बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

 2009 में लिखी यह छोटी सी कहानी, जो लिखने के बाद आठ बरस तक कहीं प्रकाशित भी नहीं करायी। 2017 की शुरुआत में साथी शैलेन्‍द्र शैली ने उसे अपनी पत्रिका 'राग भोपाली' में आग्रहपूर्वक प्रकाशित किया। आशंका के बावजूद लगता नहीं था कि यह कहानी कुछ विडंबनात्‍मक ढंग से 2020 में फलित होगी।  

अनशन की जगह

कुमार अम्‍बुज 

हम आँगनबाड़ी चलाते हैं। हमें कोई कार्यकर्ता नहीं मानता। हम नर्सें हैं। सिस्टर्स। हमें कोई सिस्टर नहीं मानता। हम शिक्षक हैं। प्राईमरी शिक्षक। हमें उन स्कूलों में भी जाना पड़ता है जहाँ विद्यार्थियों की आबादी ही नहीं बची। सड़क भी नहीं है। हमारे काम में दलिया-रोटी बनाना या बनवाना शामिल है। हम क्लीनर हैं। हम साफ कपड़े ही नहीं पहन पाते। हम तांगेवाले हैं। मान लिया गया है कि हम मर गए है। हम ठेला लगाते है। अण्डे, मूँगफली, केले और बरफ बेचते हैं। हमें खदेड़ दिया गया है। हम श्रमजीवी पत्रकार हैं, हमारे यूनियन के अध्यक्ष की पहले नौकरी ली गई फिर हत्या कर दी गई है। हम स्त्रियाँ हैं, रोज पिटती हैं और हम सिर्फ इसलिए जीवित रहना चाहती हैं कि हमारे बच्चे छोटे हैं। और हम हिजड़े हैं। हम बस मरने की कगार पर ही हैं। और हम बाइयाँ हैं। घर-घर में कामों में जुटी हैं, हमें भी कुछ कहना है, हमारी भी मुश्किलें हैं जिनसे महाकाव्य बन जाते हैं लेकिन सुना है कोई साहित्य नहीं पढ़ना चाहता। महाकाव्य तो कोई नहीं। हम सब अनशन करना चाहते हैं। 


लेकिन हमें कहीं जगह नहीं है अनशन की जो दूर दराज की जगहें हैं, वे ‘बुक्ड’ हैं। हम ऐसी जगहों का पैसा नहीं दे सकते और बाकी जगहों पर तो अब अनशन हो नहीं सकता। हम क्या करें, कहाँ जाएँ। हमारी दुकानें नहीं चलतीं क्योंकि हर सड़क पर एक बड़ी दुकान खुल गई है। हमारे अखबार नहीं बिकते क्योंकि एक ही आदमी, एक ही कंपनी के अखबार देश में चल रहे हैं। और सब संस्करणों का वही एक आदमी संपादक है। हर जगह उसकी मनमानी है। और हम भी हैं जिन्हें समाजविरोधी, अपराधी वगैरह कह दिया गया है, हम भी कुछ कहना चाहते हैं, बस, हमें जगह दो। जहाँ बैठकर, खड़े होकर या लेटकर या बिना लाठी खाए हम कुछ कह सकें, बता सकें कि हम भी इसी दुनिया में, इसी समाज में हैं और जिंदा हैं तो हमें कुछ जगह चाहिए ही चाहिए। 

आप हमें किसी भी कोने में डाल दें लेकिन जगह तो वहाँ भी चाहिए। जेल में भी आखिर जगह तो लगेगी। और जो जगह आज आपके लिए बेकार है, आप हमें वहाँ भी फेंक देंगे तो कुछ दिनों बाद आपको बाजार, मॉल, कवर्ड केम्पस आदि के लिए फिर जगह कम पड़ेगी और आप वहाँ फिर आकर कहेंगे कि अब यहाँ से जाओ। तो हम कहाँ जाएँ। तो हम अनशन करना चाहते हैं, रैली निकालना चाहते हैं, नारे लगाना चाहते हैं। लेकिन सब तरफ आपने बेरीकेड्स लगवा दिए हैं। पुलिस है। आँसू गैस है। लाठियाँ हैं। पैलेट गन है।   
                                                       
