सोमवार, 20 अगस्त 2012

सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्‍या करेगा- दूसरी किश्‍त

वक्तव्यः अगला हिस्सा
भोपाल, 16 अगस्त 2012


सांस्कृतिक विकृतीकरण फासीवाद का ही पूर्वरंग है
(सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगाः दूसरी किश्त)

हमारे पिछले वक्तव्य पर साहित्य-समाज में विपुल सहमति से स्पष्ट है कि खासतौर पर मध्यप्रदेश में साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में पैदा किये गये और लगातार पैदा किये जा रहे नये-नये संकटों के प्रति एक व्यापक चिंता है। साथ ही प्रतिरोधात्मक कार्रवाही के लिए अधिकांश रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों में बेचैनी है और प्रतिवाद भी। तमाम अग्रज और युवा रचनाकार साथियों के समर्थन के प्रति कृतज्ञता के साथ, अब हम उनके सुझावों की रोशनी में कुछ बातें जोड़ना चाहते हैं और कुछ बिंदु अधिक स्पष्ट कर देना चाहते हैं जिससे प्रतिरोध को तीक्ष्ण किया जाकर, उसे कुछ और विस्तृत आधार दिया जा सके।

1. मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार के संस्कृति विभाग के अधीन कार्यरत समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों यथा अकादमियों, परिषदों, सृजनपीठों और भारत भवन न्यास के कार्यकलापों एवं नीतियों के ख़िलाफ़ हमारा विरोध सकारण है और साफ तौर पर वैचारिक भी। लेकिन यह सिर्फ भारत भवन न्यास के विरोध तक सीमित नहीं है, जैसा कि वातावरण बनाया गया है। लेकिन हम भलीभांति परिचित हैं कि भारत भवन न्यास भी म.प्र. सरकार के सुविचारित, राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेण्डे के तहत काम करनेवाली संस्था है। यह भी कहा जा सकता है कि वह म.प्र. सरकार की सांस्कृतिक-राजनीतिक नीतियों पर एक मुखौटा है जो बेहद चालाकी के साथ, कुछ महत्वपूर्ण और मान्य रचनाकारों की सहभागिता को प्रेरित और नियोजित कर, वर्तमान सरकार की ढकी-छिपी मंशाओं के कलुष और राजनीतिक इरादे को छिपाने की कोशिश कर रहा है। (कुछ समय पहले तक यहाँ के न्यासियों में चल रही अन्तर्कलहों ने भी इसे निर्लज्जता के साथ उजागर कर दिया था।) बहरहाल, संस्कृति विभाग के अधीन संस्थाओं में कार्यरत किसी भी कर्मचारी-अधिकारी से हमारा किसी प्रकार का व्यक्तिगत विरोध नहीं है, अगर कोई ऐसा मानता है तो यह उसकी नासमझी है, भ्रम है और मूल मुद्दे से भटकाने की हास्यास्पद कोशिश है। हम संस्कृति विभाग के सभी उपक्रमों, पत्रिकाओं और निकायों का अपने विचारधारात्मक कारणों से विरोध करते हैं। विगत आठ नौ वर्ष पूर्व तक महत्वपूर्ण मानी जाने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘साक्षात्कार’ से दूरी भी इसी बात का एक और सहज प्रमाण है।

2. जैसा कि पिछले वक्तव्य में कहा था कि हमारा मुख्य विरोध इन संस्थाओं के राजनीतिक रूपांतरण को लेकर है। कुछ लोग इन स्थितियों के प्रति आँखें बंद कर लेना चाहते हैं, उनसे हम कहना चाहते हैं कि आज प्रतिवाद की जितनी जरूरत है, उतनी ज्यादा शायद पहले कभी नहीं थी। अन्य प्रदेशों में भी ऐसी ही स्थितियाँ बनी हैं और वहाँ भी प्रतिरोध की जरूरत बढ़ती जा रही है। सांस्कृतिक विकृतीकरण फासीवाद का ही पूर्वरंग है। इसलिए अकादमियों, न्यासों, परिषदों और सृजनपीठों पर नीमहकीम, असाहित्यिक, कलाविहीन, वैचारिक रूप से दरिद्र और दक्षिणपंथी लोगों को बैठाया जाता है तो उसका संज्ञान लेना ज़रूरी है। यदि यह राजनीतिक एजेंडे के तहत किया जा रहा है तो मामला अधिक गंभीर हो जाता है। महज अपनी पसंद का आदमी बैठाया जाना और अपनी विचारधारा के आदमी को पदासीन कराना, इन दो चीजों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। हम स्मरण कर सकते हैं कि फासिज्म को संस्कृति के औजारों से लागू करना एक पुराना लेकिन धोखादेह कारगर तरीका रहता आया है। साथ ही, हिन्दी भाषा और साहित्य के उन्नयन और सांस्कृतिक-साहित्यिक अस्मिता को बनाने, बचाने के लिये स्थापित अनेक संस्थाएँ, यथा सम्मेलन और प्रचारिणी सभाएँ भी आज ऐसे लोगों का अड्डा बन कर रह गयी हैं जिनका हिन्दी या उसके साहित्य से दूर का भी रिश्ता प्रतीत नहीं होता। उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली या राजस्थान का दृश्य भी मध्यप्रदेश से बहुत अलग नहीं है। हम रेखांकित करना चाहते हैं कि समय आ गया है जब हिन्दी भाषा और साहित्य-हित के लिये बनाई गयी तमाम संस्थाओं की दुर्दशा और विरूपीकरण की कोशिश के ख़िलाफ़ एक समुचित प्रतिरोधात्मक कार्रवाही भी लेखकों और संस्कृतिकर्मियों द्वारा शुरू की जाये।

3. यह वक्तव्य न तो पहले हस्ताक्षर अभियान था और न अब है। हमने अनुरोध करते हुए इन स्थितियों के प्रति ध्यानाकर्षण किया था कि रचनाकार साथी इस सारी स्थिति पर विचार करते हुए तय करें कि वे किसके साथ हैं, क्योंकि हम आश्वस्त हैं कि तमाम सुविज्ञ साहित्य संस्कृतिकर्मी अपनी पक्षधर्मी विवेक चेतना से अपना निर्णय लेने में सक्षम हैं। लेकिन हम कोई याचनापत्र जारी नहीं कर रहे हैं और न ही किसी तरह का कोई नेतृत्व करने की लालसा यहाँ है। हम सिर्फ हमारा वैचारिक और विचारधारात्मक पक्ष रख रहे हैं। दक्षिणपंथी राजनीति और उसकी सरकारों के प्रति हमारा रुख हमेशा से ही स्पष्ट है।

