शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

पुलिस

यह कविता बीस बरस पहले, 1999 में लिखी गई थी।
'अतिक्रमण' संग्रह में संकलित है। बीच-बीच में इसका स्‍मरण हो ही जाता था, 
आज कुछ ज्‍यादा ही स्‍मरण करा दिया गया। पेश हैं कुछ अंश।
पुलिस

उनकी मुश्किलें भी अजीब थीं
नौकरी के घंटे थे इस तरह कि वे समझ नहीं पाते थे
कि रात के हिस्से की नींद को दिन में किस तरह पूरा किया जाए
और दिन भर की भाषा, इल्लत, जिल्लत को
जीवन के किस अँधेरे कोने में छोड़ दिया जाए

वे ऐसी जगहों में ऐसे लोगों के साथ काम करते थे
कि लगातार भूलते जाते थे वह बोली-बानी
जो मनुष्यों के बीच पुल बनाने के लिए
उन्हें इस दुनिया ने सिखायी थी
शुरुआत से ही उन्हें एक अक्षर मनुष्य के पक्ष में पढ़ाया जाता था
और एक हजार वाक्य मनुष्यता के खिलाफ़
यह सैकड़ों सालों में फैली एक अनंत योजना थी
जिसने उन्हें यह अंदाज़ा भी नहीं लगाने दिया
कि वे मुस्तैदी से करते हैं उन्हीं के किलों, नियमावलियों 
और कुर्सियों की हिफ़ाज़त जो उन्हें मनुष्य से बदल देते हैं हथियारों में

इसलिए यह होना ही था कि एक दिन 
उसने हर एक को अपराधी समझा, हर एक पर किया संदेह
उसके छूने भर से कुम्हला सकते थे खिले हुए फूल
गरीब और कमज़ोर पर उसका गुस्सा टूटकर गिरता था
उसकी निर्ममता के किस्से ऐसा कहा जाता है फ़िल्मों ने
दुस्साहसी पत्रकारों ने, भुक्तभोगियों ने
और कभी-कभार की मानवाधिकार आयोगों की रिपोर्टों ने
अतिरंजित कर दिए थे जबकि यह सच अपनी जगह है
कि उसकी क्रूरताओं के असली चेहरे कभी नहीं हो सकते उजागर

जो इक्के-दुक्के सिपाही या अधिकारी देशसेवा की क्षणिक झोंक में
या अपनी जान पर ही बन आने की विवशता में
सचमुच वीरता करते थे तो वह कुल पुलिस की कुल क्रूरता के
दस घात दस हजार टन वज़न के नीचे कराहती थी

दिलचस्प थी यह विडंबना कि अकसर समाज में लोग 
अपने बच्चों के लिए पुलिस वर्दी की कामना करते थे
एक अर्थ में वह शोहदों को, चोरों को, मुजरिमों को
समाज में ताक़तवर होने से रोकती थी
लेकिन इसका हिसाब अभी  है कि कितने अपराधियों को 
उसने बलशाली बनाया और पैदा किए कितने नए मुजरिम

थाना परिसरों में पवित्र समझे जाने वाले वृक्षों के होने
और पूजागृहों के बनाए जाने से
अत्याचारों के संबंधों को खोजा जाना कठिन नहीं है
आंदोलनों, रैलियों और जनता के इकट्ठा हो सकने के वक्त में
उसकी ज़रूरत सबसे ज्यादा पड़ती थी
यह स्थिति इतनी सहज, वैध और अपरिहार्य कर दी गयी थी
कि जनता को अपने दुखों को सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर करने से पहले
यह बताना ज़रूरी था कि वह इसके लिए कहाँ इकट्ठी हो रही है

सभ्य किस्म के विद्वान सोचते थे 
कि वे सुरक्षित हैं जो पुलिस समाज में बनी हुई है
लेकिन कभी दैवयोग से या किसी गली से गुज़रते हुए
या देर रात तारों को देखते हुए 
या फिर किसी दृश्य का हिस्सेदार होने भर की वजह से
उनका पुलिस से साबक़ा पड़ता था तो वे अपनी राय पर 
दहशत से भरे हुए लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं कर पाते थे

केवल इस उम्मीद में लोग उससे डरते थे
नमस्कार करते थे रास्ता छोड़ देते थे
या कतराकर निकल जाते थे कि शायद इस वजह से 
कभी मौका पड़ने पर उनसे थोड़ा कम दुर्व्यवहार किया जाएगा

