शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

प्रूफ की गलतियॉं और एक पत्र में से निकली डायरी


कुछ समय पहले शुरू हुई एक पत्रिका है 'रेतपथ'। इसके नवीनतम अंक जनवरी-जून 2014 में मेरी डायरी और टिप्‍पणियॉं प्रकाशित की गईं हैं। लेकिन इनमें प्रूफ की इतनी और ऐसी गलतियॉं कर दी गईं हैं कि वाक्‍यों के मायने बदल गए हैं या वे वाक्‍य अभिव्‍यक्ति‍हीन हो गए हैं। अलाइनमेंट और पैराग्राफिंग की गलितयॉं भी दुखद हैं। अपनी वेदना और आपत्ति संपादक अमित मनोज को जता चुका हूँ। मुझे नहीं पता कि इसका क्‍या परिहार संभव होगा। बहरहाल, उनमें से एक हिस्‍से को मैं यहॉं प्रकाशित कर रहा हूँ ताकि उसे ठीक से पढ़ा, देखा जा सके। 'अच्‍छा काव्‍यपाठ' और 'क्‍या टूटे हुए पत्‍ते का पुनर्वास संभव है'- ये दो हिस्‍से बाद में पोस्‍ट करता हूँ।


मित्र को लिखे पत्र में से
(जैसे कि यह डायरी है)

2005
(एक)
एक विधा ही जीवन नष्ट करने और उसे समृद्ध करने के लिये पर्याप्त होती है।  अन्य विधा में जा सकते हैं लेकिन आदर और हिम्मत के साथ। चुनौतियाँ रखकर, समझकर। अपनी परंपरा को याद रखते हुए, समकालीनता को समझते हुए और उसे लाँघने का दुःसाहस करते हुए।
कोशिश तो यही हो, भले फिर औंधे मुँह गिर पड़ो।

(दो)
जब तुम नहीं लिख रहे होते हो, वह समय अत्यंत मूल्यवान है और कतई दूसरे फालतू कामों में लगा देने के लिए नहीं है। ऐसे काम तुम्हें थका देंगे जबकि फुरसत तुम्हें कई तरह से संपन्न करेगी।
तुम्हें अवकाश की खोज लगातार करना चाहिए जिसमें तुम अपने निजीपन को, मनुष्य होने को, आलस्य और उनींदेपन को अनुभव करते रह सको। जिसमें तुम इंद्रियों को ढीला छोड़ सको और उन्हें यह छूट दे सको कि  वे अपना काम, अपनी तरह से करती रह सकें। तुम्हें अपने मन के आकाश को भी बाधित नहीं रखना चाहिये ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें चिडियाँ या चीलें उड़ान भर सकें।

(तीन)
विशाल शहर और यह फालतू व्यस्त जीवन तुम्हें अपनी तात्कालिकता और आपाधापी का शिकार बना रहा है। तुम जरूरत पड़ने पर सुरंग खोद सकते हो तो क्या किसी संपादक के आग्रह और प्रस्ताव पर सुरंग खोदने लग जाओगे! तुम्हें क्या करना है इसका निश्चय तुम खुद कर सकते हो और अपने धैर्य को परखकर ही इसका निर्णय लेना होगा। ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास विवेक न हो लेकिन किसी ऐसी दौड़ में शामिल होने से कोई मतलब नहीं जो तुम्हें हाँफने के लिये शेष कर दे।
इसके लिये एक सूत्र हो सकता हैः ‘कोई भी ऐसा काम मत करो जो तुम्हें लगता हो कि तुम्हारे सर्जक के अलावा अन्‍य कोई भी उसे कर सकने में समर्थ है।’  इसलिए ‘दिये गये विषय’ पर लिखने को लेकर मैं प्रायः परेशान, असहज और हतप्रभ बना रहता हूँ। लगता है मैं कोई परीक्षार्थी हूँ।

(चार)
पौधों को अपनी हवा, अपने प्रकाश के भरोसे भी छोड़ देना चाहिये। दूब की बार-बार निंदाईं अकसर उज्जवलता और हरीतिमा को नष्ट कर सकती है। तुम चीजों के बारे में इस तरह दो-टूक निर्णय लेते दिखते हो जैसे वह कोई संचालित करनेवाला सूत्र है। यह कवि-व्यवहार नहीं हो सकता। 

(पाँच)
यदि कविता ऊर्ध्‍वगामी नहीं है, उसमें कवि का संत्रास, विकलता, यूटोपिया और वह पुकार अनुपस्थित है जो कवि के होने और उसके जीवन को संभव बनाती है, तब अपनी ही चीजों को रुककर, पलटकर देखने में कोई बुराई नहीं।
शायद एक मनुष्य की मूर्खता, भावुकता और व्याकुलता से भी कवि के अवयव बनते हैं। कितने तरह के नट, ठग, जगमगाहट, चमक, खनक और प्याले राह में नहीं मिलते। तमाम प्रलोभनों के बीच कविता की राह ऊबड़-खाबड़ और औचक है।