4. पूंजीवादी-लोकतान्त्रिक और दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों की सरकारों की हमारी आलोचना, उनसे हमारा सम्बंध और संघर्ष हमेशा ही विचारधारात्मक होगा। लेकिन अन्यान्य विचारों के महत्वपूर्ण रचनाकारों के अवदान के प्रति हमारा आदर और कृतज्ञता कभी भी औछी नहीं रही है। हमारा विरोध साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को पर्देदारी के साथ जनविरोधी, राजनीतिक मंशाओं के उपक्रम बनाये जाने से है। हमारा विरोध वस्तुतः साहित्य संस्कृति की सार्वजनिक संस्थाओं के विकृतिकरण और उन पर अयोग्य व्यक्तियों के काबिज़ होने से है। हम जानते हैं कि वैचारिक आधार पर प्रतिरोध के दौरान औसतन तीन तरह के लोग सामने आते हैं। एक वे, जिनका प्रतिरोध की लंबी परंपरा के सुसंयोग के कारण फिलहाल हिन्दी के दृश्य में बहुलांश है, जो प्रस्तुत स्थितियों पर गंभीरता से विचार करते हुए बहुत ठोस आधार पर समर्थन देते हैं। दूसरे, वे जो अपनी दक्षिणपंथी या वामविरोधी वैचारिकता के कारण स्पष्ट तौर पर एक विपक्ष बनाते हैं। और तीसरे वे, जो कहीं नहीं रहना चाहते, जो कहीं भी प्रतिबद्ध नहीं हैं, जो हर बात को चुटकुले में, अंगभीरता और चलताऊ टिप्पणी में बदल देना चाहते हैं ताकि वे अपनी प्रतिभाहीनता के साथ कोई सेंध लगा सके, गुब्बारे लपक सकें। वे हर प्रतिबद्ध लड़ाई को अपने निजी मौके या निजी शत्रुता की तरह ही देख पाते हैं अथवा मजावादी वातावरण बनाने की कोशिश करते हैं। यह भी दिलचस्प है कि इधर इनके साथ ऐसे भूतपूर्व मार्क्सवादी, संप्रति उत्तर-आधुनिक, पॉपुलर संस्कृति के समर्थक भी प्रकट हुए, जिनके पास विचार और भाषा की गजब दरिद्रता है लेकिन वे हर जगह अपनी प्रकृति के अनुरूप हास्यास्पद या विचारहीन टिप्पणी करते हैं। वे वाहन में जुते न होकर भी उसे खींचने के भ्रम में रहते हैं। उनसे हमारा निवेदन है कि महोदय, आसमान आपकी टांगों पर नहीं टिका है, इन्हें नीचे कर लीजिये वरना इनका अन्यथा अर्थ भी प्रकट ही है। इनमें से पहले वर्ग के साथी हमारे नैसर्गिक मित्र हैं ही। अन्य से संघर्ष है और रहेगा, इसमें न हमें कभी संदेह था, न अब है। तमाशबीनों से हम सिर्फ इतना कहेंगे कि इतिहास किसी को क्षमा नहीं करता।

5. किसी भी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था में सहभागिता का निर्णय आधारहीन नहीं हो सकता। वह एक सचेत, सजग और वैचारिक निर्णय होता है, अवसरवादी नहीं। हम न तो अंध विरोध करना चाहते हैं न अंध समर्थन। लोकतान्त्रिक संस्थाओं का फासीवादी रूपांतरण किया जायेगा तो हम उसका विरोध करेंगें। प्रतिवाद का यह न पहला मौका है और न अन्तिम। हम विश्वास करते हैं कि सही लक्ष्य के लिये उठी धीमी और एकल आवाज़ें भी जरूरी होती हैं। समय-समय पर वामपंथी लेखक संगठनों द्वारा भी प्रतिरोध के निर्णय लिए ही गए हैं, जो वर्तमान में भी लागू हैं। अनेक बार संस्थाओं के बहिष्कार हुए हैं, फिर आवाजाही हुई है और जरूरत पड़ने पर फिर प्रतिवाद किया गया है। इस तरह का कोई भी विरोध स्थिर या व्यक्तिगत नहीं होता। कई बार लेखकों का एक समूह भी निर्णय लेता है, उसे अनेक साथी आगे बढ़ाते हैं और सोच समझकर अपनी तरह से शरीक होते हैं या उतना ही सोच समझकर कुछ लोग प्रतिरोध में शामिल नहीं होते। इसमें विचित्र कुछ भी नहीं, न ही कोई अंतर्विरोध है। यह सुखद है कि जन विरोधी, साहित्य-संस्कृति विरोधी एवं फासीवादी सत्ता संरचनाओं के विरुद्ध प्रतिरोध की परंपरा वर्तमान तक चली आती है और हम उसके हिस्से है। लेकिन यहाँ यह भी याद किया जा सकता है कि दुनियाभर में ऐसी सत्ता-संरचनाओं का विरोध करने में जब-जब भी लेखकों ने कोताही बरती है तब तब उसके दुष्परिणाम समाज के सामने आए हैं।

6. लगभग नौ बरस पहले ही हमने इन संस्थाओं में सहभागिता नहीं करने का निर्णय ले लिया था। तबसे हम लगातार मध्यप्रदेश सरकार की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की गतिविधियों को देखते रहे हैं। समय-समय पर स्थानीय स्तर पर इनका विरोध भी करते रहे हैं लेकिन हमें लगा कि अब इस विरोध को व्यापक और अधिक प्रभावी बनाये जाने का समय आ गया है। सबकी तरह हमारी भी कुछ सहज सीमाएँ हैं। यह संभव भी नहीं कि सारी खबर कुल दो-चार लेखक ही रखें और हर विषय को, सांस्कृतिक प्रतिरोध के किसी एक पर्चे में और एक ही वक्तव्य का हिस्सा बना दें। हम विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे जनांदोलनों में भी सामर्थ्यभर हिस्सेदारी करते रहे हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि समाज के अन्य संकटों के सामने संस्कृति के संकट को कमतर करके देखा जाये या जिस समय अन्य क्षेत्रों में जनविरोधी गतिविधियाँ हो रही हों तब संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र के संकट पर चुप लगा ली जाये। यह सोच एक उग्र बचकानेपन से ज्यादा कुछ नहीं है। हम चाहते हैं कि सभी प्रदेशों के रचनाकार साथी अपने प्रदेश की ऐसी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के विरूपीकरण के विरोध के लिये प्रतिरोध की कार्रवाही की शुरूआत करें। कुछ व्यापक कार्य हर जगह, हर शहर, प्रत्येक लेखक संगठनों, साथियों और एक्टिविस्ट लोगों की सामूहिकता और पक्षधर पहलकदमी से संभव है। जो हमसे छूट रहा है, उसे वे पूरा करें। हम हर ऐसे विरोध में साथ होगें।

एक बार फिर सभी रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों से आग्रह करते हैं कि इस भयावह होते जाते संकट को कम करके न आँके। सोचें और प्रतिरोध की रणनीति तय करें। मुक्तिबोध के सवाल को यहाँ फिर पूछा जाना अप्रसांगिक न होगा कि तय करो कि तुम किसके साथ हो? और यह भी कि पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?


 राजेश जोशी              
एम-11, निराला नगर, भदभदा रोड,     भोपाल, मप्र 462003       ,       
   दूरभाष  0755-2770046    rajesh.isliye@gmail.com                
                             
 कुमार अम्बुज   सी-10, गुलमोहर बिल्डिंग, तृतीय तल, ग्रीन मैडोज, अरेरा हिल्स, जेल रोड  भोपाल, मप्र  462011 मोबाइल 09424474678    kumarambujbpl@gmail.com 

  नीलेश रघुवंशी,  ए-40, आकृति गार्डन,  नेहरू नगर,   भोपाल, मप्र 462003    मोबाइल- 09826701393      neeleshraghuwanshi67@gmail.com          

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को


मोहन राणा की यह कविता 'पानी का रंग', ब्‍लॉग जानकीपुल से साभार। 
दस पंक्तियों की इस कविता ने अपनी सघनता और उत्‍कटता से मुझे घेर लिया है। 
अपने कुल संयोजन में यह श्रेष्‍ठ कविता की अपेक्षा को जैसे लगभग पूरा कर देती है।


पानी का रंग

यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज़ पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुज़र चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से

कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,

शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज़ तब पानी के रंग की होगी।
0000
 

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा

विशेष अनुरोध
चूँकि इस वक्तव्य को प्रसारित करने की हमारी अपनी निजी सीमाएँ हैं, इसलिए सभी साथियों, पत्रकारों, संपादकों और ब्लॉगर्स से हमारा अनुरोध है कि वे इसे अपने-अपने माध्यम से अधिकतम लोगों तक पहुँचाने में सहयोग करें। 
यह अपने मूल रूप में प्रकाशनार्थ है।
इस बीच जिन साथियों ने भी इसे प्रसारित किया है, हम उनके समर्थन और सहयोग को इस पूरे प्रसंग में बेहद महत्‍वपूर्ण मानते हैं।