कर्तव्यों का शानदार पालन करने के लिए पदक लेते हुए
पुलिसकर्मी भी ठीक-ठीक नहीं बता पाते थे
कि यह सम्मान उन्हें नृशंसता के लिए दिया गया है या शौर्य के लिए
उन्हें सूत्र वाक्य दिया गया था :निर्मम अत्याचार के बाद ही 
पता लगाया जा सकता है कौन अपराधी है और कौन नहीं
उन्हें यह अधिकार था कि किसी भी आम जन को
बंद कमरे में या बीच सड़क पर यातनाएँ दे सकें
हत्या को बदल सकें मुठभेड़ में
उनके पास वैधानिक औज़ार थे, धाराओं की बेड़ियाँ थीं
और आत्मा को निरंकुश बना देने वाला प्रोत्साहन

इस सबके बावजूद पुलिस से सताए लोगों को
उम्मीद होती थी कि न्याय उन्हें बचाएगा
और एक अंधी अनंत सुरंग में घुसकर
जितना प्रकाश पाया जा सकता था
न्याय उन्हें उतना बचाता था
सरकार को और सरकार की पुलिस को
न्याय का यह लक्षण सबसे ज़्यादा मालूम था
लेकिन जनता को इतनी रोशनी पर इतना ही भरोसा था
कि आख़िर एक दिन वह अपने जीवन की आज़ादी के आगे
पुलिस-बुलिस कुछ नहीं समझती थी।
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गुरुवार, 7 नवंबर 2019

ओल्गा तोकारचुक


''बिखरे हुए खिलौनों के बीच, खिड़की के पास, अँधेरे में, ठंडे कमरे में बैठी एक बच्ची।''
''यह वायदा है कि शायद हम अब सही समय और सही जगह पर नया जन्म लेंगे।"

ये ओल्गा तोकारचुक के उपन्‍यास 'फ्लाइट्स' के पहले और अंतिम दो वाक्‍य हैं, जिनके बीच विस्‍मयकारी, यथार्थ और कल्पनाशीलता के बीच संपन्नतादायक यायावरी है। वे इस सफर के जरिये बड़ा विमर्श संभव करती हैं। और धरती-आकाश को एक वैश्विक, जीवंत रंगमंच बना देती हैं। शुरुआत में बिंबात्मक वाक्य उभरता है:
                    ''अँधेरा: जैसे काली ओस की तरह आकाश से गिरकर हर चीज पर जमा हो रहा है।''                           इसे इधर के समय का रूपक भी माना जा सकता है।

