
सबसे पहले `गेलीलियो का जीवन´ (बेर्टोल्ट ब्रेष्ट) नाटक में से गेलीलियो के बड़े डॉयलाग के कुछ अंश देखे जाएँ, जो संशलिष्ट रूप में धर्म की साजिश, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिकों के दायित्वबोध पर भी प्रकाश डालता है : `.....विज्ञान का अनुसरण भी मेरे मुताबिक, संदेह द्वारा पाये गये ज्ञान से है। विज्ञान सभी लोगों को सभी चीजों के बारे में ज्ञान उपलब्ध कराकर उनको अविश्वासी बनाने की कोशिश करता है। (यह अविश्वासी बनाना ही उनके विवेक को जाग्रत करना है तथा तर्क पद्वति का, स्वतंत्र चेतना का विकास करना है।-कुअं) जनसंख्या का एक बड़ा भाग उनके राजकुमारों, जमींदारों और पादरियों द्वारा (सत्ताधारी, अभिजात्य एवं पुरोहित वर्ग द्वारा) अंधविश्वासों और प्राचीन शब्दों के उस मोती जैसे कोहरे में रखा जाता है जो इन लोगों की साजिशों को ढक लेता है। अनेक लोगों की दरिद्रता पर्वतों की तरह पुरानी है और चर्च (धर्म) के प्रवचन-मंच और डेस्क से इसे पर्वतों की तरह अनश्वर बताया जाता है। सितारों की गतियाँ तो स्पष्ट हो गयी हैं मगर जनसाधारण के लिए अभी तक उनके मालिकों की गतियों का अनुमान लगाना असंभव है। संदेह के (ज्ञान के) द्वारा नक्षत्रों को नाप लेने की लड़ाई तो जीत ली गयी है लेकिन गृहणी की दूध के लिए लड़ाई, उसके (अंध)विश्वास के कारण बार-बार हारी जा रही है। विज्ञान का वास्ता दोनों तरह की लड़ाइयों से है। हजारों साल पुराने इस मोती जैसे सफेद कोहरे में ठोकर खाती यह मानवजाति, जो अपनी ही शक्तियों को पूरी तरह विकसित करना नहीं जानेगी तो यह तुम्हारे द्वारा दिखाई गयी प्राकृतिक शक्तियों को भी विकसित करने में असमर्थ होगी। तुम लोग किसलिए काम कर रहे हो? मेरा विश्वास है कि विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ मानवीय अस्तित्व के घोर कष्टों को कम करना है। स्वार्थी सत्ताधारियों से डरकर जब वैज्ञानिक सिर्फ ज्ञान के लिए ही ज्ञान संचय करने लग जाते हैं तो विज्ञान विकलांग हो जाता है और तुम्हारी नयी मशीनें सिर्फ अत्याचर के नये तरीकों का प्रतिनिधित्व करती हैं।´
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जाहिर है मनुष्य को प्रश्नाकुल बनाता है, रहस्यों का उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है लेकिन रहस्यवादी होने से बचाता है। अवैज्ञानिक दृष्टिकोण (जैसे धर्म) डराता है, उलझाता है, बहकाता है, ठगी करता है और ऐसे उत्तर देता है जिन्हें सिद्ध न किया जाए, स्वयंसिद्ध मान लिया जाएँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही हमारे समय-समाज की प्रमुख समस्याओं का निदान बता सकता है। जैसे: गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्यावृद्धि, बेरोजगारी, गैर-बराबरी के वस्तुगत और सच्चे उत्तर दे सकता है। किसी भी देश में ये सब समस्यायें बेहतर प्रबंधन, नियोजन, शिक्षाप्रसार, युक्तियुक्त कानून-नियमों-दंडप्रावधानों और अंधविश्वासों को दूर करते हुये खतम की जा सकती हैं। इसी संसार में अनेक समाजों-देशों में यह संभव हुआ है और कुछ देशों ने इन समस्याओं पर काफी हद तक विजय पायी है। यहाँ तक कि बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदायें भी किस तरह मनुष्यनिर्मित हैं अथवा किस तरह इन आपदाओं से पार पा सकते हैं, यह भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानना संभव है। प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्‍य सेन को इसी केंद्रीय काम के लिए ही नोबेल पुरस्कार दिया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिये मनुष्य अपने सुख-दुख के कारणों को, दुर्घटनाओं और अवसरों के कारणों को बेहतर तरीके से समझ सकता है, उन्हें विश्लेषित कर सकता है और सबसे बड़ी बात, भाग्यवादी या नियतिवादी न होकर, अपनी परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए और आवश्यकतानुसार उन्हें बदलने के लिए उद्यत हो सकता है। तब उसे किसी झूठे ईश्वरीय सहारे की जरूरत नहीं रहेगी और न ही किसी काल्पनिक सत्ता के होने की सांत्वना की जरूरत। यह सब एक दिन में नहीं होगा किंतु वैज्ञानिक दृष्टि के प्रसार, प्रचार और वातावरण बनाये जाने की गति और उत्साह पर निर्भर करेगा कि कितने समय में यह जगह बन सकेगी। संभव है इसमें दो सौ बर्ष भी लगें। या पचास वर्ष भी। यदि इसके पक्ष में काम नहीं किया जाएगा तो जाहिर है कि हजार सालों में भी कुछ नहीं होगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान मिलकर उन सब चीजों की वास्तविक व्याख्या कर सकने में समर्थ हैं, जिसका झूठा दावा धर्म करता है। एक उदाहरण से बात स्पष्ट की जा सकती है। मृत्यु के बाद क्या होता है, मनुष्य (प्राणी) कहाँ जाता है?? इसके संभव धार्मिक उत्तर हैं कि वह 1. पुनर्जन्म के जरिये अपनी योनि में वापस आता है। 2. किसी दूसरी योनि में चला जाता है। 3. स्वर्ग या नर्कवासी होता है और फिर बाद में कभी किसी योनि में जन्म लेता है। 4. मोक्ष/निर्वाण को प्राप्त होकर परमपिता का अंश बनता है।
ये सारे उत्तर काल्पनिक हैं और आज तक इन्हें कोई सिद्ध नहीं कर सका है, न संत, न योगी, न मठाधीश और न ही संसार का कोई धर्म। बहरहाल, वैज्ञानिक संभव उत्तर यह हो सकता है: संसार में जितने भी जीवित प्राणी हैं, वे अपने `जैविक अवयवों के समुच्चय´ ( biological setup) होने के कारण जीवित, ऊर्जावान और सक्रिय हैं। । जैसे मनुष्य को ही लें, तो अकेले हृदय, किडनी, लीवर, हाथ, पैर या मस्तिष्क को मनुष्य नहीं कहा जा सकता, ये सब और अनंत शिराओं-कोशिकाओं से मिलकर ही मनुष्य का `जैविक संयोजन´ बनता है। हर संयोजन का या उसके अवयवों का, विकासमान अवस्था के साथ एक आयुष्य होता है, चाहे वह जैविक प्रकृति हो या पदार्थों/तत्वों का संयोजन। यह संयोजन जैसे ही गड़बड़ाता है उसे हम बीमारी कहते हैं और उसका इलाज भी संभव है लेकिन जैसे ही वह प्राकृतिक तौर पर या दुर्घटना में नष्ट होता है या आयुष्य को पूरा होता है, मनुष्य/प्राणी का जीवन समाप्त हो जाता है। इसमें किसी अन्य लोक में जाने या मृत्योपरांत जीवन का प्रश्न ही कहाँ उठता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कंप्यूटर या रोबोट के जीवन के साथ होता है। फर्क यह है कि ये `इलेक्ट्रॉनिक सेटअप´ हैं। इनके अवयवों की भी एक आयु होती है, एक सीमा तक इन्हें ठीक (repair) किया जा सकता है और अंतत: एक दिन इनका भी जीवन पूरा हो जाता है। जैसे ये किसी अन्य लोक में नहीं जाते हैं, उसी तरह मनुष्य भी मृत्यु के बाद कहीं नहीं जाता।
लेकिन धर्म ठीक उलटी, मनगढंत बातें प्रचारित कर, जनता का जीवन लगातार दुखमय करता है। झूठे आश्वासन देकर, कष्टों के मूल कारणों से उसे अपरिचित रखता है। ब्राह्मणों, पुरोहितों, पंडों का जीवन-यापन तो इसी तरह के अनेक गपोड़पनों पर चल रहा है। इस तरह के तमाम सवालों, शंकाओं का उत्तर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही दिया जाना संभव है। यदि किसी बात का उत्तर विज्ञान के पास आज नहीं है तो कल जरूर होगा, जैसे सौ-पचास वर्ष पहले उठे सैंकड़ों प्रश्नों के उत्तर उस समय के विज्ञान के पास भले न रहे हों किंतु आज उनके उत्तर विज्ञान के पास हैं। लेकिन धर्म के पास न तो आज उसके उत्तर हैं और न ही भविष्य में कभी हो सकते हैं क्योंकि वह विशुद्ध अंधविश्वास है।