तीन लेखकों द्वारा जारी प्रपत्र
 भोपाल, 05 जुलाई 2012

सार्वजनिक साहित्यिक संस्थाओं का राजनैतिक रूपान्तरण और लेखकों की प्रतिरोधी भूमिका
(सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा)

पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश के भारत भवन, साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी और कला परिषद सहित कुछ संस्थानों से समय-समय पर, पृथक-पृथक कारणों से वामपंथी लेखक संगठनों तथा रचनाकारों द्वारा प्रत्यक्ष दूरी बना कर रखी गई है। कतिपय तात्कालिक कारण दूर हो जाने पर स्थिति यह है कि अनेक लोग जहाँ इन संस्थाओं, खासकर भारत भवन के आयोजनों में सीधी भागीदारी करने लगे हैं, वहीं गिने-चुने कुछ लेखकों ने इस दूरी को प्रखरता और दृढ़ता से बरकरार रखा है। इन लेखकों में से (भोपाल में रहनेवाले) पहले स्वर्गीय कमला प्रसाद जी के साथ और फिलहाल हम तीन यानी राजेश जोशी, कुमार अम्बुज और नीलेश रघुवंशी, लगातार इस मुद्दे पर विचार करते रहे हैं और अभी भी हमारा निष्कर्ष है कि इन संस्थानों में ‘रचनाकार के रूप में भागीदारी’ न करने की हमारे पास ठोस वजहें हैं। ये वजहें अनौपचारिक बातचीत में अन्य साथी लेखकों को बताई जाती रही हैं। लेकिन, अब जबकि कुछ महत्वपूर्ण, चर्चित वामपंथी लेखक या वामपंथी संगठनों से जुड़े रचनाकारों द्वारा भी इन संस्थाओं के आयोजनों में, बावजूद हमारे प्रदेश के एक प्रमुख लेखक संगठन की इस सलाह के, कि इन संस्थाओं में सीधी भागीदारी न की जाए, शिरकत शुरू कर दी है, तब हम अपना सकारण ‘स्टैण्ड’ यहाँ पुनर्विचार के बाद औपचारिक रूप से सार्वजनिक करना उचित समझते हैं।

सबसे प्रमुख और निर्णायक कारण है कि वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों के चलते, इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का, पिछले आठ-नौ वर्षों में सुनियोजित रूप से पराभव कर दिया गया है। जिसकी हद यह है कि इन संस्थाओं के न्यासियों, सचिवों, उपसचिव और अध्यक्ष पदों पर, जहाँ हमेशा ही हिन्दी साहित्य के सर्वमान्य और चर्चित लेखकों-कलाकारों की गरिमामय उपस्थिति रही, वहाँ अधिकांश जगहों पर ऐसे लोगोें की स्थापना की जाती रही है जो किसी भी प्रकार से हिन्दी साहित्य या कलाजगत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर नहीं हैं। उनका हिन्दी साहित्य की प्रखर, तेजस्वी और उस धारा से जो निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध (जिनके नाम पर सृजनपीठ हैं) से निसृत होती है, कोई संबंध नहीं बनता है। उनका हिन्दी साहित्य की विशाल परम्परा एवं समकालीन कला-साहित्य से गंभीर परिचय तक नहीं है, जिनकी हिन्दी साहित्य और वैश्विक साहित्य की समझ स्पष्ट रूप से संदिग्ध है। उनमें से अधिकांश की एकमात्र योग्यता सिर्फ यह है कि उनका वर्तमान सरकार की मूल राजनैतिक पार्टी या उनके तथाकथित सांस्कृतिक अनुषंग संगठनों से लगभग सीधा जुड़ाव, सक्रियता और समर्थन है।

हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजनैतिक अनुशंसाओं से लोग नामित किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं। कुछ नाम हम स्मरण कराना चाहते हैं कि इन जगहों पर किस स्तर के सर्जक रहे हैंः सर्वश्री त्रिलोचन शास्त्री, शमशेर बहादुर सिंह, स्वामीनाथन, बव कारंत, हरिशंकर परसाई, नरेश मेहता, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, विनोद कुमार शुक्ल, हबीब तनवीर, मंजीत बाबा, शानी, केदारनाथ सिंह, सोमदत्त, निर्मल वर्मा, प्रभाकर श्रोत्रिय, विजय मोहन सिंह, आग्नेय, भगवत रावत, कृष्ण बलदेव वैद, कमलेश, दूधनाथ सिंह, प्रभात त्रिपाठी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, सुरेन्द्र राजन, फजल ताबिश, अशोक वाजपेयी, आफाक अहमद, सुदीप बैनर्जी, कमलेशदत्त त्रिपाठी, श्रीनिवास रथ, मंजूर एहतेशाम, रमेशचंद्र शाह, हरिनारायण व्यास, दिलीप चित्रे, नरेश सक्सेना, कमला प्रसाद, मनोहर वर्मा, धु्रव शुक्ल आदि। जाहिर है एवं हमारा स्पष्ट मत है कि यहाँ प्रश्न राजनैतिक पक्षधरता का न होकर, वामपंथी अथवा दक्षिणपंथी पदावलियों से भी बाहर, व्यापक रूप से उन लोगों की वर्तमान उपस्थिति से है जिनमें से अधिकांश की कोई साहित्यिक पहचान नहीं है, कोई साहित्यिक कद नहीं है। उनका हमारी साहित्यिक परंपरा, लेखकीय अस्मिता और समकालीनता से भी कोई संबंध नहीं बैठाया जा सकता। उन्होंने संस्थाओं से प्रकाशित अनेक, अन्यथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की साहित्यिक संभावना, वैभव और प्रतिष्ठा को भी गंभीर क्षति पहुँचा दी है।

वर्तमान में इन संस्थाओं को जिस तरह से पदावनत, पतित और गरिमाहीन कर दिया गया है, वह अस्वीकार्य है। इसके साक्ष्य पिछले कुछ वर्षों में म प्र संस्कृति विभाग द्वारा दिए जानेवाले अखिल भारतीय और प्रादेशिक स्तर पर पुरस्कृत लेखकों की सूची तथा कृतियों के स्तर पर भी सहज ही देखे जा सकते हैं।

इसके चलते वे सब लेखक, जो किसी राज्य की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की श्रेष्ठता, सर्जनात्मक हस्तक्षेप और वातावरण निर्मिति में भूमिका देखना चाहते हैं, वर्तमान परिदृश्य के समर्थक, सहयोगी या हिस्सेदार कैसे बने रह सकते हैं। यह इन महत्वपूर्ण संस्थाओं का, जो जनता की निधि से ही संचालित हैं, ऐसा अविवेकी लेकिन सजग राजनैतिक रूपान्तरण है, दुर्भाग्य से जिसका हिन्दी साहित्य और कला की उत्कृष्ट परम्परा से किसी तरह का सरोकार नहीं। यह समूचे साहित्य और सर्जना के उस पर्यावरण को प्रदूषित और न्यून करने की कवायद है जो अन्यथा लोगों को विचारवान, गतिशील, जिज्ञासु और परिवर्तनमूलक बनाती है, उन्हें मनुष्यता के विराट फलक से परिचित कराती है और किसी समाज की सांस्कृतिक विरासत को नया करते हुए, अग्रगामी बनाती है। समूची मानवता के लिए वह दुर्लभ स्वप्न देखती है और वैसा अप्रतिम रचाव करती है जो सर्जनात्मकता के माध्यम से ही संभव है।