'फ्लाइट्स' की घुमक्‍कड़ी को शताधिक छोटे-छोटे प्रसंगों और अध्यायों में लिखा गया है। संरचना दिलचस्प है और इसलिए पठनीयता भी। इस यात्रा में यायावर, जैसे अजनबियों की दयालुता और सहयोग पर निर्भर हैं, यह सफर अनजानी आशा और पारस्परिकता के विश्वास से आगे बढ़ता है। संगीतकार शोपाँ के हृदय की भी यात्रा इसमें शामिल है। वे एक मिथ को तोड़़ते हुए दर्ज करती हैं कि शोपाँ के अंतिम शब्द किसी प्रसन्नता के बारे में नहीं थे बल्कि जो उनके मुँह से आखिरी चीज निकली वह गाढ़ा, काला खून था। फिर वे मर गए। बाद में तो दिल की एक राहगीरी बचती है। लंबी, अनंत, कालावधि और दिक़ को लाँघती हुई। घर, पृथ्वी, दैहिकता, नश्वरता, समय और नक्षत्रों को समाहित करती, उसके पार जाती, आकाशंगगा को अपने रास्ते में लेती, एक साथ लौकिक और अलौकिेक खगो‍लीय यात्रा। एक विशाल तारामंडल भी साथ में है जिसमें मनुष्य ही नहीं, उसके तमाम अंग, अवयव, संत्रास और आकांक्षाएँ सहयात्री हैं।
अपने देश के संस्कृति मंत्री के इस वक्तव्य पर कि अब वे ओल्गा की किताबें पढ़ेंगे, ओल्गा दिलचस्प और ध्यातव्य बातें कहती हैं: 'मेरी किताबें हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं भी हो सकतीं। मैं लोगों का दिमाग खोलने, उसे विस्तृत करने के लिए लिखती हूँ, मैं सीधे कोई राजनैतिक लेखन नहीं करती क्योंकि मैं कोई राजनैतिक माँगें पेश नहीं करती, जीवन के बारे में लिखती हूँ लेकिन जैसे ही आप मनुष्य की जिंदगी के बारे में लिखते हैं, उसमें राजनीति आ ही जाती है।'
वे अपने देश पौलेण्ड के ऐतिहासिक अपराधों की भी या‍ददिलाही कराती हैं, 'मृतकों की हड्डियों पर तुम्‍हारा हल चलाओ', उपन्यास यही सब कहना चाहता है। यहाँ इस विडंबना की याद कर सकते हैं कि हमारे देश में आज किसी लेखक का ऐसा सब कहना कितना मुश्किल बनाया जा रहा है।
वे अपने देश के अँधेरे काल को विस्मृत नहीं कर देना चाहतीं, उस पर बहस चाहती हैं, उससे सबक चाहती हैं। किसी भी झूठे गौरव को परे हटाकर वे थोथे राष्ट्रवाद के खिलाफ अपना प्रबल पक्ष रखती हैं। मनुष्य की तमाम यातनाओं, हौसलों और विस्थापन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखती हैं। उनके लेखन की विशिष्टताओं में से यह एक चीज है।
शरीर संरचना विज्ञान कहता है कि मानव शरीर में सारटोरियस सबसे लंबी, ताकतवार माँसपेशी है, इसके बरअक्स ओल्गा का कहना है कि जीभ ही मनुष्य की माँसपेशियों में सबसे अधिक शक्तिशाली है। पुरस्कृत उपन्यास के एक संक्षिप्त अध्याय को वे 'बोलने' की जरूरत और महत्व पर केंद्रित करती हैं। बोलो-बोलो। बिना बोले कुछ नहीं हो सकता। जाहिर है इस बोलने में दूसरे का बोला हुआ सुनना भी शामिल है। यह संवाद और अभिव्यक्ति की ताकत रेखांकित करना है।
वे एक्टिविस्‍ट भी हैं। और प्रतिपक्ष की सहज भूमिका में हैं। खासतौर पर नारीवादी अधिकारों को लेकर। अपने इस बोलने और लिखने की वजह से वे लगातार राष्‍ट्रवादियों के और जुझारू देशभक्तों के निशाने पर रहती हैं लेकिन ओल्गा तोकारचुक का निशाना कहीं अधिक सटीक साबित होता है। संसार भर में लेखकों की यही स्थिति और सद्गति है। लेखक होना और बने रहना इसी तरह मुमकिन है।
अपने लेखन में वे परिकथाओं, लोककथाओं, कल्‍पनाओं, परिकल्पनाओं, मिथकों, विज्ञान, आशाओं, इच्छाओं, संस्मरण और इतिहास को एक साथ लेकर चलती हैं। यह नये संसार की चाहत है। वे अपने लेखन से पाठकों के दिमाग में बाजिव किस्‍म का संदेह पैदा करना चाहती हैं, वैचारिक उत्तेजना देना चाहती हैं। साहित्य का यही सच्चा मकसद भी है। 'फ्लाइट्स' के एक और चैप्‍टर में वे कहती हैं कि इस दुनिया को चिड़िया की आँख से देखने में और मेंढ़क की आँख से देखने में फर्क आ जाता है। लेखक को अपनी निगाह साफ और कुछ ऊँचाई पर रखना चाहिए।
उनको जब नोबेल पुरस्कार की सूचना मिली, वे जर्मनी की तरफ कार से सफर कर रही थीं। यह उनकी साहित्यिक यात्रा और 'फ्लाइट्स' की यायावरी का भी एक बिंब बन जाता है। उपन्यास के दो अध्याय- 'मैं यहाँ हूँ' और 'यहाँ हूँ मैं' के नाम से वे अपनी उपस्थिति मानो किसी यात्रा में घोषित करना चाहती हैं।
वे सचमुच यात्री हैं।
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[ओल्गा के 2007 में प्रकाशित इस 'फ्लाइट्स' उपन्यास को, अंग्रेजी अनुवाद के बाद 2018 में मैन बुकर पुरस्कार मिला था और इसी उपन्यास को मुख्‍य आधार बनाकर अभी 2018 का नोबेल पुरस्कार मिला है।
मैन बुकर पुरस्कार जीतनेवाली वे पहली पोलिश लेखक हैं। इस क्रम में याद कर लें कि 'फ्लाइट्स' पर ही उन्हें पौलेण्ड के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार 'नाईके' से सम्मानित किया गया था।
ऑस्ट्रियाई पीटर हैंडके 2019 के नोबेल विजेता हैं, जो एक नरसंहार के मामले में अपने बयान के कारण विवादास्पद रहे, उनकी तुलना में ओल्गा तोकारचुक का नाम अधिक स्वीकृतिपूर्वक ग्रहण किया गया है। वे पौलेण्ड से साहित्य में नोबेल पुरस्कार की छठवीं विजेता हैं।
इस बार स्वीडिश अकादेमी की घोषित इच्छाओं में से एक पूरी होती है: महिला लेखकों पर ध्यान दिया जाएगा। दूसरी घोषणा पर अमल प्रतीक्षित रहेगा : इसे कुछ कम यूरोप केंद्रित ('यूरो‍सेंट्रिक') रखा जाए।]


