पिछले दो दशकों से रवीन्द्र व्यास मेरे प्रिय हैं। दोस्ती मेरे इंदौर प्रवास में लिखने पढ़ने की वजहों से हुई। और जल्दी ही मामला पारिवारिक हदों तक हुआ। और अब हम एक-दूसरे को लगातार 'मिस' करते हुए, अलग-अलग शहरों में रह रहे हैं।
रवि कम लिखता है, महत्वाकांक्षा उसे जैसे छू भी नहीं गई है। उसे प्रेरित करने के लिए कम से कम एक क्विंटल प्रेरणा चाहिए। फिर भी वह अपनी रौ में लिखता है। जिद करके पेंटिंग सीखी और अर्जित की। उसने जैसे हम सबको बताया कि प्रतिभा से कहीं अधिक आकांक्षा,निश्चय और प्रतिबद्धता मायने रखती है। जलरंग माध्यम में, एक ही रंग में जो उसने काम किया है वह विशाल हरे, नीले, लाल चुंबक की तरह खींचता है। वह उतना बड़ा चुंबक तो है ही जितना कि कोई विशाल ग्रह हो सकता है। उसके चित्रों में संगीत और कविता का रंग शामिल है।
बहरहाल, उसके कम लिखे हुए गद्य में भी काव्य तत्व निवास करते हैं और उस गद्य को एक नयी, अप्रतिम हार्दिकता प्रदान करते हैं। उसे वाक्य लिखने की तमीज है। वह जीवन के उत्स से अपना गद्य संभव करता है। विजुअल्स बनाता है और मार्मिक गद्य हमारे सामने होता है।
रवि पर और उसके साथ बिताए समय पर,हमारे सैंकड़ों दिनों और रातों पर मैं कुछ ज्यादा लिख सकता हूं, लिखना चाहता हूं लेकिन अभी मैं उसके ब्लॉग http://ravindravyas.blogspot.com/ में से ही एक छोटा सा टुकड़ा यहां रख रहा हूं। यह पुनर्प्रकाशन है लेकिन यह आनंद को प्रसारित करना भी है।
जिंदगी से बेदखल पसीने की गंध
रवीन्द्र व्यास
मेरे पिता के पसीने की गंध अब भी मेरे मन में बसी है। वे हमेशा पैदल चलते थे और उन्होंने कभी साइकिल तक नहीं चलाई। उनके बचपन का एक फोटो मैंने अब तक संभाल कर रखा है जिसमें वे तीन पहिए की साइकिल पर बैठे हैं। उन्होंने मुझे बहुत कम गोद में उठाया। संयुक्त परिवार में होने के कारण माँ हमेशा रसोईघर में रहती और मुझे मेरी बड़ी बहनें संभालती।
मुझे याद है, बचपन में खेलते हुए जब मेरे दाहिने पैर के अँगूठे का नाखून उखड़ गया तो पिता ने मुझे गोद में उठाया और सिख मोहल्ले के डॉक्टर सिंह के क्लिनिक ले गए क्योंकि उस दिन शायद डॉक्टर फाटक नहीं थे जो हमारे परिवार के सभी सदस्यों का इलाज करते थे।
मैंने रोते हुए पिता के कंधे पर अपना सिर रखा था और दर्द को सहते हुए मुझे पिता के पसीने की गंध भी आ रही थी। उसमें सरसों के तेल की गंध भी शामिल थी क्योंकि पिता कसरत के पहले मालिश किया करते थे।
हमारा घर बहुत छोटा था। बहनें जब कभी बाहर जाती, मेरी पीठ के पीछे कपड़े बदल लिया करती थीं। मेरी पीठ उनके लिए छोटा-सा कमरा थीं। कई बार जल्दबाजी में वे कपड़े ऐसे पटकती कि वे मेरे सिर पर गिरते थे। उनके पसीने में राई-जीरे से लगे बघार की गंध होती थी। उनके पसीने की गंध मैं भूला नहीं हूँ।
और दुनिया में कौन ऐसा बच्चा होगा जो अपनी माँ के पसीने की गंध को भूल सकता है।
और आज खुशबू का करोड़ों का कारोबार है, जिंदगी से पसीने की गंध को बेदखल करता हुआ। एक विज्ञापन बताता है कि एक खुशबू में इतना आकर्षण, सम्मोहन और ताकत है कि दीवारों में लगी पत्थर की हूरें जिंदा होकर चुपचाप मंत्रमुग्ध-सी उस बाँके युवा के पीछे चल पड़ती हैं जिसने एक खास तरह के ब्रांड की खुशबू लपेट रखी है।
अब तो हर जगह को नकली खुशबूओं ने घेर रखा है। शादी हो या कोई उत्सव, या चाहे फिर कोई-सा प्रसंग नकली खुशबुओं का संसार पसरा पड़ा है। जिसको देखो वह बाजार में सजी नकली खुशबू में नहाया निकलता है। मजाल है जो कहीं से पसीने की गंध आ जाए। और अब तो खुशबूएँ कहाँ नहीं हैं। वे हमारी गोपन जगहों पर भी पसरी पड़ी हैं क्योंकि अब बाजार में कंडोम भी कई तरह की खुशबू में लिपटे मिलते हैं।
मैं जहाँ कहीं, किसी कार्यक्रम में जाता हूँ तो लोग नाना तरह की खुशबू में नहाए मिलते हैं। इन समारोह में कई ऐसे दृश्य भी दिखाई देते हैं जहाँ पिता अपने बच्चों को ढूँढ़ रहे हैं, माँएँ अपने बच्चों को गोद में बैठाकर आईसक्रीम खिला रही हैं या फिर बहनें अपने छोटे भाई का हाथ पकड़कर उसे नूडल्स के स्टॉल की ओर ले जा रही हैं। और ये सब नकली खुशबू में नहाए खाते-पीते खिलखिला रहे हैं।
खुशबू के फैले इस संसार में क्या उस बच्चे को अपने पिता, माँ या बहन के पसीने की गंध की याद रहेगी?