हम मानते हैं कि इन चुनौतीपूर्ण और साहित्य-कला की गरिमा को नष्ट करनेवाली परिस्थितियों के बीच उन सब लेखकों को प्रतिरोध की ‘पोजीशन’ लेनी चाहिए जो इन सार्वजनिक संस्थाओं के इस तरह के अवमूल्यन के प्रति जरा भी चिंतित हैं। हम जानते हैं कि इधर कुछ महत्वपूर्ण लेखकों ने, अपनी तरह के तर्क प्रस्तुत करते हुए संदर्भित आयोजनों में भागीदारी की है। हमारी निगाह में उन्होंने इन पतनशील संस्थाओं को सुमान्य लेखकों की ओर से वह अवांछित, किंचित और तात्कालिक वैधता दी है जिसे वे अन्यथा अपनी सीमित गतिविधियों, दृष्टि, वैचारिकता और मेधा के कारण अर्जित करने में सक्षम नहीं हैं। इस भागीदारी से इन लेखकों ने प्रदेश के राजनैतिक-सांस्कृतिक कायांतरण में जाने-अनजाने ही अपना सहयोग, अपना तर्क और समर्थन दे दिया। साथ ही, एक दुविधापूर्ण और भ्रामक संदेश भी दिया, जिससे दूसरे लेखक भी प्रेरित हो सकते हैं। उनके उदाहरण की ओट में अपना औचित्य प्रतिपादित कर सकते हैं कि एक कहावत का सहारा लेकर कहें तोः ‘जब सोने में ही जंग लगने लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा।’

और अंत में हमारे तमाम उन सम्माननीय मित्रों के प्रति कुछ शब्द जो इन संस्थानों में पदों पर आते हैं अथवा नौकरी कर रहे हैं और सुसंयोगवश समकालीन कला-साहित्य संसार में जिनकी उपस्थिति का भी आदर है। हम जानते हैं कि उनका समय-समय पर बुलावा हमारे प्रति प्रेम, सदभावना और कार्यक्रमों की स्तरीय साहित्यिक चिंता से भरा हो सकता है किंतु क्या वे इस विराट और प्रत्यक्ष पराभव से निरपेक्ष रह सकते हैं। यदि वे स्वयं लेखक भी हैं तो उनसे अपेक्षा भी कुछ बढ़ जाती है क्योंकि यह दीर्घकालिक, गहरी सांस्कृतिक हानि है। इसके दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम हैं। किसी हस्तक्षेप के बजाय, वे इसका बेहद सतही, कामचलाऊ और तात्कालिक आयोजनधर्मी, व्यक्तिगत मैत्रीपूर्ण हल खोजते हैं। तमाम सदाशयता और समझ के बावजूद यह विरूपताओं को ढँकने की हास्यास्पद कोशिश है। यहाँ याद कर सकते हैं कि पहले कुछ पदाधिकारी ऐसा दखल संभव करते रहे हैं कि विभिन्न पदों पर नामित या चयनित लोगों से संस्थाओं का भी स्तर बना रहे, उनका मान सुरक्षित रहे। तंत्र में उनकी सीमाएँ और असमर्थताएँ अपनी जगह हैं लेकिन दुर्भाग्यवश हम नहीं जानते कि इन संस्थाओं में पदस्थ हमारे वर्तमान मित्रों ने, अपनी उपस्थिति का लाभ लेकर प्रतिरोध की दिशा में क्या पहल और दखल मुमकिन की है।

मध्य प्रदेश शासन की इन सांस्कृतिक नीतियों और कार्यकलापों के परिप्रेक्ष्य में, इस पूरे परिदृश्य के पतनशील राजनीतिक रूपान्तरण को रोकने के लिए एक सामूहिक कोशिश जरूरी है। हम हमारे चेतनासंपन्न वरिष्ठ और युवा लेखकों से अपेक्षा करते हैं कि वे इस पूरे दृश्य पर विचार करें। यद्यपि हमारे अनेक लेखक-संस्कृतिकर्मी भोपाल और भोपाल से बाहर भी, इन परिस्थितियों और पराभव के प्रति सजग हैं और अपनी भूमिका का यथाशक्ति निर्वहन कर रहे हैं लेकिन हम चाहते हैं कि साहित्य-कला-संस्कृति में काम कर रहे सभी विवेकवान रचनाकार-कलाकर्मी एक सामूहिक प्रतिरोध की कार्यवाही के लिए न केवल सुझाव दें बल्कि पहलकदमी भी करें।
 000000

राजेश जोशी            
एम-11, निराला नगर, भदभदा रोड,     
भोपाल, मप्र 462003         दूरभाष  0755-2770046 


कुमार अम्बुज , 
 सी-10, गुलमोहर बिल्डिंग, तृतीय तल, 
ग्रीन मैडोज, अरेरा हिल्स, जेल रोड,    
भोपाल, मप्र  462011   
09424474678       
    
नीलेश रघुवंशी  
ए-40, आकृति गार्डन, नेहरू नगर, भोपाल, मप्र 462003
09826701393                            

 





मंगलवार, 26 जून 2012

भूखे आदमी से अहिंसात्‍मक आंदोलन की उम्‍मीद नहीं की जा सकती



भूखे आदमी से अहिंसात्‍मक आंदोलन की 

उम्‍मीद नहीं की जा सकती


जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-


पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है।
ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है।
विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है।
संविधान में साफ शब्दों में लिखा है कि जल, जंगल और जमीन से उन पर आश्रित लोगों को नहीं हटाया जा सकता है। लेकिन अफसोस सरकार संविधान की भावना को ताक पर रखकर करोड़ों लोगों को सिर्फ इसलिए विस्थापित कर रही है ताकि कुछेक मुट्ठी भर लोगों की तिजोरियों को भरा जाए। दंतेवाड़ा में सात सौ गांवों को खाली करा लिया गया। वहां से करीब साढ़े तीन लाख लोग दर-दर भटक रहे हैं। लेकिन उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। यह हाल सिर्फ दंतेवाड़ा का नहीं है। मध्य प्रदेश हो या फिर झारखंड, जंगलों को निजी कम्पनियों के लिए खाली कराने का काम तेजी से चल रहा है।
अहिंसात्मक आंदोलन पर आप क्या कहेगीं ?
देखिये, आप किसी भूखे आदमी से अहिंसात्मक आंदोलन की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। आंदोलनों में विविधता होना जरुरी है। यदि कोई व्यक्ति जंतर मंतर पर अहिंसात्मक तरीक से आंदोलन कर रहा है तो वही व्यक्ति जंगलों में अपने तरीके से आंदोलन कर सकता है। अहिंसात्मक आंदोलन ही झूठ है। हमें इस तरीके से आजादी नहीं मिली है। भारत पाक विभाजन के दौरान भयानक हिंसा हुई। इसमें दस लाख लोग मारे गए थे। इसे आप इस सदी की सबसे भयानक हिंसा कह सकते हैं। मौजूदा वक्त में आप भूखे आदमी से इस तरीके से आंदोलन की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। गरीबों के संघर्ष में इस तरह के आंदोलन का कोई अर्थ नहीं है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन से दूरी क्यों ?
नहीं उनसे मेरी कोई दूरी नहीं है। यह तो मीडिया के एक तबके के द्वारा फैलाई गई अफवाह है। मैं पहले भी नर्मदा आंदोलन के साथ थी और आज भी हूं।
आप नक्सलवाद और नक्सलवादियों को बड़े रुमानी अंदाज में पेश करती हैं।
बिलकुल करती हूं। और इस पर मुझे गर्व है। मुझे हर उस इंसान और विचारधारा पर गर्व है जो गरीब आदिवासियों के हक में अपनी आवाज बुलंद करता है। यदि नक्सली ऐसा करते हैं तो इसमें क्या गलत है। आखिर लोग रोमांच से क्यों डरते हैं। दुनिया में हर व्यक्ति को रोमांच करना चाहिए। इस पर गर्व होना चाहिए। मैं हर उस आंदोलन से रोमांच करती रहूंगी जो गरीबों के लिए लड़ा जा रहा है।
अयोध्या के विवादित फैसले पर आप क्या कहेंगी ?
बहुत अफसोसजनक। मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि दुनिया की कोई भी अदालत यह कैसे तय कर सकती है कि भगवान राम कहां पैदा हुए थे और कहां नहीं। ऐसे फैसले पर तो अफसोस ही जताया जा सकता है। लेकिन इससे साफ हो गया है कि न्यायपालिका का भी साम्प्रदायिकरण हो गया है। कोर्ट ने भगवान को इंसान मान लिया। इससे तो भगवान राम का अपमान ही हुआ है और वे छोटे हुए हैं। मुझे समझ में नहीं आता है कि अदालत जब यह फैसला दे रही थी तो उसका दिमाग कहां चला गया था।
गृहमंत्री से कोई खास नाराजगी ?
गृहमंत्री पी चिदंबरम आदिवासियों, दलितों और गरीबों के हितों के खिलाफ हैं और मैं इन सब के साथ। तो खुद ब खुद मैं इनके साथ और गृहमंत्री की विरोधी हो जाती हूं। जो कोई भी आदिवासी और गरीब किसानों की लड़ाई लड़ता है, वह सरकार की नजर में माओवादी घोषित हो जाता है। और मामला यहीं खत्म नहीं होता है, सरकार उन्हें हर तरह से कुचलने की कोशिश करती है। यही मंत्री विदेशों में जाकर देश की हर उस चीज के निजीकरण की वकालत करते हैं जो गरीबों से जुड़ी हैं।
माओवादियों की हिंसा  पर आप क्या कहेंगी ?
देखिए ऐसा नहीं है कि माओवादी सिर्फ बंदूकों के बल पर ही आंदोलन चला रहे हैं। वे लगातार तीस सालों से लड़ रहे हैं। वे जंगलों में बसे आदिवासियों के हितों के लिए न सिर्फ व्यवस्था से लड़ रहे हैं बल्कि राज्य से भी लोहा ले रहे हैं। वे सिर्फ बंदूकों से लड़ते तो शायद इतनी लंबी लड़ाई वे भी नहीं लड़ पाते। वे आदिवासियों के भले के लिए भी समानान्तर कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।
भाजपा कांग्रेस में कोई अंतर नजर आता है आपको ?
सही बताऊं तो बिल्कुल नहीं। इनके नाम सिर्फ अलग हैं, नीतियां एक ही हैं। वे यह है कि निजी कम्पनियों को अधिक से अधिक लाभ कमवाना है। इसके लिए उन्हें चाहे आदिवासियों की जमीन उन्हें देनी हो या फिर किसानों को जमीन से बेदखल करना। वे इसके लिए हमेशा तैयार रहती हैं।
                                                                                                                                                 साभार- खबरकोश डॉट कॉम