और इधर देखिए, हम बच्चे हैं। हमारी भी मुश्किलें हैं। घरों में, स्कूल में। सब जगह हमारे लिए पहले से काम तय है। और हम कुछ नहीं कह सकते। अकसर रो भी नहीं सकते। और इस तरफ देखें, हम बच्चे हैं तो क्या हुआ। हमें उन सब कामों में जुटना पड़ता है जो स्कूल जानेवाले बच्चों के बाद हम बच्चों पर आ पड़ता है क्योंकि कुछ तो करना ही पड़ता है वरना कोई रोटी नहीं खिलाता। हम गालियाँ खाते हैं, थप्पड़ ही नहीं लातें भी खाते हैं। हमारे पास सोने की जगह भी नहीं है। हमें कुत्तों के साथ जगह बाँटना पड़ती है। हम भी कुछ कहना चाहते हैं। हमें कहने नहीं दिया जाता। तब भी हम कुछ कहना चाहते हैं। कुछ लोग हैं जो हमारी तरफ से कह सकते हैं। वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं उन्हें कहने के लिए जगह नहीं है। और जो लगातार कुछ कहते रहते हैं वे हमारे बारे में कुछ नहीं कहते।

यही नहीं और इतने ही नहीं। हम लिपिक हैं, हम डॉटा ऑपरेटर हैं और हम ठेके पर हैं। हम कामकाजी स्त्रियाँ हैं। हम तृतीय श्रेणी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। हम सिपाही हैं, होमगार्ड के जवान हैं। हम होटलों में, रिसॉर्ट्स में, धर्मशालाओं में खपे हुए हैं। और इधर भी देखिए, हम वर्षों से नालियाँ, गंदगी साफ कर रहे हैं। गटरों में उतरे हुए हैं, वहीं मर जाते हैं। घरों में रहते हुए भी हमारी दशा वही बनी है। हमारा आसपास, मोहल्ला और यह पूरा शहर हमारे लिए एक गटर ही बनकर रह गया है। औ हम आदिवासी हैं। लाखों सालों से हम इस पृथ्वी के, इस जंगल के, पानी के किनारों के वासी हैं। आदिवास है हमारा। हमसे कह दिया गया है कि हम अपनी जगहें छोड़ दें। हम धनुष चलाना जानते हैं और बंदूक चलाना सीखना पड़ रहा है लेकिन हमें भी कुछ कहना है। हम अपनी जगह नहीं छोड़ना चाहते और न ही बंदूक चलाना चाहते, हमें यह कहने की जगह दो। हमें इकट्ठा होने की, बात करने की जगह दो। लेकिन जगह नहीं है। हम तो किसी के हृदय में भी नहीं रह सकते, न किसी की आँखों में। हम ईश्वर नहीं हैं, हम आदिमनुष्य नहीं रहे, हम हर जगह की किरकिरी हैं।

अब केवल संतों के लिए, बापुओं के लिए, मौलवियों के लिए, चातुर्मास करनेवालों के लिए, सांसदों-विधायकों की सभाओं, सरकारी आयोजनों के लिए, ऑटो एक्सपो और रियल्टी बिजनेस मेलों और सेकण्ड्स की सेल के लिए जगह बची है। अब ये सब शहर की छाती पर, सबसे चमकदार सड़क पर सबसे लंबा, मोटा कीला गाड़कर तंबू तान लेते हैं। द्वार, तोरण भी बनाते हैं। तार डालकर सीधे बिजली ले सकते हैं। लाऊडस्पीकर लगा सकते हैं। हर चीज खरीद सकते हैं, इसके लिए नियम हैं, अनुमतियाँ हैं और वे नियमानुसार और अनुमति लेकर ही ऐसा करते हैं। मंत्रियों, पूँजीपतियों, ठेकेदारों, माफिया सरगनाओं, कलेक्टरों, कमिश्नरों, सचिवों, धार्मिक न्यासियों को कुछ कहकर माँगना नहीं है। उन्हें बिना कहे, बिना माँगे ही सब हासिल है। भृकुटि कंपन मात्र से उन्हें सब कुछ प्राप्य है। तो हमारे संसार में ऐसे भी कुछ लोग हैं जिन्हें अनशन की जरूरत नहीं, उन्हें प्रतिरोध की जगह नहीं चाहिए। इसके अलावा उनके पास पहले से ही अनंत जगहें हैं। और यदि उन्हें चाहिए भी तो फिर यह बाकी पूरी पृथ्वी, पूरी जमीन चाहिए। जिसे वे धीरे-धीरे ले ही रहे हैं। इसके लिए उन्हें किसी अनशन की भी जरूरत नहीं है। उनके पास कानून हैं। अधिग्रहण के अधिकार हैं। इलाके के वोट हैं। अपनी विशाल जाति है।

