बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

फासिज़्म लोकतन्त्र के कपड़े पहने हुए है

नवम्‍बर 2014 में भारत भवन, भोपाल में प्रस्‍तावित 'बिहार उत्‍सव' के प्रसंग में राजेश जोशी की यह एक गौरतलब टिप्‍पणी है। लेखकों को अपने समय की राजनीति समझना ही होती है और अपना पक्ष भी स्‍पष्‍ट रखना होता है। हम देखा ही रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में लेखकों की पक्षधरता में न केवल कमी आई है बल्कि उसमें अवसरवाद को जगह मिली है। और इस बहाने अनेक तर्क- वितर्क- कुतर्क के निर्माण भी हुए हैं। प्रसंगवश याद दिलाना उचित होगा कि हम तीन लेखकों, राजेश जोशी, कुमार अंबुज, नीलेश रघुवंशी, ने दो बरस पहले दो वक्‍तव्‍यों के जरिए मध्‍य प्रदेश की सांस्‍कृतिक स्थि‍ति और उसकी राजनीति पर यथाशक्ति प्रकाश डाला था और अपने उस पक्ष को स्‍पष्‍ट किया था जिसे हम पिछले एक दशक से निबाह रहे हैं। बहरहाल, यह टिप्‍पणी संलग्‍न है।
इसलिए: राजेश जोशी
भारत भवन में बिहार उत्सव.....जय हो !
मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग और भारत भवन ने प्रदेशों की संस्कृति और साहित्य पर केन्द्रित कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू करने का विचार किया है। पहला प्रदेश बिहार चुना गया है। मैं सोच रहा हूँ कि प्रथम पदेश के रूप में बिहार क्यों? न तो अकारान्त क्रम में बिहार पहले आता है न हिन्दी प्रदेशों में बिहार कोई शीर्श पर है। फिर बिहार पर यह अतिरिक्त प्रेम क्यों? अमरीका जब युद्ध के निशाने साधने के लिये देशों का चयन करता है तो उसके दिमाग में प्रमुखता से तेल होता है। मध्यप्रदेश सरकार जो सांस्कृतिक श्रृंखला शुरू कर रही है तो निशाना साधने के लिये उसकी निगाह किस तेल पर है या किस तेल की धार पर?
कांग्रेस मुक्त भारत का नारा धीरे धीरे छोटे राजनीतिक दलों और क्षैत्रिय दलों को अपने घेरे में ले रहा है। हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस मुक्त भारत के साथ क्षैत्रिय दलों से मुक्ति का अभियान भी शुरू किया जा चुका है। मोदी और शाह की भाजपा ने शिवसेना को उसकी औकात दिखा दी है। किनारे पर बैठी शिवसेना रूआँसी हुई जा रही है। उद्धव ठाकरे बिचारे इंतज़ार कर रहे हैं कि कब बुलावा आये और वे दौड़ पड़ें। लेकिन यह बात मेरी समझ से बाहर है कि इस राजनीति के खेल में मध्यप्रदेश को बिहार पर यह अतिरिक्त लाड़ क्यों उमड़ रहा है? शिवराज किसका खेल खेल रहे हैं? मोदी और शाह का या कोई अलग राग गाने की तैयारी है? भाजपा में भीतर ही भीतर कुछ सुलग तो रहा है पर अभी बाहर नहीं आ पा रहा है।
बहरहाल भारत भवन में अब बिहार उत्सव होने जा रहा है । मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग को अपना कोई अलग नामकरण कर लेना चाहिये। संस्कृति का जैसा सत्यानाश पिछले पन्द्रह वर्ष में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किया है, उसकी कोई दूसरी मिसाल मध्यप्रदेश के इतिहास में ढूंढना मुश्किल है। साहित्यिक कार्यक्रमों में जो लेखक बुलाये जा रहे हैं वो कौन है? प़ित्रकाओ की दुर्गत तो और भी ज्यादा हास्यास्पद है। जिस सरकारी सांस्कृतिक वैभव का ढिढौरा पीटते सरकार के कभी हाथ न थकते थे आज उसी मध्यप्रदेश की सरकारी सांस्कृतिक गतिविधियों की फूहड़ता पर ठीक से हँस सकना भी संभव नहीं है। हालांकि इसे फूहड़ कह कर टाल जाना भी एक किस्म का सरलीकरण ही होगा। इसके पीछे एक खास किस्म की राजनीति- ‘सांस्कृतिक राजनीति’ और काइयाँपन छिपा हुआ है। कुछ लेखकों ने इसके पीछे छिपे फासीवाद की धीमी आवाज़ की ओर बहुत पहले ही इशारा किया था।