सोमवार, 1 जून 2009

धर्म नशा है


धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार लेख की यह तीसरी किश्‍त।


धर्म नशा ही है
धर्म नशा है। अफीम से भी कहीं ज्यादा बड़ा नशा।
कीर्तन करते-कराते समूहों, हथियार लहराते, नानाप्रकार के क्रियाकलाप करते, नाचते-गाते या छाती पीटते धार्मिक जुलूसों, सांप्रदायिक दंगों (वस्तुत: वे धार्मिक दंगे हैं) में भयानक हिंसा का प्रदर्शन। इन सबको तटस्थ भाव से विश्लेषित कीजिये और देखिए, जो उनके अंग-संचालनों की स्थिति, मानसिक उत्ताप, अतािर्कक अवस्था, असहजता, अस्वस्थता होती है वह किसी भी बड़े और घातक नशे के दौरान ही संभव हो सकती है। सामूहिकता या भीड़ भी इस नशे को बढ़ाती है। सत्संग, कीर्तन, प्रार्थना, नमाज आदि के समय दिया गया प्रत्येक उपदेश उपस्थित समूह पर, उनके मनोजगत पर वशीकरण (हिप्नोटिज्म) की तरह काम करता है। इस अवसर पर दिया जानेवाला फतवा या धर्मादेश हिंसा फैलाने में सक्षम है। इसके रोजमर्रा के जीवन में ही अनेक उदाहरण हम देखते हैं। अनुयायियों को भड़काना आसान है क्योंकि धर्म उन्हें नशे में उन्मत्त तो कर ही चुका होता है। धार्मिकता की प्रत्येक अवस्था में भक्त केवल श्रद्धालु, आज्ञाकारी, अतािर्कक होता है और उसे विवेक प्रयोग करने की तो जैसे अनुमति ही नहीं होती। यह सब `नशा´ पैदा करके ही संभव है और धर्म यह करता है। चिकित्सीय कोण से देखें तो `धर्म के नशे से पैदा मानसिक उत्ताप या अवसाद´ बाकायदा एक मनोरोग है जिसकी विशिष्ट, निर्दिष्ट दवायें हैं: उदाहरण के लिए हौम्योपैथी में वेरेट्रम और स्ट्रेमोनियम। (संदर्भ: डॉ. जे.टी. केन्ट और डॉ बोरिक की रेपर्टरी)
`धर्म से उत्पन्न नशे´ की पृष्ठभूमि में ही चमत्कारों, अंधविश्वासों, अधूरी ज्ञान पद्धतियों, जादू-टोनों और कर्मकाण्डों को स्थापित कर पाना आसान है। क्योंकि नशे में अब विवेक नष्ट है, आस्था और जुनून प्रबल है। ज्योतिष-गणनाओं, भविष्यवाणियों, नक्षत्रगतियों, ग्रहप्रभावों, वरदानों, शापों, मंत्रों, रूढ़ियों आदि के लिए वह संरक्षक की भूमिका निबाहता है। ईश्वर नामक अंधविश्वास को प्रतिष्ठा देता है। (मदर टेरेसा को पोप द्वारा मरणोपरांत संत घोषित कर सकने के लिए दो चमत्कारों की माँग करना इसी श्रेणी का उदाहरण है।) हिन्दू-मुस्लिम-सिख-बौद्ध-जैन-ईसाई-पारसी आदि सभी धर्मों में, उनकी कथाओं में, अवतारी नायकों के चरित्रों में, चमत्कारी कथाओं का प्रमुख और आदरणीय स्थान है। इसीका परिणाम है कि मजार, कुटियों, आश्रमों सहित तमाम धार्मिक स्थानों और उनमें विराजमान धार्मिक लोगों के साथ करिश्मों के किस्से जोड़ दिये जाते हैं ताकि जनता उनके आस्थाजन्य प्रभामंडल का शिकार होती रहे। चूँकि बुद्धि सक्रिय, चेतन तत्व है और आस्था एक निष्क्रिय शरणागत स्थिति इसलिए वह चेतना का, बौद्धिक सक्रियता का, तािर्ककता का विरोध करता है। वह बुद्धि और आस्था में, आस्था को महत्व देता है, भक्ति, श्रद्धा आदि को वरेण्य मानता है। इस तरह वह मनुष्य की मेधा, श्रम और शक्ति को कुंठित करने में सहायक है।
धर्म की कुछ समस्यायें भी समय के साथ-साथ आधुनिक होती गयी हैं जो इस `नशे´ को नयी उपयोगिताओं में धकेलती हैं। पहली व्यवसायीकरण। इसके तहत अब धर्म एक विशाल वित्तीय संस्था का रूप ले चुका है। बड़ी संख्या में चर्चों, मंदिरों, मजारों, गुरुद्वारों, मिस्जदों, आश्रमों और अन्य धार्मिक स्थलों-स्थानों की स्थिति पूँजीपतियों की है। वहाँ इतना पैसा और संपत्ति है कि उत्तराधिकार, गद्दीनशीनी और पुजारी या ग्रंथी होने के लिए हिंसक झगड़े होना आम लक्षण है। इनके पास यह अकूत संपत्ति बेहिसाब है, प्राय: किसी प्रकार के कर और अन्य दायित्वों से मुक्त है और ये सारे स्थान इनसे जुड़े उच्च धर्मप्रमुखों के लिए सत्ता, भोग और इंद्रिय आनंद के केंद्र हैं। इस कारण प्रत्येक धर्म अब एक संस्थान (कार्पोरेट) है जिसके व्यवसाय का टर्नओव्हर खरबों रुपये है। इसी आर्थिक शक्ति के कारण इन धर्मप्रमुखों और संस्थानों ने पूरे संसार में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भरपूर उपयोग शुरू कर दिया है। ये विज्ञापन प्रकाशित कराते हैं, चैनल्स को भुगतान करते हुये उपदेश देते हैं और अपने भक्तों (ग्राहकों) की संख्या बढ़ाते हैं। यह इनके व्यवसायिक होने का ही प्रधान लक्षण है। इस प्रक्रिया में ये अपनी साख, प्रतिष्ठा, संपत्ति (दान, आयोजनों द्वारा) बढ़ाते चले जाते हैं। चूँकि इनके पास असीम पूँजी है इसलिए इनका व्यवहार, सत्ता में हस्तक्षेप और जनता को विमूढ़ रखते चले जाने की भूमिका ठीक वैसी है जैसी किसी पूँजीपति की होती है। बल्कि ये पूँजीपतियों से भी अधिक घातक हैं क्योंकि इनके पास धर्म की प्रभामंडलीय ओट और धर्म का ही हथियार है। इन आश्रमों, धर्मस्थलों, धर्मप्रधानों की तटस्थ, सघन जाँच की अनुपस्थिति ने इनका असली चेहरा कभी सामने नहीं आने दिया है। और कभी फुटकर उदाहरणों में सामने आया भी है तो इसके `नशामूलक´ असर के कारण जनता ने इन्हें वस्तुत: अपराधी माना ही नहीं। यह धर्म के प्रभाव की अनेक विडंबनाओं में से एक है।
दूसरी समस्या है, धर्म का राजनीतिकरण। जो पूरे संसार में, खासतौर पर भारत की दिनचर्या में कुछ ज्यादा ही बढ़ चुका है। कहा जा सकता है कि धर्म का यदि किसी जगह सर्वाधिक उपयोग किया जा रहा है तो वह राजनीति है। इससे सांप्रदायिकता की समस्या सीधे-सीधे जुड़ी है। मजेदार बात यह है कि यहाँ धर्म का आशय धर्मावलंबियों की संख्या, धार्मिक स्थानों तथा धार्मिक प्रतीकों में न्यून कर दिया गया है और तमाम मानवीयता, नैतिकता, मनुष्य की नागरिक समस्याओं - भोजन, गरीबी, पीने का पानी, न्याय, परिवहन, समता, मानवाधिकार, आवास आदि को दरकिनार करते हुये, किसी पार्टी विशेष की जीत को धर्म की जीत बताने की जुर्रत की जाती है। इस राजनीतिकरण के बारे में, इसके दुष्प्रभावों और अमानवीयता के बारे में सजग पत्रकारों-लेखकों द्वारा लगातार लिखा जा रहा है इसलिए यहाँ इतना कहना ही उचित है कि जो लोग सोचते हैं कि धर्म और सांप्रदायिकता अलग-अलग चीजें हैं, वे वस्तुत: अंगूर और अंगूर की शराब में जानबूझकर भेद नहीं करना चाहते हैं। अंगूर से जब तक शराब नहीं बनती, वह एक फल है, लेकिन अंगूर की शराब जब बनेगी तो अंगूर से ही बनेगी। इसी तरह प्रत्येक धर्म-विश्वासी सांप्रदायिक हो, यह कतई जरूरी नहीं, लेकिन प्रत्येक सांप्रदायिक आदमी किसी न किसी धर्म में, उपासना पद्धति में विश्वास करनेवाला होता ही है। धर्म की वजह से मनुष्य नैतिक, परोपकारी, समतावादी, न्यायवादी, सत्यप्रिय और मानवतावादी हो गया होता तो आज संसार में दृश्य कुछ और होता, तब धर्म के विरोध में यह सब सोचने-बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जो धार्मिक हैं और बेहतर मनुष्य भी हैं, वे अपनी व्यक्तिगत वजहों, सामाजिक शिक्षा, निजी विवेक और प्रज्ञा इत्यादि के कारण ऐसे हैं। अन्यथा धार्मिक लोगों की संख्या समाज में कम से कम नब्बे प्रतिशत तो है ही और ऐसी स्थिति में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग श्रेष्ठ मनुष्य होने चाहिये थे जबकि व्यवहार में हम देखते हैं कि स्थिति ठीक उलटी है। इसलिए धर्म को अपदस्थ करना एक कार्यभार भी है।

