बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

ऐब कई तरह के होते हैं



गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ                        
विष्णु खरे 
भ्य’,’शरीफ़’,’कल्चर्ड’,’बूर्ज्वा बैठकख़ानों और घरों में तो उस अतिचर्चित प्रोग्राम का पूरा हिंग्लिशनाम तक नहीं लिया जा सकता ; शायद पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका भी अपने एकांत में उसे दुहराना न चाहें.उसका केन्द्रीयशब्द भले ही यूपी-बिहार का लोकप्रिय आविष्कार हो,उसे पूरे परिवार में पढ़े जाने वाले किसी हिंदी अखबार में ज्यों-का-त्यों छापा भी नहीं जा सकता सिर्फ़ चवर्गको लुप्त कर ‘’आल इंडिया बकओद’’’ से संकेत दिया जा सकता है.यों बकओदका खुलासा यह है कि जो मौक़े पर खड़ा रहकर कार्यरूप से कुछ भी परफॉर्मन कर सके,सिर्फ़ बकबक और शेख़ी से काम चलाए. 

मुंबई के महँगे,प्रतिष्ठित नैशनल स्पोर्ट्स क्लब में कथित उच्चवर्ग ( कृपया सिने-वर्गपढ़ें )  के ऐसे दर्शकों के सामने,जो 4000 रुपये प्रति व्यक्ति-टिकट पर निजी और गुप्त रूप से आमंत्रित किए गए थे, आयोजित और शूट किया गया यह कार्यक्रम अमेरिकी टेलीविज़न के अतिशय रिअलिटी’,’इन्सल्टऔर रोस्टिंगशो की श्रेणी में आता है.इसमें उन शब्दों, गालियों और टिप्पणियों से,जिन्हें आप चाहें तो अश्लील,फ़ोह्श,पोर्नोग्राफ़िक कह लें, स्टेज पर बैठाले गए विशिष्ट अतिथिओं का बेइंतिहा बेइज़्ज़ती से तिक्का-बोटी, कीमा, तंदूरी या सीख-कबाब  किया जाता है और ‘’वी आइ पी’’ दर्शकों और अनुपस्थितों के साथ भी कभी-भी वही सुलूक किया जा सकता  है.लोकप्रिय मुहावरे में कहा जाए तो सबकी सिर्फ़ माँ-बहन ही नहीं, हर दूसरे रिश्तेदार और नज़दीकी भी एक कर दिए जाते हैं.बल्कि यह नया स्टेटस सिंबलबन गया हैयदि आप को इस प्रोग्राम में देसी हिंदी या हार्लमी अमरीकी में योनि’,’लिंग’,’गुदा’,’कुटुंबसंभोगी अजाचारी’  वगैरह से संबोधित  नहीं किया गया तो साफ़ है कि आप एक मामूली आदमी,’नॉन-एंटिटीहैं और यूँ ही आमंत्रित या घुस आए हैं.दरअसल  एकमात्र और सबसे गंदी अनकही फब्ती यही मानी जाती है.

यह नहीं है कि अपने यहाँ कभी-कभी ऐसा न होता हो.होली के दिन,जो अब दूर नहीं, कपड़ों पर अपठनीय शब्दों के आलू-ठप्पे लगाए जाते हैं,भाँग (की पकौड़ी)  और दारू के नशे की आड़ में औरतों-बच्चों की आमोदित उपस्थिति में किस-किस को सार्वजनिक रूप से क्या-क्या नहीं कहा जाता,नंगे-से-नंगा नाच-गाना-छूना-जुलूस आदि होता है,आचार्य मस्तराम से होड़ लेनेवाली लुग्दी-पुस्तिकाएँ लिखी-छापी-बाँटी जाती हैं.उधर आंचलिक ब्याह-शादियों में ‘’लेडिस’’ वयस्कोचित अपशब्द गाती हैं,आपस में सुहागरात का अतियथार्थ अभिनय करती हैंऔर घराती-बराती सभी कुलपूज्य बहुत आड़ किन्तु बड़े लाड़ से यह सब सुनते-देखते हैं. लेकिन होली-सम्ध्याने का यह विरेचन कुछ घंटों का ही होता है,संयुक्त हिन्दू परिवार अपनीजैसी हैं जहाँ हैं’ ‘’महान नैतिक परम्पराओं’’ में फिर लौट जाता है.आल इंडिया बकओदजैसे भूमंडलीकृत,उदारचरित,बहुराष्ट्रीय,अरबडॉलरी,कॉर्पोरेट फ़्रेन्चाइज़्डशो तो बेचारे बच्चनजी की मासूम मधुशाला की तरह दिन होली और रात दिवालीरोज़ मनाते हैं.

बात आई-गई हो जाती यदि अपनी जाहिल मग़रूरी में करण जौहर,रणवीर सिंह,अर्जुन कपूर,दीपिका पदुकोणे,आलिया भट्ट,गुरसिमरन खम्बा,तन्मय भट्ट,रोहण जोशी,अदिति मित्तल,आशीष शाक्य,राजीव मसंद और क्लब के क्रमशः अध्यक्ष और सचिव जयंतीलाल शाह तथा रवीन्द्र अग्रवाल ने यह तय न कर लिया होता कि हम इतने नामचीन रसूखी  लोग हैं, देखें हम पर कौन हाथ डालता है.इस तरह इन बंदरों ने अपने राजाओं सलमान खान और आमिर खान की ‘’भावनाओं’’ पर अनायास अनजाने उस्तरा चला दिया. 

यह बात अलग है कि सलमान खान की हर फिल्म में कम बाज़ारू और फ़ोह्श सीन,डांस,डायलॉग और गाने नहीं होते और आमिर खान भी बोसडीके को भगा चुके हैं लेकिन बॉक्स ऑफिस कारणों से आज दोनों मुक़द्दस मवेशी बन चुके हैं और अल्लामियाँ ने तोभाई को साक्षात् गऊमाता जैसे दिमाग़ से भी नवाज़ रखा है.इन दो जोड़ी सींगों को अपनी जानिब  दौड़ते देखकर जौहर-गिरोह को ठंढा पसीना आ गया,मुआफ़ी की भीख माँगना शुरू हो गया और हिन्दुस्तानी इन्टरनैट पर जहाँ-जहाँ इनकी अखिल भारतीय बकओदमुहय्या थी उसे हटाना शुरू हो गया.लेकिन आज नैट से कुछ-भी नेस्तनाबूद कर पाना नामुमकिन है.उल्टे यह हुआ है कि सलमान खान के हत्या और शिकार के मुक़द्दमों को लेकर हज़ारों बहुत मज़ाहिया और नुकसानदेह जुमले नैट की फ़ास्ट-ट्रैक जन-अदालतों द्वारा लिखे-पढ़े जा रहे हैं.शायद आमिर पी केखान को भी निपटाया जा रहा हो.
लेकिन मूल मामला अब इतना तूल पकड़ चुका है किप्रशासनिक इन्क्वारियाँ शुरू कर दी गई हैं, हाइकोर्ट नेमुल्ज़िमों को नोटिस जारी कर दिए हैं, केन्द्रीय सरकार से पूछा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की हरकतों के खिलाफ कार्रवाई का क्या मैकेनिज़्म है या हो,उधर बहती गटर-गंगा में हाथ धोने के लिए नए मामले दर्ज़ होने की दैनिक रिपोर्टें आ रहीं हैं.लेकिन यह भी है कि पुरानी फ़िल्मों के बकवादी ‘’हैम’’ भाजपाई शत्रुघ्न सिन्हा की लाडली बिटिया सोनाक्षी ने खुद को बकोदुओं के पक्ष में झोंक दिया है.नौ मन तेल का इन्तेज़ाम हो चुका हो तो राधा नाचेगी ही.

मुझे हैरत इस बात की है कि सनी लिओने के मामले की तरह इस पर भी हिंदी के ब्लॉग,अख़बार,कथित बुद्धिजीवी और विशेषतः अग्निवर्षक नारीवादी/वादिनियाँ,जो यूँ तो खुद काफ़ी बकोदू-लिखोदू हैं, इस क़दर सनाके में क्यों हैं ? लगता है आज हिंदी’-व्याकरण  में एक ही लिंग बचा हैनपुंसकलिंग.जबकि करण जौहर की बकोदू-मंडली के पक्ष में फिर वही महेश भट्ट,प्रीतीश नंदी और शोभा डेजैसे थर्ड-पेजीरोग्ज़ गैलरीवाले ख़सलती मशक़ूक़,जो नाम लेने लायक़ भी नहीं हैं, उसी तरह बकोदने पहुँच गए हैं जैसे किसी घर में बच्चा पैदा होने पर बृहन्नलाएँ पहुँच जाती हैं.

संक्षेप में ऐसे लोग यही मानते हैं कि दूसरे धर्मों को छोड़कर शेष सारे विश्व को किसी के बारे में कुछ भी कहने और बलात्कार को छोड़कर किसी के भी साथ कुछ भी करने का अधिकार है.हालाँकि मुझे यह लगता है कि यह मार्की द साद के मुरीद हैं और इनकी अंतरात्मा, यदि ऐसी कोई फालतू चीज़ इनके पास है तो, शायद हर तरह की हत्या और बलात्कार को भी अपनी सहिष्णुता, उदारता,प्रबुद्धता,आधुनिकता,’’सैंस ऑफ़ ह्यूमर’’ आदि का अंग मानती होगी.ऐसे परिवारों के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि किस तरह से  हर शाम  डाइनिंग-टेबल पर इनकेहर छोटे-बड़े एक-दूसरे को देशज हिंदी याझोपड़पट्टी अंग्रेज़ी में प्यार से योनि’,’लिंग’,’गुदा’,’स्तन’,’नितम्बआदि कहकर पुकारते होंगे,बात-बात में सम्भोग-सम्भोग’ (‘’‘’) का रिवायती हॉलीवुडी तकियाकलाम वापरते होंगे और डिनर के बाद सामूहिक रूप से सनी आंटी की ही एकाध क्लासिक फिल्म देख कर आपस में क्या करते होंगे.