(छह)
कवि में, काव्येतर लेखन की इच्छा किसी गहरी सृजनात्मक आकांक्षा का परिणाम हो तो स्‍वागतेय है लेकिन कहीं वह महज महत्वाकांक्षा से प्रेरित तो नहीं? भीतर के दबावों की आहटें वहाँ सुन पड़तीं हैं क्या?  न ही एक कवि रॉकेट या प्रक्षेपास्त्र की तरह हो सकता है। इसके बरअक्स वह चींटी, मधुमक्खी या कठफोड़व़ा जैसा कुछ हो सकता है।
कवि खराब कविता लिखे इससे मुझे कभी उतना दुख नहीं होगा बशर्ते वहॉं उसके दिलो-दिमाग के ‘प्रेशर कुकर’ की सीटी सुनाई दे। अच्छी-सी लगनेवाली कविता लिख लेना, कई बार समकालीनता का शिकार होना भी है और अपने भीतर ऐसी परछाइयों को लेकर चलना है जिसमें खुद का अक्स डूब ही जाता है।

(सात)
संबंधवाद,  मित्रवाद की चेतना धुंध की तरह छा सकती है।
साहित्य की सतह पर उपस्थित, बाहरी ‘एक्टिविज्म’ की जगह कवि का संबंध अपने स्वप्न और विचार के एक्टिविज्म से हो तो बेहतर। अपने समय और सभ्यता में मनुष्य होने के, जीवित रहने के, आसपास से प्रभावित होने के लक्षण हर व्यक्ति में होते हैं। कवि में भी होंगे। लेकिन कवि संभवत: वही हो सकता है जो रोज एक नया जन्म ले। गर्भ धारण करे और खुद का ही नया प्रसव करे।

मान लो कि ये सब बातें तुमसे न कहकर मैं खुद से ही कह रहा हूँ।
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मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

मुश्किल तो मेरी है

करीब 10 साल पहले लिखी इस कविता का एक उददेश्‍य चुनावी माहौल में सा्ंप्रदायिक मानसिकता के प्रति रेखांकन और 
आगाह का भी था। अब फिर चुनाव हैं और वही इरादे। इसलिए पुन:स्‍मरण।
 
सड़कों पर, चौबारों में,
टी.वी. पर, ट्रेनों में, अखबारों में,
हर तरफ हिंदू ही हिंदू हैं

जब भी उनकी सत्‍ता पर खतरा आता है
उन्हें तत्काल लोगों का हिंदू होना याद आता है

उनको क्या मुश्किल, मुश्किल तो मेरी है
मैं जो रिक्शा चलाता हूँ
मैं  जो बीड़ी बनाता हूँ
मैं  जो गन्ना उगाता हूँ
मैं  जो ट्रैफिक में फँस जाता हूँ
मैं  जो उधारी में पड़ जाता हूँ
मैं  जो शहनाई बजाता हूँ
मैं  जो भूख से बिलबिलाता हूँ

उनका क्या, मुश्किल तो मेरी है
मैं  जो बच्चों की फीस नहीं चुका पाता हूँ
मैं  जो कचहरी के चक्कर लगाता हूँ
मैं  जो हाट-बाजार में घिर जाता हूँ
मैं  जो ठंडे फर्श पर सो जाता हूँ
मैं  जो निरगुनियाँ गाता हूँ
पड़ोसी से एक कटोरी शकर लाता हूँ
और आसपास के सुख-दुख में शामिल होते हुए
आखिर अपना हिन्दू-मुस्लिम होना भूल जाता हूँ।
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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रेम के लिए संस्‍कृति की दुहाई


यह आलेख, दखल प्रकाशन द्वारा अगले सप्‍ताह में प्रकाश्‍य विचार-पुस्तिका 'क्षीण संभावना की कौंध' में संकलित है। आज के दिन इसे शेयर करना प्रासंगिक होगा।
खबरें आती ही रहती हैं कि प्रेमी युगलों को पार्कों से, धार्मिक परिसरों से, प्राकृतिक
जगहों से और कई बार तो रेस्टॉरेन्ट जैसी जगहों से खदेड़ा जाता है। उनसे अपमान
की हदों तक जाकर व्यवहार किया जाता है। तात्कालिक किस्म की सजाएँ दी जाती
हैं। इस तरह का व्यवहार करनेवाले स्वयं को संस्कृति का पहरेदार कहते हैं।
यहाँ कुछ बिंदु विचारणीय हैं। जैसे यह कि, आप प्रेम और प्रेमियों को किस
दृष्टि से देखते हैं। समाजशास्त्र, इतिहास एवं मनोविज्ञान का जरा सा भी अध्ययन
स्पष्ट कर देगा कि स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम एक सहज मानवीय घटना है। समाज में
इसकी जगह होना ही चाहिए। संदेह है कि संसार में ऐसे अभागे लोग भी हों जिनके
मन में कभी प्रेम का बीज प्रस्फुटित न हुआ हो। उस प्रेम का गौरव या उसकी कसक
हर व्यक्ति के साथ जीवन भर चलती है। व्यक्तिगत बातचीत में सभी लोग अपने
सफल-असफल प्रेम-प्रसंगों को स्वीकार करते ही हैं, किस्से सुनाते हैं, आहें भरते हैं
और उसे एक तरह की प्रेरणा और मधुर स्मृति का हिस्सा मानते हैं।