धर्म एक पुराना, भोंथरा, जंग लगा औजार
धर्म दरअसल अब एक पुराना, भोंथरा, जंग लगा औजार है। अस्तु, वह समााजरूपी शरीर को केवल हानि पहुँचा सकता है। जिस तरह आज पुराने औजारों से कोई डॉक्टर ऑपरेशन नहीं करता, जंग लगे औजारों से तो कतई नहीं। उसी तरह धर्म भी अब एक आधुनिक औजार नहीं है। बल्कि आधुनिक समाज के निर्माण के परिप्रेक्ष्य में तो वह जंग खाये हुये छुरे से अधिक कुछ नहीं, जो रक्षा का खतरनाक आश्वासन भी देता है लेकिन बदले में नयी-नयी संक्रामक बीमारियाँ फैलाता है। धर्म को क्रियान्वयित करने के लिए जो किताबें हैं (जिन्हें पवित्र धार्मिक मार्गदर्शी पुस्तकों का या धर्म-साहित्य का दर्जा प्राप्त है), उनके उपदेशों, नसीहतों, सिद्धांतों या अमृत-वचनों में वे सब बातें भी हैं जो किसी समाज को पुरातन, रूढ़िवादी, अंधविश्वासी और पिछड़ा बनाये रखने के लिए पर्याप्त हैं। अब या तो इन किताबों में संशोधन किया जाए, उनमें हस्तक्षेप कर उन्हें आधुनिक बनाया जाए अथवा उन्हें मार्गदर्शक न माना जाएँ लेकिन हम सहज ही समझ सकते हैं कि किसी धर्म में, कोई संस्था या व्यक्ति ऐसा नहीं है जो इन ग्रंथों में संशोधन कर सके, उसे स्वीकृत करा सके इसलिए उचित यही होगा कि प्रगतिशील, बुद्धिजीवियों द्वारा यह उपचार लगातार किया जाए कि वे अपराजेय, अपरिवर्तनीय मार्गदर्शक ग्रंथों या मेनुअल्स की तरह अपने-अपने समुदाय पर कुशासन न करती रह सकें। वे इन पुस्तकों को गरिमा देने का कार्य बाधित करें और कट्टरपंथियों, उदारपंथियों के संभव भय और विरोध के बरअक्स भी यह कहते रह सकें कि ये `कोड-मेनुअल्स´ आधुनिक समाज के काम नहीं आ सकते, इन पर निर्भरता खत्म होनी चाहिये।
मार्क्‍स सहित तमाम दार्शनिकों-विचारकों ने उचित ही स्पष्ट किया है कि धर्म आलोचना की चेतना को बाधित करता है, उस पर रोक लगाता है, `कंडीशनिंग´ करता है। हम समझ सकते हैं कि आलोचना की चेतना नहीं रहेगी तो सबसे पहले स्वाधीनता, न्याय, विद्रोह और समता की चेतना खंडित होती है। अपनी आलोचना के मामले में धर्म ने सदैव असहिष्णुता का परिचय दिया है। इस तरह वह सभ्यता के सम्यक विकास में ही अवरोध बन जाता है। धार्मिकता और भौतिकवाद में छत्तीस का आँकड़ा है। जैसे `उदारवादी भ्रष्टाचारिता´ और भ्रष्टाचारिता में कोई फर्क नहीं है, इसी तरह `उदारवादी धार्मिकता´ और `धार्मिकता´ में भी कोई फर्क नहीं होता। ये प्रत्यय लड़ाई के रास्ते से बचने के लिए ही प्रयुक्त किये जा सकते हैं। धर्म के प्रति लड़ाई संपूर्णता में लड़नी होगी और उन सब नजरियों के प्रति भी जो धर्म को रुतबा देते हैं।
धर्म का यह आधुनिक स्वरूप सामंती समाज की उपज है इसलिए वह अपने पूरे चरित्र में सामंती, तानाशाह और निरंकुश हो जाना चाहता है। वह न केवल अपने जन्म के समय (युग) की रूढ़ियों और अज्ञानता से जकड़ा है बल्कि वहीं अड़ा हुआ है। वह सत्ताओं से अपनी मित्रता करता है। प्रत्येक धर्म सत्ताओं के जरिये ही, व्यापक रूप से फैलाया गया है। उधर सत्तायें धर्म के जरिये अपना अस्तित्व कायम रखती हैं। सदियों से यही गठजोड़ चला आ रहा है। वे एक-दूसरे से टकराती नहीं हैं, मित्रता निबाहती हैं। वे आपस में सहयोगी हैं, एक-दूसरे की रक्षक हैं। उनका वैमनस्य दो-चार दिन भी नहीं चल पाता। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसा कि देख सकते हैं, पूँजीवादी समाज में धर्म ने पूँजीवाद से भी मित्रता कर ली है, अपने आपको संस्थाबद्ध कर लिया है और वित्तीय शक्ति प्राप्त कर ली है। धर्म अपनी उच्चतर, विकसित संस्थागत अवस्था में पूरी क्रूरता के साथ पेश आता है। जाहिर है कि प्रगतिशील विचारकों, मानवतावादी और जनपक्षधर लोगों के समक्ष इस सामंती, निरंकुश, सत्ताकांक्षी और अब पूँजीवादी धर्म के खिलाफ अनवरत संघर्ष करने की चुनौती है।