अब मामला अदालत में है और हम नहीं जानते कि फ़ैसला क्या होगा लेकिन खजुराहो,’कामसूत्रआदि की दुहाई देना धूर्ततापूर्ण है .1947 तक की सहस्रवर्षीय अल्पसंख्यक शासकीय शामी संस्कृति की अन्य चीज़ों के अलावा प्रतिक्रियावादी यौन-नैतिकता की बहुसंख्यक ग़ुलामी ने इस मुल्क में बेहद बौद्धिक नुकसान किया है.आज हम एक सड़े-गले सुपरस्ट्रक्चरके सामने ऐसी पतनोन्मुख ‘’अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’’  से बेसको प्रबुद्ध और आधुनिक नहीं बना सकते.वैसे भी आज भारत को जैसा समतावादी समाज चाहिए उसमें ऐसे शो को जगह और स्वीकृति मिल ही नहीं सकती.और आज क्या मुस्लिम-सिख-जैन-ईसाई सरीखे अल्पसंख्यक भी ऐसे शो को गले लगा लेंगे ? देखते नहीं  हैंउस उर्दू अखबार की बेचारी संपादिका और उसके परिवार पर कितना भयानक असली  खतरा मँडरा रहा है ? क्या बकोद में भाग लेने वाले गे’ ‘मर्दोंऔर महेश भट्ट, प्रीतीश नंदी और शोभा डे आदि अनस्पीकेबिलोंमें इतनी हिम्मत है कि अगला कार्यक्रम ‘’शार्ली एब्दो’’ पर रखें-रखवाएँ और उसमें मंच पर जाएँ एक पतित, खाते-पीते-अघाए, पूयपूरित ‘’उच्च’’ वर्ग के सामने क्या यह पूँजीपतियों, बिल्डरों, माफ़ियाओं, अखबारों-चैनलों के मालिकों, आइ.ए.ऐसों, आइ.पी.ऐसों, नेताओं और आगे बढ़कर जजों, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों के बारे में बकोद सकते हैं ? तो फिर आप हम कमोबेश लिखोदुओं-पढ़ोदुओं को काहे बकोदना सिखा रहे हैं ?
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मंगलवार, 6 जनवरी 2015

अावाजाही

इस आलेख का किंचित संपादित और संक्षिप्‍त रूप जनसत्‍ता में 4 जनवरी 2014 को प्रकाशित हुआ है। पूरा लेख आकार में और भी बड़ा है, जो किसी अन्‍य पत्रिका में प्रकाश्‍य है। उसके काफी कुछ महत्‍वपूर्ण बिंदु यहाँ समाहित हैं।

अन्य मंचों का उपयोग या उपभोग

किसी भी समस्या और उसके निदान के बारे में हालाँकि समन्यवादी तरीका एक आसान रास्ता है परंतु वह किस हद तक सही रास्ता है, यह विचारणीय है। जबकि प्रायः देखा गया है कि समन्यवाद किसी न किसी तरह के अवसरवाद में जाकर स्खलित होता है। लेकिन जब हम किसी विचार-विशेष में भरोसा करते हैं, किसी दृष्टि के साथ अपने को खड़ा पाते हैं तो फिर संगठन की जरूरत पड़ती है। क्योंकि ‘सामाजिक दर्शन या वैचारिकता’ को आप व्यक्तिगत तौर पर लागू नहीं कर सकते, वह अपनी प्रकृति, आकांक्षा और बुनियाद में ही सार्वजनिकता की माँग करती है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता, लोकतांत्रिकता वगैरह बहुवचनीय उपस्थिति हैं। इन्हें किसी व्यापक समाज में ही घटित किया जा सकता है। तब एक संगठन चाहिए जिसके माध्यम से वैचारिकता और उसका क्रियान्वयन संभव हो।

ऐसे तमाम सांगठनिक मंचों का उपयोग, कोई अन्य विचारधारा संपृक्त व्यक्ति को क्यों करने देगा और उसे क्यों करना चाहिए, इस पर नानाप्रकार से बात जरूरी है। कि जब हमारा विचार, साहित्य, कला की समझ और अजैण्डा एकदम अलग है, बल्कि कहीं-कहीं एक-दूसरे के विपरीत है तो क्या हम एक-दूसरे को समझाने के लिए मंचों को शेयर करें? मंच, रचना या विचार शिविर नहीं होते हैं और न ही इस तरह की कोई मंशा वहाँ होती है कि धुर-विरोधी विचार को एक लोकतांत्रिक, सुविचारित और सदाशयी जगह उपलब्ध कराई जाए। दरअसल, साहित्य-संस्कृति में आज दक्षिणपंथी संगठन और संस्थाओं के सामने फिलहाल मुश्किल यह है कि उनके पास मान्य लेखक नहीं हैं। कार्यकर्ताओं और प्रचारकों को ही वे लेखक मान लेते हैं, जिन्हें सत्ता संरचनाओं के साथ मिलकर संस्थाओं में, परिषदों, अकादेमियों, पत्रिकाओं में पद दिए जाते हैं और इस तरह वे उन्हें शायद लेखक सिद्ध कर देना चाहते हैं। (हालाँकि, कुछ प्रतिष्ठित लेखक भी लोभ-लाभ के लिए उनकी तरफ आकर्षित होने लगते हैं। यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।)

उनके इन उत्सवधर्मी और लेखकविहीन आयोजनों को कुछ गरिमा और लेखकीय व्यक्तित्व मिले, इसलिए ही वे उन तमाम सुप्रसिद्ध लेखकों को भी बुलाना चाहते हैं जिनमें अधिकांश, मोटे तौर पर अभी भी वामपंथी हैं या कहें कि दक्षिणपंथी तो कतई नहीं हैं। उन्हें वहाँ सिर्फ इसलिए आमंत्रित किया जाता है ताकि ऐसे कार्यक्रमों को वह वैधता और प्रतिष्ठा मिल सके जो उन्हें अन्यथा प्राप्त नहीं हो सकती। मगर ऐसा होता नहीं देखा गया है कि इन आयोजनों में जाकर किसी वामपंथी लेखक ने अपनी पूरी शक्ति और चेतना के साथ, प्रखरतापूर्वक दक्षिणपंथ या व्यक्तिवाद के विरोध में, अपनी विचारधारा को रेखांकित करते हुए उस मंच से बात कही हो, उसे चुनौती दी हो और बावजूद इसके, उस लेखक को संस्था विशेष ने फिर-फिर, बारम्बार न्यौता दिया हो। हाँ, कभी-कभी लेखकों को ऐसा भ्रम हो सकता है कि उन्हें अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता दी जा रही है क्योंकि दक्षिणपंथी संस्थाएँ सांस्कृतिक फासीवाद के शुरुआती दौर में एक घालमेली लोकतांत्रिकता का निर्माण करना चाहती हैं जहाँ किसी भी तरह का विमर्श हास्यास्पद, कारुणिक या समन्यवादी हो जाए। वे अपने खिलाफ किसी भी प्रतिरोध को नखविहीन या आपसदारी का बना देना चाहती हैं। जो लेखक नहीं जाते उनके संदर्भ में यह जताना चाहती हैं कि हम उन्हें आमंत्रित करते हैं, वे आते ही नहीं। यानी वे आएँ तो उनके आयोजकीय खाते में लेखक बढ़ते हैं और न आएँ तो उन पर दूरी बनाए रखने या छुआछूत का लांछन सहज ही लगाया ही जा सकता है।

दरअसल, हमने अपना मंच, अपना संगठन बनाया ही इसलिए है कि हम आपसे अलग, आपसे असहमत और अपने अजैण्डे साथ काम करना चाहते हैं। संख्या में चाहे हम फिर कम हों या ज्यादा। यह छुआछूत नहीं है, हमारी असहमति है, विरोध है और पृथक कार्य है। यों भी, दूसरों के मंच का उपयोग करना गहरी योजना, समझ और चतुराई की माँग करता है। किसी उदाहरण विशेष की गहराई में जाए बिना, उसे अनुकरणीय या आदर्श नहीं बनाया जा सकता। सामान्यीकरण करते हुए इसकी व्यापक छूट भी उचित नहीं। इसमें औसत का नियम नहीं लगाया जा सकता कि नदी में से पौने छह फीट का एक आदमी बिना डूबे निकल गया तो पौने छह फीट ऊँचाई के औसतवाले एक पूरे समूह को नदी में से पार उतरवा दिया जाए। (और फिर फासिज्म की नदी भी ऐसी जिसमें पानी लगातार बढ़ रहा हो।)

बहरहाल, इस विचलन के तीन कारण हो सकते हैंः
सत्ता संरचनाओं से लाभ उठाने की नीयत। सत्तापीठों से प्रतिरोध में इच्छा की कमी। और वामपंथी संगठनों की निष्क्रियता। इधर, इस तीसरी वजह से तमाम वरिष्ठ और युवतर लेखकों को वह ‘स्पेस’ उपलब्ध नहीं है जो आज से दस-बारह साल पहले तक मुमकिन था क्योंकि तब प्रलेस, जलेस, जसम के आयोजनों, गोष्ठियों की भरमार बड़े शहरों, छोटे कस्बों सहित सब जगहों पर थी। तब अधिकांश शासकीय, स्वायत्त संस्थानों, परिषदों और अकादेमियों में भी वामपंथी या तुलनात्मक रूप से गहरा साहित्यिक ज्ञान रखनेवाले लोग पदासीन थे और उनके आयोजनों में सहज, दुविधारहित शिरकत संभव थी। कि चलो, जो वहाँ बैठा है, उसकी साहित्यिक समझ स्वीकार्य है। वैचारिकता की लोकतांत्रिकता का सम्मान अपनी जगह है। लेकिन आज भाजपा शासित राज्यों की संस्थाओं में पदासीन सचिवों, संपादकों, न्यासियों, अध्यक्षों का बायोडाटा देखें तो इनमें से अधिसंख्य की साहित्यिक-सांस्कृतिक विपन्नता, कुटुम्बकम और मानवतावाद का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है। उनके नाम पढ़कर हतप्रभ हुआ जा सकता है, वे किसी कोटि के भी लेखक नहीं है।

