बुधवार, 25 जून 2014

पिछले साठ वर्षों से हिंदी कविता का स्थायी मिज़ाज जन-पक्षधरता का रहा है



श्री विष्‍णु खरे द्वारा लिखित 'प्रतिनिधि कविताऍं' की भूमिका के कुछ अंश, जिनमें पिछले कुछ वर्षों की हिंदी कविता का एक जायजा शामिल है। शायद यह रुचिवान पाठकों को दिलचस्‍प लगेगा।

1970 तक यह लगभग तय हो चुका था कि हिंदी कविता की प्रासंगिक (चाहें तो उसे ‘प्रमुख’ या ‘केन्द्रीय’ भी कह लें) धारा मुक्तिबोध की आधारभूत प्रतिबद्ध चराचर चेतना, अधुनातन वैचारिकता, वैज्ञानिक ब्रह्मांडीय मीमांसा तथा रघुवीर सहाय के दैनंदिन, ज़मीनी, जन-पक्षधर राजनीति-बोध से मिलकर ही बनेगी, यद्यपि दोनों में निजी जीवन-तत्व भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. बेशक़ इसमें सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, भवानी प्रसाद मिश्र, त्रिलोचन आदि का न्यूनाधिक योगदान भी स्पष्ट देखा जाएगा और जो समर्थ युवतर कवि ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ (मुक्तिबोध,१९६४) और ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (रघुवीर सहाय,१९६७) के आसपास उस मुख्यधारा से जुड़े वे भी अपने तब तक के अनुभवों और प्रतिभा से उसमें कुछ निजी और नया जोड़ पाए. स्वयं रघुवीर सहाय ने 1980 तक अकुंठ-भाव से पहचान लिया था कि उनके सिलसिले में, भले ही कुछ अलग, एक कनिष्ठ पीढ़ी काव्य-परिदृश्य पर आ चुकी है.

इस युवतर पुश्त ने शायद यह समझ लिया था कि कविता का दायरा अब उत्तरोत्तर फैलता ही जाएगा – उसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, विचारधारा और कविता का भी वह समुत्सुक और समझदार अहसास था जो उससे पहले हिंदी में उतना कभी नहीं था – और एक प्रतिबद्ध विवेकशील विश्व-बोध के अंतर्गत वह एक साथ ‘सभी कुछ’ की और ‘अभी की नहीं तो कभी की नहीं’ कविता होती चली जाएगी. इस कविता के लिए किंचित् नई भाषा,शैली और शिल्प की दरकार होगी और सभी जड़-चेतन को, सम्पूर्ण सृष्टि को देखने का मानस-विन्यास भी न्यूनाधिक बदलना होगा – बल्कि नई स्थिति में यह सब स्वयं बदलते जाएँगे. इस प्रक्रिया में वह पहले कभी मुक्तिदायिनी समझी गई किन्तु अब कभी-कभी अवरोधक ‘पद्यात्मकता’ के बंधों को खोलती हुई एक जोखिम-भरी लेकिन सर्वसुलभ ‘आभासी’ ‘गद्यात्मकता’ तक पहुँच जाया करेगी.

यदि कहा जा रहा है कि ब्रह्मांड भी एक नहीं, अनेक हैं तो कविता को भी अपनी नई-नई समष्टियाँ खोजनी-बनानी-उच्चारनी होंगी – सिर्फ दो चीज़ें नहीं बदलेंगी, बदलने नहीं दी जाएँगी – सारी कायनात में जो श्रेयस्कर है उसे सर्वथा बचाने में सहयोग और जो कुछ भी उसे नष्ट करना चाहे उसे पूरे पूर्वाग्रह के साथ नष्ट कर डालने का समर्थन. 1964-67 के बीच मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के कारण हिंदी कविता ने जो सघन एजेंडा हासिल किया, 1970 के दशक की पीढ़ी ने उसका लगभग कल्पनातीत, किन्तु अधिक व्यावहारिक, अनुप्रयोज्य विस्तार करना शुरू किया और कविता की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए अभिव्यक्ति के सभी खतरे उठाने की अप्रत्यावर्ती सीमाओं तक पहुँचा दिया; इस तरह आज मौजूद सारी प्रासंगिक कवि-पीढ़ियों के सामने जहाँ सृजनशीलता के अक्षुण्ण संसार खोल दिए गए, वहीं सार्थक, प्रतिबद्ध, उत्कृष्ट कविता लिख पाना एक चुनौती-भरा उपक्रम बन गया. इस दुनिया में प्रवेश सब का था, शर्त सृजन-संकल्प और अपनी जगह खुद खोजने-बनाने की थी.