धर्म की सकारात्मक भूमिकाएँ
देखें, धर्म की समाज में प्रमुख सकारात्मक भूमिकाएँ, जो आज भी प्रासंगिक हो, क्या हो सकती हैं? उदाहरणार्थ, वह पारलौकिक विश्वासों के आधार पर व्यक्तियों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है और उन्हें अपने असफल, दरिद्र, निराश क्षणों में यह विश्वास और संबल दिलाता है कि आगामी समय में अथवा अगले जन्म में तो चीजें़ बेहतर हो सकती हैं। हर घटना, जिस पर मनुष्य का व्यक्तिगत या सामूहिक वश नहीं चल पाता, उसे नियति से जोड़कर उसे तत्काल एक आश्वासन उपलब्ध कराता है। साथ ही, वह अपनी समझ और सीमा के अनुसार नैतिक विचारों एवं मूल्यों का प्रसार करता है। वह उस पूरे समाज को, जहाँ उसका प्रभाव और मान्यता है, नियंत्रित करते हुये, अपनी तरह की सामूहिकता, सामाजिकता और नैतिकता का निर्माण भी करता है।
उपरोक्‍त भूमिकाओं का जरा-सा भी सावधान विश्लेषण यह स्पष्ट कर देता है कि इस कुल भूमिका के परिणामस्वरूप मानवसमाज कूकपोलकल्पनाधारी, कूपमंडूप, अनावश्यक संतोषी, यथास्थितिवादी, अकर्मण्य, अपनी स्थिति के लिए खुद को जबावदेह न माननेवाला, अवतारों की प्रतीक्षा करनेवाला, प्रगतिविरोधी, कट्टर, अंधविश्वासी होता चला जाता है। इस धार्मिक दृष्टि और वैज्ञानिक दृष्टि में मूलरूप से गहरा मतभेद है क्योंकि जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण कार्य-कारण, निरीक्षण-परीक्षण-अन्वेषण-खोज एवं तािर्कक-औचित्यपूर्ण व्याख्याओं में खुद को प्रस्तुत करता है, वहीं धार्मिक दृष्टिकोण अलौकिक शक्ति, अवतारवाद, कर्मकाण्ड, भाग्यवादिता में विश्वास करता है। धर्म के इस प्रभाव में मनुष्य मान लेता है कि उसके सुख-दुख का दाता कोई परमशक्ति है, इस तरह वह सांत्वना प्राप्त कर लेता है। धर्म की इसी भूमिका के कारण वह सत्ताप्रिय होता है क्योंकि सत्ता के अपराधों, गलतियों और चूकों की वह जाने-अनजाने रक्षा करता है और सत्ता के प्रति किसी भी विरोध एवं विद्रोह का शमन कर सकता है। इसीलिए मार्क्‍स का यह कथन सटीक है कि धर्म जनता की अफीम है।
कुछ लोगों ने इधर तर्क दिया है कि मार्क्‍स ने अपने लेख में दरअसल धर्म की प्रशंसा यह कहते हुये की है कि `धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, निर्दय संसार का मर्म है, निरुत्साह परिस्थितियों का उत्साह है।´ लेकिन पूरे पैराग्राफ और लेख को पढ़ते हुये साफ हो जाता है कि ये सब वाक्य इस सुविचारित आक्रामक वाक्य की ही पुष्टि एवं ध्वनियाँ हैं कि धर्म जनता की अफीम है। संदर्भित लेख में वे फिर आगे लिखते ही हैं कि `धर्म के उन्मूलन का अर्थ है जनता के वास्तविक सुख की माँग करना.....धर्म की आलोचना मनुष्य का मोहभंग कर देती है ताकि वह मनुष्य अब विवेक के साथ चिन्तन और कर्म कर सके.....`धर्म की आलोचना´ इस सीख पर खतम होती है कि मनुष्य के लिए मनुष्य सर्वोच्च प्राणी है जिससे यह अनिवार्यता उजागर होती है कि उन समस्त संबंधों का खात्मा कर दिया जाए जो मनुष्य का दर्जा पतित, पराधीन, परित्यक्त या घृणास्पद बनाते हैं। (हेगेल के न्यायदर्शन की समालोचना का प्रयास-कार्ल मार्क्‍स।
एक कुतर्क और सामने आया है कि मार्क्‍स की धर्म संबंधी आलोचना दरअसल हिन्दू धर्म की आलोचना नहीं है। यह ऐसा ही है जैसे कि अमेरीका या जापान में बैठकर किये गये भ्रष्टाचार के अध्ययन को यह कहकर खारिज किया जाए कि यह भारत में चल रहे भ्रष्टाचार की आलोचना नहीं है, इसलिए भारतीय भ्रष्टाचार आलोच्य नहीं है।
मार्क्‍स स्पष्ट करते हैं कि धर्म एक काल्पनिक सुख देता है और वह सुख वास्तविकता में कभी प्राप्त नहीं हो सकता।
इसलिए धर्म का उन्मूलन अथवा वैज्ञानिक दृष्टि का विकास, जनता के लिए वास्तविक सुख की माँग करना है। ताकि मनुष्य अपने लिए, समाज के लिए वास्तविक और प्राप्य सुखों की माँग कर सके। स्वतंत्रता, समता, न्याय और मानवीय अधिकारों की माँग कर सके और लड़ सके और जान सके कि उसके साथ जो भी अन्याय, दुख, गरीबी और त्रास संलग्न है वह किसी भी अलौकिकता, पूर्वजन्मों के पाप आदि की वजहों से नहीं बल्कि इसी समाज में रह रहे नियामकों, सत्ताधारियों, धार्मिक आश्वस्तियों और पूँजीपतियों के शामिल खेल की वजह से है। जो लोग कहते हैं कि धर्म वैज्ञानिक है, तार्किक है, समाज को प्रगति की तरफ ले जानेवाला है उनसे तो यह फ्रांसीसी कहावत ही कही जा सकती है- `आप लिखते हैं `लंदन´ और पढ़ते-बोलते हैं `कुस्तुनतुनिया´।´

शुक्रवार, 29 मई 2009

धर्म कोई निजी परिघटना नहीं है


मित्रो,
'धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार' शीर्षक लेख की यह दूसरी किश्‍त।


धर्म कोई निजी मान्यता या परिघटना नहीं है
जो कहते हैं कि धर्म एक निजी आस्था, विश्वास और मान्यता की बात है। वे दरअसल भोले हैं या चालाक। जैसे भ्रष्टाचार, ईमानदारी, बेईमानी, चरित्रहीनता, बुद्धिमानी देखने-सुनने में निजी लगती है लेकिन अंतत: वह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच में ही घटित होती है और इस तरह व्यक्तियों के समूह में और पूरे समाज में। फिर धर्म तो कतई निजी बात नहीं है। जैसा कि स्पष्ट है कि वह परमसत्ता द्वारा उपदेशित, संभव समूह/अनुयायियों को संबोधित और प्राय: जन्मजात प्राप्त और थोपी हुयी अवधारणा है इसलिए उसको किसी के निजी खाते में डाल कर मुक्त हो जाना विचारहीनता है, शरारत है। यदि वह इतनी निजी है तो फिर मनुष्य को यह आजादी सभी धर्म क्यों नहीं देते कि वह वयस्क होने पर अपनी पसंद का धर्म चुन ले या कोई धर्म न चुने। बच्चे को उसकी अबोध अवस्था से ही परिजन या समाज के लोग धर्म विशेष की पद्धतियों, प्रशिक्षण एवं प्रक्रियाओं से क्यों गुजारने लगते हैं? धर्म पूरे समाज को प्रभावित कर रहा है और उसे कतई निज तक सीमित कहकर बरगलाया नहीं जा सकता।
सभ्यता विकास के क्रम में ज्ञान-दर्शन-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में पर्याप्त विकास हुआ है और हो रहा है। अब प्रकृति के रहस्यपूर्ण उत्तरों के लिए धर्म के पास जाना हास्यास्पद है। वहाँ जो भी लिखा हुआ है उसमें तत्कालीन समय, समाज के ज्ञान की सीमा और अज्ञान का प्रभाव है। और सबसे बड़ी बात यह कि उसे चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि वह परमसत्ता के आदेश के रूप में प्रतिष्ठित है। विज्ञान के पास जिन सवालों के सटीक और अंतिम उत्तर नहीं हैं, वहाँ विज्ञान तार्किक रूप से कुछ संभावनाओं की ओर इशारा करने में सक्षम है और कहता है कि इस दिशा में खोज की जाएगी। लेकिन धर्म सिर्फ अहंकारी रूप से सब कुछ जानने का दावा करता है जबकि जानता कुछ नहीं है। यदि धर्म इतना ही जानकार है तो वह विज्ञान की कसौटियों पर कसे जाने के लिए खुद को प्रस्तुत क्यों नहीं करता? स्वयं को आधुनिकतम ज्ञान-विज्ञान की सरणियों में से क्यों नहीं गुजरता?
बेट्रोल्ट ब्रेष्ट ने `गेलीलियो का जीवन´ नाटक में, धर्मग्रंथों में उिल्लखित खगोलीय घटनाओं एवं स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सटीक व्यंग्य करते हुये ठीक ही प्रश्न किया है: `क्या ईश्वर ने धर्मग्रंथ लिखने से पहले खगोलशास्त्र ध्यान से नहीं पढ़ा होगा?´ (प्रसंगवश यहाँ एक उदाहरण दिलचस्प होगा जो इस लेखक, कुछ मौलवियों और हिन्दू धर्म में आस्था रखनेवाले युवाओं के साथ, एक ट्रेन यात्रा में बातचीत के दौरान घटित हुआ। जब इन मौलवियों और हिन्दू युवाओं द्वारा बार-बार स्थापना रखी गयी कि सब कुछ कुरान और वेदों में लिख दिया गया है। मैंने उनसे प्रश्न किया कि आप सबके बच्चों ने या आपने जब स्कूल-कॉलेज की परीक्षायें दी होंगी और यह पूछे जाने पर कि पृथ्वी, संसार, मानव सभ्यता का निर्माण और विकास कैसे हुआ तब आपने अपने धर्म के अनुसार उत्तर क्यों नहीं लिखे? इस प्रश्न ने उन सबको विचलित कर दिया और वे अप्रासंगिक, असंदर्भित बहस करने लगे। थोड़ी शांति होने पर मैंने उनसे पुन: कहा कि यदि संसार बनने, सभ्यता विकसित होने के विश्वसनीय उत्तर धार्मिक ग्रंथों में ही हैं तो फिर वे ईसाइयों, हिन्दुओं, मुस्लिमों के ग्रंथों में अलग-अलग क्यों हैं और यदि विज्ञान सही है तो फिर आप सब मिलकर इन धर्मग्रंथों की अवधारणाओं को ठीक क्यों नहीं करते? पुरातनकाल से, जब सब मनुष्य साथ-साथ विकसित होते हुये इस सदी तक आ गये हैं तो उनकी उत्पत्ति और विकास के सिद्धांत, धर्म के आधार पर अलग-अलग कैसे हो सकते है?? विज्ञान-भूगोल की परीक्षाओं में आपको क्योंकर विज्ञान का ही सहारा लेना पड़ता है। जाहिर है, इनका तार्किक या समाधानकारी उत्तर उनके पास न था।)
कहा जा सकता है कि धर्म को सर्वज्ञ मानने की जिद का अर्थ है- किसी स्थान पर बिजली की सुविधा और उपलब्धता होने पर भी चिमनी जलाने की जिद।