हमारे पास उस जगह तक का भी कोई पट्टा नहीं है जहाँ हम पिछले कई सालों से रात में सो रहे हैं। तो हम आखिर कहाँ जाएँ! हमसे साफ कह दिया गया है कि अब इस नये राजकाज में आप यहाँ शहर के बीच में अनशन नहीं कर सकते। यह अस्सी हजार रुपये प्रति स्कावयर फीट की जगह है। क्योंकि हम शहर में दिक्कत पैदा कर देते हैं, रुकावट डाल देते हैं। सबके लिए परेशानियाँ खड़ी कर देते हैं। संसार भर में बदनामी भी कर देते हैं, सो अलग। 
खबर दी जा रही है कि तमाम मुश्किलों का और हमारी सुविधा का ध्यान रखते हुए सरकार ने, चालीस किलोमीटर दूर एक जगह, दूर कहीं मैदान में तय कर दी है। वहाँ खाने-पीने के स्टॉल्स और मीडिया वगैरह के लिए भी केबिन बनवाया गया है। इस पर बीस करोड़ का खर्च भी आया है। तो कहा जा रहा है कि अनशन वगैरह आप वहाँ जाकर करें। वहाँ किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। जब तक अनशन करोगे वहाँ दो-तीन डिप्टी कलेक्टर, नायब तेहसीलदार और पुलिस भी रहेगी। होमगार्ड के जवान भी। मीडिया भी चला आयेगा। फेयर वेदर रोड है और बारिश में यों भी अनशन की कोई जरूरत नहीं पड़ती।

फिर भी हम यहाँ आ गए हैं। यह शहर के बीचों बीच है कि लगभग एकड़ भर जगह खाली है। इसके आसपास दुकानें हैं, आवाजाही से भरी सड़कें हैं, पूरा बाजार है। कह सकते हैं, यह शहर की अनशन की वास्तविक जगह है। हम तो वर्षों से ऐसा ही देख रहे हैं। कि यहाँ कोई भी आकर अनशन, धरना दे सकता है, सभा कर सकता है। सत्संग करा सकता है। बहुत कम दिन ऐसे होते हैं कि यहाँ कोई धरना-प्रदर्शन-प्रवचन न हो रहा हो। 

तो हमने यहाँ धरना दे रखा है। सप्ताह भर हो गया। हमारे गाँव के गाँव डूब में आ गए हैं। वाजिब मुआवजा मिलता नहीं, घर-बार-खेती उजड़ गई है। नयी जगह का कोई ठिकाना नहीं। जो जगह दी जा रही है, वह बंजर है, पानी भी नहीं है और एक ऐसा उजाड़ है कि बसना मुश्किल। तो औरतें-बच्चे भी यहीं धरना देने आ गए हैं। वहाँ क्या करते। पिछले अनुभवों से सीख गए हैं कि दो-चार दिन में सुनवाई होती नहीं इसलिए इस बार लंबे इंतजाम से आए हैं। आटा, सत्तू, दाल लाए हैं। शहर देख सकता है कि फोर लेन के इस डिवाइडर की रेलिंग पर अब कई रंगों की साड़ियाँ, लहँगे और बच्चों के कपड़े, कमीज, धोती वगैरह सूख रहे हैं। वे हमारे अनशन का हिस्सा हो गए हैं। किनारे ईंटों के चूल्हे से उटता धुआँ भी शामिल है इसमें। लेकिन हमसे कहा जा रहा है कि यहाँ अनशन नहीं कर सकते। क्योंकि हम शहर की साँस घोंट रहे हैं, शहर भर के लिए रुकावट हैं। शासन ने अब एक जगह तय कर दी है। वहीं जाएँ। वहीं जाना होगा। यही बार-बार बतलाया जा रहा है। 

जीप पर लगे लाउडस्पीकर से भी।हमको अभी समझाया जा रहा है। दो तीन दिन और समझाया जाएगा। 
फिर समझाने के दूसरे तरीके भी हैं। जतला दिया गया है कि उन तरीकों को आप जानते ही हैं। अगली ही सुबह या चुपचाप आज रात उन पर अमल किया जाएगा। अब हम भी कुछ तो समझते ही हैं।
बाकी बातें और समझेंगे, धीरे-धीरे। लेकिन सवाल है कि अनशन करने इतनी दूर कैसे जाएँ। 
और क्यों जाएँ?
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रचनाकाल- 2009 

प्रथम प्रकाशन- राग भोपाली, फरवरी 2017 (वर्ष 21, अंक 11) 
