जब हम यह कहते हैं कि 1980 के दशक के युवा कवियों को मुक्तिबोध-रघुवीर सहाय-1970-79 की कविता उपलब्ध थी तो हम यह भी मान रहे होते हैं कि उनका परिचय प्रत्यक्ष या परोक्ष, गंभीर या सरसरी तौर पर 1950-60-70 के दशकों की वृहत्तर कविता से भी रहा होगा. यह तीस वर्ष सहज ही आधुनिक हिंदी काव्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण, केन्द्रीय वर्ष कहे जा सकते हैं जिनमें मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद को छोड़कर तीनों बड़े ‘छायावादी’, तीनों सप्तकों के सारे कवि, अनेक क्लासिकल और नव-प्रगतिवादी कवि, राष्ट्रवादी और स्वच्छंदतावादी कवि, ’नई कविता’ के कवि,’ आधुनिकतावादी’ कवि, ’नवगीतात्मकतावादी’ कवि, ’अकविता’ के कवि, अनेक प्रकार के ‘मंचीय’ कवि, सक्रियतावादी वामपंथी कवि और फिर उपरोक्त ’70 की दहाई के अपेक्षाकृत युवा कवि, अपनी-अपनी प्रासंगिकताओं-अप्रासंगिकताओं के साथ, कभी एक ही अवधि में कभी अलग-अलग, कभी समूहों में कभी व्यष्टिक, मौजूद थे. यूँ तो कोई भी ‘दशक’ किसी भी पंचांग, तिथि और घड़ी से सुनिर्धारित नहीं होता, फिर वह पिछले ‘दशक’ का ‘विस्तार’ और आगामी ‘दशक’ का ‘स्रोत’ ही होता है, यानी जब तक कोई असंदिग्ध एलियटीय ‘संवेद्यता-विच्छेद’ (‘डिसोसिएशन ऑफ़ सेंसिबिलिटी’) न हो तब तक सारी कथित समय-अवधियाँ अलग लगती हुई भी एक-दूसरी से गुँथी हुई ही होती हैं, फिर भी उपरोक्त तीस वर्षों का कविता- काल-खंड, सब कुछ के बावजूद, हैमिंग्वे के पैरिस-जैसा “मूवेबिल फ़ीस्ट” था, जब, वर्ड्सवर्थीय शब्दों में, “ब्लिस इट वाज़ इन दैट डॉन टु बि अलाइव, बट टु बि यंग वाज़ वैरी हैवन !”