धर्म की नैतिकता
यहाँ देखना उचित होगा कि धर्म की नैतिकता, वस्तुत: नैतिकता नहीं है। क्योंकि नैतिकता के जो प्रमुख लक्षण होते हैं वे इसमें नहीं हैं। मसलन-
1. नैतिकता मनुष्यमात्र के लिए संबोधित होती है, न कि किसी समूह या खास विचारों में यकीन रखनेवाले व्यक्तियों के लिए। नैतिकता इस तरह धर्मनिरपेक्ष होती है।
2. नैतिकता समाज और मनुष्य आधारित ही हो सकती है न कि ईश्वराधारित या आत्माधारित।
3. नैतिकता एक विवेकसम्मत, सुविचारित, पारस्परिक निर्णय है, न कि कोई अलौकिक या पैगम्बरीय संदेश।
4. नैतिकता पाप-पुण्य की अवधारणा से परे होती है और हर हाल में सभी मनुष्यों (लिंग, रंग या जाति इत्यादि के भेद के बिना) पर एकसमान लागू होती है।
5. नैतिकता समाजाधारित है, मनुष्यनिर्मित है इसलिए देश-काल-परिस्थिति अनुसार आलोच्य होकर, परिवर्तनशील एवं संशोधनयोग्य है, क्योंकि समाज भी परिवर्तित होता रहता है। जबकि धर्म, नैतिकता को स्थिर, जड़ बनाता है, उसकी गतिशीलता को रोकता है।
6. धार्मिक नैतिकता प्राय: सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करती है। (जैसे किसी भी धर्माधारित नैतिक उपदेश द्वारा `चोरी करना´ नहीं रोका जा सकता, जब तक कि समाज में एक बड़ा हिस्सा वंचितों का है। इसी तरह `सदा सत्य बोलो´ का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है।)
इसीलिए दृष्टव्य है कि जैसे-जैसे नागरिक समाज एवं राष्ट्र की अवधारणा विकसित होती गयी है, धार्मिक नैतिकताओं या धर्म-सूत्रों का स्थान नागरिक-कानून लेते गये हैं। कुछ कानून तो वैश्विक स्तर पर बनाये गये हैं जिन्हें हम अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की तरह जानते हैं। क्योंकि धार्मिक सूत्र केवल धर्म विशेष के अनुयायियों पर ही लागू किये जा सकते हैं जबकि नागरिक कानून पूरे देश, किसी समाज या पूरे संसार पर। लेकिन अभी इस विषयक प्राय: हर देश में समस्याएँ बनी हुयी हैं। अनेक धार्मिक रीतियों, आदेशों और रिवाजों को समुदाय विशेषों में अहमियत मिली हुयी है और कानूनों का अनुपालन वहाँ नहीं है। जैसे, हमारे देश में ही विरासत, विवाह, तलाक, संपत्ति विवाद, धर्मस्थल विवाद, धार्मिक आयोजनों आदि अनेक मामलों में हिन्दु-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि के धर्मग्रंथों एवं उनकी धार्मिक परंपराओं को प्राथमिकता दी जाती है। आज जबकि कोई भी विकसित देश किसी जाति या धर्म विशेष से मिलकर नहीं बन सकता, इसलिए समान नागरिक कानून की महती आवश्यकता है, जो हमारी कालसापेक्ष एवं समाजसापेक्ष नैतिकताओं का निर्माण और क्रियान्वयन कर सके।

धर्म और पूँजी की शामिल हिंसा
तमाम नैतिकताओं के उलट, धर्म में हिंसा का उपदेश निहित है। अपने धर्म को फैलाने, धर्मान्तरण करने या रोकने, धर्मविरोध होने, धर्म विषयक तर्क या आलोचना करने, धर्म की रक्षा करने आदि बिंदुओं पर, धर्म हिंसा को जायज ठहराता है, हिंसा का आदेश देता है। यही नहीं, बलि आदि के महत्त्व से पशु-पक्षियों को ही नहीं, मनुष्य को भी स्वाह कर देने को प्रतििष्ठत करता है। वह इस तरह की हिंसा करनेवाले को दण्ड के नहीं, यश, कीर्ति, और कर्तव्‍य के हिस्से में रखता है। (हिन्दुओं में तो तमाम देवी-देवता हथियारधारी हैं। हर प्रमुख देवी-देवता और हर धर्म के ईश्‍वरीय अवतारों ने अनेक हत्यायें की हैं। खुद हिंसा भरे कष्‍ट उठाए हैं, काफिरों को परास्त किया है या मार गिराया है। हिंसा की ये कथायें मुग्धभाव, गौरवभाव से सुनी-सुनायी जाती हैं।) अनेक वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और विद्वानों को धर्म विषयक असहमतियों के चलते या नये आविष्कार करने के जुर्म में, धर्म के झण्डाबरदारों ने यातनायें दीं और जलाकर, जहर देकर या अन्यान्य तरीकों से मार डाला। जिस तरह पूँजी कई अपराधों और हिंसा की जनक होती है, उसी तरह धर्म भी। जिस तरह पूँजी अपने पक्ष में किये गये अपराधों के दोषियों की रक्षा करने में सक्षम हो जाती है, उसी तरह धर्म भी। इसलिए ही धर्म और पूँजी का गठजोड़ बहुत आसानी से हो जाता है। इसी मायने में धर्म एक सुगठित माफिया-प्रमुख की तरह पेश आता है। यही वजह है कि अपने को धार्मिक कहनेवाले लोग, अन्य धर्मावलंबियों के साथ की गयी हिंसा, बलात्कार, कत्ल तक को जायज ठहरा देते हैं। कश्मीर में जेहाद और हाल ही में गुजरात में घटित मुस्लिमों के नरसंहार को अपने-अपने धर्मावलंबियों द्वारा उचित ठहराया गया है। हर धर्म का इतिहास ऐसी घटनाओं से, मानवरक्त से सना हुआ है। वह अपने स्वभाव में बर्बर है, साम्राज्यवादी है, तानाशाह है। इसलिए उन्नत, आधुनिक, मानवीय समाज में धर्म को अपदस्थ किये जाने की आवश्यकता बनी रहेगी।
धर्म सामान्य जनजीवन में भी अपराधों को प्रेरित करता है: व्यभिचार, हत्या, बलात्कार, चोरी, झूठ, धोखा आदि कर्मों के लिए धर्म के पास कन्फेशन, पश्चाताप, प्रार्थना, यज्ञ, बलि, दान सहित पाप-मुक्ति की अनेक क्रियाएँ हैं। हिन्दू धर्म में स्त्री और शूद्रों के लिए तो मौत तक की सजाएँ हैं लेकिन बाकी सबके लिए उपाय हैं। तुलसी ने कहा ही है कि `समरथ को नहीं दोष गुसाईं।´ साथ ही, वह मनुष्यों के बीच लिंग, वर्ण, जाति, सामाजिक स्थिति, राजकीय स्थिति, रंग, नस्ल आदि के आधार पर भेद करता है। यह विकसित, सभ्य समाज की अवधारणा के विरुद्ध है, अन्यायपूर्ण तो है ही। देवदासी, साध्वियाँ, शिष्यायें बनाने जैसी प्रथाओं के जरिये वह हर तरह के अन्‍याय और वंचना को जगह देता है, महिमामंडित करता है और धार्मिक महंतों, पुजारियों, आचार्यों आदि के उपभोग के शोषण को वैधता और गरिमा प्रदान करता है।
धर्म मनुष्य को अलौकिकता के जाल में फँसाता है। वह मानव जीवन के दुखों और मृत्यु के बाद के जीवन की ऐसी कहानी प्रचारित करता है जिसमें सत्य का लेशमात्र अंश भी नहीं है। मोक्ष, स्वर्ग, नर्क, कयामत, श्राद्ध, पुनर्जन्म, पूर्वजीवन के कर्म, पाप, पुण्य, पराशक्तियों आदि कल्पनाओं का प्रक्षेपण करता है, जनता को कर्मकाण्ड में, व्यर्थ की पूजापद्धतियों, भाग्यवाद, ज्योतिष, ग्रहों के प्रभावों, सितारों की गतियों और प्रार्थनाओं में फँसाता है। इस तरह जनता के इस लोक के वास्तविक दुखों के कारणों पर तथा दुखों-कष्टों को पैदा करनेवाले मनुष्यों एवं सामाजिक-राजनैतिक कारकों पर पर्दा डालता है। असमानता, अन्याय फैलानेवाले सत्ताधारी, पूँजीपतियों और सामंती लोगों का कवच बनता है, उन्हें बरी करता है। वह भुला देता है कि हमारे वास्तविक शत्रु भूख, गरीबी, अज्ञान, अन्याय, असमानता और बीमारियाँ आदि हैं और इनका हल इसी समाज में, इसी जीवन में है। फलस्वरूप वह समाज में बेहतरी, बदलाव और प्रगतिवादी क्रांति के बीच कुचालक (bad conductor) का काम करता है। अलौकिकता के विस्तार और अंतरंग में जाकर वह आध्यात्मिकता को पुष्ट करता है। आध्‍यात्मिकता अपार्थिवता, अभौतिकता की तरफ ले जाती है और धर्म को ही गरिमा देती है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे का मान बढ़ाने वाले हैं। रेखांकित किया जाना चाहिये कि आध्‍या‍त्‍मिकता किसी भौतिक दर्शन या वाद की तरफ यात्रा नहीं करती है। जो `धर्म या आध्‍यात्मिकता´ में से आध्‍यात्मिकता का गर्वीला चुनाव करते हैं, वे सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष तरीके से धर्म की ही ध्वजा उठाते हैं।
जारी। तीसरी किश्‍त एकाध दिन में।