अब तमाम वामपंथी रुझान रखनेवाले लेखकों के सामने संकट यह आन पड़ा है कि जाएँ तो जाएँ कहाँ! लेकिन इसका समाधान यह कतई नहीं हो सकता कि कहीं भी चले जाएँ। या अचानक, बिना सोचे-विचारे ही समन्वयवादी, समझौतावादी हो जाएँ। सच्चा समाधान तो यहीं कहीं से निकलेगा कि अपने वैचारिक संगठनों की सक्रियता बढ़ाई जाए। अन्यथा छोटे-छोटे दल बनाए जाएँ, संस्थाओं की तरह काम किया जाए। अथवा जब तक कोई सक्रिय संगठन पुनः नहीं बनता, अकेले या कुछ समानधर्मा मित्रों के साथ अपना काम जारी रखें। प्रतिबद्धता और धीरज के साथ। इधर-उधर लपलपाने से कैसे काम होगा। हालाँकि तमाम वैचारिक सक्रियताओं के लिए दृश्य में एक वामपंथी राजनैतिक पार्टी की मजबूती भी चाहिए। यह अलग, विचारणीय और जरूरी मुद्दा है। तमाम लेखकों, किसानों, मजदूरों, छात्रों, स्त्रियों, उपेक्षितों, दलितों आदि के संगठन तमाम स्वायत्तता के बावजूद अंततः एक राजनैतिक पार्टी के ‘विंग्स’ ही होते हैं। लेकिन पार्टी रूपी पक्षी ही घायल हो तो ये ‘विंग्स’ कैसे उड़ान भर सकते हैं।

कई प्रदेशों में फासीवादी तत्व इतने मजबूत, एकीकृत, राजनीतिक रूप से शक्तिशाली और दुस्साहसी हो गए हैं कि आप धर्मान्धता या सांप्रदायिकता के खिलाफ अथवा पूँजीवादी संस्थानों के विरोध में कोई बयान दीजिए, लेख लिखिए, आप पर मुकदमा वगैरह जरूरत हुई तो बाद में चलेगा, फासीवादी संगठनों के तथाकथित सांस्कृतिक सदस्य, छुटपुट लोग, आपके ऊपर व्यक्तिगत आक्रमण कर देंगे और मुमकिन यही है कि आप इस तंत्र में उनके खिलाफ कुछ न कर पाएँ। यदि यह सब लिखने, कविताऍं पढ़ने, बयानबाजी करने के बावजूद आपके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा है तो जाहिर है कि अभी आप उनके रास्ते में ठीक से अवरोध नहीं बने हैं।

फासीवादी संरचनाओं में कैसे और कितनी जगह खोजी जाए, यह एक वृहत्तर रणनीति तो हो सकती है लेकिन इसमें व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि खास तरह के सामूहिक कौशल, चतुराई और विवेक की जरूरत होगी। इसलिए यहाँ ठहरकर यह सोचना ही होगा कि वे भला क्यों आपको आमंत्रित करेंगे, क्यों आपको जगह देंगे। जाहिर है कि उनकी भी कोई रणनीति शामिल रहेगी। वे कोई भोले या उदार संगठन नहीं हैं। उनकी अपनी योजनाएँ, प्रशिक्षण, कैमोफ्लाज, शिकारीपन और लक्ष्य हैं। यदि आप यह मानकर चल रहे हैं कि उनके मंच पर जाकर केवल आप उनका उपयोग कर रहे हैं तो इससे अधिक भोलापन कुछ नहीं हो सकता। यह गाफिल होना है। वे आपको उनके अपने तात्कालिक या दूरगामी लाभ और रणनीति के तहत ही बुलावा भेज रहे हैं।

फिर याद कर लें कि उपाय यही है कि अपने वैचारिक संगठनों को मजबूत और सक्रिय किया जाए। उसका विकल्प कुछ नहीं। चूँकि हमारे संगठन या समानधर्मी लोग उतने सक्रिय नहीं रह गए हैं इसलिए अब अन्य मंचों पर जाना मजबूरी है या यही उचित है, यह सोचना, दोहरा नुकसान करना है। जबकि यह आपकी-हमारी निष्क्रियता है। यदि आप अपने मंच से अपना राॅकेट लांच नहीं कर सकते तो किसी दूसरे प्लेटफाॅर्म से वह लांच हो नहीं सकता। या फिर वह इतनी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष शर्तों पर और इतने कुहासे के साथ लांच होगा कि ‘लांचिंग’ ही एक संदिग्ध स्थिति में फँस जाएगी। आपके पास अपना मंच है, अपना मैदान है, आप वहाँ काम कीजिए।

इस भागमभाग भरी आकांक्षा में यह पक्ष भी गौण नहीं है कि अनेक वामपंथी लेखक जो उम्र में साठ-पैंसठ पूरे कर चुके हैं, जिन्हें अन्यथा तमाम तरह के पुरस्कार, सम्मान मिल चुके हैं और जो विभिन्न संस्थानों, प्रकाशनों में पदाधिकारी, संपादक वगैरह हैं, और हर शहर में ऐसे वरिष्ठजन की भरमार है, ये लेखक अपनी आयु के इस उत्तर जीवन में समन्यवादी हो सकने के लिए बिछे रहते हैं। जबकि अभी दशक-दो दशक पहले ही ये युवा तुर्क, गुस्सैल, नाराज, आक्रामक थे और अपने तेवरों के लिए विख्यात थे। हालाँकि अब शायद अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है कि इनमें से अधिसंख्य दरअसल महत्वाकांक्षी रूप से अवसरवादी थे। पहले वामपंथी होने से या उन लेखक-संगठनों में रहने से लाभ, प्रतिष्ठा, पुरस्कार, सम्मान, स्थान वगैरह मिल सकता था सो लिया। अब वरिष्ठ हैं, बुजुर्ग हैं, सम्मानित हैं, सामर्थ्‍यवान हैं  तो उनका तर्क है कि ‘कहाँ कहाँ नहीं जाओगे’, ‘किस किस को मना करोगे’, ‘यह तो छुआछूत है’। ‘चारों तरफ अब ऐसी ही संस्थाएँ हैं, ऐसे ही लोग हैं।’ ‘वे भी इसी समाज से हैं, सबसे ही तो अपना संबंध है।’ ‘सबको शिक्षित करना है। अपने ही जैसे लोगों के बीच में क्या बोलते रहना।’ ‘एक विशाल साहित्यिक परिवार है।’ अब ये समावेशीकरण पर जोर देते हैं, हर जगह से पैसा, चर्चा और सुविधा लेना है। हर जगह छपना चाहते हैं। कहीं के लिए भी साक्षात्कार और तस्वीरें ले जाइए। इनका कहना है कि हम तो भाई, इन सब चीजों से ऊपर उठ गए हैं और वक्त भी वैसा नहीं रहा। सचाई यह है कि ये उनके मंचों का ‘उपयोग’ नहीं, ‘उपभोग’ करना चाहते हैं। पुनः प्रश्न यह उठता है कि आपने अपना मंच या संगठन क्यों बनाया। इस संदर्भ में तर्क नहीं बल्कि देखा यह जाना चाहिए कि अंततः आप खड़े कहाँ होते हैं। और यदि आप बार-बार वहीं जाकर खड़े होते हैं तो फिर किसी भी तर्क का कोई मायना नहीं है। वह शब्दाडम्बर है। आपकी ‘पोजीशन’ ही अर्थवान है, वही अवस्थिति आपके विचारों का वास्तविक सूचकांक है।

यह भी कम अजीब स्थिति नहीं कि अपने पदभार के चलते दक्षिणपंथी संस्था या सत्ता में कोई वामपंथी रुझान का लेखकनुमा अधिकारी पदस्थ होते ही आशा करता है कि उसके रहते सभी वामपंथी लेखकों को इस संस्था में आना-जाना शुरू कर देना चाहिए। वह सोचता है कि ऐसा मानना उसका हक है। बल्कि यह उसकी उदारता, उसका साहस है कि वह किसी वामपंथी छबि के लेखक को आमंत्रित कर रहा है। कि वह उस संस्था के द्वार, उसकी पदस्थापना के सीमित समय के लिए ही सही, बावजूद विपरीत विचार की सरकार के, वाम लेखकों के लिए भी खोले दे रहा है। वह सारा दबाव लेखकों पर डालेगा बजाय इसके कि वह संस्था के भीतर उन कारणों को दूर करे जिनकी वजह से उस संस्था के प्रति बहिष्कार, विवाद या दुविधा है। हालाँकि वह चाहे तो भी ऐसा कुछ कर नहीं सकता क्योंकि वह तो दक्षिणपंथी सत्ताधीशों की प्रत्यक्ष या परोक्ष मेहरबानी पर ही वहाँ टिका हुआ है। ध्यान से देखें तो दिखेगा कि वह स्वयं दया का पात्र है, अपना ही कैरीकेचर है, इसलिए अब वह एक आभासी वातावरण बना देना चाहता है जिसके अंतर्गत उसे अपनी प्रशासकीय, संपादकीय या अकादेमिक श्रेष्ठता साबित कर देना है। फिर वह तमाम लेखकों को आमंत्रित, प्रलोभित करता है, निजी संबंधों का उपयोग करता है, तोड़-फोड़ करता है। यह दिलचस्प विडंबना है कि अनेक ‘तथाकथित प्रतिबद्ध लेखक’ वहाँ जाते हैं। लेकिन इससे समाज में, साहित्य की दुनिया में, वैचारिक संघर्ष में कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता और न ही हो सकता है कि इस आवाजाही के पक्ष में खड़ा हुआ जा सके।

इसलिए कौन कहाँ बना रहता है, क्या करता है और किन रास्तों से गुजरता है या किन मुद्दों से कन्नी काट जाता है, ये सब बातें महत्वपूर्ण और निर्णायक हैं। कहीं भी, किसी भी विचार के मंच पर जाने के लिए यों किसी तर्क की जरूरत है भी नहीं। यह आपकी स्वतंत्रता का विषय भी हो सकता है लेकिन इसे किसी सिद्धांत की ओट में ‘सही’ या ‘जरूरी’ साबित करने की कोशिश हास्यास्पद है। खुशी की बात है कि आप और हम एक तरह से नहीं सोचते हैं, इसलिए इस विषय पर विवाद है और बना रहेगा। खुशी की बात है कि यह दुनिया इकहरी नहीं है।

और यदि यह आवाजाही, दूसरे मंचों का यह उपयोग संगठित तौर पर, नीतिगत तौर पर, किन्हीं बड़े वैचारिक, सुनियोजित, रणनीतिक आधारों पर किया जा रहा है तो स्वागतेय हो सकता है और इस रणनीति की तरफ उत्सुकता से भी देखा जा सकता है। लेकिन क्या ऐसा है? हम सब सहज ही जान सकते हैं कि ऐसा नहीं है।
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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

सुचिंतित संपादकीय

सुप्रसिद्ध स्‍तंभ लेखक जय प्रकाश चाैकसे जी एक किताब अभी प्रभात प्रकाशन से आई है। जिसमें उनके 100 आलेख संकलित हैं। इस किताब की भूमिका लिखने का अवसर मुझे मिला। वह भूमिका यहॉं पेश है।