काव्यलोक का विस्तार और वैविध्य ‘निराला’, शमशेर, भवानीप्रसाद, त्रिलोचन, मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय में अलग-अलग मिज़ाज और मात्रा का है लेकिन उनमें से ‘निराला’ और शमशेर ने अपेक्षाकृत संकोचहीनता से अपने निजी ब्यौरों,  हताशाओं,पराजयों को छिपाया नहीं, उनकी तरसप्रेरक नुमाइश नहीं की – औरों ने भी नहीं की – क्योंकि उन्होंने स्वयं को अवतार-पुरुष या अतिमानव नहीं बल्कि आम इंसान ही बताया. काव्य में वैविध्य केवल बाह्य का नहीं, आंतरिक या ‘आत्म’ अथवा ‘स्व’ का भी है और यह मात्र कोई आध्यात्मिक योगमुद्रा नहीं है, इसका वास्ता बहुत ‘सांसारिक’ मनोलोक से है. संस्कृत का कवि तो निर्वैयक्तिक है, वह अपने जीवन, मनोलोक, भावनाओं की बात तो दूर, अपना नाम तक सार्वजनिक करने में संकोच करता है. उसने एलिअट से सदियों पहले व्यक्तित्व-विलोपन कर रखा था. अपनी विचारधारा, आस्था, पक्षधरता, विद्रोह, जय-पराजय, परिवेश, अपराध-बोध, आत्मकथा के ब्यौरे आदि हिंदी में पहली बार इतने दो-टूक और निस्संकोच रूप से शायद कबीर में आते हैं, कुछ मीरा में, आंशिक रूप से तुलसीदास के मानसेतर काव्य में और उसके बाद इतनी शिद्दत से ‘निराला’ में. फिर हिंदी कविता अनेक तरीकों से अपने निजी संघर्षों को भी मुखरित करने की सारी पर्दादारी तर्क कर देती है. उर्दू शाइरी का एक हिस्सा हमेशा-से इकबालिया रहा है लेकिन हिंदी में बाकायदा वैसा हुए अभी सौ बरस भी नहीं हुए हैं. अब हिंदी कवि सिर्फ खुद को नहीं देखता बल्कि अपने निकटतम परिवार,मित्रों,परिचितों-अपरिचितों, पहले और आख़िरी बार मिल या दिख जानेवालों, सजीव-निर्जीव वस्तुओं-प्राणियों,घटनाओं,स्थितियों ’स्टिल लाइफ़’ – गोया जितनी भी मुमकिन हो उतनी दुनिया - को अपनी कविता में जगह और ज़ुबान देने लगता है. यह प्रक्रिया,जो ‘मैक्रो’ और ‘माइक्रो’ दोनों स्तर पर है, ’70 के दशक से कविता को अधिकाधिक लोकतंत्रीय और वैश्विक बनाने लगती है और वाक़ई सिद्ध कर देती है कि कविता के क्षेत्र में प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवि के लिए कुछ भी और कोई  भी वर्जित, ’आउट ऑफ़ बाउन्ड्स’ नहीं है. ब्रह्माण्ड में कुछ भी अकाव्यात्मक नहीं है – जो कविता में है वही बाहर है और जो कविता में नहीं है वह कहीं नहीं है. कविता में वर्ग-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, जाति-भेद, लिंग-भेद, धर्म-भेद नष्ट होने लगते हैं.

पिछले साठ वर्षों से हिंदी कविता का स्थायी, अभिभावी मिज़ाज जन-पक्षधरता का रहा है, भले ही अधिकांश कवि पार्टी-या यूनियन-सदस्य न हों न होना चाहें, न क्लासिकल या नव-मार्क्सवाद पढ़े हों, बल्कि कुछ  पढ़ना भी न चाहते हों – एक आधारभूत साम्यवाद तो हमेशा मानवता में रहा है और रहेगा - यहाँ तक कि उनमें से कुछ को अलग-अलग कारणों से मार्क्स और मार्क्सवादियों से एक स्वस्थ नफ़रत हो या वे उन्हें कुछ कुतूहल और परिहास-भाव से देखते हों. इसका एक कारण तो यही है कि अधिकांश घटिया पत्रिकाओं में और सभी परिवारों के वामपंथी लेखक-संघों में धूर्त, मौक़ापरस्त, छद्म, कैरिअरवादी और शुद्ध मूर्ख मार्क्सबाज़ पापे छा गए. इनमें अकादमिक ग़ैर-अकादमिक ‘आलोचक’ भी घुस गए हैं. ज़ाहिर है लेखन भी इन ढोंगियों से बचा न होगा. लेकिन साहित्य में अब भी कुछ ऐसा है, और इसकी तफ़्तीश और विश्लेषण बहुत मनोरंजक  हो सकते हैं, कि जो ‘होक्स’ और ‘फ्रॉड’ हैं वे भी जानते-मानते हैं कि कौन असली है और कौन उनकी (व्यापक) बिरादरी का. मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि कलाकार के रूप में आप अपना सर्वोत्तम और मार्क्सवादी के रूप में अपना क्रूरतम नैतिक देने की महत्तम कोशिश नहीं करते तो आप न तो सही आर्टिस्ट हैं न सही मार्क्सिस्ट.