कुमार अम्बुज
शनिवार, 28 जनवरी 2012
बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012
जैसे विरोध करने की कोई उम्र होती है
इधर लगातार एक अनुभव हो रहा है, प्रत्यक्ष हो रहा है कि हमारे अनेक प्रगतिशील, जनवादी लेखक दक्षिणपंथी संस्थाओं, सत्तासीन लोगों के साथ मंचासीन होने में कोई परहेज नहीं बरत रहे हैं। बल्कि लगता है कि वे इससे गौरवान्वित, सम्मानित और प्रसन्न हैं। और इसके लिए अपने तर्क भी गढ़ चुके हैं। इनमें से अनेक वे अग्रज हैं जो हमें प्रतिबद्धता, संघर्ष,प्रतिरोध, वामपक्ष और प्रतिवाद का पाठ पढ़ाते रहे हैं। ये लोग तय कर रहे हें कि यह कविता, जो करीब एक दशक पहले लिखी गई थी, वह कहीं अधिक प्रासंगिक बनी रहे, उसे ये दुखद रूप से जैसे सिद्ध कर रहे हैं।
जैसे विरोध करने की कोई उम्र होती है
बेकार है इस उम्र में किसी तरह का विरोध करना
एक बेटी अभी तक है अनब्याही
जब उम्र थी कई लोगों से ले ली बुराई
अब ठीक यही हिलमिल कर गुज़ारें जीवन
क्या पता कब क्या मुश्किल आए
अस्पताल भी जाना पड़ सकता है आधी रात में
अपने बच्चे ही नहीं सुनते जब कोई बात
तब क्या परिषदों, अधिकारियों, अकादमियों से टकराना
क्या नारेबाजी और क्या भृकुटि को तलवार बनाना
मुद्दा ठीक है लेकिन जिसके खिलाफ़ है
उससे मेरे अड़तीस साल पुराने संबंध
समर्थन भी तो मित्रता का ठहरा एक आधार
फिर भी देता मैं तुम सबका साथ लेकिन देखो
अब तो मुझे खाँसी भी आती है बहुत
हाथ काँपते हैं ज्ञापन पर दस्तखत भी मुश्किल
इधर अब तो मेरी प्रतिष्ठा भी यही हो चली है:
वरिष्ठ हैं, चुप रहते हैं, ग़म खाते हैं।
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जैसे विरोध करने की कोई उम्र होती है
बेकार है इस उम्र में किसी तरह का विरोध करना
एक बेटी अभी तक है अनब्याही
जब उम्र थी कई लोगों से ले ली बुराई
अब ठीक यही हिलमिल कर गुज़ारें जीवन
क्या पता कब क्या मुश्किल आए
अस्पताल भी जाना पड़ सकता है आधी रात में
अपने बच्चे ही नहीं सुनते जब कोई बात
तब क्या परिषदों, अधिकारियों, अकादमियों से टकराना
क्या नारेबाजी और क्या भृकुटि को तलवार बनाना
मुद्दा ठीक है लेकिन जिसके खिलाफ़ है
उससे मेरे अड़तीस साल पुराने संबंध
समर्थन भी तो मित्रता का ठहरा एक आधार
फिर भी देता मैं तुम सबका साथ लेकिन देखो
अब तो मुझे खाँसी भी आती है बहुत
हाथ काँपते हैं ज्ञापन पर दस्तखत भी मुश्किल
इधर अब तो मेरी प्रतिष्ठा भी यही हो चली है:
वरिष्ठ हैं, चुप रहते हैं, ग़म खाते हैं।
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सोमवार, 26 दिसम्बर 2011
ऋणग्रस्तता
आईसाहित्य http://bit.ly/w3ij4v पर एक साक्षात्कार है। http://bit.ly/w3ij4v
इसका एक अंश यहां।
प्रश्न: कविता को चुनने के पीछे कोई विशेष कारण , प्रभाव ? एक कवि के तौर पर आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन कौन से रचनाकार रहे जिन्हें आपने अपने शुरुआती दिनो में पढ़ा और उनसे बेहद प्रभावित हुये ?