फिल्में, लोकगीत और साहित्य का उल्लेखनीय हिस्सा प्रेम-प्रसंगों से पटा पड़ा
है। उनकी लोकप्रियता में यह तथ्य निहित है कि वे हमारी अव्यक्त या प्रकट या
दमित भावनाओं की अभिव्यक्तियाँ हैं। यहाँ तक कि धार्मिक साहित्य में भी
स्त्री-पुरुष प्रेम की उदात्त, आत्मिक और दैहिक अभिव्यक्तियाँ उपलब्ध हैं। उन्हें
कितनी ही अलौकिकता या आध्यात्मिकता प्रदान कर दी जाये किंतु वे हैं तो
अपने-अपने समय के स्त्री-पुरुष प्रेम संबंध ही। इसके अलावा हीर-राँझा,
रूपमती-बाजबहादुर, शीरी-फरहाद, शाहजहाँ-मुमताज, सोहिनी-महिवाल जैसे किस्सों
का महिमामंडन भी प्रचलित है। यह सब भारतीय समाज की ही बात हो रही है
जिसमें रामचंद्र जी, सीता से सबसे पहले एक वाटिका में ही मिलते हैं, कृष्ण से राधा
का प्रेम तो गृहस्थजीवन में प्रवेश के उपरांत का है और वे इसके लिये उपवनों में,
कुंजों में, गलियों के कोनों-किनारों में ही मिलते थे, पार्वती ने शिव के लिए तपस्या
की, मीरा ने लोकलाज तक की परवाह नहीं की। इन प्रसंगों का सकारात्मक,
उल्लेखनीय पक्ष यह है कि हमारे समाज में इन्हें आदरणीय मान्यता प्राप्त है। लेकिन
आज इसी समाज का एक हिस्सा संस्कृति की दुहाई देता हुआ, प्रेमियों के प्रति
अमानवीय, हिंसक व्यवहार पर उतर आता है तो यह चिंतनीय है।

यह दोहराने में कोई हर्ज नहीं कि हमारा यह पूरा संसार प्रेम की ही पैदाईश
है। जब तक कोई किसी के साथ प्रेम के नाम पर जबर्दस्ती न कर रहा हो, किसी
को बरगला न रहा हो, धोखा न दे रहा हो, तब तक किसी तीसरे को हक नहीं कि
किन्हीं दो के प्रेम के बीच में वह व्यवधान डाले। सार्वजनिक स्थानों पर भी जब तक
कोई युगल ऐसी आपत्तिजनक स्थिति में संलग्न न हो जिससे किसी दूसरे की
गरिमा, सम्मान या स्वतंत्रता बाधित होती हो, तब तक किसी को भी उनके बीच
खलल डालने का अधिकार नहीं है। जो नैतिकता का प्रश्न उठाते हैं उन्हें समझना
चाहिए कि प्रेम अपने आप में एक नैतिक कार्य है। इसे किसी अनैतिकता के दायरे
में परिभाषित करने की कोशिश एक पिछड़े, विचारहीन, असभ्य समाज का परिचय
है। प्रेम करना एक मानवाधिकार भी है। यह अधिकार केवल तब सीमित होता है
जब इस वजह से किसी अन्य के अधिकार का हनन हो रहा हो।
लेकिन हम देख रहे हैं कि प्रेमी-युगलों के साथ अपराधियों की तरह व्यवहार
किया जा रहा है। पुलिस उन पर डंडे बरसाने में संकोच नहीं करती और संस्कृति
के तथाकथित रक्षक उन्हें मारने-पीटने में गौरवान्वित अनुभव करते हैं। माता-पिता
को बुलाकर या थाने में बैठाकर उन्हें लज्जित किया जाता है। जबकि वास्तविक
अपराधी वे हैं जो इन प्रेमियों या संभव हों कि वे आपस में महज मित्र ही हों, से
दोषियों की तरह पेश आते हैं। स्त्री-पुरुष को साथ में देखते ही जिन्हें केवल
प्रेमी-प्रेमिका होने का बोध होता है, ऐसे लोगों की मानसिकता ही दूषित है। वेलेंटाईन
डे पर देखा गया है कि धर्म के नाम पर बनाये गये संगठनों द्वारा भाई-बहिनों को
या आपस में रिश्तेदारों, परिचित पड़ोसियों या मित्र स्त्री-पुरुषों को प्रताडि़त कर दिया
जाता है। राजनैतिक कारणों से इनके पक्ष में कानून-व्यवस्था भी नहीं है। यही
फासीवादी लक्षण हैं। खाप पंचायतें जैसे दृश्‍य तो अमानवीयता की पराकष्‍ठा हैं। 