शनिवार, 31 मई 2014

जो बच गया हूॅं, वह हूँ

'पुस्‍तक-वार्ता' के, नवीनतम अंक में, मेरे सबसे पुराने मित्रों में शामिल, राकेश श्रीमाल ने मुझसे एक स्‍तंभ लिखवा लिया। कि गुजारी गई शामों के बारे में एक लेखक के नजरिए से कुछ याद करूँ, बात करूँ। टिप्‍पणियों में दर्ज उस आलेख का एक संपादित रूप यहॉंं।

जो बच गया हूँ, वह हूँ

जीवन की स्मृतियों में से शामों को याद करना  एक साथ किंचित खुशी, अनंत अवसाद, ढलती लालिमा और असमाप्य उदासी की सुरंग में धँसने जैसा  है। सारी शामें एक-दूसरे में बेतरह उलझी हुई हैं। उन्हें सुलझाया भी नहीं जा सकता। न उनमें से किसी एक को स्मृति या उदाहरण की तरह उठाया जा सकता है। विस्मृत सी, अधिकांश धुँधली शामों से सिर्फ एक नाजुक कोलाॅज बनाया जा सकता है। जो मामूली स्पर्श से भी बिखरकर एक नई संरचना में बदल जाएगा। जैसे कोई कैलाइडोस्कोप। जरा घुमाया तो नितांत एक नयी आकृति और नया संयोजन। और फिर आती हुई रातें, जैसे वे शाम का आँचल पकड़कर आती हैं।
रातों को शामों से परे करना उन्हें अधूरेपन में देखना है।

मेरी शामों में रातें एक अनिवार्य हिस्सा हैं। नक्स-वोमिका के मरीजों के एक खास लक्षण की तरह मेरी सुबहें आलस्य से भरी रहती हैं और शाम आते-आते मैं पूरी तरह चैतन्य हो जाता हूँ। बहरहाल।
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(एक)
धूल उड़ रही है। गोधूलि।
घरवालों की आवाजों से गली भर गई है। वे चाहती हैं कि सारे खेल बंद करके, सारी गपशप बंद करके बच्चे वापस घरों के भीतर आ जाएँ। आँगन में इतने लोग हैं, इतनी आपाधापी और हाहाकार है कि घर में भीतर जाना यातना है। अपनी आजादी को अचानक खो देना है।
तो भीतर जाइए, सबको अपनी शकल दिखाइए और फिर चुपके से वापस गली में या ओसारे में आइए। लेकिन अब बाहर सुनसान है। लोग हैं लेकिन बच्चों का सुनसान है। जो जगह इतने सारे दोस्तों से, खेलों से और अजीब कारनामों से भरी हुई थी, वहाँ अब ठंडी धूल है। और अँधेरा।
फिर शुरू होती है घर के भीतर ही कोई सुनसान और एकांत खोजने की कोशिश। अकसर सफल कोशिश। बच्चों की चिंता सबको है मगर बच्चा घर में ही, यहीं कहीं है, इतने भर से काफी निश्चिंतता। उसी निश्चिंतता में से बच्चे का एकांत निकल आता है।
पास ही आम के पेड़ों का बगीचा है।
तीन कुएँ हैं। दो सूखे।
एक में मुश्किल पानी है जिसे आसान बनाने की अनवरत कोशिश सब लोग करते रहते हैं।
एक कमरे में अनाज का ढेर है और दूसरे में भूसा ही भूसा।

ये सब बातें दरअसल जीवन की शाम के कठिन रूपक में बदलने के लिए अभिशप्त हैं।

(दो)
शाम आते ही पहली मुश्किल शुरू होती है। कि आखिर इस शाम का क्या किया जाए। एक खाली जगह दिखती है, निर्वात। अंतरिक्ष। यदि इसे ठीक तरह की चीजों से, क्रियाशीलता से, सरगर्मियों से, वार्तालाप से, किसी अनोखी गतिशीलता से, संगीत या गोताखोरी से नहीं भर दिया गया तो यह निर्वात, यह अंतरिक्ष मुझे निगल लेगा, अपने में ही समो लेगा। और मजे की बात है कि शामें मुझे अकसर निगल लेती हैं। इस तरह मैं, हजारों शामों द्वारा उदरस्थ किया जाकर, जो बच गया हूँ, वह हूँ।

शामों में अन्यथा इतनी चहल-पहल, धूल, भागमभाग, आवाजें, धुआँ, गंध, शीत, बारिश, कीचड़, जद्दोजहद, उमस या ओस है और ढलती हुई हर क्षण कमजोर होती रोशनी है कि जितना विस्मय होता है उससे अधिक बेचैनी। इस तरह ये शामें मुझे अपने जीवन का भी श्वेत-श्याम चित्रपट जैसी लगती रही हैं।