सिनेमाई अनुभव की साहित्यिक नोटबुक

फिल्म की दुनिया चकाचैंध, वैभव, माया, स्वप्न, आकांक्षा, प्यास और ऐश्वर्य की दुनिया है। शेष संसार के लिए वह एक चुंबक की तरह काम करती है। लेकिन उस दुनिया के बारे में लिखा जाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। खासकर पत्रकारिता के संदर्भ में। हिंदी में तो और भी ज्यादा अकाल है। खासतौर पर जब दैनिक स्तंभ लिखा जा रहा हो। अक्सर ऐसा लेखन औसत से ऊपर नहीं हो पाता। लेकिन जय प्रकाश चौकसे का नियमित लेखन एक सुखद अपवाद है।

इसका सबसे बड़ा कारण है कि फिल्म से जुड़े किसी भी प्रसंग के बहाने जय प्रकाश चौकसे एक बहुत बड़ी सामाजिक दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं। हर बार वे फिल्म की घटनाओं का अतिक्रमण करते हैं। जीवन और दर्शन की व्यापकता जैसे उनका अभीष्ट हो जाता है। फिर वहाँ साहित्य और कला अनुशासनों की इतनी आवाजाही है कि हमारे रोजमर्रा के तमाम अनुभवों और विचारों से टकराने का अवसर उपलब्ध है। यह अनेक खिड़कियों का एक साथ खुलना है। धीरे-धीरे हम जान लेते हैं कि यह महज फिल्मी खबरें नहीं हैं के बल्कि उसके बहाने व्यापक सरोकारों से सज्जित और चिंतित संपादकीय हैं।

और इस लेखन को जय प्रकाश चौकसे अपनी इतनी परिमार्जित भाषा के साथ संपन्न करते हैं कि उसे पढ़कर साहित्यिक रचना की अनुभूति होती है। यह भाषा ठस या बोझिल नहीं है। इसमें गतिशीलता है, संवाद की ताकत है। आत्मीयता है। वे हिंदी के कठिन और तत्सम शब्दों का इस्तेमाल भी इतनी सहजता से कर लेते हैं कि कोई अवरोध नहीं बनते। इस तरह वे संप्रेषण के लिए अटकते नहीं हैं और अखबारी भाषा की विपन्नता को भी लाँघ जाते हैं। उन्होंने भाषा का अपना एक मुहावरा बनाया है। इस तरह वे हिंदी गद्य को भी नये सिरे से समृद्ध करते हैं। हर पंक्ति पर लगता है कि आप एक सुपठित, सजग और व्यग्र लेखक के साथ हैं।

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों, आशा-निराशा, राग, द्वेष, ईष्र्या, प्रेम, लोभ, काम और इच्छाओं के साथ परम्परा तथा हमारे समय की आधुनिक जटिलताओं यथा- संस्थानों की समस्याओं, निजीकरण, भूमण्डलीकरण, अमीर-गरीब की बढ़ती खाई, बेरोजगारी, वंचितों की असहायता और धन के अश्लील प्रदर्शन, आत्मा का लुटा हुआ द्वीप, इन सबके बीच जय प्रकाश चौकसे ऐसे पुल बनाते हैं कि हम खुद वहाँ पहुँचकर इन प्रवृत्तियों का कुछ करीब से जायजा ले सकें। वे कुछ क्लोज अप और लाँग शाॅट्स के जरिए भी हमारे लिए दृश्य रच देते हैं। वे जो कुछ भी परदे के पीछे रह जाता है, नेपथ्य में ओझल है, उसे प्रतिदिन के रंगमंच पर ले आते है और ऐसा वे किसी अदाकारी अथवा नाटकीयता के जरिए नहीं बल्कि अनायासिता और सहजता से करते हैं।

यह उस लेखन का विशिष्ट उदाहरण है जो अंतर्वस्तु में श्रेष्ठ होते हुए भी लोकप्रियता के तत्व को बरकरार रखता है। श्रेष्ठ यदि लोकप्रिय हो जाये तो इससे अधिक स्वागतेय क्या होगा? इस प्रसंग में जय प्रकाश चौकसे को रेखांकित किया जाना चाहिए। फिल्म को माध्यम बनाकर यह सब लिखना दरअसल, एक नये प्रकार का साहित्य है। इसे किसी नयी विधा, नयी कोटि के अंतर्गत रखना होगा। ये सिनेमाई अनुभव की साहित्यिक नोटबुक है। जहाँ शब्दकला के बहुआयामी शिल्पों और संगीत का सुखद मेल, उसका आस्वाद उपस्थित है।

इसमें सामाजिक सरोकार, मनुष्य की चिंताएँ, घबराहट और जिजीविषा प्रखर रूप से शामिल है। ये लक्षण, उनके नियमित स्तंभ को किसी ‘प्रकाश स्तंभ’ में तबदील कर देते हैं जिसकी रोशनी में हम अपनी नौकाओं की दिशाएँ कुछ हद तक तो ठीक कर ही सकते हैं। स्वतंत्र भारत के व्यावसायिक हिंदी अखबार जगत में, हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के बाद, इतने लंबे समय तक किसी स्तंभ को रोज लिखना ही अपने आप में एक विरल उदाहरण है। फिल्मों के बहाने लिखना तो शायद अकेली मिसाल है। यहाँ मेरा आशय यों ही कलम घिस देने से नहीं, एक पठनीय, लोकप्रिय और श्रेष्ठ लेखन से है। यह संयोग मुश्किल से होता है। जय प्रकाश चौकसे ने इसे संभव किया है। इसलिए ही उनको रोज पढ़ना, अब एक विस्तृत पाठक वर्ग की दिनचर्या है, आदत है।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

फासिज़्म लोकतन्त्र के कपड़े पहने हुए है

नवम्‍बर 2014 में भारत भवन, भोपाल में प्रस्‍तावित 'बिहार उत्‍सव' के प्रसंग में राजेश जोशी की यह एक गौरतलब टिप्‍पणी है। लेखकों को अपने समय की राजनीति समझना ही होती है और अपना पक्ष भी स्‍पष्‍ट रखना होता है। हम देखा ही रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में लेखकों की पक्षधरता में न केवल कमी आई है बल्कि उसमें अवसरवाद को जगह मिली है। और इस बहाने अनेक तर्क- वितर्क- कुतर्क के निर्माण भी हुए हैं। प्रसंगवश याद दिलाना उचित होगा कि हम तीन लेखकों, राजेश जोशी, कुमार अंबुज, नीलेश रघुवंशी, ने दो बरस पहले दो वक्‍तव्‍यों के जरिए मध्‍य प्रदेश की सांस्‍कृतिक स्थि‍ति और उसकी राजनीति पर यथाशक्ति प्रकाश डाला था और अपने उस पक्ष को स्‍पष्‍ट किया था जिसे हम पिछले एक दशक से निबाह रहे हैं। बहरहाल, यह टिप्‍पणी संलग्‍न है।
इसलिए: राजेश जोशी
भारत भवन में बिहार उत्सव.....जय हो !
मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग और भारत भवन ने प्रदेशों की संस्कृति और साहित्य पर केन्द्रित कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू करने का विचार किया है। पहला प्रदेश बिहार चुना गया है। मैं सोच रहा हूँ कि प्रथम पदेश के रूप में बिहार क्यों? न तो अकारान्त क्रम में बिहार पहले आता है न हिन्दी प्रदेशों में बिहार कोई शीर्श पर है। फिर बिहार पर यह अतिरिक्त प्रेम क्यों? अमरीका जब युद्ध के निशाने साधने के लिये देशों का चयन करता है तो उसके दिमाग में प्रमुखता से तेल होता है। मध्यप्रदेश सरकार जो सांस्कृतिक श्रृंखला शुरू कर रही है तो निशाना साधने के लिये उसकी निगाह किस तेल पर है या किस तेल की धार पर?
कांग्रेस मुक्त भारत का नारा धीरे धीरे छोटे राजनीतिक दलों और क्षैत्रिय दलों को अपने घेरे में ले रहा है। हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस मुक्त भारत के साथ क्षैत्रिय दलों से मुक्ति का अभियान भी शुरू किया जा चुका है। मोदी और शाह की भाजपा ने शिवसेना को उसकी औकात दिखा दी है। किनारे पर बैठी शिवसेना रूआँसी हुई जा रही है। उद्धव ठाकरे बिचारे इंतज़ार कर रहे हैं कि कब बुलावा आये और वे दौड़ पड़ें। लेकिन यह बात मेरी समझ से बाहर है कि इस राजनीति के खेल में मध्यप्रदेश को बिहार पर यह अतिरिक्त लाड़ क्यों उमड़ रहा है? शिवराज किसका खेल खेल रहे हैं? मोदी और शाह का या कोई अलग राग गाने की तैयारी है? भाजपा में भीतर ही भीतर कुछ सुलग तो रहा है पर अभी बाहर नहीं आ पा रहा है।
बहरहाल भारत भवन में अब बिहार उत्सव होने जा रहा है । मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग को अपना कोई अलग नामकरण कर लेना चाहिये। संस्कृति का जैसा सत्यानाश पिछले पन्द्रह वर्ष में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किया है, उसकी कोई दूसरी मिसाल मध्यप्रदेश के इतिहास में ढूंढना मुश्किल है। साहित्यिक कार्यक्रमों में जो लेखक बुलाये जा रहे हैं वो कौन है? प़ित्रकाओ की दुर्गत तो और भी ज्यादा हास्यास्पद है। जिस सरकारी सांस्कृतिक वैभव का ढिढौरा पीटते सरकार के कभी हाथ न थकते थे आज उसी मध्यप्रदेश की सरकारी सांस्कृतिक गतिविधियों की फूहड़ता पर ठीक से हँस सकना भी संभव नहीं है। हालांकि इसे फूहड़ कह कर टाल जाना भी एक किस्म का सरलीकरण ही होगा। इसके पीछे एक खास किस्म की राजनीति- ‘सांस्कृतिक राजनीति’ और काइयाँपन छिपा हुआ है। कुछ लेखकों ने इसके पीछे छिपे फासीवाद की धीमी आवाज़ की ओर बहुत पहले ही इशारा किया था।
गालिब कह गये थे कि वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात इसलिए बिाहार के या बिहार से बाहर रह रहे बिहार के अनेक लेखक न समझें तो कोई क्या करे ? सुना है कई लेखक बिहार उत्सव में शिरकत फरमाने आने वाले हैं । आइये, आइये, भाजपा की भगवा कार्पेट बिछी हुई है। अगर आपकी चड्डी में लाल रंग का नाड़ा डला हो तो उसे फेंक आइये। उन दिनों जब देश में भाजपा की सरकार नहीं आयी थी तब भी हमने मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा की जा रही सांस्कृतिक गतिविधियों में छिपी हुई मंशाओं की ओर इशारा करते हुए लेखकों से यह अनुरोध किया था कि भारत भवन और अन्य सांस्कृतिक परिषदों के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी का बहिष्कार करें। पर तब भी हिन्दी के हमेशा सरकारी कार्यक्रमों के प्रति लालायित रहने वाले रचनाकारों ने बहिष्कार नहीं किया तो अब जब केन्द्र में मोदी सरकार आ चुकी है तो उनसे क्या उम्मीद की जाये। जर्मनी में फासिज़्म के चरम पर आ जाने के बाद भी अनेक लेखक उसका पक्ष ले रहे थे तो हमारे यहाँ तो अभी फासिज़्म लोकतन्त्र के कपड़े पहने हुए है उसके विरोध में जाने का तो सवाल ही नहीं उठता ।
तो मध्यप्रदेश में बिहार उत्सव हो रहा है। नितीश और लालू यादव सोचें...... विचार करें कि यह क्यों हो रहा है? इसके पीछे छिपी मंशा क्या है? राजनीति क्या है? और कौन लोग हैं जो इसमें हिस्सेदारी कर रहे हैं?
बहराल भारत भवन में आने ...गाने ...बजाने...मटकने ...लटकने...ठुमकने...फुदकनेवालों की जय हो...जय हो...।
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शनिवार, 13 सितंबर 2014