बुधवार, 27 मई 2009

धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार

अपने सुधि एवं विचारशील साथियो के लिए कुछ वैचारिक लेख इस ब्‍लॉग में दे रहा हूं। ये विभिन्‍नलघु पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित हुए हैं।

सबसे पहले धर्म विषयक‍ आलेख।
प्रस्‍तुत लेख काफी बड़ा है इसलिए इसे चार किश्‍तों में दिया जा रहा है।
यह लेख वसुधा मे प्रकाशित हुआ था।

धर्म के विकल्प की परिकल्पना
चीजों को बहुत विवादास्पद न बनाया जाए और अतािर्कक हठधर्मिता न पाली जाए तो बात कुल एक पंक्ति की है: `धर्म´ का विकल्प `वैज्ञानिक दृष्टिकोण´ हो सकता है तथा `धर्म में विश्वास´ का विकल्प `मनुष्य प्रजाति की ऐतिहासिकता में विश्वास´ में मुमकिन है। लेकिन हम जानते हैं कि मामला इतना सीधा और स्वीकार्य नहीं हो सकता, इसलिए मजबूरी है कि हम `धर्म´ के विस्तार में जाएँ, इक्कीसवीं सदी तक आते-आते उसकी भूमिका, उपयोगिता और स्वभाव पर एक बार फिर दृष्टिपात करें और धर्म की प्रतिक्रियावादी, यथास्थितिवादी, अवैज्ञानिक-अंधविश्वासवादी, अविवेकी प्रकृति को भी देखें ताकि इस प्रक्रिया में `धर्म का विकल्प´ खोजे जाने का औचित्य भी रेखांकित हो सके।


क्षीण संभावना की कौंध

मध्‍यकाल से लेकर आज तक पूरे संसार में धर्म को लेकर, उसकी प्रासंगिकता, उपादेयता, भयावहता, उपकरणवादिता के संदर्भ में अनेकानेक विचार होते रहे हैं किंतु हर बार जनता के बीच `धर्म´ की विजय होती रही है। इक्कीसवीं सदी में भी इस बात की संभावना क्षीण है कि फिलहाल धर्म को किसी आधुनिक, वैज्ञानिक विचारधारा से अपदस्थ किया जा सकेगा। लेकिन यही `क्षीण संभावना´ वह खिड़की भी खोलती है जहाँ से हवा-प्रकाश आ सकता है। इसी क्षीण संभावना में वह कौंध छिपी हुयी है जो हर बुद्धिजीवी, विचारक और अन्वेषी को आकर्षित करती है और सूचना देती है कि `विकल्प का यह विचार´ दुर्निवार नहीं है।


यहाँ उन अनेक प्रगतिशील विचारकों की निराशा को याद करना भी उचित होगा जो धर्म के विकल्प का प्रश्न उठते ही `धर्म की तथाकथित अच्छाइयों´ को याद करने लगते हैं या फिर `धर्म के साथ आधुनिकता जोड़ने, संग-साथ निर्वाह करने´ के सुझाव को विकल्प बताने की कोशिश करते हैं। कहना होगा कि ऐसे लोग धर्म का विकल्प खोजना ही नहीं चाहते। दरअसल उन्होंने स्वयं ही `वैज्ञानिक दृष्टिकोण´, `भौतिकवादी दर्शन´ को इस तरह अर्जित नहीं किया होता है कि वे उसमें असंदिग्ध विश्वास जता सकें तथा गलत को `लगातार और सदैव´ गलत कह सकने का साहस और विवेक दर्शा सकें। इसलिए जब भी यह कहा जाता है कि धर्म का कोई विकल्प नहीं है तब देखना चाहिये कि कहनेवाले ने इस दिशा में सम्यक विचार किया भी है या नहीं। कहीं वह धर्म के दैत्याकार, अपरिमित और अतीव बलशाली रूप को देखकर स्तुति में तो नहीं खड़ा रह गया है। लेकिन यहाँ तक आते हुये हमें याद कर सकते हैं कि हीगेल,मार्क्‍स, बर्टेण्‍ड रसेल ने खासतौर पर और अपनी-अपनी तरह से ड्यूहरिंग, कांट, कोपरनिकस, ब्रूनो, गैलीलियो, न्यूटन, रूसो और डार्विन सहित सैंकड़ों ज्ञात-अज्ञात विचारकों-वैज्ञानिकों- साहित्यकारों ने लगातार और विपुल कार्य हमारे सामने रखा है जिससे धर्म की आलोचना, अत्यंत वैज्ञानिक एवं तािर्कक आधार पर हो सके। इनमें मार्क्‍स, बर्टेण्‍ड रसेल का विमर्श न केवल आधुनिकतम है बल्कि वह इस विमर्श को अनवरत ठोस रूप में आगे बढ़ाये जा सकने की संभावना का मार्ग भी प्रशस्त करता है।


जरूरी है कि चर्चा की जाए कि यहाँ `धर्म´ से हमारा क्या अभिप्रेत है! पहला अर्थ संस्कृत भाषा के परिप्रेक्ष्य में देखें : धर्म `धृ´ धातु से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। दूसरा, religion के अर्थ में देखें तो religare शब्द से निकला है जिसका अर्थ है -`बाँधना´। अथाZत यहाँ भी वही अर्थ निकलता है कि ऐसे नियमों के समुच्चय जो धारण किये जाएँ, जिनका पालन किया जाएँ अर्थात् समाज को ऐसे (नैतिक) नियमों से बाँधा जाए जिनका पालन बाध्यकारी हो और समाज का संचालन हो सके।


यहाँ तक धर्म को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं हो सकता क्योंकि समाज में रहने के कुछ नियम तो बनाये ही जाएँगे (जैसे अभी कानून, नियम, अधिनियम बनाये जाते हैं), ताकि अराजकता न फैले, सामूहिकता सुचारु रूप में संचरित हो सके। तब जाहिर है कि इन नियमों को बदलते समाज, समय और आवश्यकताओं के अनुरूप सहज ही परिवर्तित भी किया जा सकता है। किया जाना चाहिये, क्योंकि जिन्होंने भी धर्म के बहाने ये `नियम´ बनाये, उनमें अपने युग की, उनके निजी ज्ञान की, स्वार्थ, तथा वर्चस्वांकाक्षा की दिलचिस्पयाँ भी सहज शामिल थीं। धर्म के बारे में विस्तार से उपलब्ध आलोचना और बहस से स्पष्ट है कि `धर्म´ के जरिये समाज के वर्ग-विशेष ने अपनी स्थिति निरंकुश बनायी और बहुसंख्यक लोगों पर, खासतौर पर स्त्रियों तथा कमजोर वंचितवर्ग पर शासन ही नहीं किया, उत्पीड़न भी किया। सामान्यजन उन नियमों को `बाध्यतानुसार´ मानते रहें इसलिए `धर्म´ को धीरे-धीरे अलौकिकता, ईश्वरीय आदेश या परम सत्ता से जोड़ा गया।


धर्म ईश्वर से भारित है

`धर्म´ को ईश्वर से जोड़ते ही उसकी लौकिकता प्रभावित हो जाती है, उसका `नैतिक रूप´ एवं `धारण करने योग्य चरित्र´ खंडित हो जाता है क्योंकि तब वह एक अपरिवर्तनीय, सर्वशक्तिमान आदेश के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होता है। जिस पर कोई बहस करना पाप है, अधर्म है और जो सिर्फ स्वीकार करते चले जाने के लिए है। पीढ़ी दर पीढ़ी। एक शताब्दी से गुजरते हुये दूसरी शताब्दी तक। हम यहाँ इसी `धर्म´ की बात करना चाह रहे हैं जो अलौकिक हो चुका है, ईश्वरीय हो चुका है और जाहिर है कि घनघोर अवैज्ञानिक हो चुका है। वह अपने `नैतिक नियमों´ की आकांक्षा और प्रतिज्ञा से ही भटक गया है। उसमें अब एक भी ऐसा लक्षण नहीं बचा है जो `नैतिकता´ में सहज ही होते हैं। यदि फिर भी कहें कि धर्म, धारण करने योग्य नैतिकता का संक्षेप है तो वह नैतिकता कैसे स्वीकार्य हो सकती है जो जड़ हो, अवैज्ञानिक हो, तर्कविरोधी हो, अपरिवर्तनशील हो, अविनाशी हो, अपना औचित्य समाज की सत्ता और मनुष्य की मुक्ति, गतिशीलता और स्वतंत्रता में न खोजती हो। जो सर्वोपरि हो जाना चाहती हो और जिसका अब शब्दकोषीय अर्थ है: Religion- a belief in one or more gods. एवं ब्रिटेनिका विश्वकोष के अनुसार- ^Religion is commonly regarded as consisting of a person's relation to God or to gods or spirits.