बुधवार, 13 जून 2012

अच्‍छा काव्‍य पाठ


अच्छा काव्य पाठ

(तथाकथित अच्छे काव्य पाठ के बारे में कुछ अन्‍यथा विचार)


एक दिलचस्प आरोप समकालीन कविता के कवियों पर अकसर लगाया जाता रहा है। कि अधिकांश कवि, अच्छे कवि भी, अपनी कविताओं का पाठ प्रभावी ढंग से नहीं करते। या कहें कि नहीं कर पाते हैं। मुझे अनेक अर्थों में यह एक विलक्षण माँग लगती है। कविता लिखना और पाठ करना, दो अलग अलग कलाएँ हैं। और एक ही व्यक्ति में ये दोनों उत्कृष्ट रूप में हों, यह प्रायः दुर्लभ है।

जैसे एक जमाने में फिल्मों में नायक के लिए गायन कला में पारंगत होना लगभग अनिवार्य शर्त थी। और इसकी अपनी मुश्किलें थीं, साथ ही यदि कोई अच्छा अभिनेता है लेकिन गायक नहीं है तो उसकी अभिनय प्रतिभा को भी नायकत्व के अवसर असंभव नहीं लेकिन दुष्कर अवश्य ही थे। इस तरह के आग्रह, एक उत्कृष्टता को कमतर देखते चले जाने का या उसकी उपेक्षा का अनजाने ही कारण बनता है। जैसे एक कलाकार से आप एक न्यूनतम ‘पैकेज’ की माँग कर रहे हैं। संगीत की समझ, संगीतकार होना, गायक होना, कविता या गीत लिखना और मंच पर पाठ, ये सब अलग-अलग प्रतिभाओं की माँग करती हैं। कुछ लोगों में ये सारी अथवा कुछ प्रतिभाएँ एक साथ हो सकती हैं मगर अधिकांशतः ऐसा नहीं होता।

यहाँ प्रभावी काव्य पाठ के आशय भी पृथक हो सकते हैं। किसी के लिए वह साफ उच्चारण और कुछ धीमी गति से पढ़ना पर्याप्त होगा। किसी के लिए पूरे हावभाव, अभिनय के साथ प्रभावशील प्रतीत होगा और किसी के लिए प्रचुर नाटकीयता का तत्व जरूरी लग सकता है। किसी की आवाज भारी, गूँज भरी या अन्य रूप से प्रभावी हो सकती है और इसका उलट भी, जिसमें उसका अपना योगदान लगभग कुछ नहीं होता। वह प्राकृतिक रूप से प्रदत्त है। काव्य पाठ में कवि का व्यक्तित्व, उसका चेहरा-मोहरा और उसकी सहज, नैसर्गिक देह भंगिमाएँ भी शामिल हो जाती हैं। इन सबके समुच्चय में काव्य पाठ होता है, जिसमें कुछ चीजें प्राकृतिक होती हैं, कुछ का विकास किया गया होता है और कुछ अभिनयमूलक। हकलहाट, तुतलाहट, अटकना और उच्चारण दोष के बावजूद किसी का कुल पाठ अच्छा लग सकता है। या कहें कि उससे हमारा तादात्मय बैठ जाता है। दरअसल, कविता पाठ में कोई कवि कुछ ही पक्षों में, कुछ ही हद तक सुधार कर सकता है। हमेशा इसकी एक सीमा बन जाएगी। इसका कोई आदर्श रूप बना पाना अवांछित और कठिन है। जितने कवि, उतनी तरह का काव्य पाठ। यही सच है। यही आकर्षण है। 

मुझे तो लगभग अपना हर प्रिय कवि, जिसका भी काव्यपाठ मैंने सुना है, वह अपने सहज, प्राकृतिक ढंग में ही प्रिय लगता रहा है। वही उसकी विशिष्टता भी बन जाती है। कविता सुनना भी एक कला है जिसे हर श्रोता अपने ढंग से अर्जित करता है। और यह अपने कवि से, प्रस्तुत काव्यपाठ से तादात्मय बैठाने से गहरा संबंध रखता है। कविमुख से कविता सुनने के आनंद में यह शामिल है कि ‘कवि की अपनी प्राकृतिकता में, उसकी अपनी शक्तियों और सीमाओं के साथ सुनने से प्राप्त आनंद।’ और इसका कोई मानकीकरण नहीं हो सकता। यदि आप इसमें आनंदित नहीं हो सकते तो बेहतर है कि उसे किसी अन्य के मुख से सुना जाए।