(तीन)
थोड़ा सा आराम मिलता है यदि इन शामों में बाहर मैदान में जाने का मन और मौका मिल जाए। और उन्हें धीरे से रात में तबदील होता देखा जाए। शाम के धुँधलके में एक-एक करके तारों को उगते हुए देखना। फिर चाँद को खोजना। जो कभी दिखता है, कभी नहीं। जो कभी जरा सा दिखता है और कभी एकदम पूरा। फिर उस होती हुई नयी नवेली, किशोर रात्रि के रंग में रंगे हुए अपने पूरे आसपास को देखना। सब कुछ किसी रहस्य में डूबा हुआ और उसमें से उबरने की इधर-उधर दिखती छटपटाहट। कई तरह की रोशनियाँ। ज्यादातर मद्धिम। कुछ कतारबद्ध और ज्यादातर छिटपुट बिखरी हुईं।

बस, इस तरह से भी शामों को अपने ऊपर से गुजर जाने दिया जा सकता है। कभी वे रौंदती हुई चली जाती हैं और कभी नाजुक ख्यालों से लदी हुईं और भारहीन।
और एक अनंत रात मेरे सामने होती है। जो मेरे लिए शाम का ही एक बेहतर विस्तार है।

(चार)
इसलिए यह अप्रत्याशित नहीं होना चाहिए कि शमशेर बहादुर सिंह की यह काव्य-पंक्ति अकसर ही संध्याओं, समय की संधि बेला में कौंधने लगती हैः ‘टूट मत ओ साँझ के पत्थर
                                                                                      हृदय पर’  
ऐसी भी शामें हैं जो कभी किताबों में या फिल्मों में बीत गईं। संगीत ने कुछ दूर तक सहारा दिया। जिन्होंने साँझ के पत्थर को हृदय पर गिरने से थाम लिया, स्थगित कर दिया।

यात्राओं, कामकाज, नींद और थकान के खाते में भी हजारों शामें हैं। करीब पाँच बरस की शामें तो पास के कस्बों से नौकरी से लौटते हुए बस में बीतीं। और वे तमाम संध्याएँ थकान, भूख और नींद के तत्वों से मिलकर बनती रहीं। लेकिन वे उबाऊ नहीं थीं। बीच-बीच में जो चैतन्य अवस्था, आलस्य में भी जो चमक रहती थी, उसमें बहुत ताकत और कल्पनाशीलता के झोंके थे।

(पाॅंच)
जैसे ही शाम आती है, मैं लगभग अचेत और अकेला हो जाता हूँ। इस अर्थ में कि मुझे पता नहीं रहता कि मैं जीवित हूँ या मर गया हूँ। इस मायने में भी कि मुझे सूझ पड़ना कम हो जाता है और मैं अवश किसी तंद्रा की तरफ जाता हूँ और वहाँ न जाऊँ, इस उपाय में एक तरह की रस्साकशी चलती रहती है। बस की यात्राओं के बीच सर्जनात्मकता को अपवाद मान लिया जाए तो घर में रहकर या अन्य कहीं मेरे लिए किसी भी शाम में कभी लिखना-पढ़ना, खासतौर पर लिखना असंभव सा है। मैं किसी अनजाने चक्रवात में पत्ते की तरह घूमता हूँ।

थोड़ी देर में यह शाम का बगूला बैठ जाएगा और मैं भी धीरे-से एक जगह थमकर वापस अपनी डाल पर वापस लग जाऊँगा। जैसे कभी टूटा ही नहीं था, जैसे कभी किसी बगूले के साथ नाचा ही नहीं था। जैसे वह एक स्वप्न था और अब यह असल जीवन है।

मैं अकेली शामों का और अकेली रातों का ही सर्वाधिक शुक्रगुजार हूँ।
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शुक्रवार, 16 मई 2014

मैं क्यों गया था बनारस क्रांति करने*



विष्‍णु खरे जी की यह टीप प्राप्‍त हुई है, इसे इसलिए भी यहॉं प्रस्‍तुत किया जा रहा है कि इधर-उधर की तमाम रिपोर्ट्स के बीच, यह एक सीधा हस्‍तक्षेप है। इस बीच चुनाव परिणाम भी आ चुके हैं और भाजपा की, बजरिये मोदी जी, अभूतपूर्व जीत तय हो चुकी है। बहरहाल।