तुमने सितारों को जीत लिया है

| अकेले का विरोध |
तुम्हारी नींद की निश्चिंतता में
वह एक कंकड़ है
एक छोटा-सा विचार
तुम्हारी चमकदार भाषा में एक शब्द
जिस पर तुम हकलाते हो

तुम्हारे रास्ते में एक गड्ढा है
तुम्हारी तेज़ रफ़्तार के लिए दहशत
तुम्हें विचलित करता हुआ
वह इसी विराट जनसमूह में है

तुम उसे नाकुछ कहते हो
इस तरह तुम उस पर ध्यान देते हो

तुमने सितारों को जीत लिया है
आभूषणों, गुलामों, मूर्तियों
और खण्डहरों को जीत लिया है
तब यह छोटी-सी बात उल्लेखनीय है
कि अभी एक आदमी है जो तुम्हारे लिए खटका है
जो अकेला है लेकिन तुम्हारे विरोध में है

तुम्हारे लिए यह इतना जानलेवा है
इतना भयानक कि एक दिन तुम उसे
मार डालने का विचार करते हो
लेकिन वह तो कंकड़ है, गड्ढा है
एक शब्द है, लोककथा है, परंपरा है।
(कविता संग्रह - "अमीरी रेखा" से)

आज मैं वही सब कर रहा हूँ


मंगलेश डबराल की यात्राओं की दिलचस्प स्मृति लेखा पुस्तक 'एक सड़क एक जगह' में दर्ज
जापान के कवि सोइचिरो इवाकिरी की कविता, जो अनेक तरह से प्रासंगिक है:

"जीना लगातार तथाकथित स्व पर एक आघात है
आज मैं वही सब कर रहा हूँ जिसे कुछ दिन पहले
दूसरों को करते हुए देखकर चकित रह जाता था। ''


सर्वे के लिए कुछ सवाल


लेखक जो रोशनी और उम्मीद अपनी रचनाओं से पैदा करते हैं
वही कुछ हद तक अपने जीवन व्यवहार से भी कर सकें।
जहाँ मैं रहता हूँ वहाँ नौकरी व्यापार के अलावा
और कहाँ और क्या करता हूँ काम
कौन हैं वे लोग जिनसे करता हूँ प्रेम और किनसे नफरत
अजनबियों को देखता हूँ किस तरह
किन जगहों पर आता-जाता हूँ गाता-बजाता हूँ
सब्जी-फल बेचनेवालों को कबाड़ियों मनिहारीवालों
लोहकूटों कामवाली बाइयों को किस हद तक समझता हूँ चोर
बगल से गुजरते जुलूस में कितना होता हूँ शामिल


अमीरी को देखता हूँ किस तरह और भिखारियों को किस तरह
साँतिए को टोटका समझता हूँ कि कला में एक परंपरा
घर में मेरी उपस्थिति मेरा हस्तक्षेप मेरी सक्रियता
शयनकक्ष के अलावा और कहाँ है
जब हत्या का समाचार पढ़ता हूँ तो कितनी देर बाद
पी लेता हूँ शरबत और कितनी देर बाद लग आती है भूख
क्या गाहे-बगाहे अब भी स्मृतियों में चला आता है बचपन
कलेजे को चीरता शैलेन्द्र का वह गीत और पड़ोसियों का प्यार
और क्या याद है अब भी एक विधर्मी की वह छोटी-सी बच्ची
जिसे देखकर पच्चीस साल पहले आया था ख्याल
कि काश, ऐसी ही बिटिया मेरे घर में भी हो
चमक-दमक को देखकर किस कदर होता हूँ दीवाना
अपने ऊपर बीतती है तब या जब दिखता है लालच का लट्टू
तो हाथ से छूट तो नहीं जाता विचारधारा का दीपक।