'बहुसंख्यक विवेचना और पारिभाषिक विश्लेषण के अनुसार धर्म में तीन तत्व अनिवार्य रूप से पाये जाते हैं: 1.अलौकिक शक्ति के प्रति विश्वास 2.कर्मकाण्ड-पूजापद्धति-अवतार 3.धर्मग्रंथ। यद्यपि पाण्डुरंग वामन काणे ने हिन्दुओं में धर्म को धार्मिक विधियों/क्रियाओं/कर्तव्यों के रूप में ही विश्लेषित किया है। संदर्भ लें - `ऋगवेद की ऋचाओं में धर्म ज्यादातर स्थानों पर धार्मिक विधियों या धार्मिक क्रिया संस्कारों के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अथर्ववेद में धर्म शब्द का प्रयोग `धार्मिक क्रिया संस्कार करने से अर्जित गुण´ के अर्थ में है। एतरेय ब्राहम्ण में धर्म शब्द `सकल धार्मिक कर्तव्यों´ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।´ छान्दोग्योपनिषद, मनुस्मृति, याज्ञवलक्यस्मृति तक आते-आते धर्म के 5 स्वरूप मान लिए गये: वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रम धर्म, नैमित्तिक धर्म ओर राजादि के गुणधर्म (कर्तव्यादि)। इन्हीं आधारों पर धर्मसूत्र (आर्यजाति के सदस्यों के लिए आचार-नियम) बनाये गये, जैसे गौतमधर्मसूत्र, वसिष्ठधर्मसूत्र, कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि-इत्यादि। अर्थात् आर्यजाति के लिए `धर्म का अर्थ´ आचार-विधि का परिचायक, कर्तव्यों, बंधनों का द्योतक है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-1, लेखक: भारत रत्न महामहोपाध्याय डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे।)

यहाँ हम इन सूत्रों-स्मृतियों को `नियमों´ का दर्जा दे भी दें तब भी आज विचारशील एवं बहुसंख्यक हिन्दुओं/आर्यजाति को मनुस्मृति सहित तमाम स्मृतियों और धर्मसूत्रों के ये नियम मान्य नहीं हैं, न ही हो सकते हैं क्योंकि इनमें वर्ण के आधार पर उच्चवर्णों का भारी पक्ष लिया गया है तथा शूद्रों (दलितों) और स्त्रियों को वंशानुगत रूप से जन्मना ही प्रताड़ित कर दिया गया है। इनमें अनेकानेक मानवविरोधी लक्षण विद्यमान हैंं। यहाँ इसके विवरण में न जाते हुये यह कहना पर्याप्त होगा कि `धर्म´ के नाम पर ये आचार-नियम ब्राहम्णों/उच्चवर्णों की तानाशाही और वर्चस्व बनाये रखने की संहिताओं के अलावा कुछ नहींं हैं और इन्हें कतई नैतिक-नियम नहीं कहा जा सकता क्योंकि अपनी प्रकृति और आकांक्षा में इनसे अधिक अनैतिक कुछ नहीं हो सकता। आधुनिक विचारकों ने, राजनीतिज्ञों ने इन वैदिक नियमों का खुला विरोध भी इसलिए किया है क्योंकि ये सामाजिक अन्याय के जनक और पोषक हैं।
यहाँ डॉ. वामन काणे इस पक्ष की उपेक्षा कर देते हैं कि इन आचार-संहिताओं में तमाम कर्मकाण्डी पद्धतियों का समावेश है और इन्हें भी अंतत: ईश्वरीय आदेशों और भगवत् इच्छा से जोड़ा गया था ताकि उनका पालन कराने में कोई व्यवहारिक कठिनाई न हो तथा राज्य (state) को नागरिक-विवेक की जगह पुरोहितीय सुविधा से चलाया जा सके एवं अभिजात्य और शासकवर्ग को चुनौती न दी जा सके।
इस तरह हमारे सामने संसार का जो भी `धर्म´ उपस्थित है वह ईश्वर या अलौकिकता और परमसत्ता से भारित (loaded) है। इसी ओट में वह नियंत्रक, परम, निरंकुश और शक्तिमान होता है। यहाँ एँगेल्स को याद करें तो `हर प्रकार का धर्म, मनुष्यों के दिमागों में उन बाह्य शक्तियों के काल्पनिक प्रतिबिंब के अलावा कुछ नहीं है जो उनके दैनिक जीवन को शासित करती हैं। इस प्रतिबिंब में पार्थिव शक्तियाँ, अलौकिक शक्तियों का रूप धारण कर लेती हैं।´ अस्तु अब कोई भी धर्म मूल अर्थों (अर्थात धारण करने योग्य आचरण) में `धर्म´ नहीं है क्योंकि वह `नागरिक या मानवमात्र के लिए´ नैतिक नियमों को प्रस्तावित नहीं करता, अपितु वह अपने अनुयायी समाज के लिए महज धार्मिक क्रियाओं, अंधविश्वासों, प्रदर्शनों, धार्मिक संस्कारों एवं कर्मकाण्डों की रक्षा करने में जुटा हुआ है और अलौकिक सत्ता से `लोडेड´ है। हमारा आशय इसी धर्म से है। यहाँ, जहाँ भी `धर्म´ शब्द का प्रयोग है, वह धर्म के इसी आशय और संदर्भ में है। `धर्म´ के इसी स्वरूप ने आज प्रत्येक मानवसमाज को नानाप्रकार के रोगों से घेरकर रखा है और सत्ताधारी, पूँजीपति, अधिनायकवादी, धार्मिक नेतृत्व कर रहे लोग इस धर्म का उपयोग जनता को तमाम अंधविश्वासों में बनाये रखकर, उसके शोषण में करते चले आ रहे हैं।
धर्म के खिलाफ होने, उसे अपदस्थ करने या उसका विकल्प खोजने के प्रयास हेतु अनेक कारण हैं। जैसे वह पिछड़े, सामंती समाज का अग्रदूत और सखा है, निरंकुश है, आलोचना के विरुद्ध है, यथास्थितिवादी, अवैज्ञानिक, अंधविश्वासी है, वह ईश्वर-भारित होकर मानव समाज को खास तरह से अशिक्षित, नियतिवादी और मनुष्यविरोधी बनाये रखने में अपनी अग्रणी भूमिका निबाहता है। (यह किस हद तक मानवविरोधी बनाता है इसके लिए केवल यह विख्यात तथ्य पर्याप्त होगा कि संसार में तमाम युद्धों में जितने लोग मारे गये हैं, उससे कई गुना अधिक मनुष्य धर्मयुद्धों या धार्मिक विद्वेष के झगड़ों-फसादों में मारे गये हैं।) लेकिन धर्म के खिलाफ, जैसा कि हम जानते हैं, महत्वपूर्ण आरोप यह है कि वह समतावादी, न्यायवादी, मानवतावादी, लोकतंत्रवादी और शोषणरहित समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। यह एक अकेला आरोप ही इतना संगीन है जिसका सुस्पष्ट निष्कर्ष है कि `धर्म´ के रहते मानव की सच्ची मुक्ति संभव नहीं। मनुष्य की स्वतंत्रता मुमकिन नहीं।
`धर्म´ अंतत: ईश्वरीय या परमसत्ता की संरचना, आदेश, अपेक्षित नैतिकता, उपदेश आदि के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। धर्म में जो भी संशोधन हुये, (जैसे हिन्दू धर्म में बुद्ध या जैन), वे भी कालांतर में ईश्वर या अवतारों की ओर से किये गये संशोधन मान लिए गये और उनका हश्र भी वही हुआ जो प्रारूपिक (typical) `धर्मों´ का हो सकता है। (हालाँकि वामन काणे सहित अन्य विद्वानों के अध्ययन को केंद्र में रखकर देख सकते हैं कि हिन्दू धर्म अपने प्रारंभ में ईश्वराधारित नहीं था बल्कि समाज पर नियंत्रण करने के प्रभुत्वशाली (ब्राह्मणवगाZदि) लोगों द्वारा बनायी गयी आचरणपद्धति थी जो इस वर्ग को असीम ताकत देती थी, निरंकुश बनाती थी और आमबहुजन समाज को, स्त्रियों को, यंत्रणापूर्ण, दासतापूर्ण जीवन की ओर धकेलती थी। एक तरह से यह राजकीय स्तर की, उत्पीड़न को मान्यता देती हुयी समानांतर शासन व्यवस्था थी। लेकिन भविष्य में इसका बने रहना तब ही संभव था जबकि इसे ईश्वरीय आदेश से जोड़ दिया जाएँ ऐसा ही किया गया, खासतौर पर जब बौद्ध धर्म ने इसमें संशोधन और तत्संबंधी प्रतिरोध किया। तब श्रीमद्भगवत् गीता प्रकाश में आती है और वह आज के हिन्दू धर्म का मार्गदशीZ धार्मिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ सीधा विष्णुअवतार कृष्ण के मुख से निसृत हुआ है और इसलिए ईश्वरीय आदेश है। अत: अब यह कहना कि हिन्दू धर्म सिर्फ एक जीवनप्रणाली है अथवा आचरण प्रणाली है, एक अधूरा, पुराना और गलत बयान है।)
अतएव हिन्दू धर्म सहित, संसार के प्रत्येक धर्म में न केवल ईश्वर या अवतार या पैगम्बर की उपस्थिति एक प्रमुख तत्व है बल्कि वह इसी कारण अपरिवर्तनीय भी है। उसमें किसी तरह का संशोधन, पहली बात तो लगभग नामुमकिन है, क्योंकि उसके अनुयायी ऐसा करने ही नहीं देंगे और यदि किसी तरह वह संशोधन हुआ भी तो एक नया धर्म सामने आ जाएगा, जिसमें संशोधनकर्ता को पैगम्बर या अवतार की मान्यता मिलेगी और इस तरह वह भी उतनी ही समस्याओं तथा बुराइयों से लैस होगा, जितना कोई भी धर्म हो सकता है। विस्तार से यह बात इसलिए कि धर्म में परिवर्तन या सुधार करने की बात बेमानी है, ढोंग है, नासमझी है। धर्म का निषेध ही किया जाना चाहिये और उसकी जगह व्यापक, विवेक सम्मत, तािर्कक, न्यायपूर्ण दृष्टि को मिलना चाहिये। कह सकते हैं कि यह दृष्टि `वैज्ञानिक दृष्टिकोण´ के रूप में उपलब्ध है।