मैं क्यों गया था बनारस क्रांति करने* 
विष्णु खरे

चुनाव-परिणाम आने में अब चंद घंटे रह गए हैं और वे उससे बहुत ज़्यादा अलग या अप्रत्याशित नहीं होंगे जो (पिछले वर्ष अप्रैल से) मैं और कुछ अन्य लोग लिखते-कहते आ रहे हैं.फिर भी जब मृत्यु को अपरिहार्य जानते हुए भी हर प्राणी उससे मुकाबला करने की कोशिश करता है – और यह नतीज़े भी एक तरह की मौत हो सकते हैं – तो उन्हें टालने या बदलने के जतन भी हुए हैं.
अभी चार मई को बनारस के कबीर-मठ प्रांगण में मुख्यतः हिंदी और उत्तर भारत के कथित वामपंथियों और प्रगतिकामियों की एक सभा बुलाई गई थी जिसके संचालक-नियामक  युवा कवि-नाट्यकर्मी तथा राजनीतिक सक्रियतावादी व्योमेश शुक्ल थे.उन्होंने किसी तुफैल में मुझे भी इस बैठक में दावत के क़ाबिल समझा,हालाँकि तीन मई को मुझे  देर रात तक मुंबई में जागना था और मैंने कहा भी था कि मेरा पहुँच पाना नामुमकिन-सा है.लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे आना ही होगा और किसी भी तरह हवाई जहाज़ से ही आ जाऊं,किराया लौटा दिया जाएगा.
वामपंथियों की इस सभा में,जिसमें पिछले बीसियों वर्षों से सुपरिचित नाम और चेहरे थे और जो अब सानुपातिक ढंग से ज़्यादा थके,अधेड़ या बूढ़े चुके थे,जिनमें बनारस के एक दर्ज़न भी  आम वोटर नहीं थे,नरेन्द्र मोदी को बीसियों बार छपे आंकड़ों,तथ्यों और रपटों से सौवीं बार बेनकाब या नंगा किया गया.कई बार तालियों और ‘शेम,शेम’ आदि का विजय-नाद हुआ.अपनी-ही बिरादरी और खाप के बंधुआ श्रोताओं को मोदी के बारे में भयावह चेतावनियाँ दी गईं.सभी एकमत थे कि बनारस से मोदी को नहीं आने देना है.
लेकिन इस बात पर भी लगभग सर्वसम्मति थी कि यह बनारस के मतदाताओं के नैतिक विवेक पर छोड़ देना है कि वे किसे वोट दें.बनारस के किसी पिछले चुनाव की,उसमे डाले गए वोटों की,उसमें जीते और हारे प्रत्याशियों की,मत-विभाजन और पैटर्न की कोई भी बात