सोमवार, 6 अप्रैल 2020

ईरानी फिल्म 'शीरीं' - एक परिचयात्‍मक टीप

कल 'शीरीं' 2008 फिल्‍म बहुत दिनों बाद फिर देखी।

यह वही खुसरो-शीरीं-फरहाद की पुरातन कहानी है लेकिन ईरानी फिल्‍मकार 
कियारोस्‍तामी की कारस्‍तानी और कारनामे ने इसे कुछ अजब-गजब बना दिया है। 
दरअसल यह फिल्‍म एक साउंड ट्रैक है। और दर्शक को विजुअल्‍स के नाम पर 
केवल दर्शकों, अधिकांश महिलाओं, के चेहरे दिखते हैं, जो इस फिल्‍म को देखते हुए 
दिखाई गईं है, साउंड ट्रैक आपको सुनाई दे रहा है।  

संवाद किसी कविता का उत्‍कृष्‍ट रूप हैं। 
आवाजों की कशिश, खासकर शीरीं की, आपको व्‍याप लेती है।

प्रेम, दुख, तकलीफ, राजनीति, वत्‍सलता, राग, वियोग, दीवानगी, आकांक्षा, मृत्‍यु, 
नश्‍वरता और अनश्‍वर आशा के संयोजन ने इसे इंद्रधनुष से कहीं अधिक रंगसंपन्‍न कर दिया है। 
यहाँ तो एक आँसू भी सात रंग बिखेरकर बहता है।

निजामी द्वारा लिखित इस अमर कथा को कियारोस्‍तामी ने 
अधिक सांद्र, सघन और नया कर दिया है, 
एक प्रसन्‍न तकलीफ और उदासी से भरकर। 
हजार बार कही जा चुकी कहानी को इस तरह कहना अप्रतिम कला है।

दस 'स्टिल्‍स' संलग्‍न हैं। इन पर लिखे शब्द ध्यान से पढ़िए। इस समय भी प्रासंगिक हैं।













फासिज्म और अमीरी की रुग्णता

आय सर्वड किंग ऑव इंग्लैंड

फासिज्म और अमीरी की रुग्णता

चेक फिल्म निदेशक जिरी मेन्जेल, 'क्लोजली वॉच्ड ट्रेन्स-1966' और 'माय स्वीट लिटिल विलेज-1985' जैसी फिल्मों के लिए बेहतर जाने जाते हैं। उनकी फिल्म 'आय सर्वड द किंग ऑव इंग्लैंड-2006' एकाधिक मायनों में देखने योग्य है। कॉमिकल अंदाज में, बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में यह फासिज्म और अमीरी की रुग्णता का औपन्यासिक दस्तावेज है।
लेकिन यह केवल ह्यूमर नहीं है।
दरअसल, इसमें दार्शनिकता, पारिस्थितिकी और मनोवज्ञान के कदम-कदम पर पेंच हैं। उलझनें हैं, उनमें से बनते रास्ते हैं। यदि कुछ अधिक शब्दों लेकिन एक वाक्य में कहना हो तो : "यहाँ विलासितापूर्ण आकांक्षा की फूहड़ता के आधार स्तंभों पर मनुष्य की लंपटता, अमानवीयता, लालच, कमीनगी, आसक्ति, दुर्दिन, दुर्भाग्य, जिजीविषा, विलासिता को गैरमामूली निर्देशन में, भयानक स्वर्ग और दिलकश नर्क की नयनाभिराम सिनेमेटोग्राफी के साथ 'सर्व' कर दिया है।"
इसलिए राष्ट्रवाद, नस्लवाद, आर्यन गौरव, जातीय अभिमान को पददलित करने के अनगिन, अविभाज्य प्रसंग समाहित हैं और इन सब चीजों को हास्यास्पद बना दिया गया है। जब जर्मन सेना हारती है तो फासिस्ट लोगों को यकीन नहीं होता कि सर्वश्रेष्ठ खून, एक अप्रतिम नस्ल भला कैसे हार सकती है। यह आपको चाहे-अनचाहे पूँजीवादी सभ्यता में मनुष्य के पराभव की गवाह बनाती है। बिना उपदेश दिए सावधान करती है। लेकिन याद दिलाती है कि अच्छाई और साधारणता की महत्ता को विस्मृत करना इस मानव प्रजाति का स्वभाव है।
लेकिन यह सब और इतना कह देना भी अधूरी बात है। यह राजनीतिक फिल्म है। फासीवाद और अमानवीय राजनीति से पैदा मौकापरस्ती और नृशंसता की असमाप्य कथा है। जिसमें मनुष्य उजड़ जाते हैं, मानवीय संबंध दयनीय बन जाते हैं। फिर भी कहीं चुपचाप मनुष्य की प्रेमिल कार्रवाइयाँ, ग्लानि और आशाएँ लगातार राहत के काम में जुटी रहती हैं। यह बहुस्तरीय सुरंगों में चलनेवाली फिल्म है जो जमीन पर चलती दिखाई देती है।