गालिब कह गये थे कि वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात इसलिए बिाहार के या बिहार से बाहर रह रहे बिहार के अनेक लेखक न समझें तो कोई क्या करे ? सुना है कई लेखक बिहार उत्सव में शिरकत फरमाने आने वाले हैं । आइये, आइये, भाजपा की भगवा कार्पेट बिछी हुई है। अगर आपकी चड्डी में लाल रंग का नाड़ा डला हो तो उसे फेंक आइये। उन दिनों जब देश में भाजपा की सरकार नहीं आयी थी तब भी हमने मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा की जा रही सांस्कृतिक गतिविधियों में छिपी हुई मंशाओं की ओर इशारा करते हुए लेखकों से यह अनुरोध किया था कि भारत भवन और अन्य सांस्कृतिक परिषदों के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी का बहिष्कार करें। पर तब भी हिन्दी के हमेशा सरकारी कार्यक्रमों के प्रति लालायित रहने वाले रचनाकारों ने बहिष्कार नहीं किया तो अब जब केन्द्र में मोदी सरकार आ चुकी है तो उनसे क्या उम्मीद की जाये। जर्मनी में फासिज़्म के चरम पर आ जाने के बाद भी अनेक लेखक उसका पक्ष ले रहे थे तो हमारे यहाँ तो अभी फासिज़्म लोकतन्त्र के कपड़े पहने हुए है उसके विरोध में जाने का तो सवाल ही नहीं उठता ।
तो मध्यप्रदेश में बिहार उत्सव हो रहा है। नितीश और लालू यादव सोचें...... विचार करें कि यह क्यों हो रहा है? इसके पीछे छिपी मंशा क्या है? राजनीति क्या है? और कौन लोग हैं जो इसमें हिस्सेदारी कर रहे हैं?
बहराल भारत भवन में आने ...गाने ...बजाने...मटकने ...लटकने...ठुमकने...फुदकनेवालों की जय हो...जय हो...।
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शनिवार, 13 सितंबर 2014



बी बी सी हिंदी से, मुक्तिबोध के निधन की अाधी शताब्‍दी पूरी होने के संदर्भ में, एक संक्षिप्‍त बातचीत। 
इस बातचीत का लिंक यहॉं नीचे है।
मुक्तिबोध: उनके वाक्य, ताला भी कुंजी भी
कुमार अम्बुज
मुक्तिबोध के निधन के बाद के पाँच दशक गवाह हैं कि उनके जाने के बाद उनकी प्रासंगकिता और ज़्यादा बढ़ी है. इन पाँच दशकों में शायद हिन्दी के प्रत्येक कवि ने मुक्तिबोध को हमेशा ही अपनी स्मृति में रखा है.
मुक्तिबोध का पूरा रचनाकर्म, जो सृजनधर्मिता थी वह हिन्दी के लिए गौरव की बात है. यह बहुत महत्वपूर्ण अवसर है कि हम मुक्तिबोध की कुछ बातों को अपने-अपने तरीक़े से याद करें.
कवि और कथाकार के रूप में तो मुक्तिबोध की ख्याति है ही लेकिन उनका पत्रकार रूप भी लोगों को याद रहना चाहिए. उनके दो काम और भी विलक्षण थे जिन्हें मैं उनके कवि कर्म से कम महत्वपूर्ण नहीं मानता हूँ.
एक, उन्होंने जो डायरी लिखी है उसमें रचना प्रक्रियाओं को लेकर एक लेखक के मन की उधेड़बुन, व्यग्रता और मुश्किलें शामिल हैं. वह 'एक साहित्यिक की डायरी' नाम से प्रकाशित हुई और उनकी रचनावली में यह सम्पूर्ण रूप में है.
दूसरा, उन्होंने 'इतिहास और संस्कृति' के नाम से भारत का इतिहास लिखा. जो बहुत विवादास्पद भी रहा, जिसको लेकर मुक़दमेबाज़ी हुई, लेकिन वह वैज्ञानिक ढंग से लिखा गया इतिहास है.
उनकी डायरी की कई पंक्तियाँ इतनी सारगर्भित हैं कि लगभग एक वाक्य से ही हम बहुत सारे निष्कर्षों की तरफ़, बहुत सारी अवधारणाओं की तरफ़ जा सकते हैं. वह अपने आप में ताला भी हैं और कुंजी भी हैं.
उनकी रचनावली के पाँचवें खंड में जो डायरी है उसमें एक हिस्से की शुरुआत इस वाक्य से होती है, "साहित्य विवेक मूलतः जीवन-विवेक है." यह वाक्य मुझे बहुत अनुप्राणित करता रहा है. इस वाक्य को अगर हम खोलने की कोशिश करें तो हम पाएँगे कि यह एक पूरा विमर्श है.
जनता का साहित्य क्या है?
इसी तरह उन्होंने बहुत दिलचस्प शीर्षक से डायरी लिखी है कि जनता का साहित्य किसे कहते हैं. यह सवाल बार-बार उठता है कि साहित्य बहुत लोकप्रिय नहीं होता है, जो अच्छा साहित्य है उसे बहुत पढ़ने वाले नहीं मिलते हैं और उसे हम जनता का साहित्य कैसे कहें जिसे जनता पढ़ ही नहीं सकती.