उत्तर: मैं कविता ही लिख सकता था। एक संवेदना, एक विचार और एक दृश्य मुझ पर जैसे झपट्टा मारता था। उस आवेग का प्रतिफलन कविता में होता था। रामचरितमानस की अनेक भावप्रवण और उपमाओं, रूपकों से भरी पंक्तियों का प्रारंभ में मेरे ऊपर काफी प्रभाव रहा है। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ते हुए वामपंथ और माक्र्सवाद से गहरा परिचय हुआ।
यों एक रचनाकार पर अपने आसपास की हर चीज का, हर शब्द का और हर ध्वनि का प्रभाव पड़ता है। वह ऋणग्रस्त ही है। वह दस हजार तत्वों से मिलकर बनता है। रोज बनता रहता है। उसे किसी एक दो प्रभावों में न्यून नहीं किया जा सकता। सबसे ज्यादा प्रभाव तो अपने बचपन का, स्मृतियों का, अपनी असहायताओं, जिज्ञासाओं और असमर्थताओं का होता है। जैसे एक कवि कविता लिखते हुए इन सब पर विजय पाना चाहता है या इन्हीं में घुलकर कोई नया पदार्थ बन जाना चाहता है। मुझे लगता है कि एक कहानीकार, उपन्यासकार या आलोचक की तुलना में कवि इस संसार में कहीं अधिक मिस फिट और अवसादग्रस्त व्यक्ति होता है। अधिक संवेदित, स्पर्शग्राही, और कहीं अधिक भावुक और विश्वासी। एक कवि बार-बार धोखे खा सकता है, एक कवि को किसी अन्य रचनाकार की तुलना में कहीं अधिक आसानी से ठगा जा सकता है। यह उसकी कोई प्रशंसा, निंदा या प्रशस्ति नहीं है, बस एक स्वभाव और बनावट पर ध्यानाकर्षण है। हालाँकि सजग, चतुर और चालाक कवियों की भी उपस्थिति हो सकती है लेकिन मैं उन्हें आपवादिक मानता हूँ।
प्रश्न: आपकी अतिक्रमण (2002) कविता संग्रह के बाद आपका एक गद्य इच्छाए (2008) प्रकाशित हुआ। क्या इस बीच के समय को आपने विशेष रूप से गद्य (कहानियो) को दिया ? आप गद्य हमेशा से लिखते थे लेकिन आपने अचानक से इन्हें प्रकाशित करने का निर्णय कैसे लिया ? क्या लिखते समय आप प्रकाशन या किसी निश्चित समय में इसे पूरा करने के बारे में सोचते हैं?
उत्तर: मैं विनम्रता लेकिन दृढता से कहना चाहता हूँ कि कहानियाँ मैंने इसलिए लिखीं कि मैं पिछले दस-पंद्रह साल की अधिसंख्य हिंदी कहानियों के गद्य से बेहद निराश था। उनकी कृत्रिमता, नाटकीयता, इतिवृत्तामत्कता, अलौकिकता, इतिहास की कोई घटना या दुर्लभ बीमारियों के संदर्भ से बनाया गया कथासार, उनकी स्थूलता, विद्रूपता, शिल्प की अतिरिक्त सजगता, महीनता, काम चित्रावली और बौद्धिकता से मैं, अपनी तरह का एक पाठक, थक गया था। वे बहुत से शब्दों से बनी हुई विशाल, बड़बोली कहानियाँ थीं जिन्हें लिखनेवाला किसी उच्चतर जगह पर बैठा सृष्टा था। मुझसे वे पढ़ी भी नहीं जाती थीं। उनमें सब कुछ था बस सहजता, संबंध, जीवन का उत्स, सच्ची निराशा, अपराधबोध, मार्मिकता और अवसाद गायब था। वे महान कहानियाँ थीं और उनमें साधारण चीजें, रोजमर्रा का जीवन और आपाधापी अनुपस्थित थी। उनमें गद्य का एक अच्छा, स्वाभाविक पैराग्राफ खोजने पर भी नहीं मिलता था। यद्यपि ढर्रे में लिखा गया विपुल गद्य। प्रसंगों और घटनाओं के लिए आविष्कृत बरसों पुराना बासी गद्य। एक अच्छा वाक्य खोजने के लिए, कथा में जीवन, उत्साह, आलोचना, अस्वीकार और स्क्रीनिंग के लिए मुझे एक चौथाई सदी पीछे, ज्ञानरंजन के पास जाना पड़ता था। मैं महज अपना एक प्रतिवाद रखना चाहता था। एक शिकायत और एक इच्छा। मैं आलोचक की तरह यह काम करने में समर्थ नहीं था इसलिए मेरे पास इसका कोई सर्जनात्मक उपाय ही मुमकिन था। मैं नहीं कह सकता कि क्या कुछ मैं कर पाया लेकिन उसे एक रचनात्मक आकांक्षा और असहमति की तरह भी देखा जा सकता है।
प्रश्न: अपनी नये कविता संग्रह “ अमीरी रेखा” के बारे में कुछ बताइये । इसके शीर्षक के पीछे भी गहरी सामाजिक समस्या का अनुभव होता हैं । इस कविता संग्रह में आपकी किस तरह की कविताओ का संग्रह हैं? आज के समय आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार , कमजोर होता लोक तंत्र और हमारे सामाजिक जीवन में संस्कृति व सभ्यता का पतन कुछ बुनियादी मुद्दे हैं तो क्या ये कविता संग्रह इन सब को सामने लाने की कोशिश हैं क्योंकि ये संग्रह आपका उस समय आया हैं जब वाकई हर जगह इन समस्याओ पर क्रोध हैं ।
उत्तर: किसी कालखंड में लिखी कविताएँ अपने समय और समाज से प्रतिकृत होती ही हैं। अमीरी की रेखा कोई हो नहीं सकती और उसकी पड़ताल करना मुश्किल है। वह प्रवृत्तियों में, अमानुषिकता और पूँजीवादी विचार में कहीं खोजी जा सकती है। और ऐसे तमाम प्रत्यय हैं, विडंबनाएँ और विषमताएँ हैं जो इधर समाज में बढ़ती जा रही हैं लेकिन उन पर विमर्श गायब है। बहस के, विचार के गलियारों से भी वे बहिष्कृत हैं। मुझे अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते ये सब चीजें कहीं अधिक विचारणीय लगती हैं, संवेदित करती हैं, परिचालित करती हैं। याद रखने की बात है कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिकता, समानता और समाजवाद की चाह अभी अप्रासंगिक नहीं हुई है। इन सबको एक ग्लोबल ओट में रखा जा रहा है।
इसका एक अंश यहां।
प्रश्न: कविता को चुनने के पीछे कोई विशेष कारण , प्रभाव ? एक कवि के तौर पर आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन कौन से रचनाकार रहे जिन्हें आपने अपने शुरुआती दिनो में पढ़ा और उनसे बेहद प्रभावित हुये ?