यहाँ पूँजी की, धनजनित यश अभिलाषी मन की जीवित अवस्था में ही शल्य क्रिया कर दी गई है।
बिना बेहोश किए।

तात्कालिकता और लोभ हमेशा ही वशीभूत कर लेता है। यही चुनौती है और यही मुश्किल, जिससे यह संसार अनवरत रूप से नष्ट या परास्त हुआ दिखता है। फिर कोई बड़ी मानवीय कोशिश ही उसे उबारती है। नायक अपने सुदिनों की याद करते हुए आनंद लेता है और वर्तमान दुर्दिनों को स्वीकार करता है। कि ये दिन भी उसकी सहमति और सक्रियता से ही मिले हैं। अच्छे दिनों की कमाई हैं।
हम अच्छे दिनों की चाह में और उनसे गुजरते हुए अक्सर दुर्दिनों की ही कमाई करते हैं।
यह फिल्म मुग्ध करती है, आखिर में आप कुछ अजीब ढंग से उदास हो सकते हैं। एक जीवन का समृद्ध अनुभव अब आपके जीवन में विन्यस्त हो गया है।कहानी और दृश्यों के बारे में बस, एक दृश्य-
जिसमें जर्मन नायिका, चेक नायक से संसर्ग करते समय, अपने आराध्य और काम्य हिटलर की तस्वीर की तरफ लगातार देखते रहना चाहती है इसलिए वह आरूढ़ प्रेमी के सिर को बार-बार अपनी दायीं तरफ धकियाती है ताकि सामने दीवार पर लगी हिटलर की तस्वीर और उसके बीच में, कमतर नस्ल के प्रेमी का सिर व्यवधान न बने। और उसे अनुभव होता रहे कि वह प्रेमी के साथ नहीं, हिटलर के साथ ही संसर्ग कर रही है।
इसका कोई अर्थ इधर के जीवन में दिखता हो तो देखा जा सकता है। क्योंकि चरम अंधभक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत यह एक राजनीतिक दृश्य है।
बहरहाल, कुछ और स्टिल्स नीचे लगाए हैं जिनमें लिखे संवाद आपसे कुछ और बातें बेहतर कह सकते हैं।






शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

पुलिस

यह कविता बीस बरस पहले, 1999 में लिखी गई थी।
'अतिक्रमण' संग्रह में संकलित है। बीच-बीच में इसका स्‍मरण हो ही जाता था, 
आज कुछ ज्‍यादा ही स्‍मरण करा दिया गया। पेश हैं कुछ अंश।
पुलिस

उनकी मुश्किलें भी अजीब थीं
नौकरी के घंटे थे इस तरह कि वे समझ नहीं पाते थे
कि रात के हिस्से की नींद को दिन में किस तरह पूरा किया जाए
और दिन भर की भाषा, इल्लत, जिल्लत को
जीवन के किस अँधेरे कोने में छोड़ दिया जाए

वे ऐसी जगहों में ऐसे लोगों के साथ काम करते थे
कि लगातार भूलते जाते थे वह बोली-बानी
जो मनुष्यों के बीच पुल बनाने के लिए
उन्हें इस दुनिया ने सिखायी थी
शुरुआत से ही उन्हें एक अक्षर मनुष्य के पक्ष में पढ़ाया जाता था
और एक हजार वाक्य मनुष्यता के खिलाफ़
यह सैकड़ों सालों में फैली एक अनंत योजना थी
जिसने उन्हें यह अंदाज़ा भी नहीं लगाने दिया
कि वे मुस्तैदी से करते हैं उन्हीं के किलों, नियमावलियों 
और कुर्सियों की हिफ़ाज़त जो उन्हें मनुष्य से बदल देते हैं हथियारों में

इसलिए यह होना ही था कि एक दिन 
उसने हर एक को अपराधी समझा, हर एक पर किया संदेह
उसके छूने भर से कुम्हला सकते थे खिले हुए फूल
गरीब और कमज़ोर पर उसका गुस्सा टूटकर गिरता था
उसकी निर्ममता के किस्से ऐसा कहा जाता है फ़िल्मों ने
दुस्साहसी पत्रकारों ने, भुक्तभोगियों ने
और कभी-कभार की मानवाधिकार आयोगों की रिपोर्टों ने
अतिरंजित कर दिए थे जबकि यह सच अपनी जगह है
कि उसकी क्रूरताओं के असली चेहरे कभी नहीं हो सकते उजागर