शेष अगली किश्‍तों में

आध्या‍त्मिकता का खेल

हमारे साथी रचनाकारों , संयोग से दोनों के नाम अशोक पांडे हैं, के ब्‍लॉग्‍स यथा ' कबाड़खाना' और 'हमकलम' पर भी जावेद अख्‍तर का यह संभाषण प्रस्‍तुत किया गया है। इसे अनेक साथियों, पाठकों तक पहुंचना चाहिए, इस इरादे से यह वक्‍तव्‍य यहां भी दिया जा रहा है। वैचारिक समझ और स्‍पष्‍टता हो तो वह बौद्धिक साहस भी आ जाता है कि आप आध्‍या‍त्मिकता का व्‍यवसाय करनेवालों की उपस्थिति में भी यह सब कह सकते हैं।

इस क्रम में बाद में मैं 'वसुधा' में प्रकाशित अपने एक लेख 'धर्म का विकल्‍प' के अंश भी क्रमश: देने का प्रयत्‍न करूंगा।

(जावेद अख्तर के इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिए गए व्याख्यान का डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद)

मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था. कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएं नहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!

एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है. मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.

मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आया हूं.

इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :

”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.

काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.

मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..

”रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं. मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं.

जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते.

इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं.

इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि की कृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं. तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द - आध्यात्मिकता - पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?

पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जब इंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायोडिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जो कॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग? ....नहीं.अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिनवह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?

तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसल धार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्न हो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहता है कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है.

एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुता है, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगे भी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य! और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है. ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है. आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता.

एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एक सीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भले हो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपने हिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.

आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिन एक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए. और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान और सत्ता की स्वीकृति हो.

लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं. मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.धन्यवाद.

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

'सर्वाइवल ऑव द फिटेस्‍ट'

डायरी का एक और अंश। कि कुछ बातचीत जारी रहे।

04.09.97
`सर्वाइवल ऑव द फिटेस्ट´ -सर्वोपयुक्त का बचना, `प्रजातियों के विकास´ के महान वैज्ञानिक डार्विन के इस सिद्धांत को लोग इधर `सभ्यता और समाज के विकास´ के संदर्भों में उदाहरण की तरह देने लगते हैं। यह आधारभूत स्तर पर कुतर्क है।

`समाज का विकास´ और `प्रजातियों का विकास´ दो अलग-अलग चीजें हैं। अब जैसे पूँजीवादी व्यवस्था के साँचे में देखा जाए तो यही सिद्धांत कितना भयावह लगने लगता है। स्पष्ट है कि जो असहाय है, शोषित है, निर्धन है और निर्बल है, वह पूँजीवादी समाज में सर्वोपयुक्‍त हो नहीं सकता। तब वह कैसे बचेगा ! प्राकृतिक विकासमान व्यवस्था के इस सिद्धांत को एक अप्राकृतिक, कृत्रिम व्यवस्था में रख भर देने से उसके मायने और व्यंजना कितनी बदल जाती है। बैंक में काम कर रहे हमारे मित्र कहते हैं कि बचेगा बिलकुल बचेगा। जो असहायों में, निर्बलों और निर्धनों में सर्वाधिक उपयुक्त होगा, वह बच जाएगा। तर्क है। लेकिन यह तर्क पूँजीवादी समाज के दर्शक-नागरिक की तरफ से है। जबकि बहुत साफ है कि जो बचेगा वह 'जैविक रूप से एक सबसे सहनशील' आदमी भर होगा। लेकिन क्या वह समाज के ताकतवर और आत्मीय हिस्से की तरह बचेगा ?


जो बचेगा वह `कोरू´ होगा। मुझे हावर्ड फास्ट के (अमृतराय द्वारा अनूदित उपन्यास) `आदिविद्राही´ के उस प्रसंग की याद आ रही है जहाँ `कोरू´ का मतलब बताया गया है। यानी तीन पीढ़ियों का गुलाम। सोने की खानों में बेहद मुश्किल परिस्थतियों में काम कर सकने वाले गुलाम के बेटे का बेटा। इजिप्ट की जबान में एक तरह का गलीज जानवर, पेट के बल घिसटने वाला। एक ऐसा जानवर जिसे दूसरे जानवर भी नहीं छूते। इतनी कठिन परिस्थितियों में (और न्यूनतम से भी जो कुछ कम हो सकता है उतना खाना खाते, पानी पीते और नींद लेते हुए) सैंकड़ों में से एकाध गुलाम बच पाता है और ऐसे बचे हुए गुलामों की तीसरी पीढ़ी। जो विद्रोह के बारे में सोच ही नहीं सकती। वह अपने को मनुष्य ही नहीं मान सकती। मुक्ति का कोई स्वप्न उसके पास रह नहीं जाता। यह होगी वह `कोरू´ प्रजाति, जो असहायों, अशिक्षितों और गरीबों, श्रमिकों की तीसरी पीढ़ी के रूप में, यदि `सर्वाइवल ऑव द फिटेस्ट´ के चलते, पूँजीवादी समाज में बच भी पाई तो ! मालिकों के लिए तो इस प्रजाति की जरूरत हमेशा से है। क्योंकि यह अपनी मुक्ति के बारे में विचार ही बमुश्किल कर पाएगी और कोई भी संभव मुक्तिदाता उन्हें संगठित ही कैसे कर पाएगा !

यह दास प्रथा का कितना अधिक परोक्ष और अमानवीय संस्करण है। अपने आप को न्यायपूर्ण घोषित करता हुआ। गरीबों को, मजदूरों को, दु:खीजन को सिर्फ अकर्मण्य बताता हुआ।
मेरा देश इसी रास्ते पर चल निकला है। तत्काल मुक्ति का कोई मार्ग नहीं दिखता।

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पुनश्च् !

इस `कोरू´ शब्द को हम यदि सरकारी नौकरियों और जीवन के अन्य व्यवसायों में जुटे शोषण तंत्र के हिस्से हो गए लोगों पर भी लागू करें तो बड़ी मजे़दार और व्यावहारिक व्यंजना बनती है। जैसे `कोरू साहूकार´, `कोरू राजनीतिज्ञ´ और `कोरू आई.ए.एस.´ ! लेकिन ये खास लोग हर पीढ़ी के साथ कितने संगठित, चालाक और भयावह होते जाते हैं। एक पूँजीवादी व्यवस्था के सुचारू और निर्विघ्न रूप से चालन के लिए इन `कोरू अत्याचारियों´ और उन `कोरू गुलामों´- दोनों की कितनी जरूरत है !
दोनों में से कोई मनुष्य नहीं रह पाता है। यह कितना भयानक है।
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