मुक्तिबोध: उनके वाक्य, ताला भी कुंजी भी


बी बी सी हिंदी से, मुक्तिबोध के निधन की अाधी शताब्‍दी पूरी होने के संदर्भ में, एक संक्षिप्‍त बातचीत। 
इस बातचीत का लिंक यहॉं नीचे है।
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/09/140912_muktibodh_kumar_ambuj_rns.shtml

कुमार अम्बुज
मुक्तिबोध के निधन के बाद के पाँच दशक गवाह हैं कि उनके जाने के बाद उनकी प्रासंगकिता और ज़्यादा बढ़ी है. इन पाँच दशकों में शायद हिन्दी के प्रत्येक कवि ने मुक्तिबोध को हमेशा ही अपनी स्मृति में रखा है.
मुक्तिबोध का पूरा रचनाकर्म, जो सृजनधर्मिता थी वह हिन्दी के लिए गौरव की बात है. यह बहुत महत्वपूर्ण अवसर है कि हम मुक्तिबोध की कुछ बातों को अपने-अपने तरीक़े से याद करें.
कवि और कथाकार के रूप में तो मुक्तिबोध की ख्याति है ही लेकिन उनका पत्रकार रूप भी लोगों को याद रहना चाहिए. उनके दो काम और भी विलक्षण थे जिन्हें मैं उनके कवि कर्म से कम महत्वपूर्ण नहीं मानता हूँ.
एक, उन्होंने जो डायरी लिखी है उसमें रचना प्रक्रियाओं को लेकर एक लेखक के मन की उधेड़बुन, व्यग्रता और मुश्किलें शामिल हैं. वह 'एक साहित्यिक की डायरी' नाम से प्रकाशित हुई और उनकी रचनावली में यह सम्पूर्ण रूप में है.
दूसरा, उन्होंने 'इतिहास और संस्कृति' के नाम से भारत का इतिहास लिखा. जो बहुत विवादास्पद भी रहा, जिसको लेकर मुक़दमेबाज़ी हुई, लेकिन वह वैज्ञानिक ढंग से लिखा गया इतिहास है.
उनकी डायरी की कई पंक्तियाँ इतनी सारगर्भित हैं कि लगभग एक वाक्य से ही हम बहुत सारे निष्कर्षों की तरफ़, बहुत सारी अवधारणाओं की तरफ़ जा सकते हैं. वह अपने आप में ताला भी हैं और कुंजी भी हैं.
उनकी रचनावली के पाँचवें खंड में जो डायरी है उसमें एक हिस्से की शुरुआत इस वाक्य से होती है, "साहित्य विवेक मूलतः जीवन-विवेक है." यह वाक्य मुझे बहुत अनुप्राणित करता रहा है. इस वाक्य को अगर हम खोलने की कोशिश करें तो हम पाएँगे कि यह एक पूरा विमर्श है.
जनता का साहित्य क्या है?
इसी तरह उन्होंने बहुत दिलचस्प शीर्षक से डायरी लिखी है कि जनता का साहित्य किसे कहते हैं. यह सवाल बार-बार उठता है कि साहित्य बहुत लोकप्रिय नहीं होता है, जो अच्छा साहित्य है उसे बहुत पढ़ने वाले नहीं मिलते हैं और उसे हम जनता का साहित्य कैसे कहें जिसे जनता पढ़ ही नहीं सकती.
मुक्तिबोध लिखते हैं, "साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक. किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है. दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज़ नहीं. ऐसा होता तो क़िस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते."
वह आगे कहते हैं, "तो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है. इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिष्‍ठापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो. इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है."
कला के क्षण
इसी तरह डायरी के वे हिस्से बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसमें उन्होंने कला के दूसरे और तीसरे क्षण के बारे में लिखा है. किसी लेखक और रचना के लिए होने वाले संघर्ष-आत्मसंघर्ष, उसकी प्रक्रिया के बारे में उन्होंने बहुत संवेदनशीलता और बहुत ज़िम्मेदारी से लिखा है.
मुक्तिबोध की 'अंधेरे में', 'भूल-ग़लती' जैसी कई कविताएं बहुत लोकप्रिय हैं लेकिन मैं यहाँ उनकी ऐसी कविता का स्मरण करना चाहता हूँ जो शायद उतनी उद्धृत नहीं है. यह कविता है 'भूरी भूरी ख़ाक धूल' संग्रह में शामिल कविता 'झरने पुराने पड़ गए'. यह उनकी लगभग अधूरी रचना है. यह कविता उनकी मृत्यु से क़रीब चार-पाँच साल पहले 1959-60 में लिखी गई थी.
दुनिया बदलने का एक सपना
उनकी कविता में तद्भव और तत्सम शब्दों का विशाल सपुंजन और समावेश है, लेकिन 1955 के बाद उन्होंने जो कविताएं लिखी हैं उनमें आम बोलचाल की भाषा लगातार बढ़ती गई है.
वैज्ञानिक शब्दावली, आविष्कारों और खोजों के प्रति उनकी उत्सुकता, श्रद्धा और जीवन को ये आविष्कार बदलेंगे इसका विश्वास, साथ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनके कुल लेखन में कभी भी अनुपलब्ध नहीं रहे.
मुक्तिबोध इसलिए हमारे लिए आजतक महत्वपूर्ण बने हुए हैं क्योंकि वह जनता से जुड़कर, जीवन से जुड़कर इस दुनिया को बदलने के लिए एक सपना हमेशा देखते रहे.
संदर्भित कविता 'झरने पुराने पड़ गए' का अंश
झरने पुराने पड़ गए
उनकी उपमा अब कोई नहीं देता
शायद धोबी दें,
जो वहाँ कपड़े फचीटते हैं,
या किसान
जो उसमें फंसी हुई गाड़ी घसीटते हैं लेकिन
वो सभ्य नहीं हैं
इसलिए झरने की उपमा अब लभ्य नहीं है
फिर भी मैं झरने की उपमा ज़रूर दूँगा
उस सुदूर को
जो बहता हुआ हमारी ओर आ रहा है
हमारे पास लगातार आ रहा है
इसलिए नहीं कि हम नदी या तालाब हैं,
जिसमें मिल जाएगा
बल्कि इसलिए कि हम वे टीले हैं
जिन्हें घाव-ही-घाव हैं
टूटे हैं तड़के हैं
फिर भी ठहराव है
एक रुकाव है, इसीलिए सब तरफ़ चेहरे ये पीले हैं
वह आ रहा है, अनक़रीब है,
हमें बहा ले जाएगा!!
कहाँ ले जाएगा?
तो उसी का क़िस्सा है
पुराने जमाने में
भयानक परिपाटी-सी
एक घाटी थी
उसकी वह माटी भी अजीब थी,
बहुत ग़रीब, बहुत बदनसीब थी
वहाँ कई लड़ाइयाँ हुई थीं,
खूब ठठरियाँ फैली थीं,
टूटी हुई हड्डियों के टुकड़े
अभी भी देखे जा सकते हैं
निरखे जा सकते हैं, परखे जा सकते हैं.
लेकिन कौन इस धंधे में पड़े
तो हाँ, वहाँ हजारों किसान मारे गए थे,
बड़े युद्धवीर थे
इसीलिए तलवार के घाट उतारे गए थे
और भी दूसरे कई-कई लोग थे,
बड़े लड़ाकू थे, मरण-संयोग थे
उन्होंने गढ़ और गढ़ियाँ,
दुर्ग और क़िले ढहा दिए
बड़े-बड़े अहंकार और गर्व बहा दिए
आज उसी एक क़िले के हिस्से में
मेरा यह कॉलेज है
टेबल और मेज है,
आर्ट्स और साइंस, कॉमर्स हैं
मुझे यह हर्ष है
कि उसी क़िले के एक महत् सिंहद्वार के
ऊपर और नीचे के कक्षों में मुझको बसाया गया,
क्वार्टर्स बन गए.
 (रंगनाथ सिंह, बी बी सी हिंदी, से बातचीत पर आधारित)

सोमवार, 8 सितंबर 2014

ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास की जन्‍मशती

निर्विवाद रूप से श्री विष्‍णु खरे हमारे समय के सबसे अधिक उर्वर, अध्‍यवसायी और चैतन्‍य मस्तिष्‍कों में से एक हैं। और यह पक्ष उन्‍हें अनेक अनुशासनों में दखल देने योग्‍य बनाता है। ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास की जन्‍मशती के प्रसंग में लिखा गया उनका यह महत्‍वपूर्ण आलेख यहॉं 'बुद्धू-बक्‍सा' ब्‍लॉग से साभार। युवतर पीढ़ी के लिए यह अनेक जानकारियॉं और अब्‍बास को देखने की दृष्टि भी उपलब्‍ध कराता है।
 