जो इक्के-दुक्के सिपाही या अधिकारी देशसेवा की क्षणिक झोंक में
या अपनी जान पर ही बन आने की विवशता में
सचमुच वीरता करते थे तो वह कुल पुलिस की कुल क्रूरता के
दस घात दस हजार टन वज़न के नीचे कराहती थी

दिलचस्प थी यह विडंबना कि अकसर समाज में लोग 
अपने बच्चों के लिए पुलिस वर्दी की कामना करते थे
एक अर्थ में वह शोहदों को, चोरों को, मुजरिमों को
समाज में ताक़तवर होने से रोकती थी
लेकिन इसका हिसाब अभी  है कि कितने अपराधियों को 
उसने बलशाली बनाया और पैदा किए कितने नए मुजरिम

थाना परिसरों में पवित्र समझे जाने वाले वृक्षों के होने
और पूजागृहों के बनाए जाने से
अत्याचारों के संबंधों को खोजा जाना कठिन नहीं है
आंदोलनों, रैलियों और जनता के इकट्ठा हो सकने के वक्त में
उसकी ज़रूरत सबसे ज्यादा पड़ती थी
यह स्थिति इतनी सहज, वैध और अपरिहार्य कर दी गयी थी
कि जनता को अपने दुखों को सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर करने से पहले
यह बताना ज़रूरी था कि वह इसके लिए कहाँ इकट्ठी हो रही है

सभ्य किस्म के विद्वान सोचते थे 
कि वे सुरक्षित हैं जो पुलिस समाज में बनी हुई है
लेकिन कभी दैवयोग से या किसी गली से गुज़रते हुए
या देर रात तारों को देखते हुए 
या फिर किसी दृश्य का हिस्सेदार होने भर की वजह से
उनका पुलिस से साबक़ा पड़ता था तो वे अपनी राय पर 
दहशत से भरे हुए लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं कर पाते थे

केवल इस उम्मीद में लोग उससे डरते थे
नमस्कार करते थे रास्ता छोड़ देते थे
या कतराकर निकल जाते थे कि शायद इस वजह से 
कभी मौका पड़ने पर उनसे थोड़ा कम दुर्व्यवहार किया जाएगा

कर्तव्यों का शानदार पालन करने के लिए पदक लेते हुए
पुलिसकर्मी भी ठीक-ठीक नहीं बता पाते थे
कि यह सम्मान उन्हें नृशंसता के लिए दिया गया है या शौर्य के लिए
उन्हें सूत्र वाक्य दिया गया था :निर्मम अत्याचार के बाद ही 
पता लगाया जा सकता है कौन अपराधी है और कौन नहीं
उन्हें यह अधिकार था कि किसी भी आम जन को
बंद कमरे में या बीच सड़क पर यातनाएँ दे सकें
हत्या को बदल सकें मुठभेड़ में
उनके पास वैधानिक औज़ार थे, धाराओं की बेड़ियाँ थीं
और आत्मा को निरंकुश बना देने वाला प्रोत्साहन

इस सबके बावजूद पुलिस से सताए लोगों को
उम्मीद होती थी कि न्याय उन्हें बचाएगा
और एक अंधी अनंत सुरंग में घुसकर
जितना प्रकाश पाया जा सकता था
न्याय उन्हें उतना बचाता था
सरकार को और सरकार की पुलिस को
न्याय का यह लक्षण सबसे ज़्यादा मालूम था
लेकिन जनता को इतनी रोशनी पर इतना ही भरोसा था
कि आख़िर एक दिन वह अपने जीवन की आज़ादी के आगे
पुलिस-बुलिस कुछ नहीं समझती थी।
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गुरुवार, 7 नवंबर 2019

ओल्गा तोकारचुक


''बिखरे हुए खिलौनों के बीच, खिड़की के पास, अँधेरे में, ठंडे कमरे में बैठी एक बच्ची।''
''यह वायदा है कि शायद हम अब सही समय और सही जगह पर नया जन्म लेंगे।"

ये ओल्गा तोकारचुक के उपन्‍यास 'फ्लाइट्स' के पहले और अंतिम दो वाक्‍य हैं, जिनके बीच विस्‍मयकारी, यथार्थ और कल्पनाशीलता के बीच संपन्नतादायक यायावरी है। वे इस सफर के जरिये बड़ा विमर्श संभव करती हैं। और धरती-आकाश को एक वैश्विक, जीवंत रंगमंच बना देती हैं। शुरुआत में बिंबात्मक वाक्य उभरता है:
                    ''अँधेरा: जैसे काली ओस की तरह आकाश से गिरकर हर चीज पर जमा हो रहा है।''                           इसे इधर के समय का रूपक भी माना जा सकता है।