वर्जित-सी थी.बनारस के इस विश्व-विख्यात मुक़ाबले के Realpolitik पर कोई भी चर्चा एक मौन सुलह में taboo मान ली गयी थी.किसी ने भी यह नहीं बताया कि यदि बाक़ी सभी कुछ वोटर की अंतरात्मा और आत्म-निर्णय पर छोड़ देना है तो उसे मोदी को क्यों नहीं जिताना है यह भी उसके ज़मीर और निजी फैसले पर क्यों न छोड़ दिया जाए ?
इसलिए जब मैंने पहली बार स्पष्ट कहा कि बनारस में यदि मोदी को कोई हरा सकता है तो अपने हत्या-बलवे आदि के सारे संदिग्ध  इतिहास के बावजूद वह कांग्रेस का अजय राय ही हो सकता है और हर प्रगतिकामी बुद्धिजीवी को स्थिति के सारे contradictions देखते हुए भी साफ़-साफ़ इस मुक़ाबले में कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय का समर्थन करना चाहिए तो वह भाग-दौड़ और अफ़रा-तफ़री मच गयी जो भेड़ों के रेवड़ में अचानक किसी भेड़िए के कूद जाने से मचती होगी.वह माहौल बन गया जो पंक्तिपावन ब्राह्मणों की सभा में किसी अन्त्यज के वेद-पाठ से बनता होगा.एक पूरा गिरोह अपनी भोजनोत्तर ऊंघ से जाग कर इस अनिर्णय में खड़ा हो गया कि मंच की ओर,जहाँ मैं अपनी सम्पूर्ण निर्लज्ज धृष्टता में जमा हुआ था,बढ़े या न बढ़े.
इस बीच में एक शख्स ने,जिसका ज़िक्र बाद में आएगा,बदहवास आकर कहा कि मैं अपना वक्तव्य हरगिज़ वापिस न लूं,और तुरंत उस छोटी-सी भीड़ में गायब हो गया.
बहरहाल,सभा दोबारा रिरियाती हुई शुरू हुई, मोदी-विरोधी मर्मभेदी निर्गुण भजन गाए गए,’’छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के’’ पर झूम-थिरक कर मोदी और उसके समर्थकों में आतंक और भय का संचार किया गया,एक नुक्कड़-नाटक के ज़रिये  मोदी की ज़मानत जब्त करवाई गयी और दास्तानगोई से – ‘सूफ़ियाना कलाम’ के बाद यह साला एक नया फ्रॉड ड्राइंगरूमी कॉकटेली वामपंथियों ने नाज़िल किया है – फ़तह का सारा किस्सा तमाम किया गया.
पाँच मई को व्योमेश ने मुझसे पूछा कि क्या मैं शाम को बेनीबाग के चलते रास्ते पर मुसलमानों के लिए होनेवाली एक कांग्रेस-समर्थक मोदी-विरोधी खुली नुक्कड़ मीटिंग में बोलना चाहूंगा,जिसमें अजय राय सहित एक मुस्लिम केन्द्रीय मंत्री – जिनका नाम मैं अब तक नहीं जानता – मौजूद रह सकते हैं तो मैंने फ़ौरन हामी भर दी,कांग्रेसी नेताओं की संभावित उपस्थिति के कारण नहीं, बल्कि एक एकदम नए तज्रिबे की खातिर.


किन्हीं ईसाभाई द्वारा संचालित,उन्हीं की दूकान की एक ख़तरनाक बड़ी होर्डिंग के नीचे,एक चौराहे सरीखे तिराहे पर,जिसके , एक ओर बनारस की एक व्यस्ततम सड़क थी और मंच से बिल्कुल लगी हुई एक उतनी ही व्यस्त गली थी और दोनों पर सारे वाहन,सारे औरत-मर्द बनारसिए, जिनमें अनेक मुस्लिम थे,विशेष गश्ती पुलिस-दस्ते वगैरह आ-जा रहे थे.मैं पहले भी ऐसी खुली सभाओं में फंस चुका हूँ इसलिए मेरे लिए इस बस्टर कीटन-चार्ली चैपलिन स्थिति में कुछ भी नया न था.यूँ भी ऐसे मरहले आदमी की ज़िंदगी में बार-बार पेश नहीं होते.
मंच बच्चों और बड़ों से भरा हुआ था.कुछ शुरूआती जोशीली तकरीरों के बाद उपरोक्त मुस्लिम केन्द्रीय मंत्री – जिनका नाम मुझे अब भी याद नहीं आ रहा – नमूदार हुए और शायद दक्षिण भारतीय होते हुए भी ठीक-ठाक हिन्दुस्तानी बोले.जब वह जा चुके और अजय राय आशंकानुसार नहीं ही आए  तो मेरी बारी आई.मैंने अपने अधिकांश अदृश्य,शायद आसपास के घरों और दूकानों में बैठे हुए,मुस्लिम श्रोताओं को आगाह किया कि मोदी की आमद दूसरी पार्टियों को भी एक ‘डिक्टेटर’ को अपना नेता बनाने की प्रेरणा दे सकती हैं और सारा देश हिटलरवाद की राह पर जा सकता है.यह भी कहा कि मोदी को बनारस से हराने का दारोमदार मुसलमानों पर है.अगर वे कांग्रेस को अपना इकट्ठा वोट दें तो सारे हिन्दू-मुसलमान वोटों के आगे मोदी हार सकता है.मेरे इस भाषण का खुलासा अगले दिन दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के सम्पादक ने प्रकाशित कर मुझ पर उपकार किया.
ऊपर जिस शख्स के बारे में कहा गया है कि उसने मुझसे मेरा कबीरमठ  बयान वापिस न लेने को कहा था वह भी इस मीटिंग में मंडरा रहा था और मेरा वीडिओ उतार रहा था.उसने फिर अपने ब्लॉग ‘जनपथ’ ‘junputh’ पर ऐसा वर्णन किया जैसे मैं मंच पर नशे में चढ़ा-उतरा.इसका जवाब मैं उसी ब्लॉग पर दे चुका हूँ.लेकिन बनारस उन दिनों इस संकर नस्ल के बेहद संदिग्ध ‘पत्रकारों’,ब्लॉगियों,फ़ोटोग्राफ़रों और कैमरामैनों से बजबजा रहा था.ये वहाँ किन एजेंसियों,’फिल्म-निर्माताओं’ आदि  के लिए क्या काम क्यों कर रहे थे इसका पता लगाना मुश्किल था,ज़रूरी भी नहीं था, लेकिन यदि आप इस मशकूक आदमी का ब्लॉग देखें तो साफ़ मालूम हो जाएगा कि यह एक लुम्पेन agent-provocateur है जो रावण की तरह अपने ग्यारहवें रासभ-मुख से बोलता है.इसके साथ इसी की किमाश का एक और उचक्का था.