यहाँ अनेक ऐसे कवि भी ध्यान में आ सकते हैं जो अपनी निष्प्रभावी और कमतर कविताओं का भी गजब, प्रभावी पाठ कर पाते हैं। किसी के लिए इसमें बहुत हद तक स्वाभाविक, प्रकृति प्रदत्त सहयोग भी मिला होता है। नाद, पाठ, स्वर, सटीक उच्चारण और अंग संचालन से उत्पन्न प्रभावी पाठ की अपेक्षा सभी कवियों से, बल्कि अधिकांश कवियों से करना एक अतिरिक्त माँग है। इस आधार पर उनकी आलोचना तो दुराग्रह ही है। यदि यह आग्रह रखना ही है तो ऐसे काव्य प्रेमियों का दल विकसित किया जाना चाहिए जो भले ही कवि न हों लेकिन अच्छा काव्य पाठ कर सकते हों। और वे कविताओं का पाठ करें। जैसा मराठी, मलयालम, अंग्रेजी और अन्य यूरोपियन भाषाओं में कहानियों के पाठ विकसित किए गए और स्टोरी टेलर की एक आदरणीय, लोकप्रिय जमात पल्लवित हुई। ‘पोएट्री रिसाइटल’ के लिए भी ऐसी जमात को प्रेरित किया जाना कहीं बेहतर और व्यावहारिक होगा ताकि ‘काव्य पाठ’ के असर को संप्रेषणीयता और प्रचार के उच्चतम स्तर तक पहुँचाया जा सके। उनकी विशेषज्ञता किसी भी श्रेष्ठ पाठ करनेवाले कवि से बेहतर ही होगी।

अपने में गुम, संकोच, संशय और सहज मानवीय कमजोरियों के साथ किए गए अनेक कवियों के काव्यपाठ, अप्रतिम काव्यानुभव के कारण भुलाए नहीं भूलते। और जिन कवियों के काव्यपाठ की बड़ी प्रशंसा है, अनेक अवसरों पर उनकी नाटकीयता, आवाज पर उनका आत्मविश्वास और उच्चारण की शुद्धता ही अकसर बाकी चीजों को ढाँप लेती है। तथाकथित अच्छा पाठ, खराब कविता के लिए ओट भी बन सकता है। बनता रहा है।  

न्यूनतम अपेक्षा शायद यह हो सकती है कि उच्चारण यथासंभव ठीक हो और श्रोता तक आवाज पहुँच सके।  इसे किसी कवि द्वारा धीरे धीरे अर्जित भी किया जा सकता है और कविता सुनाये जाने के लिए इतनी भर अपेक्षा जायज प्रतीत होती है। हालांकि, क्षेत्रीय बोली-भाषा से प्राप्‍त उच्‍चारण और स्‍वरदोष आसानी से दूर नहीं हो सकते।

एक अर्थ में तथाकथितअच्छे  काव्य पाठ का आग्रह, अन्‍यथा एक रूपवादी, रूमानी आग्रह भी हो सकता है।
00000

मंगलवार, 1 मई 2012

एक दिन मन्‍ना डे

कल दो-तीन मित्रों ने याद दिलाया कि एक मई मन्‍ना डे का जन्‍म दिन है और वे इस कहानी को पढ़ना चाहते हैं। 
किंचित देरी से ही सही, यह कहानी यहॉं पोस्‍ट कर रहा हूँ,शायद कुछ और लोगों की दिलचस्‍पी भी हो।


कहानी
एक दिन मन्ना डे

छियासी बरस के मन्ना डे उस दिन शहर में आए थे। जीवनकाल में ही अमर हो चुके अपने अनेक गीतों को गाने के लिये। कार्यक्रम का ज्यादा प्रचार नहीं हुआ लेकिन धीरे-धीरे खबर फैलती गई कि मन्ना डे शहर में आज गाना गाएँगे। आमंत्रण पत्र से प्रवेश था। फिर भी रवीन्द्र भवन पूरा भर चुका था। सीढि़यों पर, गैलरी में, रास्ते में लोग बैठे हुये थे या खड़े थे। सब उम्मीद कर रहे थे कि मन्ना डे इस उमर में भी कम से कम चार-छः गीत तो गाएँगे ही। लेकिन उन्होंने लगभग ढाई घंटे तक गाया और पच्चीस-तीस गीत गाए। सब लोगों ने नॉस्टेल्जिक अनुभूतियों के साथ, खुशी जताते हुए, तालियाँ बजाते हुए उन्हें सुना। मुझे भी बड़ा सुख मिला। मन्ना डे जैसे बड़े पाश्र्व गायक को सीधे सुनने का आनंद और संतोष हुआ।

रात नौ बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ, भीड़ के साथ सीढि़याँ उतरते हुए मुझे ‘प्रसाधन’ लिखा देखकर ख्याल आया कि इस बीच फारिग हो लूँ। भीड़ भी छँट जाएगी और तब आराम से घर जा सकूँगा। मैं जाकर खड़ा हुआ ही था कि बगल में एक आदमी कुछ निढाल-सा, थके कदमों से आया और पेशाब करने लगा। मैंने उसकी तरफ देखा, वह रुआँसा हो रहा था। निगाह मिलने पर वह कुछ सकपका गया और नजर चुराने लगा। मैंने पूछा- ‘आपको कैसे लगे मन्ना डे? उनकी आवाज से लगता नहीं है न कि वे छियासी साल के हैं?’
यकायक वह आदमी रोने लगा। मैं घबरा गया। मुझे लगा कि शायद मैंने कुछ गलत बात कह दी। वह एक बाँह से आँसू पोंछने लगा। मैंने सोचा कि उसे ढाढ़स बँधाना चाहिए। जिप खींचकर मैं एक तरफ खड़ा हो गया कि जब यह इधर आए तो इससे सांत्वना के कुछ शब्द कहूँ। मैं खुद को कहीं न कहीं अपराधी समझ रहा था। वह जैसे ही पलटा मैंने कहा- ‘माफ करें, शायद मैंने कुछ ऐसी बात पूछ ली जो आपको अच्छी नहीं लगी।’
‘नहीं भाई, आपकी बात से कुछ नहीं हुआ। मुझे तो पहले से ही रोना आ रहा था।’ उसने भर्रायी आवाज में कहा।
मुझे आश्वस्ति हुई कि चलो, मेरी वजह से इसे कुछ नहीं हुआ।
‘जैसे ही आपने कहा कि लगता नहीं वे छियासी के हैं, मैं अपने आँसू रोक नहीं पाया।’
‘इसमें ऐसा क्या कह दिया मैंने?’
‘अब क्या बताऊँ आपको! इस उमर में, बुलंद आवाज में, पूरे पक्के सुरों में उनके गाने सुनते हुए दरअसल मुझे यह ख्याल सताने लगा कि एक दिन मन्ना डे.....।’ वह कुछ कहते-कहते रुक गया।
‘एक दिन मन्ना डे, क्या? क्या मतलब?’
‘अरे भाई, मुझे अचानक यह ख्याल आया कि एक दिन मन्ना डे इस दुनिया में नहीं रहेंगे। तबसे यह कुविचार मेरा पीछा कर रहा है। मैं इससे पीछा नहीं छुड़ा पा रहा हूँ।’

मुझे समझ नहीं आया कि इस भले आदमी से आखिर क्या कहूँ। इसकी बात पर हँस दूँ, इसे समझाऊँ या टाल कर चल दूँ। उस आदमी की मुद्रा गंभीर थी। वह किसी गहरी तकलीफ में दिख रहा था। मैंने विषयांतर करने के लिए, एक तरह से उसका ध्यान बाँटने के लिये कहा- ‘चलिए, नीचे चलते हैं, रेस्टॉरेंट में चाय पीते हैं। आपके पैन्ट्स की जिप खुली है।’ आखिरी वाक्य मैंने इस तरह कहा कि उसे बुरा न लगे। उसने अनमने मन से जिप खींची और बोला- ‘ठीक है, आप भी चाय पीना चाहते हैं तो चलिये।’
हम रेस्टाॅरेंट के एक शांत कोने की टेबुल की तरफ गए। वह अभी तक संयत नहीं हुआ था।
‘देखिए, आप यह मत समझिए कि मन्ना डे के लिए मैं ऐसा सोच रहा हूँ। बल्कि यह सोचना मुझ पर कितना भारी पड़ रहा है, मैं ही जानता हूँ।’
‘अब कुछ तो मैं भी जानता हूँ।’ मैंने मुसकराते हुए कहा। लेकिन उस पर इस परिहास का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
‘लगता है आप इस बात पर भावुक हो गए हैं, कुछ हद तक डिप्रेशन में आ गए हैं।’ कहते हुए मैंने सोचा कि शायद सहानुभूति से ही इस आदमी को उबारा जा सकता है।