यातना शिविर में


लिखी जा रही लंबी कविता का छोटा-सा अंश
#* #* #* #*

"अगस्त की एक रात में होती है तेज बारिश
पौ फटने तक बह जाते हैं सारे रास्ते
टूट चुके होते हैं तमाम पुल, बंद हो जाते हैं दर्रे
यह बर्फबारी का मौसम नहीं है मगर बर्फ के नीचे
दब जाते हैं सारे फूल, इच्छाएँ, आशाएँ और घास
सिर्फ यातनाएँ चमकती रहती हैं बर्फ के ऊपर
अब आप लिख सकते हैंः अगस्त सबसे क्रूर महीना है
अगस्त में हुआ था सबसे बड़ा धमाका
अगस्त की तारीखों में से उठता था विकिरण
जिसने घेर लिया था तमाम महीनों को, सभ्यता को
अगस्त में ही मजलूमों का आत्मसमर्पण
अगस्त में ही हुए थे इस देह के दो टुकड़े
हमेशा बचा रहता है बस एक जर्जर, शरणार्थी दिल
जो उठाता रहता है सारी तकलीफें
आप मान लीजिए मैं यातना शिविर में नहीं हूँ
मर ही जाता यदि सचमुच होता किसी यातना शिविर में
मेरी ये उजड़ी तसवीरें तो झूठी हैं, सुबह की स्लेटी धुंध झूठी है
झूठी हैं मुझ पर तनी हुई बंदूकें, झूठी हैं सायरन की ये आवाजें
खून की लकीरें झूठी हैं, झूठे हैं ये घायल जिस्म, ये चीखें झूठी हैं
थर्ड डिग्री की यह खबर झूठ की प्रतिलिपि है, महाझूठी है
घर में भीतर की दीवारों पर गोलियों के ये निशान झूठे हैं
कौन कह सकता है भला मैं यातना शिविर में हूँ
जो कह देगा वह शख्सियत झूठी है
सच्ची है सिर्फ मेरी चुप्पी और सच्चाई मेरी झूठी है
मेरा कुछ भी कहना अब इस कदर बेमतलब है
कि कह दूँ तो मानेगा कौन, न कहूँ तो समझेगा कौन
जबकि कहना बस इतनी सी बात है कि अभी संसार में हूँ
मेरी आवाज पर निगाह है, मेरी हस्तलिपि पर निगाह है,
निगाह है मेरी आँख की पुतली पर, अब कोई निजता नहीं रही
इसलिए इस सामाजिक चौपाल पर यूनिकोड में लिखता हूँ-
महादेश में हूँ, जब तक मुमकिन है जिंदा हूँ, मजे में हूँ
और यहाँ तक आते-आते मान चुके हैं आप भी
कि मैं हूँ मगर किसी यातना शिविर में नहीं हूँ.. ... "