'फ्लाइट्स' की घुमक्‍कड़ी को शताधिक छोटे-छोटे प्रसंगों और अध्यायों में लिखा गया है। संरचना दिलचस्प है और इसलिए पठनीयता भी। इस यात्रा में यायावर, जैसे अजनबियों की दयालुता और सहयोग पर निर्भर हैं, यह सफर अनजानी आशा और पारस्परिकता के विश्वास से आगे बढ़ता है। संगीतकार शोपाँ के हृदय की भी यात्रा इसमें शामिल है। वे एक मिथ को तोड़़ते हुए दर्ज करती हैं कि शोपाँ के अंतिम शब्द किसी प्रसन्नता के बारे में नहीं थे बल्कि जो उनके मुँह से आखिरी चीज निकली वह गाढ़ा, काला खून था। फिर वे मर गए। बाद में तो दिल की एक राहगीरी बचती है। लंबी, अनंत, कालावधि और दिक़ को लाँघती हुई। घर, पृथ्वी, दैहिकता, नश्वरता, समय और नक्षत्रों को समाहित करती, उसके पार जाती, आकाशंगगा को अपने रास्ते में लेती, एक साथ लौकिक और अलौकिेक खगो‍लीय यात्रा। एक विशाल तारामंडल भी साथ में है जिसमें मनुष्य ही नहीं, उसके तमाम अंग, अवयव, संत्रास और आकांक्षाएँ सहयात्री हैं।
अपने देश के संस्कृति मंत्री के इस वक्तव्य पर कि अब वे ओल्गा की किताबें पढ़ेंगे, ओल्गा दिलचस्प और ध्यातव्य बातें कहती हैं: 'मेरी किताबें हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं भी हो सकतीं। मैं लोगों का दिमाग खोलने, उसे विस्तृत करने के लिए लिखती हूँ, मैं सीधे कोई राजनैतिक लेखन नहीं करती क्योंकि मैं कोई राजनैतिक माँगें पेश नहीं करती, जीवन के बारे में लिखती हूँ लेकिन जैसे ही आप मनुष्य की जिंदगी के बारे में लिखते हैं, उसमें राजनीति आ ही जाती है।'
वे अपने देश पौलेण्ड के ऐतिहासिक अपराधों की भी या‍ददिलाही कराती हैं, 'मृतकों की हड्डियों पर तुम्‍हारा हल चलाओ', उपन्यास यही सब कहना चाहता है। यहाँ इस विडंबना की याद कर सकते हैं कि हमारे देश में आज किसी लेखक का ऐसा सब कहना कितना मुश्किल बनाया जा रहा है।
वे अपने देश के अँधेरे काल को विस्मृत नहीं कर देना चाहतीं, उस पर बहस चाहती हैं, उससे सबक चाहती हैं। किसी भी झूठे गौरव को परे हटाकर वे थोथे राष्ट्रवाद के खिलाफ अपना प्रबल पक्ष रखती हैं। मनुष्य की तमाम यातनाओं, हौसलों और विस्थापन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखती हैं। उनके लेखन की विशिष्टताओं में से यह एक चीज है।
शरीर संरचना विज्ञान कहता है कि मानव शरीर में सारटोरियस सबसे लंबी, ताकतवार माँसपेशी है, इसके बरअक्स ओल्गा का कहना है कि जीभ ही मनुष्य की माँसपेशियों में सबसे अधिक शक्तिशाली है। पुरस्कृत उपन्यास के एक संक्षिप्त अध्याय को वे 'बोलने' की जरूरत और महत्व पर केंद्रित करती हैं। बोलो-बोलो। बिना बोले कुछ नहीं हो सकता। जाहिर है इस बोलने में दूसरे का बोला हुआ सुनना भी शामिल है। यह संवाद और अभिव्यक्ति की ताकत रेखांकित करना है।
वे एक्टिविस्‍ट भी हैं। और प्रतिपक्ष की सहज भूमिका में हैं। खासतौर पर नारीवादी अधिकारों को लेकर। अपने इस बोलने और लिखने की वजह से वे लगातार राष्‍ट्रवादियों के और जुझारू देशभक्तों के निशाने पर रहती हैं लेकिन ओल्गा तोकारचुक का निशाना कहीं अधिक सटीक साबित होता है। संसार भर में लेखकों की यही स्थिति और सद्गति है। लेखक होना और बने रहना इसी तरह मुमकिन है।
अपने लेखन में वे परिकथाओं, लोककथाओं, कल्‍पनाओं, परिकल्पनाओं, मिथकों, विज्ञान, आशाओं, इच्छाओं, संस्मरण और इतिहास को एक साथ लेकर चलती हैं। यह नये संसार की चाहत है। वे अपने लेखन से पाठकों के दिमाग में बाजिव किस्‍म का संदेह पैदा करना चाहती हैं, वैचारिक उत्तेजना देना चाहती हैं। साहित्य का यही सच्चा मकसद भी है। 'फ्लाइट्स' के एक और चैप्‍टर में वे कहती हैं कि इस दुनिया को चिड़िया की आँख से देखने में और मेंढ़क की आँख से देखने में फर्क आ जाता है। लेखक को अपनी निगाह साफ और कुछ ऊँचाई पर रखना चाहिए।
उनको जब नोबेल पुरस्कार की सूचना मिली, वे जर्मनी की तरफ कार से सफर कर रही थीं। यह उनकी साहित्यिक यात्रा और 'फ्लाइट्स' की यायावरी का भी एक बिंब बन जाता है। उपन्यास के दो अध्याय- 'मैं यहाँ हूँ' और 'यहाँ हूँ मैं' के नाम से वे अपनी उपस्थिति मानो किसी यात्रा में घोषित करना चाहती हैं।
वे सचमुच यात्री हैं।
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[ओल्गा के 2007 में प्रकाशित इस 'फ्लाइट्स' उपन्यास को, अंग्रेजी अनुवाद के बाद 2018 में मैन बुकर पुरस्कार मिला था और इसी उपन्यास को मुख्‍य आधार बनाकर अभी 2018 का नोबेल पुरस्कार मिला है।
मैन बुकर पुरस्कार जीतनेवाली वे पहली पोलिश लेखक हैं। इस क्रम में याद कर लें कि 'फ्लाइट्स' पर ही उन्हें पौलेण्ड के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार 'नाईके' से सम्मानित किया गया था।
ऑस्ट्रियाई पीटर हैंडके 2019 के नोबेल विजेता हैं, जो एक नरसंहार के मामले में अपने बयान के कारण विवादास्पद रहे, उनकी तुलना में ओल्गा तोकारचुक का नाम अधिक स्वीकृतिपूर्वक ग्रहण किया गया है। वे पौलेण्ड से साहित्य में नोबेल पुरस्कार की छठवीं विजेता हैं।
इस बार स्वीडिश अकादेमी की घोषित इच्छाओं में से एक पूरी होती है: महिला लेखकों पर ध्यान दिया जाएगा। दूसरी घोषणा पर अमल प्रतीक्षित रहेगा : इसे कुछ कम यूरोप केंद्रित ('यूरो‍सेंट्रिक') रखा जाए।]