मेरे इस ‘बनारस-अभियान’ को एक अंतिम सार्थक सफलता स्थानीय ‘अमर उजाला’ के सम्पादक,वर्षों पहले जयपुर ‘नवभारत टाइम्स’ में मेरे सहयोगी,शब्द-शोधक अजित वडनेरकर और उनके विशेष संवाददाता अजय राय ने तब उपलब्ध करवाई जब उन्होंने ‘मोदी बरक्स कांग्रेस’ को लेकर मुझसे एक अपेक्षाकृत लम्बी  बातचीत राहुल गाँधी के  रोड-शो के दिन प्रकाशित की जब मैं शहर छोड़ चुका था.सुना है उसे बहुत पढ़ा और पसंद किया गया.
मैं नहीं समझता कि बनारस में मेरी चार दिनों की उपस्थिति और उपरोक्त हरकतों से मोदी का एक भी वोट कटा या अजय राय को एक वोट ज़्यादा पड़ा.आशंका तो यह है कि कहीं उल्टा न हुआ हो.मुझे तसल्ली है तो सिर्फ़ इस बात की कि इन दिनों,जब अधिकांश हिंदी लेखक कारणविशेषों से एकदम चुप हैं और अधिकांश युवा ब्लॉगिये गुदाभंजन की अपनी विभिन्न stages में अभिनय कर रहे हैं कि देश में कुछ घट ही नहीं रहा है,मैं कुछ,प्रतीकात्मक,अपने आप और बेकार,करने का मौक़ा हासिल कर सका.
और अंत में यह कि अपने जीवन में मैं कभी कांग्रेस पार्टी से सम्बद्ध नहीं रहा,उसका या उसके किसी नेता का मैं एक नए पैसे का भी देनदार नहीं हूँ,मेरे जीवन को बनाने में उसका कोई योगदान नहीं है,नेहरू के ज़माने में भी मुझे कांग्रेस पार्टी से नफरत ही थी, जो लगातार बढ़ती रही है,मैं कांग्रेस का दलाल,एजेंट या मुखबिर नहीं हूँ.मैं मानता हूँ कि भारत की जनता की दुर्दशा के लिए मुख्यतः कांग्रेस और कुछ दूर तक वामपंथी दल भी ज़िम्मेदार हैं और इस वक़्त उन्हें जो सज़ा मिल रही है वह उचित है.मैं भारत में प्रबुद्ध सशस्त्र मार्क्सवादी क्रांति के अलावा कोई रास्ता देख नहीं पाता.लेकिन मोदी,उसकी पार्टी और उसके संघ और उनके सहयोगियों को जो दूसरी ताक़तें परास्त कर सकें उनसे अवसरोचित रणनीतिगत समझौता करने या उनका समर्थन करने में कोई गुरेज़ नहीं करता.

·       शीर्षक रघुवीर सहाय की पंक्ति ‘मैं क्यों गया था काबुल क्रांति करने’ से प्रेरित है.