घटनाक्रम ऐसा बनता गया कि मुझे इस अतिनाटकीयता में रुचि हो गई या कहूँ कि एक तरह से मैं फँस गया। और अब मैं घर जाने की बजाय यहाँ इस आदमी के साथ, जिसका नाम तक नहीं जानता, दो चाय का आॅर्डर देने के बाद बैठा हुआ था। मेरा कमरा पास में ही, पाँच मिनट की पैदल दूरी पर था। वह अभी भी गंभीर और उदास था। इस स्थिति में किसी औपचारिक परिचय के लेन-देन की गुंजाइश नहीं निकल रही थी।
‘जब उन्होंने गाया ‘फुलगेंदवा न मारो’, मैं मारे खुशी के झूम उठा। क्या तान थी, क्या उठान और इतनी गहरी, साफ-सुथरी आवाज कि कभी रेडियो या कैसिट पर न सुनी थी। इतनी उमर के बावजूद एक भी सुर गलत नहीं लगाया। और भाई, इसी दौरान मुझे यह दुष्ट ख्याल आ गया कि एक दिन मन्ना डे नहीं रहेंगे। इतना नायाब गायक हमारे बीच नहीं रहेगा, यह आवाज, यह गायकी नहीं रहेगी। इसकी वजह से मेरी यह खुशी गायब हो गई है कि मैंने मन्ना डे को सुना।’ उसने धीरे-धीरे, भरे हुए गले से कहा।
‘यह तो होगा ही। एक दिन हम सब नहीं रहेंगे। पहले भी महान कलाकार हुए हैं और आखिर उनकी भी उमर पूरी हुई। यह कितनी खुशी की बात है कि मन्ना डे आज और अभी हमारे बीच हैं। दुआ है कि वे शतायु हों।’ मैंने टेबुल पर रखे उसके हाथ को छूकर कहा। सोचा कि स्पर्श उसे राहत दे सकेगा।
वह खामोश रहा।
‘एक बार मैंने भी कुमार गंधर्व को सुनते हुए और बचपन में मुकेश का कोई गाना सुनते हुए सोचा था कि काश, ये लोग कभी न मरें। यह ख्याल जीवन में अपने प्रिय कलाकार को लेकर कभी न कभी सबके मन में आता ही है। लेकिन इसे लेकर इतना व्यथित होने की कोई बात नहीं है।’ मैंने उसे इस तरह भी दिलासा देने का प्रयास किया।
‘मैं जानता हूँ। मगर अभी कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। मैं तो उनके गाने के बीच में उठकर, चीखकर कहनेवाला था कि मन्ना, अब मत गाओ, नजर लग जाएगी। मगर मन का लोभ तो यही था कि वे गाते जाएँ, बस, गाते जाएँ। और उसी बीच यह विचार जड़ जमाता चला गया कि चार साल बाद मन्ना डे नब्बे के हो जाएँगे। और आखिर एक दिन, सात साल बाद या दस साल बाद....।’ उसने खुद को रोने से रोका। इस तरह कि पास खड़े वेटर का ध्यान भी हमारी तरफ आकर्षित हो गया। मैंने वेटर को हाथ के इशारे से जताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं, दोस्तों के बीच की ही कोई छोटी-मोटी बात है।

मैंने सोचा कि कहीं इस आदमी ने ज्यादा शराब तो नहीं पी ली है। और इस वजह से ही यह अति भावुकता का शिकार हो गया है! तब तो इसे समझाना, इसके साथ वक्त जाया करना बेकार है। मैं भी किस प्रपंच में पड़ गया। आखिर मैंने पूछ ही लिया- ‘क्या आपने आज कुछ अल्कोहल लिया है?’ वह टेबुल पर दोहरा होते हुए मेरे पास अपना मुँह ले आया और गहरी साँस चेहरे पर छोड़ते हुए बोला- ‘लो, सूँघ लो। मैंने पिछले दस बरस से शराब नहीं पी।’
मुझे पसीने की और उसके मुँह की मिली-जुली तीखी, खट्टी गंध का अहसास हुआ।
‘साॅरी! मुझे इस तरह नहीं पूछना चाहिए था। लेकिन आपको इतना सेण्टीमेंटल देखकर लगा कि...।’
‘कोई बात नहीं। मुझे भी अपना मुँह आपके मुँह पर इस तरह नहीं लाना था लेकिन आपकी बात पर मुझे कुछ गुस्सा आ गया। हालाँकि मैं समझ सकता हूँ कि आप भले आदमी हैं और मन्ना डे को प्यार करते हैं। वरना मेरे रोने से, मेरे दुख से आप क्यों अपना रिश्ता जोड़ते!’
‘आप इस तरह से किसलिये दुखी हो रहे हैं? मन्ना डे की आवाज, उनके गाये गीत धरोहर के रूप में हमारे पास, हमारी यादों में हमेशा रहेंगे। अब तो सी.डी., डी.वी.डी. वगैरह जैसी चीजें भी हैं और कितनी म्यूजिक कंपनियाँ हैं जो मन्ना डे को ही नहीं बल्कि तमाम महान गायकों को हमारे लिए, आनेवाले लोगों के लिए बचाकर रखेंगी।’
‘खाक बचाकर रखेंगी। जरा खोजकर देखें। पुराने गीत ढूँढ़ने में पसीने आ जाते हैं। और मेरी चिंता तो यह भी है कि डेढ़ सौ साल बाद, दो सौ साल बाद मन्ना डे की आवाज कैसे सुन पाएँगे।’
मुझे हँसी आ गई।
‘अरे भाई, तीस-चालीस साल बाद तो हम दोनों ही नहीं रहेंगे, डेढ़ सौ-दो सौ साल बाद की परवाह आप क्यों कर रहे हैं!’
‘आप नहीं समझ सकते। मुझे लग रहा था कि शायद आप कुछ समझेंगे। कोई नहीं समझ सकता। ओह! मैं मन्ना डे को सुनने आया ही क्यों? इस तरह उन्हें साक्षात् सुनना, जिसे यहाँ सुनकर लगा कि कोई कंपनी आज तक उनकी आवाज ठीक से दर्ज ही नहीं कर पाई, उस आवाज को सुनना! मैंने यह खुला खजाना देखा ही क्यों? काश! कोई मुझसे कह दे कि मन्ना डे हमारे बीच इसी तरह बने रहेंगे, इसी आवाज के साथ।’ वह फिर बहक गया।

शायद उसे नर्वस ब्रेकडाउन जैसा कुछ हो गया था। मैं चुप रहा।
कुछ देर बाद उसने धीरे से अपनी आँखों को मला। वेटर ने चाय सर्व कर दी। संक्षिप्त शांति में हम चाय पीते रहे। चाय जैसे ही खतम हुई, वेटर बिल रख गया। उसने तुरंत बिल अपने कब्जे में लिया।
‘बिल इधर दीजिए। पैसे मैं दूँगा, चाय पीने का प्रस्ताव मेरा था।’ मैंने कहा।
‘नहीं, पैसे मैं ही दूँगा। वरना बाद में मुझे ऐसा लगेगा कि मैं कुछ नर्वस था, दुख में था, इसलिए सहानुभूति में आपने मुझे चाय पिला दी। यह ख्याल मुझे फिर परेशान करेगा।’
अजीब तर्क था। उसने पंद्रह रुपए दिए। बारह चाय के और तीन टिप मानकर।