उत्तर: मैं कविता ही लिख सकता था। एक संवेदना, एक विचार और एक दृश्य मुझ पर जैसे झपट्टा मारता था। उस आवेग का प्रतिफलन कविता में होता था। रामचरितमानस की अनेक भावप्रवण और उपमाओं, रूपकों से भरी पंक्तियों का प्रारंभ में मेरे ऊपर काफी प्रभाव रहा है। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ते हुए वामपंथ और माक्र्सवाद से गहरा परिचय हुआ।
यों एक रचनाकार पर अपने आसपास की हर चीज का, हर शब्द का और हर ध्वनि का प्रभाव पड़ता है। वह ऋणग्रस्त ही है। वह दस हजार तत्वों से मिलकर बनता है। रोज बनता रहता है। उसे किसी एक दो प्रभावों में न्यून नहीं किया जा सकता। सबसे ज्यादा प्रभाव तो अपने बचपन का, स्मृतियों का, अपनी असहायताओं, जिज्ञासाओं और असमर्थताओं का होता है। जैसे एक कवि कविता लिखते हुए इन सब पर विजय पाना चाहता है या इन्हीं में घुलकर कोई नया पदार्थ बन जाना चाहता है। मुझे लगता है कि एक कहानीकार, उपन्यासकार या आलोचक की तुलना में कवि इस संसार में कहीं अधिक मिस फिट और अवसादग्रस्त व्यक्ति होता है। अधिक संवेदित, स्पर्शग्राही, और कहीं अधिक भावुक और विश्वासी। एक कवि बार-बार धोखे खा सकता है, एक कवि को किसी अन्य रचनाकार की तुलना में कहीं अधिक आसानी से ठगा जा सकता है। यह उसकी कोई प्रशंसा, निंदा या प्रशस्ति नहीं है, बस एक स्वभाव और बनावट पर ध्यानाकर्षण है। हालाँकि सजग, चतुर और चालाक कवियों की भी उपस्थिति हो सकती है लेकिन मैं उन्हें आपवादिक मानता हूँ।
प्रश्न: आपकी अतिक्रमण (2002) कविता संग्रह के बाद आपका एक गद्य इच्छाए (2008) प्रकाशित हुआ। क्या इस बीच के समय को आपने विशेष रूप से गद्य (कहानियो) को दिया ? आप गद्य हमेशा से लिखते थे लेकिन आपने अचानक से इन्हें प्रकाशित करने का निर्णय कैसे लिया ? क्या लिखते समय आप प्रकाशन या किसी निश्चित समय में इसे पूरा करने के बारे में सोचते हैं?
उत्तर: मैं विनम्रता लेकिन दृढता से कहना चाहता हूँ कि कहानियाँ मैंने इसलिए लिखीं कि मैं पिछले दस-पंद्रह साल की अधिसंख्य हिंदी कहानियों के गद्य से बेहद निराश था। उनकी कृत्रिमता, नाटकीयता, इतिवृत्तामत्कता, अलौकिकता, इतिहास की कोई घटना या दुर्लभ बीमारियों के संदर्भ से बनाया गया कथासार, उनकी स्थूलता, विद्रूपता, शिल्प की अतिरिक्त सजगता, महीनता, काम चित्रावली और बौद्धिकता से मैं, अपनी तरह का एक पाठक, थक गया था। वे बहुत से शब्दों से बनी हुई विशाल, बड़बोली कहानियाँ थीं जिन्हें लिखनेवाला किसी उच्चतर जगह पर बैठा सृष्टा था। मुझसे वे पढ़ी भी नहीं जाती थीं। उनमें सब कुछ था बस सहजता, संबंध, जीवन का उत्स, सच्ची निराशा, अपराधबोध, मार्मिकता और अवसाद गायब था। वे महान कहानियाँ थीं और उनमें साधारण चीजें, रोजमर्रा का जीवन और आपाधापी अनुपस्थित थी। उनमें गद्य का एक अच्छा, स्वाभाविक पैराग्राफ खोजने पर भी नहीं मिलता था। यद्यपि ढर्रे में लिखा गया विपुल गद्य। प्रसंगों और घटनाओं के लिए आविष्कृत बरसों पुराना बासी गद्य। एक अच्छा वाक्य खोजने के लिए, कथा में जीवन, उत्साह, आलोचना, अस्वीकार और स्क्रीनिंग के लिए मुझे एक चौथाई सदी पीछे, ज्ञानरंजन के पास जाना पड़ता था। मैं महज अपना एक प्रतिवाद रखना चाहता था। एक शिकायत और एक इच्छा। मैं आलोचक की तरह यह काम करने में समर्थ नहीं था इसलिए मेरे पास इसका कोई सर्जनात्मक उपाय ही मुमकिन था। मैं नहीं कह सकता कि क्या कुछ मैं कर पाया लेकिन उसे एक रचनात्मक आकांक्षा और असहमति की तरह भी देखा जा सकता है।