हत्यारे की जीवनी


(एक)
जनता वाचनालय में एक दिन मुझे हाथ लगी हत्यारे की जीवनी
जर्जर पीले पन्नों की वह किताब पुराने कागज की गंध से भरी
उस पर ख़ून का एक छींटा भी नहीं था
आवरण पर रौनक थी और उस पर बना चित्र इतना सात्विक
कि उसके लिए जँच सकता था कुछ बेहतर शीर्षक भी
जीवन में कविता की किताब खोजते हुए
अचानक ही वह मुझे मिल गई
विशाल जनता-वाचनालय के एक कोने में बैठकर उसे पढ़ा मैंने
वह एक फूल के वर्णन से शुरू होती थी
तालाब किनारे बने देवालय को प्रणाम करती
सिर झुकाकर एक पेड़ के तने के नीचे से निकलती
वह बागीचे में जाती थी और आसमान की तरफ
देखती थी कैमरामैन की निगाह से
अनगिन पेड़ों, पक्षियों और शरारतों के दृश्यों से भरपूर
वह शुरू से ही जकड़ लेती थी अपने मोह में
दरअसल वह एक मोहिनी थी
लिखा गया था जिसे जीवनी की तरह
उसमें एक तितली को इसलिए पकड़ा गया था
कि उसके पास सबसे अलहदा सबसे ज्यादा सबसे सुंदर रंग थे
ऐसा ही सलूक एक बार चींटी के साथ किया गया
फिर चिड़िया के साथ और फिर कब्र पर पड़े एक फूल के साथ
फूल के विवरण से शुरू हुआ अध्याय
एक फूल को कुरते पर लगा लेने में खत्म होता था।
(दो)
उसमें एक बच्चे का बचपना था
जिसे हत्यारे का बचपना नहीं कहा जा सकता
उसकी किशोरावस्था तो और ज़्यादा मदमाती थी
फिर वह भीड़ से प्रेम करने लगा और एकांत में बिलखता था
फिर एकांत में प्रेम करता था और व्यग्र रहता था भीड़ में
पृष्ठ क्रमांक 184 पर उसने प्रेम करते हुए कसम खाई
कि वह सब कुछ बनेगा लेकिन कभी हत्यारा नहीं बनेगा
मगर उसकी पत्नी तक ने कसम पर भरोसा नहीं किया
उसकी प्रेमिका इस शपथ से घबराकर
अजानी आशंका में शहर ही छोड़कर चली गई
उसकी याद में जीवनी में लिखे गए थे
तेईस पृष्ठ और अड़तालीस पैराग्राफ
उसमें से एक भावुक हृदय झाँकता था और आकांक्षाएँ
मसलन उसे नापसंद थे गंदगी में रहनेवाले लोग
लेकिन वह पटियों पर बैठकर चाय पी लेता था
गरीबों, आदिवासियों के संग तस्वीरें थीं उसकी
एक तसवीर के लिए वह गटर तक में उतर गया था
और भरी सभा में भी उसे कभी
अपना दिल खोलकर रख देने में कोई संकोच नहीं रहा
वह संगीत से प्रेम करता था और सितार सुनने के लिए
चला जाता था बीस मील दूर तक पैदल
जब वह बाँसुरी की धुन पर सवार होकर चंद्रमा के पास पहुँचता
तो हत्या का विचार तक मन में न आता था
उसने कई पोशाकें बदलीं, कई चेहरे लगाए, कई भाषाएँ सीखीं
वह सब कुछ जैसा लगना चाहता था हत्यारा नहीं
वह कई बार भूखा रहा और कुछ दिन गरीबी में बीते
उसने अखबार बाँटे, ब्रेड बेची, बैरे का काम किया
नगर पालिका लैंप पोस्ट के नीचे करता रहा पढ़ाई
एक समय वह डॉक्टर होना चाहता था
एक वक्त बनना चाहता था खिलाड़ी और एक समय चित्रकार
वह जहाँ भी जाता था वहीं का हो जाना चाहता था
सर्वव्यापी प्रेम के नशे में अपनी नाकुछ ऊँचाई से
वह पूरी दुनिया पर निगाह डालता था, कहता था-
इसे मैं अब अपनी तरह से बनाऊँगा।
(तीन)
उसकी मृत्यु आत्म हत्या की तरह प्रचारित हुई
आधिकारिक सूचना से कहा गया देवलोकगमन
या शायद वह बच भी गया था और आज तक जीवित है
ऐसी संभावना भी उस किताब में छोड़ दी गई थी
हत्यारे की जीवनी से ही पता चली यह विलक्षण बात
कि खुद उसने कभी किसी की हत्या नहीं की
उसे तो कोई हथियार चलाना भी नहीं आता था
वह सीधे-सादे ढंग से रहता था
योग, व्यायाम, साधना में काटता रहा नश्वर जीवन
यहाँ तक आते-आते वह लोकप्रिय हो गया था अपार
पाठ्य पुस्तकों में भरे थे उसके वृतांत
तमाम दीवारों, दफ्तरों, पूजाघरों में उसकी तस्वीरें
जीवनी जहाँ खतम हुई उसके बाद के खाली पृष्ठ पर
किसी पाठक ने, अजीब से मज़ाक में, लिख दिया था-
       ‘
हत्याओं से पहले हत्यारे की जीवनी!
    यह सिर्फ मज़ाक ही तो हो सकता है
    या हत्यारे की जीवनी के किसी पाठक का अपना पाठ
    मुमकिन है एक दिन हमें मालूम हो
    कि यही है ऐतिहासिक तथ्य भी।
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