हम बाहर निकल आए। उसने बताया कि पेड़ के नीचे, उधर अँधेरे कोने में उसका स्कूटर खड़ा है। ‘अब आपको ठीक लग रहा है न!’ मैंने पूछा।
‘हाँ। मैं शायद ज्यादा ही भावुक हूँ। मगर सच मानिए, जरूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूँ। लेकिन मन्ना डे को यह बात मालुम होनी चाहिए ताकि वक्त-जरूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें। पता भर लग जाए। मुझे लगता है कि मैं मर जाऊँ, बल्कि हममें से बहुत से लोग मर जाएँ और मन्ना डे बच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।’ वह बाढ़ के पानी में लकड़ी के पटिये की तरह बहने लगा।
‘हाँ, मन्ना डे के लिए तो कोई भी, कुछ भी कर सकता है।’ मैंने उसे शांत करने की नीयत से कहा।
‘आप भी कैसी बात करते हैं! इतने गायक, इतने कलाकार भूख से, गरीबी से, बीमारी से, उपेक्षा से मर गए, किसी ने कुछ किया? मैंने तक नहीं किया। वक्त आने पर आदमी अपने माँ-बाप तक के लिये कुछ नहीं करता। कलाकार, वैज्ञानिक बंद कमरों में सड़ जाते हैं, पागल हो जाते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं या जानलेवा बीमारियों से मर जाते हैं। क्या आप नहीं जानते? मन्ना डे के लिए ही अभी कौन क्या कर रहा है? लेकिन अब उनके लिए मैं कुछ भी, सच में कुछ भी करना चाहता हूँ।’
वह फिर किसी गहरी घाटी में उतर गया।
जानबूझकर मैं चुप रहा। कि बात बढ़ाने से इस आदमी का मानसिक उत्ताप बढ़ता ही जाएगा। स्कूटर के पास जाकर वह अचानक पलटा और करीब आकर, कंधे पर हाथ रखकर बोला- ‘आपको क्या लगता है, आयोजकों ने मन्ना जी को दो-तीन लाख रुपए भी दिए होंगे?’
‘नहीं, मुझे इसका अंदाजा नहीं।’ मैंने कुछ घबराहट में और कुछ उसे दूर हटाने के भाव से जवाब दिया।
‘मैं जानता हूँ, नहीं दिए होंगे। जबकि हर फालतू जगह पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। खैर, मन्ना डे को इससे क्या फर्क पड़ता है! मेरी तो बस एक ही तमन्ना है कि मन्ना डे को कभी कुछ न हो!’
‘जरूर। ऐसा ही होगा। आपकी दुआ काम आएगी।’
‘लेकिन मैं जानता हूँ। आप भी जानते हैं कि एक दिन मन्ना डे....। ओफ्फो! यह ख्याल मेरी जान लेकर ही मानेगा।’ निराशा में उसने अपनी उँगलियों को चटकाया।
‘अरे भाई, आपका नाम क्या है? आप क्या करते हैं? कहाँ रहते हैं??’ मैंने एक साथ सवाल पूछे ताकि परिचय भी हो जाए और उसका ध्यान भी इस बात से हट जाये, जिस पर वह बार-बार अटक जाता है।
‘आपकी गाड़ी कहाँ है?’ बदले में उसने पूछा। मैंने बताया कि यहीं पास में रहता हूँ, पैदल आया हूँ, पैदल जाऊँगा।
‘नहीं, मैं आपको छोड़ूँगा।’ इस पर मैंने आग्रहपूर्वक समझाया कि दरअसल मेरा कमरा एकदम करीब है, यह सामने काॅलोनी में। पैदल लायक ही दूरी है।
तब उसने स्कूटर स्टार्ट किया और बोला- ‘आप मुझे इसी रूप में जानें कि मैंने एक दिन मन्ना डे को सुना। मेरी यही पहचान काफी है। और देखो, अब मैं मुस्करा सकता हूँ।’ 
उसके लहराते स्कूटर को दो पल मैं देखता रहा। मैंने सोचा, अजीब पागल आदमी से पाला पड़ा था। उससे छूटकर मुझे एक तरह की राहत भरी खुशी का अनुभव हुआ।

कमरे का ताला खोलकर भीतर घुसते हुए मैं मन्ना डे के गानों की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा। मन्ना डे की आवाज और गीतों का जादू तो मुझ पर भी था। इस घटनाक्रम के बाद अब मैं इस बेहतरीन, मन्ना डे की आवाज से भरी शाम की स्मृति में अपनी तरह से वापस जाना चाहता था। बेसिन पर हाथ धोकर मैंने टिफिन उठाया। टिफिन खोलने के पहले अलमारी में से खोजकर मन्ना डे के गानों की कैसिट निकाली, उसे ‘टू इन वन’ पर लगाया। फिर टिफिन खोलकर खाना खाने बैठ गया। ‘हँसने की चाह ने, कितना मुझे रुलाया है.....।’
मन्ना डे की आवाज गूँजती रही।
अचानक ही मुझे रुलाई आ गई। मैंने खुद को बहुत रोका। मगर बेकार। मुझसे फिर खाना भी नहीं खाया गया।
मैं वहीं बिस्तर पर लेट गया। बत्ती बुझा दी।
मुझे रह-रहकर वह आदमी याद आने लगा और उसका वह ख्याल कि एक दिन मन्ना डे.....। मैंने उस रात में पहली बार, उस ख्याल की मारक बेचैनी को महसूस किया।
रो लेना भी एक दवा है। स्वस्थ आदमी ही इस तरह रो सकता है। कमरे के अँधेरे में इस तरह सोचते हुए, मैंने खुद को सांत्वना देने की असफल सी कोशिश की।
00000

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

रास्‍ते की मुश्किल


रास्ते की मुश्किल

आप मेज को मेज तरह और घास को घास की तरह देखते हैं
इस दुनिया में से निकल जाना चाहते हैं चमचमाते तीर की तरह
तो मुश्किल यहाँ से शुरू होती है कि फिर भी आप होना चाहते हैं कवि

कुछ पुलिस अधीक्षक होकर, कुछ किराना व्यापारी संघ अध्यक्ष होकर
और कुछ तो मुख्यमंत्री होकर, कुछ घर-गृहस्थी से निबटकर 
बच्चों के शादी-ब्याह से फारिग होकर होना चाहते हैं कवि 
कि जीवन में कवि न होना चुनकर भी वे सब हो जाना चाहते हैं कवि

कवि होना या वैसी आकांक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं
लेकिन तब मुमकिन है कि वे वाणिज्यिक कर अधिकारी या फूड इंस्पेक्टर नहीं हो पाते
जैसे तमाम कवि तमाम योग्यता के बावजूद तेहसीलदार भी नहीं हुए
जो हो गए वे नौकरी से निबाह नहीं पाए
और कभी किसी कवि ने इच्छा नहीं की और न अफसोस जताया
कि वह जिलाधीश क्यों नहीं हो पाया
और कुछ कवियों ने तो इतनी जोर से लात मारी कि कुर्सियाँ जाकर गिरीं कोसों दूर

यह सब पढ़-लिखकर, और जानकर भी, हिन्‍दी में एम ए करके, विभागाध्यक्ष होकर
या फिर पत्रकार से संपादक बनकर कुछ लोग तय करते हैं 
                                                 कि चलो, अब लिखी जाए कविता
और जल्दी ही फैलने लगती है उनकी ख्‍याति
कविताओं के साथ छपने लगती हैं तस्वीरें
फिर भी अपने एकांत में वे जानते हैं और बाकी सब तो समझते ही हैं
कि जिन्हें होना होता है कवि, चित्रकार, सितारवादक या कलाकार
उन्होंने गलती से भी नहीं सोचा होता है कि वे विधायक हो जाएँ या कोई ओहदेदार
या उनकी भी एक दुकान हो महाराणा प्रताप नगर में सरेबाजार 

तो आकांक्षा करना बुरा नहीं है
यह न समझना बड़ी मुश्किल है कि जिस रास्ते से आप चले ही नहीं
उस रास्ते की मंजिल तक पहुँच कैसे सकते हैं।
00000