प्रश्न: अपनी नये कविता संग्रह “ अमीरी रेखा” के बारे में कुछ बताइये । इसके शीर्षक के पीछे भी गहरी सामाजिक समस्या का अनुभव होता हैं । इस कविता संग्रह में आपकी किस तरह की कविताओ का संग्रह हैं? आज के समय आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार , कमजोर होता लोक तंत्र और हमारे सामाजिक जीवन में संस्कृति व सभ्यता का पतन कुछ बुनियादी मुद्दे हैं तो क्या ये कविता संग्रह इन सब को सामने लाने की कोशिश हैं क्योंकि ये संग्रह आपका उस समय आया हैं जब वाकई हर जगह इन समस्याओ पर क्रोध हैं ।
उत्तर: किसी कालखंड में लिखी कविताएँ अपने समय और समाज से प्रतिकृत होती ही हैं। अमीरी की रेखा कोई हो नहीं सकती और उसकी पड़ताल करना मुश्किल है। वह प्रवृत्तियों में, अमानुषिकता और पूँजीवादी विचार में कहीं खोजी जा सकती है। और ऐसे तमाम प्रत्यय हैं, विडंबनाएँ और विषमताएँ हैं जो इधर समाज में बढ़ती जा रही हैं लेकिन उन पर विमर्श गायब है। बहस के, विचार के गलियारों से भी वे बहिष्कृत हैं। मुझे अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते ये सब चीजें कहीं अधिक विचारणीय लगती हैं, संवेदित करती हैं, परिचालित करती हैं। याद रखने की बात है कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिकता, समानता और समाजवाद की चाह अभी अप्रासंगिक नहीं हुई है। इन सबको एक ग्लोबल ओट में रखा जा रहा है।
सोमवार, 12 दिसम्बर 2011
डायरी : इधर उधर से बरामद कुछ कविताएं
प्रेम के दिन
पतझड़ से, मुसकराहटों से भरे
खुशी से लथपथ, चोट खाये हुए
घायल और क्षितिज पर टँगे
धूल झाड़कर हर बार खड़े तुम्हारे सामने
कभी घूरते हुए, कभी बिसूरते
कभी कंधे पर हाथ रखकर चलते
उनके बिना किसी का कोई जीवन नहीं।
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जैविक क्रिया
जिस वक्त को
व्यर्थ गवाँए वक्त की तरह याद करता हूँ
जैसे कहीं किसी प्रतीक्षा में, यों हीं ऊँघते हुए
कैरम खेलते या क्रिकेट देखते
या टूँगते हुए तारे या पत्थर या दीवार
वही वक्त किसी बोये गए बीज की तरह
यकायक प्रकट होता है डालियों से भरा पूरा
जब मैं होता हूँ सबसे ज्यादा निष्फल
सबसे ज्यादा असहाय।
00000
वजहें
किसी लेखक की तरह देखो अपना शहर
एक कवि, चित्रकार की निगाह से देखो अपना देश
तुम्हें अनगिन घाव दिखेंगे
उधड़ी हुयी खाल और चकत्ते
और बहता हुआ मवाद
और वे आदमी भी जो खदेड़ दिए गए हैं
और वहीं तुम्हें दिख सकती हैं वे वजहें भी
जो तुम्हारे नगर पालिका अध्यक्ष, विधायक
या सांसद बने रहने में हैं।
00000
यह एक पौधा
जबकि हर चीज किसी न किसी की व्यक्तिगत संपत्ति है
इन सबके बीच यह एक पौधा बच गया है
जो फिलहाल सार्वजनिक है
इसे मैं निर्भय उमगकर छूता हूँ।
000000
स्थगित अभिव्यक्तियाँ
शब्द भी प्रतीक्षा करते हैं और राह तकते हैं
उन्हें अभिवादन करते हुए
मुझे अपनी दिनचर्या में जाना पड़ता है
मैं लौटता हूँ तो वे सीढि़यों पर मिलते हैं
मुझे राह देते हुए रेलिंग की तरफ सट जाते हैं
फिर वे मेरे कमरे में आ जाते हैं
एक तरफ घुटने मोड़कर बैठेते हैं निशब्द
वे साथ नहीं छोड़ते, पीछा भी नहीं करते
बस आसपास बने रहते हैं
और कभी कभी देखते हैं इस तरह
कि मैं उनसे बस कुछ कह दूँ।
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कवि परंपरा
इस जीवन में
इस दुनिया में कुछ कमी है
वह क्या है जो नहीं है?
क्या है वह जो अटूट है, अनंत है?