जब हमने समाज में सहशिक्षा को स्वीकार कर लिया है, कार्यस्थलों पर
स्त्री-पुरुष काम करते हैं, हर क्षेत्र में स्त्री-पुरुषों के मिलने-जुलने के अवसर हैं, तब
यह स्वाभाविक है कि उनके बीच मित्रता के, प्रेम के या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद
के संबंध भी बनेंगे। जितनी सहजता से हमें पुरुष और पुरुष की मित्रता स्वीकार्य
है, उसी सहजता से पुरुष-स्त्री के मित्रता और प्रेमपूर्ण संबंध को भी स्वीकार करना
चाहिये। सबसे बड़ी बात है कि स्त्री-पुरुष के स्वस्थ, मैत्रीपूर्ण, सहयोगी संबंधों को
कहीं हम ही तो गलत निगाह से नहीं देखते। कहीं हमारे भीतर ही तो वह अस्वस्थ
दृष्टि नहीं बन गयी जो प्रेमविरोधी है और स्त्री-पुरुष संबंध को पहले से अनैतिक
मान लेती है? लगता है हमारे अपने अंतर्मन में कोई खोट, द्वेष या ग्रंथि है जो हमें
इन संबंधों को सहजता से नहीं लेने देती। अथवा नैतिकता की कोई सँकरी परिभाषा
बना ली गयी है जो पुरातनपंथी संस्कारों के रूप में हमारे मन में जगह जमा चुकी
है।

समस्यामूलक चिंतन यह होना चाहिए कि ये प्रेमी या मित्र यदि आपस में
कुछ निजी बातचीत करना चाहें, कुछ समय बिताना चाहें तो इस बंद और अनुन्नत
समाज में वे आखिर कहाँ जायें। उन्हें हर जगह शक की निगाह से देखा जाता है,
हर जगह उनके लिए बाधाएँ खड़ी की जाती हैं और कह सकते हैं कि अब तो उनका
जीना ही हराम कर दिया गया है। तब उनके पक्ष में, प्रेम की तरफदारी में कुछ बातें
सोचने की जरूरत आन पड़ी है। क्योंकि हम इक्कीसवीं सदी में आ ही गये हैं तो
प्रेम को लेकर भी हमारे विचार आधुनिक होना चाहिए। किसी समाज की प्रगति
देखने का एक पैमाना यह भी है कि उसमें स्त्री-पुरुष मित्रता या उनके संबंधों को
कितनी उदारता या संकीर्णता से देखा जाता है। क्षोभ है कि हमारे देश में प्रेमियों
को निजी एकांत की जगह तक नहीं दी जा रही है। यह हमारे बौद्धिक, सांस्कृतिक
पिछड़ेपन का ही उदाहरण है। जबकि हमें अपनी युवा पीढ़ी पर इतना भरोसा करना
चाहिए कि वे अपने प्रेम संबंधों में भी जवाबदारी का परिचय देगी। यदि इससे उन्हें
कोई निजी लाभ-हानि होती भी है तो यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है।
जब तक हमारे घर-परिवारों में पुत्र-पुत्रियों, स्त्री-पुरुष मित्रों को घरों में ही मिल
सकने की, बातचीत करने की स्वतंत्रता देने की आधुनिक मानसिकता नहीं बनती
है तब तक पहल यह होना चाहिए कि शहरों में ऐसी जगहें विकसित की जायें जहाँ
ये प्रेमी या मित्र, बेखटके मिल-जुल सकें। पुलिस की भूमिका केवल इतनी हो कि
उन्हें कोई अपमानित न करे और उनकी निश्चल शांति को भंग न कर सके। इस
बीच परिवार और समाज में उपस्थित सामंती मानसिकता से भी लड़ाई जारी रहना
चाहिए, यही हमारी संस्कृति की सच्ची परंपरा है और यही आधुनिकता की उदात्त
मानवीय धारा भी।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

हिन्‍दुजन: एक वैकल्पिक खतरनाक वर्तमान



हमारे समय के प्रखर कवि, विचारक और हस्‍तक्षेपकर्ता अग्रज साथी विष्‍णु खरे की यह टिप्‍पणी अविकल यहॉं दी जा रही है। इसकी चिंताऍं और खतरे अब हम सबके सामने सुस्‍पष्‍ट हैं।

भारत के विश्व पुस्तक मेले का आग़ाज़ शायद इससे अधिक विडंबना से नहीं हो सकता था.जब कथित रूप से सारे संसार से प्रकाशक और पुस्तक-विक्रेता देश की राजधानी आए हुए हैं,और पोलैंड से एक अपर्याप्त,अल्पज्ञात लेखक-मंडल भी,तब एक प्रतिष्ठित विश्वव्यापी अंग्रेज़ी प्रकाशन-गृह की भारतीय शाखा ने,जो इस देशी मेले में वर्षों से प्रमुखता से भाग लेती रही है, निर्णय लिया है कि वह एक विदेशी विदुषी द्वारा लिखित, भारत से ही सम्बंधित अपने एक बहुचर्चित,पुरस्कृत,बहुविक्रीत  अंग्रेज़ी प्रकाशन  को न सिर्फ़ भारतीय बाज़ार से हटा लेगी बल्कि भारत में उपलभ्य उसकी एक-एक प्रति को अगले छः महीनों में खोज-खोज कर उसकी लुग्दी बना देगी.    