मुक्तिबोध लिखते हैं, "साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक. किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है. दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज़ नहीं. ऐसा होता तो क़िस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते."
वह आगे कहते हैं, "तो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है. इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिष्‍ठापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो. इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है."
कला के क्षण
इसी तरह डायरी के वे हिस्से बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसमें उन्होंने कला के दूसरे और तीसरे क्षण के बारे में लिखा है. किसी लेखक और रचना के लिए होने वाले संघर्ष-आत्मसंघर्ष, उसकी प्रक्रिया के बारे में उन्होंने बहुत संवेदनशीलता और बहुत ज़िम्मेदारी से लिखा है.
मुक्तिबोध की 'अंधेरे में', 'भूल-ग़लती' जैसी कई कविताएं बहुत लोकप्रिय हैं लेकिन मैं यहाँ उनकी ऐसी कविता का स्मरण करना चाहता हूँ जो शायद उतनी उद्धृत नहीं है. यह कविता है 'भूरी भूरी ख़ाक धूल' संग्रह में शामिल कविता 'झरने पुराने पड़ गए'. यह उनकी लगभग अधूरी रचना है. यह कविता उनकी मृत्यु से क़रीब चार-पाँच साल पहले 1959-60 में लिखी गई थी.
दुनिया बदलने का एक सपना
उनकी कविता में तद्भव और तत्सम शब्दों का विशाल सपुंजन और समावेश है, लेकिन 1955 के बाद उन्होंने जो कविताएं लिखी हैं उनमें आम बोलचाल की भाषा लगातार बढ़ती गई है.
वैज्ञानिक शब्दावली, आविष्कारों और खोजों के प्रति उनकी उत्सुकता, श्रद्धा और जीवन को ये आविष्कार बदलेंगे इसका विश्वास, साथ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनके कुल लेखन में कभी भी अनुपलब्ध नहीं रहे.
मुक्तिबोध इसलिए हमारे लिए आजतक महत्वपूर्ण बने हुए हैं क्योंकि वह जनता से जुड़कर, जीवन से जुड़कर इस दुनिया को बदलने के लिए एक सपना हमेशा देखते रहे.
संदर्भित कविता 'झरने पुराने पड़ गए' का अंश
झरने पुराने पड़ गए
उनकी उपमा अब कोई नहीं देता
शायद धोबी दें,
जो वहाँ कपड़े फचीटते हैं,
या किसान
जो उसमें फंसी हुई गाड़ी घसीटते हैं लेकिन
वो सभ्य नहीं हैं
इसलिए झरने की उपमा अब लभ्य नहीं है
फिर भी मैं झरने की उपमा ज़रूर दूँगा
उस सुदूर को
जो बहता हुआ हमारी ओर आ रहा है
हमारे पास लगातार आ रहा है
इसलिए नहीं कि हम नदी या तालाब हैं,
जिसमें मिल जाएगा
बल्कि इसलिए कि हम वे टीले हैं
जिन्हें घाव-ही-घाव हैं
टूटे हैं तड़के हैं
फिर भी ठहराव है
एक रुकाव है, इसीलिए सब तरफ़ चेहरे ये पीले हैं
वह आ रहा है, अनक़रीब है,
हमें बहा ले जाएगा!!
कहाँ ले जाएगा?
तो उसी का क़िस्सा है
पुराने जमाने में
भयानक परिपाटी-सी
एक घाटी थी
उसकी वह माटी भी अजीब थी,
बहुत ग़रीब, बहुत बदनसीब थी
वहाँ कई लड़ाइयाँ हुई थीं,
खूब ठठरियाँ फैली थीं,
टूटी हुई हड्डियों के टुकड़े
अभी भी देखे जा सकते हैं
निरखे जा सकते हैं, परखे जा सकते हैं.
लेकिन कौन इस धंधे में पड़े
तो हाँ, वहाँ हजारों किसान मारे गए थे,
बड़े युद्धवीर थे
इसीलिए तलवार के घाट उतारे गए थे
और भी दूसरे कई-कई लोग थे,
बड़े लड़ाकू थे, मरण-संयोग थे
उन्होंने गढ़ और गढ़ियाँ,
दुर्ग और क़िले ढहा दिए
बड़े-बड़े अहंकार और गर्व बहा दिए
आज उसी एक क़िले के हिस्से में
मेरा यह कॉलेज है
टेबल और मेज है,
आर्ट्स और साइंस, कॉमर्स हैं
मुझे यह हर्ष है
कि उसी क़िले के एक महत् सिंहद्वार के
ऊपर और नीचे के कक्षों में मुझको बसाया गया,
क्वार्टर्स बन गए.
 (रंगनाथ सिंह, बी बी सी हिंदी, से बातचीत पर आधारित)