वह अपनी हर विधा में प्रगतिकामी मूल्यों पर अडिग रहे
विष्‍णु खरे


ख्वाज़ा अहमद अब्बास को ‘बहुमुखी प्रतिभा का धनी’ कहना एक पिष्टोक्ति है लेकिन उसके सिवा उन्हें कुछ कहा भी नहीं जा सकता – आप चाहें तो उसमें सिर्फ़ कहीं ‘प्रतिबद्ध’ जोड़ सकते हैं. उन्होंने 20 की उम्र के आसपास उर्दू कहानीकार के रूप में अपनी सृजन-यात्रा शुरू की, फ़क़त 27वें बरस में सार्थक सिनेमा से आजीवन जुड़ाव का आग़ाज़ किया, साथ-साथ उर्दू-हिंदी और अंग्रेज़ी पत्रकारिता में गहरा सक्रिय दख़ल दिया और 1935 के इर्द-गिर्द अदीब की हैसियत से तरक्क़ीपसंद तहरीक़ (प्रगतिशील आन्दोलन) और उसकी जन्मदात्री वैश्विक वामपंथी राजनीति से वाबस्ता हुए. यह सब करते हुए उन्हें चौतरफ़ा मुसीबतों और विवादों का सामना करना पड़ा लेकिन वह डटे रहे और वैसा आत्मपावन, शहीदाना पलायन नहीं किया जो उनके पहले और समान्तर प्रेमचंद या अमृतलाल नागर आदि कर चुके थे.
समस्या यह है कि अब्बास को मुख्यतः क्या माना जाए – मुख्तलिफ़ हैसियतों से उनके नाम पर क़रीब पाँच दर्ज़न फ़िल्में दर्ज़ हैं, अलग-अलग ज़ुबानों में कोई पचहत्तर किताबों पर उनके दस्तख़त हैं, उनके लिखे सियासी-ग़ैरसियासी अख़बारी कॉलमों की सही-सही शुमारी कठिन है और प्रगतिशील आन्दोलन और ‘इप्टा’ वगैरह में उन्होंने कौन-से कारनामे अंज़ाम दिए इसी के दस्तावेज़ मिलना मुश्किल है. फिर भी सच यही है कि 1941-91 की (‘नया संसार’ से ‘बॉबी’ तक की) अर्धशती में अगर संसार-भर के करोड़ों लोगों ने उनका नाम जाना, जो आज डीवीडी, इन्टरनैट, एमआरक्यूई और आइऐमडीबी वगैरह के ज़रिये ‘और अमर’ है, तो वह सिनेमा के साथ उनकी सोहबत की वजह से ही है. लेकिन यह भी सच है कि अगर वह सिर्फ़ लेखक होते, पत्रकार या सांस्कृतिक-राजनीतिक-सैद्धांतिक सक्रियतावादी ही, तब भी जन्मशती मनाए जाने के अधिकारी होते.
दूसरी आलमी जंग शुरू होने से पहले ही युवा अब्बास वामपंथी हो चुके थे और मध्य-1941 में मार्शल योसिफ़ स्त़ालीन के नेतृत्व में जब सोवियत रूस विश्व-इतिहास के अब तक के सबसे बड़े हमले का मुक़ाबला कर रहा था और वर्ष के अंत तक जर्मनी की नात्सी फौजों को परास्त कर अपने यहाँ से खदेड़ देने वाला था, अब्बास ने अपने जीवन की पहली सिने-कहानी और पटकथा लिखी और इस तरह ‘नया संसार’ शीर्षक फिल्म बनी जो प्रतिबद्ध पत्रकारिता जैसे अश्रुतपूर्व विषय पर शायद पहली भारतीय फिल्म थी और अपने सामयिक आदर्शवाद के बावजूद ख़बरख़रीद के इस बेहया ज़माने में अब भी प्रासंगिक है. 1946 में चेतन आनंद ने ‘इप्टा’ की आर्थिक मदद से बनाई गई अपनी फिल्म ‘नीचा नगर’ की पटकथा लिखने के लिए अब्बास को चुना और इस फिल्म ने युद्धोत्तर पहले कान फिल्म समारोह में भारत के लिए पहला सह-ग्रांप्री हासिल कर इतिहास बनाया. अब्बास की इन दोनों उपलब्धियों ने उनके अपने हौसले और दूसरों के उनकी प्रतिभा में यकीन को इतना बढ़ाया कि उन्होंने बंगाल के दुर्भिक्ष सरीखे जोखिम-भरे विषय पर आधारित अपनी पटकथा पर ‘इप्टा’ के सहयोग से 1946 में ही ‘धरती के लाल’ जैसी कालजयी फिल्म का निर्माण और निदेशन किया. इस वर्ष को अब्बास के फ़िल्मी जीवन का परिभाषी या निर्णायक वर्ष कहा जा सकता है क्योंकि उनकी प्रतिभा को वी. शांताराम जैसे व्यावसायिक रूप से सफल, आदर्शवादी मराठी-हिंदी निर्माता-निदेशक ने पहचाना और अपनी फिल्म ‘डॉ कोटनिस (मूल मराठी में ‘कोटणीस’ है) की अमर कहानी’ की कहानी और पटकथा के लिए चुना. मुझे याद है कि 1946-47 में मुझ जैसे लाखों बच्चों तक की ज़ुबान पर इस फिल्म का नाम रहा करता था.
भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी सार्थक शुरूआत शायद ही किसी और लेखक-निदेशक को मिली हो लेकिन आज़ादी के वर्ष 1947 में जिस ‘आज और कल’ शीर्षक फिल्म का निदेशन अब्बास ने किया उसके बारे में सिर्फ़ यही पता चलता है कि उसमें श्याम, आरिफ़, नीता और नयनतारा ने काम किया था – गानों का भी कोई वजूद बचा नहीं है. ज़ाहिर है कि फिल्म अच्छी-ख़ासी फ्लॉप रही होगी क्योंकि उसके चार बरस बाद तक अब्बास को कोई काम नहीं मिला. लेकिन जब मिला तो ऐसा कि बहुत कम को नसीब होता है. अल्लाह बेहतर जानता है कि इस पूरे किस्से में कितना सच है लेकिन अब्बास अपनी नई स्क्रिप्ट लेकर महबूब के पास गए जिन्होंने कहा कि उसमें बाप के रोल में अशोक कुमार को लेंगे और बेटे के रोल में दिलीप कुमार को. अब्बास राज़ी न हुए. नर्गिस को मालूम पड़ा कि कहानी नायाब है. उसने राज कपूर को बताया. राज कपूर अब्बास से मिलने उस होटल में गया जिसमें अब्बास आठ आने प्रति रात्रि एक खटिया पर सोते थे. राज कपूर की जेब में बयाने के लिए डेढ़ रुपये थे लेकिन अब्बास ने कहा कि इसे लौटने के किराये के वास्ते बचा ले जाओ. राज कपूर के अतिनाटकीय पापाजी पृथ्वीराज कपूर फिल्म के लिए राज़ी होंगे या नहीं इस पर भी सस्पैन्स रहा.
‘आवारा’ ने इतना इतिहास रचा जो कई सदियों पर भारी है. बेशक़ उसमें कुछ मेलोड्रामा है और कोर्ट-सीन को चीख़-पुकार के साथ खींचा गया है लेकिन वह शायद भारत की पहली ‘आधुनिक’ ‘वयस्क’ फिल्म है, जिसने सोवियत संघ और तत्कालीन कई पूर्वी और पश्चिमी विकासशील देशों के दर्शकों, सिनेमा और संगीत पर गहरा असर डाला और राज कपूर–नर्गिस की जोड़ी को भारत में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता दी. बेशक़ ‘आवारा’ के हर 35 मि.मी. पर राज कपूर की मुहर है लेकिन खुद राज कपूर के किरदार पर अब्बास की अमिट छाप है. उसके बाद राज कपूर पहले जैसा नहीं रहा और जितना उसने बदलने की कोशिश की, ‘आवारा’ जैसा होता गया.
‘आवारा’ में अब्बास ने राज कपूर के किरदार को कैसा गढ़ा था यह देखते हुए नर्गिस ने 1952 में अब्बास से गुजारिश की वह उनके लिए एक ख़ास फिल्म लिखें और डायरेक्ट करें जिसमें बेशक़ हीरो राज कपूर ही रहे लेकिन नायिका के रूप में उनकी भूमिका ऐसी हो जैसी  पहले किसी हीरोइन की नहीं रही. अब्बास ने ठीक वही, बल्कि उससे ज़्यादा, कर दिखाया. ‘अनहोनी’ न सिर्फ़ पहली नारी-मनोवैज्ञानिक फिल्म थी बल्कि नायिका के ‘डुअल रोल’ वाली पहली ऐतिहासिक भारतीय फिल्म भी थी. हालाँकि नर्गिस बहुत बाद में ‘रात और दिन’ में भी ऐसी ही दुहरी भूमिका निभाने वाली थीं लेकिन ‘अनहोनी’ में अब्बास का यह करिश्मा खेल बदल देने वाला था. नर्गिस की वह भूमिका और अदाकारी कुछ महानतम उपलब्धियों में शुमार की जाती है और महिला-एक्टिंग की एक ‘प्रैक्टिकल’ पाठ्य-पुस्तक या ‘मास्टरक्लास’ की तरह है. सच तो यह है कि ‘अनहोनी’ में राज कपूर के साथ यह अनहोनी हुई कि वह नर्गिस के सहायक अभिनेता की तरह नज़र आया. लेकिन वह ज़माना पूर्णरूपेण टुच्चे ईगोटिज्म का न होकर कुछ ‘महान विचारों’, चुनौतियों तथा फ़न और हुनर को समर्पण का भी था. ध्यान रहे कि यह अब्बास की पहली aut फिल्म थी. 1952 में ’आन’, ’बैजू बावरा’, ’जाल’ और ‘दाग’ के बाद ‘अनहोनी’ ने बॉक्स-ऑफिस पर सबसे ज़्यादा कमाई की थी, हालाँकि वह 1950 के ‘आवारा’ से बहुत कम थी लेकिन फिल्म हिट थी.