यहूदी मूल की,लगभग 74-वर्षीया,वेंडी डॉनिगर विश्वविख्यात भारतविद् हैं.उनके पास कई अर्जित-मानद डॉक्टरेट उपाधियाँ हैं,वे वर्षों से शिकागो में भारतविद्या की प्रोफ़ेसर हैं और अनेक पुस्तकों की रचेता हैं.यूँ तो आज तक यह तय नहीं हो पाया है कि हिन्दू धर्म आखिरकार है क्या,वह ‘हिन्दू’ या ‘धर्म’ है भी या नहीं,क्योंकि कई बार लगता है कि ‘नेति,नेति’ उसी के लिए कहा गया है,उसका कोई एक ग्रन्थ या एक पैग़म्बर न कोई है न हो सकता है,और यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रतिक्रियावादी और साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा हथिया लिए जाने के कारण ‘हिंदुत्व’ और ‘हिन्दुत्ववादी’ पद कुपद बन चुके हैं,लेकिन डॉनिगर इन्हीं विषयों को पढ़ाती और इन्हीं पर बोलती-लिखती रही हैं.वे हिन्दू धर्म की अन्धानुयायी या सिस्टर निवेदिता या मादाम ब्लावात्स्की नहीं हैं और उन्होंने एक प्रबुद्ध,आधुनिक और खिलंदड़ा दिमाग़ पाया है इसलिए उन  विषयों पर उनका बोला और लिखा गया विवादास्पद भी सिद्ध हुआ है. लेकिन उनकी हाल की अंतिम पुस्तक,’द हिंदूज़ : एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ ( ‘हिन्दूजन : एक वैकल्पिक इतिहास’ ),हुज्जत की हदें तोड़ती हुई हिन्दुस्तानी अदालती बाड़े में पहुँच गई.मुद्दआ जाना-पहचाना था – ‘यह किताब अश्लील है और  हिन्दू धर्म तथा  कुछ वंदनीय हिन्दुओं का अपमान करती है’.इससे पहले कि मुआमला और तूल पकड़े,मुददआअलैह प्रकाशन-गृह ने आत्म-समर्पण करने में ही बेहतरी समझी और पूरे भारत से किताब को नेस्तनाबूद कर देने के करारदाद पर दस्तख़त कर दिए.संसार के पुस्तक प्रकाशन इतिहास में शायद ही किसी आधुनिक,जनतांत्रिक,धर्म-निरपेक्ष देश में मुक़द्दमा हारने से पहले ही किसी प्रकाशक ने अपनी किताब के साथ ऐसा क़ातिलाना सुलूक किया हो.

मुद्दई कोई ‘शिक्षा बचाओ आन्दोलन’ है जिसके नुमाइंदे कोई दीनानाथ बत्रा साहब हैं, जिन्हें शायद  ‘बतरा’ या ‘बत्तरा’ भी लिख सकते होंगे – इन विभाजनोत्तर कुलनामों का कुछ भरोसा नहीं होता.लेकिन प्रकाशन-गृह कोई और नहीं बल्कि पेन्ग्विन बुक्स हैं जो ग्लोबल स्तर पर सामान्य पाठकों से लेकर सर्वोच्च लेखकों-बुद्धिजीवियों के बीच सुप्रतिष्ठित हैं  और संसार-भर में अपने प्रकाशनों की करोड़ों प्रतियाँ बेचते हैं.भारत पर यह विशेष कृपालु हैं – यहाँ के अंग्रेज़ी लेखकों को एहसासे-यतीमी से बचाने के लिए इनका अलग स्वायत्त विभाग है और पिछले कुछ वर्षों से हिंदी लेखकों को सरज़द एहसासे-कमतरी से छुटाने के लिए इन्होंने एक भाषा-उपविभाग भी खोल दिया है और नाना प्रकार के चालक साहित्य-मेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं.हिंदी के कई युवा और अधेड़ ‘लेखक’ अपने ब्लॉगों पर न सिर्फ़ दरियागंजी  प्रकाशकों की सपरिवार गुलामी कर रहे हैं बल्कि हिंदी पेन्ग्विन की निर्लज्ज चाटुकारिता और दलाली पर भी उतर आए हैं और, बकौल ज्ञानरंजन, जहाँ से आदमी की पूँछ झड़ चुकी है, वहाँ कृतकृत्य गुदगुदी अनुभव कर रहे हैं.हिंदी का दिल्ली-6 स्थित कोई पिद्दीजान तलुआचाटू प्रकाशक होता तो उसकी ऐसी वणिक-सुलभ कायरता  अपनी स्वाभाविकता में फ़ौरन समझ में आ जाती, लेकिन पेन्ग्विन ? वेंडी डॉनिगर सहित संसार के अधिकांश पाठक-लेखक-बुद्धिजीवी पेन्ग्विन की इस एकतरफ़ा बुज़दिली से पहले स्तब्ध लेकिन अब आग-बबूला हैं.एक प्रश्न यह है कि कोई प्रकाशक लेखक के संज्ञान और अनुमति के बिना उसके विक्रयशील प्रकाशन को एक देशविशेष में ही सही, लेकिन क्या इस तरह नष्ट कर सकता है ? विदेशी प्रकाशनों में तो लेखक के नैतिक अधिकार तक की घोषणा छपती है. ज़ाहिर है कि पेन्ग्विन ने यह शर्मनाक निर्णय किन्हीं बड़े दबावों में या किसी भयावह आशंका में लिया होगा. 