आप बताना चाहते हैं तो लिखते हैं, कहते हैं
फिर लिखते हैं, फिर कहते हैं
फिर लगता है
ठीक से कुछ भी नहीं कहा जा सका
ठीक से कुछ भी नहीं लिखा जा सका
अब आप फिर से शुरू करते हैं
यह परंपरा है
यही कवि का जीवन है।
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पतझड़ से, मुसकराहटों से भरे
खुशी से लथपथ, चोट खाये हुए
घायल और क्षितिज पर टँगे
धूल झाड़कर हर बार खड़े तुम्हारे सामने
कभी घूरते हुए, कभी बिसूरते
कभी कंधे पर हाथ रखकर चलते
उनके बिना किसी का कोई जीवन नहीं।
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जैविक क्रिया
जिस वक्त को
व्यर्थ गवाँए वक्त की तरह याद करता हूँ
जैसे कहीं किसी प्रतीक्षा में, यों हीं ऊँघते हुए
कैरम खेलते या क्रिकेट देखते
या टूँगते हुए तारे या पत्थर या दीवार
वही वक्त किसी बोये गए बीज की तरह
यकायक प्रकट होता है डालियों से भरा पूरा
जब मैं होता हूँ सबसे ज्यादा निष्फल
सबसे ज्यादा असहाय।
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वजहें
किसी लेखक की तरह देखो अपना शहर
एक कवि, चित्रकार की निगाह से देखो अपना देश
तुम्हें अनगिन घाव दिखेंगे
उधड़ी हुयी खाल और चकत्ते
और बहता हुआ मवाद
और वे आदमी भी जो खदेड़ दिए गए हैं
और वहीं तुम्हें दिख सकती हैं वे वजहें भी
जो तुम्हारे नगर पालिका अध्यक्ष, विधायक
या सांसद बने रहने में हैं।
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यह एक पौधा
जबकि हर चीज किसी न किसी की व्यक्तिगत संपत्ति है
इन सबके बीच यह एक पौधा बच गया है
जो फिलहाल सार्वजनिक है
इसे मैं निर्भय उमगकर छूता हूँ।
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स्थगित अभिव्यक्तियाँ
शब्द भी प्रतीक्षा करते हैं और राह तकते हैं
उन्हें अभिवादन करते हुए
मुझे अपनी दिनचर्या में जाना पड़ता है
मैं लौटता हूँ तो वे सीढि़यों पर मिलते हैं
मुझे राह देते हुए रेलिंग की तरफ सट जाते हैं
फिर वे मेरे कमरे में आ जाते हैं
एक तरफ घुटने मोड़कर बैठेते हैं निशब्द
वे साथ नहीं छोड़ते, पीछा भी नहीं करते
बस आसपास बने रहते हैं
और कभी कभी देखते हैं इस तरह
कि मैं उनसे बस कुछ कह दूँ।
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कवि परंपरा
इस जीवन में
इस दुनिया में कुछ कमी है
वह क्या है जो नहीं है?
क्या है वह जो अटूट है, अनंत है?
आप बताना चाहते हैं तो लिखते हैं, कहते हैं
फिर लिखते हैं, फिर कहते हैं
फिर लगता है
ठीक से कुछ भी नहीं कहा जा सका
ठीक से कुछ भी नहीं लिखा जा सका
अब आप फिर से शुरू करते हैं
यह परंपरा है
यही कवि का जीवन है।
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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011
यात्रा के अंत में मितली
रस्किन बाण्ड, जैसा कि मैंने अपने अधिसंख्य लेखक मित्रों से बात करके जाना कि हिन्दी में बहुत प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ, अंग्रेजी में लिखनेवाले, भारतीय लेखक की तरह स्वीकार नहीं किए जाते हैं। एक आदरणीय, लोकप्रिय, चर्चित, फ्रीलांसर और औसतन पठनीय लेखक की तरह ही हिन्दी में उनकी सहज स्वीकृति है।
रस्किन के यहॉं संभवतः कहानी में कला, यथार्थ, समकालीनता और गल्प में नए अन्वेषण का वैभव अनुपलब्ध है। खास तरह के परिवेश और सीमित परिधि के विषयों, खासकर आत्मकथात्मकता के साथ लिखी गईं उनकी ज्यादातर कहानियॉं इसका प्रमाण हो सकती हैं। लेकिन मुझे रस्किन की साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत किताब ‘देहरा में आज भी उगते हैं हमारे पेड़’ कुछ कारणों से पसंद है।
पहला तो यही कि वरिष्ठ कवि सौमित्र मोहन ने इसका प्रशंसनीय अनुवाद किया है। उन्होंने जैसे रस्किन के अंग्रेजी में लिखे को ‘हिंदी में ही लिखित’ बना दिया है। इससे जो गद्य पैदा हुआ है, वह आकर्षक है, हृदय में बस जानेवाला है। दूसरी विशेषता यह है कि रस्किन अपनी इन कहानियों में अनेक मार्मिक वाक्य लिख सके हैं। एक ऐसा गद्य जो कहानी या उपन्यास या संस्मरणात्मक लेखन वगैरह की कोटि से ऊपर होता है और अपने अनूठेपन और औचकपन के कारण उस पूरी विधा को ही सहारा देकर किसी अप्रतिम जगह तक ले जाता है। बावजूद शेष लचर काया के।
एक बात और, इन कहानियों के आरंभिक और अंत के वाक्य प्रायः ऐसे हैं जो सुंदर, संवेदनशील और हार्दिक गद्य से ही संभव होते है। कई बार एक सूचनात्मक वाक्य भी निजी चमक रखता है। कुछ नमूने यहॉं पेश हैं, यह याद करते हुए कि रस्किन अपनी सीमाओं में ही सही, अपने लघु सीमांत में ही सही, मेरे जैसे पाठकों के लिए आकर्षक और पठनीय हैं। हम कई बार एक अच्छे वाक्य के लिए, अच्छे गद्य और उसके अप्रत्याशित विन्यास के लिए उन यात्राओं पर भी चले जाते हैं जो वैसे कठिन और सम्मोहक नहीं दिखती हैं।
बहरहाल, जायजे के लिए इस पुस्तक से उनकी कहानियों के पहले या अंतिम कुछ वाक्य-
‘किसी यात्रा के अन्त में महसूस होनेवाली हल्की सी मितली का संबंध शायद उस पहली घर वापसी से हो, जब मैं अपने पिता की मृत्यु के बाद लौटा था।’
‘मेपलवुड को छोड़े हुए मुझे बहुत साल नहीं हुए हैं लेकिन इस खबर से मुझे कतई हैरानी नहीं होगी कि वह कॉटेज अब नहीं रहा।’ ‘एक संघर्षशील लेखक के लिए यह पुराना कॉटेज बहुत उदार था।’
‘जावा की रानी में अभी फूल आए ही थे कि जकार्ता पर पहले बम गिरे और गलियों में फैले मलबे पर चटख गुलाबी फूल बिखरे दिखाई देने लगे।’
‘आप जहाँ भी जाते हैं या जो कुछ भी करते हैं, ज्यादातर वक्त आपकी जिन्दगी तो आपके दिमाग में ही बीत रही होती है। उस छोटे कमरे से बच पाना मुमकिन नहीं!’