अब्बास के फ़िल्मी जीवन में एक पैटर्न देखा जा सकता है. उन्होंने बीसियों फिल्मों का निदेशन किया और उस हैसियत से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की लेकिन उस अहंकार में उन्होंने कभी-भी दूसरों के या ‘दूसरे’ सिनेमा के लिए कहानियाँ, पटकथा या संवाद लिखने से गुरेज़ नहीं किया. इसके पीछे एक मार्क्सवादी श्रमजीवी का ‘प्रोफ़ेशनलिज्म’ तो था ही, साथ में अपनी फ़िल्में अपनी कमाई, अपनी शर्तों और अपनी मर्जी से बनाने की एक प्रतिबद्ध रणनीति भी थी. उनके नाम से जुड़ी हुई कोई भी फिल्म यदि चर्चित या सफल होती थी तो उस ख्याति का फ़ौरन फ़ायदा उठा कर वह अपनी कोई नई फिल्म की घोषणा कर देते थे जिसमें अपनी यत्किंचित् पूंजी तो लगाते ही थे, पुराने या नए मित्रों, प्रशंसकों, आशावादी फ़िनान्सिअरों से भी पैसे उगाह लेते थे. यह उन्हीं की सूझ-बूझ नहीं थी, अनेक मुसीबतज़दा निर्माता-निदेशक आज भी ऐसा ही करते हैं. एक तो वह निस्बतन सस्ती फिल्मों का ज़माना था, दूसरे अब्बास को भी (कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा) किफ़ायती फ़िल्में बनाना आता था. दरअसल वह वाजिब लागत की फ़िल्में ही बनाना चाहते थे. उनकी कुछ फ़िल्में अच्छी चलीं, कुछ अपनी लागत ही वसूल कर पाईं लेकिन बहुत कम इतनी नाकामयाब हुईं कि अब्बास दीवालिया होकर सड़क पर आ जाते.
1953 की फिल्म ‘राही’ शायद उनकी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्मों में गिनी जाए. ब्रिटिश-कालीन चाय बागान की पृष्ठभूमि पर आधारित अपने प्रगतिशील-युग के मित्र मुल्कराज आनंद के विख्यात अंग्रेज़ी उपन्यास ‘टू लीव्ज़ एंड अ बड’ पर बनाई गई इस फिल्म में उस ज़माने की बॉक्स-ऑफिस जोड़ी देवानंद-नलिनी जयवंत और हिंदी फिल्मों के पहले और आख़िरी कम्यूनिस्ट और महान अभिनेता बलराज साहनी ने काम किया था और संगीत अनिल बिस्वास का था जिनकी फिल्म के शीर्षक पर आधारित कालजयी धुन ‘इस पल रुक जाना, जाने वाले राही’ और उपन्यास के शीर्षक पर आधारित कोरल  थीम-सॉंग ‘इक कली दो पतियाँ जाने हमरी सब बतियाँ’ पुराने नहीं पड़े हैं. कहा जाता है कि फिल्म टिकट-खिड़की पर मक़बूल रही थी लेकिन याद नहीं आता कि हमारे क़स्बे छिन्दवाड़ा तक पहुँची हो. उसके बाद, दुर्भाग्यवश, अब्बास ने बिना गानों की शायद पहली फिल्म ‘मुन्ना’ बनाकर एक जुआ खेला लेकिन पाँसे उलटे पड़े. फिल्म असफल रही पर इस योग्य समझी गई कि लन्दन में ‘पथेर पांचाली’ के साथ दिखाई जाए और पॉल रोथा उसकी सराहना करें. बहुत बाद में चेतन आनंद ने ‘मुन्ना’ की कहानी का इस्तेमाल ‘आख़िरी ख़त’ के लिए किया जो अपने अमर गीत ‘बहारो,मेरा जीवन भी संवारो’ के साथ सफल रही.
‘आवारा’ के सुपर-हिट कहानी-पटकथा-संवाद के यौगिक को दुहराते हुए राज कपूर ने 1955 में यह तिहरी ज़िम्मेदारी फिर अब्बास को सौंपी, जिसका अज़ीमुश्शान नतीज़ा था ‘श्री 420’, जो ‘आवारा’ से कहीं बेहतर फिल्म तो है ही, आज साठवें साल में भी इतनी अकाट्य है कि उससे एक फ़्रेम, एक शॉट, एक डायलॉग, एक आइडिआ निकालना लगभग असंभव है. ‘आवारा’ आज एक सीमित, आरोपित और ‘लेबर्ड’ समस्या लगती है जबकि ‘श्री 420’ अपने पहले चंद लम्हों में ही सर्वहारा और पूंजी के चिरंतन द्वंद्व में कूद पड़ती है. 1955 में अलाहाबाद यूनिवर्सिटी का सिर्फ़ एक गोल्ड मैडलिस्ट मुड़-मुड़ के न देखने के लिए सेठ सोनाचंद धर्मानंद की पत्तेबाज़ बम्बैया ‘दोल्चे वीता’ दुनिया द्वारा निगल लिया गया था, आज लाखों राज इसीलिए सुनहरी तमग़ा पाना चाहते हैं कि कैम्पस पर ही ‘बॉडी स्नैचर्स’ उन्हें आकर तिब्बत में सोने की ‘स्कैम’ दुनिया में ले जाएँ, उनके द्वारा लाखों को करोड़ों-अरबों से ठगा जाए, अपने निजी घर के सपने दिखलाकर नौदौलतिए सिन्धी, पंजाबी, मारवाड़ी बिल्डर मुंबई के झोपड़पट्टीवालों को फ़ुटपाथों पर फेक दें, ईमानदार, मेहनती निम्न और मध्यवर्गीय सुफ़ैदगरेबानों की ज़िंदगी-भर की जमा-पूंजी लूट कर चम्पत हो जाएँ.
अब्बास और राज कपूर के परस्पर बहुविध सहयोग का गहरा विश्लेषण शायद अब तक हुआ नहीं है. ‘आवारा’, ‘अनहोनी’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘चार दिल चार राहें’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘बॉबी’ और (मरणोपरांत) ‘हिना’ के माध्यम से अब्बास ने बतौर निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के राज कपूर की, और एक निर्माण-गृह के रूप में आर.के.फिल्म्स की, जो छवि राष्ट्रीय-वैश्विक स्तर निर्मित की वह हिंदी फिल्म के इतिहास में अद्वितीय संगत है. दुर्भाग्य यह है कि इस चार दशक लम्बे साथ पर न तो राज कपूर ने सविस्तार लिखा और न अब्बास ने, और हमारे मित्र जयप्रकाश चौकसे तो दोनों को ख़ूब जानते हुए भी  ‘भास्कर’ के अपने प्रेम-लपेटे अटपटे कॉलम में ही मगन हैं. बहरहाल, ‘आवारा’ का शीर्षक भले ही चैप्लिन के ‘ट्रैम्प’ से प्रेरित हो, उसमें राज कपूर का किरदार मार्लन ब्रैंडो या जेम्स डीन के ज़्यादा करीब है लेकिन वह पहले ही दिलीप कुमार का इलाका बन चुका था, इसलिए ‘श्री 420’ में अब्बास ने मूलतः वामपंथी चार्ली चैप्लिन से सीख कर राज कपूर को जो पहली बार आपादमस्तक ‘चैप्लिनिस्क’ ‘कॉमिक हीरो’ बनाया उसने उनकी वह छवि सदा-सर्वदा के लिए पेटेंट कर दी. यूँ राज कपूर जब भी अपनी वाली पर आते थे तो दिलीप की टक्कर के ट्रैजिक हीरो भी बन जाते थे – ‘श्री 420’ में ही उनका एक पुराना मुखौटा उतारने और नया पहनने का सीन है जो लाजवाब है, और फिल्म के टाइटिल्स के पीछे ग्रीक ट्रैजिक-कॉमिक मास्कों का बहुत सार्थक इस्तेमाल किया गया है - लेकिन उनमें थोड़ी रूमानियत रहती ही थी, दिलीप-जैसा अस्तित्ववादी ‘मिस्टीक’ आ नहीं पाता था.
‘श्री 420’ में चार्लियत और चैप्लिनीयता के इतने तत्व हैं कि उस पर सिनेमा में एम.फ़िल. की एक तुलनात्मक शोध-निबंधिका लिखी जा सकती है. अब्बास में यदि राज कपूर के क़द-बुत, शरीर-भाषा, सलाहियत, प्रतिभा वगैरह की समझ न होती और राज कपूर अब्बास के दिमाग़ और ‘कमिटमेंट’ को जान न पाया होता तो यह फिल्म जैसी बनी है वैसी बन ही न पाती. इसमें छोटे-से-छोटा ‘केमिओ’ या ‘एक्स्ट्रा’ तक लगता है हमारे छिन्दवाड़ा के कुशल, अब दिवंगत, ‘मास्टर-क्राफ्ट्समैन’ छुट्टू कुम्हार द्वारा अपने चाक पर गढ़ा गया है. मैं इसे राज कपूर की सबसे बड़ी फिल्म मानता हूँ लेकिन अब्बास की लेखनी के बिना यह इतनी बुलंदी छू ही नहीं सकती थी. अब्बास के बगैर भी राज कपूर ने सफल फ़िल्में बनाईं मगर  उनमें सार्थकता और बौद्धिक कलात्मकता का अभाव ही रहा. आज साठ वर्ष बाद भी ‘श्री 420’ का जादू कम नहीं हुआ है, जिसमें संगीत की अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन अब्बास की महान उपलब्धि है पूंजीपति खलनायक सेठ सोनाचंद धर्मानंद का किरदार, जिसके लिए नीमो को मानों स्वयं ईश्वर ने अपने हाथों से रचा था. उन्हें ‘कास्ट’ करने का कमाल किसका था यह मालूम नहीं लेकिन अब्बास ने नीमो को जो शख्सियत, दृश्य और संवाद दिए हैं वह अद्भुत हैं. उनका ‘पीपलीनगर में कपड़े ही कपड़े हैं’ और ‘नो,राज,नो’ कहने का अंदाज़ बेमिसाल है. 1955 में पता नहीं कितने सेठ सोनाचंद थे, आज तो हर कॉर्पोरेट हाउस, अखबार और टीवी चैनल का सी.ई.ओ. उसका वंशज नज़र आता है. अब्बास ने अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता से ‘श्री 420’ को कितना मालामाल किया है, इसका भी विश्लेषण अभी होने को है. सेठ सोनाचंद धर्मानन्द से अधिक ‘कम्प्लीट’ खलनायक हिंदी परदे पर फिर दिखाई न दिया. सिर्फ़ नीमो के लिए यह फिल्म बार-बार देखी जानी चाहिए.