हमें नहीं मालूम कि ‘शिक्षा बचाओ आन्दोलन’ और दीनानाथ ब(त/त्/त्त)रा की राजनीति क्या है, आया उनका यह मुक़द्दमा Suo Motu था, वह वकीलों की फ़ीस कहाँ से देते थे, या फिर उनके पीछे कोई ‘हिन्दुत्ववादी’ शक्तियाँ हैं. यूँ उनहोंने यह भयावह चेतावनी दे दी है कि ‘मैंने लड़ाई जीत ली है लेकिन युद्ध जीतना अभी बाक़ी है...हम ऐसे कई दूसरे लेखकों और प्रकाशकों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई में लगे हुए हैं जिन्होंने अपने ऊपर हिन्दू धर्म को विकृत करने का जिम्मा उठा रखा है’. लेकिन शक़ यह होता है कि सारी पश्चिमी दुनिया और उसकी विश्वव्यापी संस्थाओं की तरह पेन्ग्विन ने भी यह जान-मान  लिया है कि मई-जून 2014 तक भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा (नियंत्रित) सरकार होगी. यदि उन्होंने अपनी इस तरह की किताबें अविलम्ब वापिस न लीं तो उनके धंधे में इतनी रुकावटें डाली जा सकती हैं – हिटलर के ज़माने की तरह उनकी होली जलाई जा सकती है, विक्रेताओं पर पत्थरों या हथियारों से हमले करवाए जा सकते हैं, दोनों को मुक़दमों और जेलों में फँसाया-डलवाया जा सकता है – कि उन्हें भारत से अपना करोड़ों का बिज़नेस समेट कर जाना पड़ जाय. वैश्विक बनियावी उसूल  ‘चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए’ पर अमल करते हुए पेन्ग्विन ने अपनी शर्मो-हया की चमड़ी उधेड़ उसकी जूतियाँ अभी से बनवाकर हिन्दुत्ववादियों को पहना  हैं. जब पेन्ग्विन ऐसा कर सकते हैं तो अन्य विदेशी प्रकाशकों और उनके भारतीय फ़्रेंचा- इज़ियों को इशारा और दीनानाथ की चेतावनी  समझते देर न लगी होगी. हिंदी प्रकाशन ‘घराने’ तो लगभग 95 फ़ीसद प्रच्छन्न या प्रकट प्रतिक्रियावादी-भाजपाई हैं ही. फ़िलहाल ग़नीमत यह है कि किताब पर सल्मान रुश्दी की ‘द सैटेनिक वर्सेज़’ की तर्ज़ पर रोक नहीं लगी है, उसके विदेशी संस्करण को भारत में अपनी जोखिम पर बेचा-ख़रीदा जा सकता है और ‘किन्ड्ल’ पर तो वह हमेशा सशुल्क उपलब्ध है ही.