तुमने सितारों को जीत लिया है

| अकेले का विरोध |
तुम्हारी नींद की निश्चिंतता में
वह एक कंकड़ है
एक छोटा-सा विचार
तुम्हारी चमकदार भाषा में एक शब्द
जिस पर तुम हकलाते हो

तुम्हारे रास्ते में एक गड्ढा है
तुम्हारी तेज़ रफ़्तार के लिए दहशत
तुम्हें विचलित करता हुआ
वह इसी विराट जनसमूह में है

तुम उसे नाकुछ कहते हो
इस तरह तुम उस पर ध्यान देते हो

तुमने सितारों को जीत लिया है
आभूषणों, गुलामों, मूर्तियों
और खण्डहरों को जीत लिया है
तब यह छोटी-सी बात उल्लेखनीय है
कि अभी एक आदमी है जो तुम्हारे लिए खटका है
जो अकेला है लेकिन तुम्हारे विरोध में है

तुम्हारे लिए यह इतना जानलेवा है
इतना भयानक कि एक दिन तुम उसे
मार डालने का विचार करते हो
लेकिन वह तो कंकड़ है, गड्ढा है
एक शब्द है, लोककथा है, परंपरा है।
(कविता संग्रह - "अमीरी रेखा" से)

आज मैं वही सब कर रहा हूँ


मंगलेश डबराल की यात्राओं की दिलचस्प स्मृति लेखा पुस्तक 'एक सड़क एक जगह' में दर्ज
जापान के कवि सोइचिरो इवाकिरी की कविता, जो अनेक तरह से प्रासंगिक है:

"जीना लगातार तथाकथित स्व पर एक आघात है
आज मैं वही सब कर रहा हूँ जिसे कुछ दिन पहले
दूसरों को करते हुए देखकर चकित रह जाता था। ''