‘मैंने जब देहरा छोड़ा था, तब उन्होंने और रामू ने जरूर यही सोचा होगा कि पक्षियों की तरह मैं भी दोबारा लौटूँगा।’
‘आजादी, मुझे अब लगने लगा था, वह चीज है, जिसके लिए लगातार आग्रह करते रहना होता है।’
‘मैं पैदल चलते हुए अपने होटल पहुँचा। मुझे इसका पूर्वबोध हो चला था कि मैं अपनी माँ से आखिरी बार मिल रहा हूँ।’
‘पेड़ भी तो हार चुके हैं, हाँ जब वे नीचे गिरते हैं तो गरिमा के साथ गिरते हैं। चिन्ता न करें। मनुष्य तो आते जाते रहते हैं, पहाड़ स्थायी हैं।’
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रविवार, 17 जुलाई 2011
सब कुछ एक साथ नहीं
कुछ पुरानी डायरी या कहें कि नोटबुक में से दो टुकड़े।
26.01.1998
इधर मैं उनमुक्त नहीं रह पा रहा हूँ जैसा कि मुझे रहना चाहिए।
एक मनुष्य अपने जीवन में सब कुछ एक साथ नहीं बन सकता। अर्थात् घोड़ा, बनिया, राक्षस, गणितज्ञ, लेखक, दुकानदार, संगीतकार, अनंत ज्ञान का स्वामी या कुछ और। इनमें से उसे कुछ न कुछ छोड़ देना होगा अथवा उससे छूट ही जाएगा। इनमें से एक-दो हो जाना और शेष न हो सकना, सफलता-असफलता के दायरे से बाहर है।
मैं अपनी सामर्थ्य और सीमाओं के साथ, एक कवि का ही जीवन जीना चाहता हूँ। यह कितना कठिन है। कितना अलभ्य। मुझे किस कदर बुलाता हुआ। यह एक रहस्यमयी पुकार है। धुंध और अँधेरे से आती हुई। कोहरे से आती हुई और कितनी स्पष्ट। कितनी आल्हादकारी!
इच्छा भर होना, प्राप्त होना तो नहीं है। लेकिन मैं इस आकांक्षा का शुक्रगुज़ार होता हूँ।
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तारीख नहीं। शायद 1993।
‘अगर तुम अपनी आकांक्षाओं के रास्ते में आने वाली हर चीज को खतम कर दोगे तो एक दिन पाओगे कि तुम बहुत अकेले हो गए हो..... और (आखिर में) पाओगे कि फिर कोई आकांक्षा भी नहीं बची रह गई है।’
-(एक फिल्म को देखते हुए आया ख्याल।)
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बुधवार, 13 जुलाई 2011
सर्जनात्मक अराजकता
सर्जनात्मक अराजकता
नागार्जुन की कविता पर एक संक्षिप्त टीप
एक कवि के लिए विस्मय, चुनौती और प्रेरणा भी, तीनों नागार्जुन के पास जाने पर मिलेंगे।
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नागार्जुन की कविता पर एक संक्षिप्त टीप
एक उक्ति का सार है कि लेखकों को अपना घर ज्वालामुखियों के किनारे बनाना चाहिए। इसकी व्यंजना और ध्वनि मुक्तिबोध के कथन के इस आशय तक भी आती है कि सच्चे लेखकों को अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होते हैं। बीसवीं सदी की समूची हिन्दी कविता में नागार्जुन ही एक मात्र कवि हैं जो इस तरह यायावरी करते हैं कि जहां जाते हैं वहां अपना घर और ज्वालामुखी साथ लेकर चलते हैं और अभिव्यक्ति के समस्त संभव खतरों से गुजरते हैं।
इन खतरों को निराला, मुक्तिबोध जैसे कवि भी उठाते हैं, नागार्जुन के सामने भी प्रस्तुत समय के सभी अंतर्विरोध, अमानुषिकता और सत्ता की शक्ति के भयावह रूप उपस्थित थे, साथ ही व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयां। इनके बीच कविता लिखना, सर्जक की तरह सक्रिय रहना किसी लेखक के मन में अनेक तरह की निराशाएं, भय और आशंकाएं भर सकता है, लेकिन इनके बरअक्स नागार्जुन कभी भी, किसी भी स्थिति में ‘पैरानोइया’ के लक्षणों से ग्रस्त नहीं होते। वे अपने कविकर्म में अपवाद स्वरूप भी अपना आत्मविश्वास, प्रतिरोध, प्रतिबद्धता और आशावाद कभी नहीं छोड़ते।
कबीर के साथ उनके आराध्य राम का, एक तरह की आध्यात्मिकता का संबल था लेकिन नागार्जुन सिर्फ और सिर्फ आमजन, शोषित बहुजन के संबल के सहारे ही एक अराजक सर्जनात्मकता को मुमकिन करते हैं। नागार्जुन का अध्यात्म यही जनता थी। उनकी समूची कविता में अनवरत एक ऐसी अराजकता विद्यमान है जो विशिष्ट और जनोन्मुखी सर्जनात्मकता का प्रादुर्भाव करती है। अधिकांश जगहों पर वह उनकी कविता में विन्यस्त विचारों में देखी जा सकती है और अन्य अनेक स्थलों पर भाषा, छंद और रूप के निर्माण और उल्लंघन में भी।