यह कल्पनातीत है कि केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, भाजपा की अपनी अभिभावक सरकार के आ जाने से पहले इस शर्मनाक काण्ड की भर्त्सना करने की नैतिक इच्छा या हिम्मत जुटा पाएगी, जबकि इमरजेंसी के ज़माने में उसने इंदिरा गाँधी की लेखिका फुफेरी बहन नयनतारा सहगल के एक लम्बे, साहसिक प्रतिवाद को चालाकी से अपनी कार्रवाई के रिकॉर्ड में ले लिया था, जो अब भी वहाँ दर्ज़ है. यह देखना दिलचस्प होगा कि जरा-जीर्ण रज़ा फाउंडेशन के अति-मुखर वाक्-स्वातंत्र्य चैंपियन हमारे मित्र इस मामले पर क्या कहते-करते हैं. लेकिन वहाँ भी करोड़ों-अरबों रुपयों के ट्रस्ट और अब भी कई प्रकार की वर्तमान और भावी रसरंजक नौकरियों और जिम्मेदारियों की संभावना का सवाल है. फिर उन्होंने कभी भाजपा आदि को उनके सही नाम से पुकारने का साहस अब तक दिखाया नहीं है. उनकी हिम्मत तो पिछले दिनों देखी जा चुकी है जब उन्होंने अनंतमूर्ति के मामले को लेकर एक मुँहतोड़ सामूहिक पत्र का मसव्विदा अपूर्वानंद,पुरुषोत्तम अग्रवाल,नामवर सिंह,राजेंद्र यादव आदि कुछ प्रारंभिक दस्तखतों के साथ ‘सर्कुलेट’ किया था, लेकिन जब उनके भविष्यदृष्टा पेशेवर अवसरवादी गिरगिट मुसाहिबों ने समझाया कि आक़ा क्यों हमें 2014 के बाद मरवाने पर तुले हैं तो उन पालतुओं पर जीवदया दिखाते हुए उसे ‘सप्रैस’ कर लिया गया. वैसे भी जब कभी-कभार डेढ़-दो सौ मेंगनी-शब्दों से ही हिंदी जगत को चुग़द बनाया जा सकता हो तो अंग्रेज़ी के बड़े-बड़े आत्महंता प्रतिवेदन ज़माने-भर में क्यों भेजे जाएँ. हिंदी के जो दयनीय हुडुकलुल्लू बिला नागा पेन्ग्विन के चपरासियों के पाँव चाँपने पहुँचा करते है उनसे तो कोई उम्मीद करना शिखंडी से अश्वत्थामा के पितृत्व-परीक्षण की जाँच में ‘पॉज़िटिव’ आने की आशंका जैसा होगा.
विष्णु खरे

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

पूँजीवाद का ग्‍लूकोज

जब पैसा पास में आ जाता है तो विचारधारा अनावश्यक जान पड़ने लगती है। आज हम अपने कस्‍बों-शहरों में देख सकते हैं कि साहित्य में, तत्‍संबंधी आयोजनों में, पुरस्‍कर्ताओं में नवधनाढ्यवर्ग घुस गया है और वह लगातार विचारधारा के विरोध में बात करता है। वह लगभग अपढ़ है। आप ऐसे लोगों को जरा नजदीक से देखें, जानें तो पता चलेगा कि इनके पास काफी धन-संपत्ति है। या ऐसी नौकरी है जहाँ प्रचुर आर्थिक सुरक्षा है। शानदार पेंशन है। या बेहतर व्यवसाय है। अति साधन संपन्नता है। या संस्‍थान हैं। जैसे ही धन का प्रवेश होता है, विचारधारा गायब होने लगती है। क्योंकि अब विचारधारा रहेगी तो खुद के खिलाफ ही मुश्किल पेश करेगी।

फिर ये अपढ़ लोग अपनी मतिमंदता छिपाने के लिए मानवतावाद की दुहाई देने लगते हैं। जबकि शोषक भी मानव होता है और शोषित भी। अत्याचारी भी मनुष्य ही होता है और प्रताडि़त व्यक्ति भी मनुष्य होता है। फोर्ब्‍स सूची के अमीरों में भी मनुष्यों का नाम होता है और निर्धनतम लोगों में भी मानव ही रहेंगे। मानवतावाद की आड़ में आप पक्षधर होने से बचना चाहते हैं। अपनी राय और अपनी सहानुभूति को जाहिर नहीं करना चाहते। साहित्य में और जीवन में भी वंचित समाज के साथ खड़े नहीं होना चाहते। लेखक को विचारशील, पक्षधर की तरह पेश होना होता है, मानवाधिकार आयोग के माननीय सदस्य की तरह नहीं।

यही कारण है कि इधर वे तमाम पत्रिकाएँ, जिनमें हमारी अनेक लघु पत्रिकाएँ भी शामिल होती जा रही हैं, जिन्हें हर तरफ से विज्ञापन चाहिए, सत्‍ता से समझौते चाहिए, आर्थिक सहारे और अफसर-व्यापारियों की कृपा चाहिए क्योंकि उन्हें पत्रिका से कमाई भी करना है, उन सबमें पिछले रास्तों से समावेशी दृष्टि प्रवेश कर चुकी है। उनकी विचारधारा गायब हो गई है और एक उदार छबि बनती जा रही है। वामपंथ या पक्षधरता उनके स्वभाव और आकांक्षा से विलोपित हो रही है।

यह पूँजीवाद का ग्‍लूकोज है और धनलिप्सा है जो रिसकर उनकी शिराओं में पैठ गई है। इसलिए इधर किसी भी साहित्यिक गोष्ठी में, पत्रिकाओं में कोई विमर्श नहीं है, कोई मतभेद नहीं, कोई झगड़ा-टंटा नहीं, चिंता की कोई लकीर नहीं है, एक सहज आश्वस्ति है, मित्रभाव है, सहमति है, बेधड़क आशा है और पिकनिक है। अचरज नहीं होना चाहिए कि रचनाओं में संघर्ष, प्रतिरोध, प्रतिवाद, व्‍यग्रता और जिजीविषा के स्‍त्रोत सूखते जा रहे हैं। एक खास तरह की रूमानियत इन सबकी जगह ले रही है या ऐसी विवरणिकाएँ जो अपने मूल में सर्जनात्‍मकता प्रेरित नहीं हैं।