‘जागते रहो’ में राज कपूर का एकमात्र, अंतिम एकालाप फिल्म का खुलासा है. उसके बाद अब्बास ने सोवियत संघ के सहयोग से निर्मित अपनी महत्वाकांक्षी हिंदी-रूसी फिल्म ‘परदेसी’ का पटकथा-लेखन-निदेशन किया, जिसके रूसी रूपांतर के निदेशक वासिली प्रोनीन थे. अफ़ानासी निकीतीन नामक एक ईसाई रूसी व्यापारी, जो भारत आने वाला दूसरा यूरोपीय व्यक्ति था, 15वीं सदी में किसी तरह महाराष्ट्र. कहते हैं आज की मुंबई के पास के एक गाँव में, पहुँच सका और तीन बरस इस देश में रहा. निकीतीन का मृत्यु-वर्ष 1472 ही मालूम है. उन दिनों उत्तर-पश्चिमी दक्षिण भारत पर देश की पहली आज़ाद मुस्लिम, बहमनी, सल्तनत का निज़ाम था जो दिल्ली के मोहम्मद बिन तुग़लक़ से बग़ावत के बाद वुजूद में आई थी. निकीतीन ने अपने भारत-प्रवास पर रूसी में ‘खोषदेनिए ज़ा त्री मोर्या’ (‘तीन समन्दरों का सफ़र’) शीर्षक से  बहुत दिलचस्प और मूल्यवान संस्मरण लिखे हैं और ऐसा शक़ किया जाता है कि वह (सुन्नी) मुस्लिम हो गया था. बहरहाल, वह वाक़ई भारत-रूस संबंधों का पहला, असली प्रतीक और प्रतिनिधि है. ‘परदेसी’ ऐतिहासिक नहीं, तत्कालीन सामाजिक फिल्म है जिसमें अफ़ानासी को एक मराठी, हिन्दू युवती चंपा की मुहब्बत की गिरफ़्त में दिखाया जाता है. ओलेग स्त्रीषेनौफ़, जिन्होंने निकीतीन की भूमिका निबाही थी, के बारे में अब तक पता नहीं चल सका है कि सोवियत संघ में उनकी ख्याति क्या थी – दरअसल भारत में देखे गए वह पहले और अंतिम रूसी हीरो थे – लेकिन चंपा का किरदार नर्गिस को मिला जिनसे उनकी ‘आवारा’ की घनघोर लोकप्रियता की वजह से लगभग हर सोवियत नागरिक परिचित था.
‘परदेसी’ जैसी फ़िल्मों की क्या मजाल कि वे सारे जहाँ से अच्छा अरुण यह मधुमय देश हमारा में चल भी पाएँ लेकिन अपरिचित, कमज़ोर, दढ़ियल, रूसी हीरो के बावजूद वह दिलचस्प है. नर्गिस, पद्मिनी, पृथ्वीराज कपूर और डेविड तो उसमें हैं ही, लोकशाहीर की भूमिका में बलराज साहनी और अनिल बिस्वास के संगीत पर गाया गया प्रेम धवन रचित उनका मन्ना डे और शुरूआती कोरस वाला उद्बोध-गीत ‘भई तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया’, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, अविस्मरणीय हैं. सोवियत सहयोग के कारण ‘परदेसी’ पहली भारतीय रंगीन वाइड-स्क्रीन सिनेमास्कोप फिल्म होने का श्रेय भी प्राप्त कर सकी. ‘अलविदा’ के लिए रूसी शब्द ‘दस्वीदान्या’ पहली बार इसी में सुना गया. इसके बाद अब्बास साहब ने ‘ज़िन्दगी या तूफ़ान’ जैसी अकालकवलित फिल्म के कहानी-संवाद लिखकर खुद को रुसवा किया.
उनके करिअर में ऐसे उतार-चढ़ाव आते ही रहे. ऐसा लगता है कि उनके भीतर जो क्लासिकी ‘एजिटप्रॉप’ कॉमरेड बैठा हुआ था उस पर जल्द नतीज़े और असर का शैदाई मुसन्निफ़-अख़बारनवीस ज़्यादा हावी था और वह उससे जाने-अनजाने कतराते थे, या उसकी परवाह नहीं करते थे, जिसे वह अपने लिए ज़रुरत से ज़्यादा ‘कलात्मकता’ या ‘कलावादिता’ समझते रहे होंगे. मैं राज कपूर को अब्बास का एक शरारती, तेज़ शागिर्द ही समझता हूँ जो जब-जब करें इरादे अपने उस्ताद की क्लास में जा बैठता भी था और ‘बंक’ भी करता रहता था. दरअसल अब्बास को शायद राज कपूर से लोकप्रिय कला का हुनर सीखना चाहिए था और राज कपूर को अपनी ग़ैर-अब्बासीय फिल्मों में उन-जैसा ‘कमिटमेंट’. इस पर बहस हो सकती है कि यदि राज कपूर (या बिमल रॉय,या हृषीकेश मुखर्जी) ‘राही’, ’ग्यारह हज़ार लड़कियाँ’, ‘शहर और सपना’, ‘आसमान महल’, ‘बंबई रात की बांहों में’, ‘सात हिन्दुस्तानी’, ‘द नक्सलाइट्स’ या ‘लव इन गोआ’ जैसी फ़िल्में बनाना चाहते तो क्या उनमें ज़्यादा ‘सफल’ रचाव-बसाव नहीं होता?
ऐसी सारी यदिकिन्तुवादी अटकलबाज़ी के बावजूद यह लगभग तय है कि 1959 में ‘चार दिल चार राहें’ जैसी प्रतिबद्ध किन्तु प्रयोगशील फिल्म बनाने की ख़ुद्कुशीपज़ीर दीवानगी सिर्फ़ अब्बास में थी. एक चौरस्ते पर तीन प्रेम कहानियाँ और एक शहादत की कथा – चारों में कोई सम्बन्ध नहीं – रेखागणित की तरह एक-दूसरे को अनजाने काटती हुई अपनी-अपनी कभी सफल कभी असफल राहों पर निकल जाती हैं. बहुत कम लक्ष्य किया गया है कि राज कपूर–मीना कुमारी की प्रेम-कथा हिन्दू सवर्ण उत्तराधिकारी और अनुसूचित जाति-बाल विधवा  की है, अजीत एक भोला-भाला दोटूक पठान मोटर-चालक और निम्मी एक ‘संभ्रांत’ तवायफ है, शम्मी कपूर एक अनाथ ईसाई युवक है और कुमकुम एक ग़रीब और शोषित आया, और जयराज अपनी जान से ज़्यादा अपने आन्दोलन से मुहब्बत करनेवाला सक्रियतावादी. गाँव की खापें और राज कपूर का अहीर-चौधरी परिवार शादी के ख़िलाफ़ हैं लेकिन हिंदी फिल्मों के एक महानतम दृश्य में दूल्हा बना हुआ अकेला राज कपूर एक मशाल और एक ढोलची के साथ संकरी गलियों से चौड़े-धाड़े धमधमाता गुज़रता हुआ अपनी दुल्हन मीना कुमारी को लिवाने जाता है. शम्मी कपूर ने एक छोटी-सी भूमिका में अपने जीवन की पहली और अंतिम मार्मिक एक्टिंग की है. मीना कुमारी, निम्मी, कुमकुम, अजीत सभी अपने उरूज पर हैं. साहिर ने मुकेश के लिए ‘नहीं किया तो करके देख’ और लता के वास्ते ‘इन्तिज़ार और अभी’ जैसे गीत लिखे हैं जिन्हें अनिल बिस्वास ने अमर कर दिया है. लेकिन फिल्म को चलना नहीं था सो नहीं चली. ‘बॉबी’ चली जिसने नौबालिग़ ऋषि कपूर-डिंपल को और अधेड़ प्रेमनाथ को स्टार बना दिया, और ज़ेबा बख्तियार को भारत में ‘हिना’ ने. कहानियाँ अब्बास की थीं.
1942-1980 के बीच अब्बास को सिनेमा के लिए दर्ज़नों छोटे-बड़े सम्मान और पुरस्कार मिले. उनकी कई फ़िल्में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों के चक्कर लगाती रहीं. उन्होंने सिने-संसार को अनेक प्रतिभाएं दीं. लेकिन एक दोस्त फिक्रमंद बाप ने उन्हें ख़त लिखा कि उसका बेटा फिल्म-लाइन में स्ट्रगल कर रहा है, हो सके तो उसे कैसा भी कोई चांस दो. बाप खुद कोई मामूली आदमी नहीं था, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के रिश्तेदार-जैसा था. सो अब्बास ने अपने दोस्त हरिवंशराय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन को एक नौजवान बिहारी मुस्लिम शायर अनवर अली ‘अनवर’ के किरदार में 1969 में ‘सात हिन्दुस्तानी’ में ‘ब्रेक’ दिया. यह एक पूरी तरह सेauteur फिल्म थी. आज की नई दर्शक पीढ़ी, जो ख्वाजा अहमद अब्बास को न जानती है, न जानना चाहती है क्योंकि शायद जानने की सलाहियत नहीं रखती, इसी से तरद्दुद में पड़ सकती है कि अमिताभ बच्चन को ‘डिस्कवर’ करने वाले इस ख्वाजा को कैसे डिस्कवर किया जाए. जबकि खुद अब्बास ने अमिताभ की अपनी ‘खोज’ को कभी तूल नहीं दिया. वह तो उनके कारनामों की किताब में महज़ एक दिलचस्प, शायद ज़रूरी भी, फ़ुटनोट है. दूसरे तो इससे एक पूरी तिजारत कर लेते. देखा जाए तो खुद अब्बास आजीवन कई स्तरों पर एक महान स्ट्रग्लर रहे. ‘द नक्सलाइट्स’ सरीखी बाद की फिल्म को लेकर भी, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती और स्मिता पाटिल थे और इंदिरा गाँधी तब जीवित थीं, वह परेशानी में पड़ चुके थे. उनकी मृत्यु से पहले ही भारतीय सिनेमा में उन जैसा कोई दूसरा प्रतिबद्ध फिल्मकार नहीं था और उनके बाद, विशेषतः अब, सुदूर भविष्य में भी, किसी युवा अब्बास की कल्पना कठिन है. यह ज़रूर है कि उनकी फिल्मों को, उनके पैग़ामों को, जो कई मुक़ाबलों और संघर्षों में हौसलाअफ़ज़ा और कारगर रहेंगे, नेस्तनाबूद कर पाना नामुमकिन साबित होगा. अगले सौ बरसों तक हमें एक बड़ा सहारा ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्मों का भी है