उनकी कविता में इस अराजकता का गहरा रचनात्मक मूल्य है इसलिए वह अकविता की शब्दावली में या किसी शून्यवाद में या तेज-तर्रार भाषा भर में गुम नहीं हो जाती। वह क्रोध, अपमान, मोह, आशा और घृणा के विवेक से संचालित है। जैसे ये पंचतत्व हैं जो उनकी कविता को बनाते हैं।
विषयों की दृष्टि से देखें तो नागार्जुन की कविता सर्वाधिक अप्रत्याशित, प्रतिबंधित और अनुपयुक्त क्षेत्रों में चली जाती है। सुअर, भुटटे, चूडि़यां, बादल, इंदिरा गांधी, नक्सलवाद, हरिजन, अकाल, मंत्र, जूतियां, खेत, विपल्व, बंदूक- इन कुछ शब्दों के सहारे अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी कविता की यात्रा किस हद तक बीहड़, जनोन्मुखी और अनुपमेय थी। जबकि काव्य विषय संबंधी ये शब्द उनकी काव्यधर्मिता का दशमलव एक प्रतिशत भी नहीं हैं।
उनकी कविताएं और उनका जीवन बता सकता है कि वे लगातार खुद को डि-क्लास करते हैं। अपना प्रतिरोध भी डि-क्लास होकर ही दर्ज करते हैं। उनकी कविता ‘एक्टिविस्ट’ है। सक्रिय, सचेतन और आबद्ध है। वह विचार, नारा और उक्ति को एकमएक कर देती है। वह समकालीनता की प्रामाणिक अभिव्यक्ति भी है जो अपने समकालीनता के बाड़े को, उसकी परिधि को लांघ जाती है। लेकिन वह अपने समय को दिनांकित करती चली जाती है। इसलिए उनकी कविता में अपने समय की राजनैतिक और सामाजिक घटनाओं को साक्ष्य की तरह और एक रचनाकार की व्याख्या की तरह भी देखा जा सकता है। बल्कि उसे एक क्रम में रखकर देखने से उसका एक ऐसा सामाजिक-राजनैतिक इतिहास लेखन संभव है जो सत्ता संरचनाओं के प्रतिरोध से उत्पन्न है।
वे कवि की ओर से लगातार एक ‘गजट’ प्रकाशित करते जाते हैं। वे समकालीनता को एक शक्ति में, विराट गतिशील रूपक और टकराहट में बदल देते हैं। वे अलसाये, अघाए, निश्चेष्ट, कलावादी और आत्मदया से लबरेज कवियों में लज्जा भर सकते हैं।
जादुई यथार्थवाद के तमाम रचनात्मक तामझाम के बीच मुझे यह विचित्र आकर्षण और अचरज का विषय लगता रहा है कि नागार्जुन ने ऐसे सीधे, अक्षुण्ण और बींधते यथार्थ को सामने रखा जिसने एक नए तरह का जादू अपनी तरह से संभव किया। यह यथार्थवादी जादू है। यह प्रगतिवादी और जनवादी जादू है। यह जनपक्षधरता, जनप्रतिबद्धता और जनसमूह के बीच खड़े रहने का, उसमें विश्वास का जादू है। यह कला और कविता का जादू है। यह अनलंकृत होने का और अभिव्यक्ति के साहस का और दृष्टिसंपन्नता का जादू है। यह उस भाषा का जादू है जो जनता के कारखाने में बनती है, जो महज साहित्य से साहित्य में प्रकट नहीं होती। यह अनुभव और जनसंघर्षों में भागीदारी का जादू है।
हिन्दी में अच्छी प्रेम कविताओं का अभाव सा है। जो कुछ बेहतर कविताएं हैं, उनमें नागार्जुन की कविता ‘वह तुम थीं’ अविस्मरणीय है। ‘कर गई चाक, तिमिर का सीना, जोत की फांक, वह तुम थीं’। इन शब्दों में मितव्ययी होने का और शब्दों से कुछ अधिक कार्यभार संपन्न करा लेना भी अविस्मरणीय है। यह कविता एवं प्रकृति के उपादानों से लिखी अन्य अनेक कविताएं हमें नागार्जुन के उस उदात्त, प्रेमिल, मानवीय और भावुक रूप का भी पता दे सकती हैं, जिसे नागार्जुन के संदर्भ में प्रायः विस्मृत सा कर दिया जाता है।
एक कवि के लिए विस्मय, चुनौती और प्रेरणा भी, तीनों नागार्जुन के पास जाने पर मिलेंगे।
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अराजकता,
नागार्जुन,
यथार्थवादी जादू
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