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

कवि की अकड़

कवि की अकड़
(अपनी राह चले कुछ प्रिय कवियों के बारे में सोचते हुए) 
यों तो हर काल में ही 
कवियों को जिंदा मारने की परंपरा है
हाथी तक से कुचलवाने की निर्दयता है
और समकाल में तो यह कहकर भी कि क्या पता वह जिंदा है भी या नहीं
खबर नहीं मिली कई महीनों से और मोबाइल भी है ‘नॉट रीचेबल’
किसी कार्यक्रम में वह दिखता नहीं और दिख जाए तो 
अचानक बीच में से ही हो जाता है गायब
जब वह खुद ही रहना चाहता है मरा हुआ
तो कोई दूसरा उसे कैसे रख सकता है जीवित

और वह है कि हर विषय पर लिखता है कविता
हर चीज को बदल देना चाहता है प्रतिरोध में 
और कहता है यही हमारे समय का सच्चा विलाप है
वह विलाप को कहता है यथार्थ और इस अकड़ में रहता है
वह इतिहास लिखता है, भविष्य लिखता है और उसे ही कहता है वर्तमान
वह लिंक रोड पर भी फुटपाथ पर नहीं चलता 
और हाशिए पर भी चलता है तो ऐसे जैसे चल रहा हो केंद्र में
कि हम आईएएस या एसपी या गुण्डे की 
और पार्टी जिलाध्यक्ष और रिपोर्टर की अकड़ सहन करते ही आए हैं
लेकिन एक कवि की अकड़ की आदत रही नहीं
और फिर ऐसी भी क्या मजबूरी कि उसे करें बर्दाश्त
क्या मिलेगा या उससे क्या होगा बिगाड़
हम तो जाएँगे वहाँ जहाँ अकड़ न हो 
          फिर भले कविता भी न हो

और वह कभी कविता लिखता है कभी कहानी कभी उपन्यास
फिर अचानक लिखने लगता है कोई स्क्रिप्ट या डायरीनुमा कुछ
और फिर जुट जाता है पेंटिंग में, कभी पाया जाता है संगीत सभा में
और न जाने कहाँ से क्या कमाता है जबकि करता कुछ नहीं
किसी से माँगता नहीं 
इसी से संदिग्ध है वह और उसका रोजगार 
संदिग्ध नहीं है सेबी और शेयर बाजार 
संदिग्ध नहीं बिल्डर, विधायक और ठेकेदार 
संदिग्ध नहीं मालिक, संपादक और पत्रकार
संदिग्ध नहीं आलोचक, निर्णायक और पुरस्‍कार
संदिग्ध नहीं कार्पोरेट, प्रमुख सचिव और सरकार
संदिग्ध है बस कवि की ठसक और उसका कविता-संसार

जबकि एक वही तो है जो इस वक्त में भी अकड़ रहा है
जब चुम्मियों की तरह दिए जा रहे हैं पुरस्कार
जैसे देती हैं अकादेमियाँ और पिताओं के स्मृति-न्यास नाना-प्रकार
जैसे देते हैं वे लोग जिनका कविता से न कोई लेना-देना न कोई प्यार
तो फड़फड़ाते, उड़ते-फिरते या गायब होते 
              कविता लिखे पीले जर्जर पन्नों का नहीं है कोई नियम
और गायब होते जाते कवियों का भी नहीं कोई नियम
लेकिन वही है जो कहता है कि आपके देने के हैं कुछ नियम 
                            तो जनाब, मेरे लेने के भी हैं कुछ नियम 

वह ऐसे वक्त में अकड़ में रहता है जब चाहते हैं सब 
कि कवि चुपचाप लिखे कविता और रिरियाये
जहाँ बुलाया जाये वहाँ तपाक से पहुँच जाये
न किराया माँगे, न भत्ता, न रॉयल्टी, न सवाल उठाये
बस सौ-डेढ़ सौ एमएल में दोहरा हो जाये
वह दुनिया भर से करे सवाल
लेकिन अपनी बिरादरी में उसकी ताकत कम हो जाये

आखिर में कहना चाहता हूँ कि यदि उसकी कविता में
हम सबकी कविता मिलाने से कुछ बेहतरी हो तो मिला दी जाये
यदि बदतरी होती हो तो हम सबकी कविता मिटा दी जाये
लेकिन एक कवि की अकड़ को, उसकी ठसक को रहने दिया जाये
कि वही तो है जो बिलकुल ठीक अकड़ता है
कि वही तो है जिसके पास कोई अध्यादेश लाने की ताकत नहीं 
कोई वर्दी या कुर्सी नहीं और मौके-बेमौके के लिए लाठी तक नहीं
फिर भी एक वही तो है जो बता रहा है 
              कि अकड़ना चाहिए कवियों को भी

इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि वह 
कविता की बची-खुची अकड़ है
जीवन पर निर्बल की सच्ची पकड़ है।
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                                                                                               जनसत्‍ता में 20 अक्‍तूबर 2013 को प्रकाशित