मंगलवार, 1 जुलाई 2014

साहित्य में पूँजीवाद का ग्लूकोज

करीब साल भर पहले लिखी एक टीप का पुनर्लेखन।
यह संतुलनवाद है

जब पैसा पास में आ जाता है तो विचारधारा अनावश्यक जान पड़ने लगती है। आज साहित्य में नवधनाढ्यवर्ग कहीं अधिक ताकत के साथ घुस गया है और वह लगातार विचारधारा के विरोध में बात करता है। जबकि वह लगभग अपढ़ है। उसने अपने मंच बना लिए हैं, लघु पत्रिकाओं तक को वित्तीय सहायता प्रदान कर दी है। आप ऐसे लोगों को जरा नजदीक से देखें, जानें तो पता चलेगा कि इनके पास काफी धन-संपत्ति है। या ये ऐसी नौकरी में है जहाँ प्रचुर आर्थिक सुरक्षा है। शानदार पेंशन है। या बेहतर व्यवसाय है। अति साधन-संपन्नता है। जैसे ही धन का प्रवेश होता है, विचारधारा गायब होने लगती है। क्योंकि विचारधारा रहेगी तो खुद के खिलाफ ही मुश्किल पेश करेगी।

फिर ये  लोग अपनी मतिमंदता छिपाने के लिए मानवतावाद की दुहाई देने लगते हैं। जबकि शोषक भी मानव होता है और शोषित भी। अत्याचारी भी मनुष्य ही होता है और प्रताडि़त व्यक्ति भी मनुष्य है। फोर्ब्‍स सूची के अमीरों में भी मनुष्यों के नाम दर्ज हैं और निर्धनतम लोगों में भी मनुष्य ही रहते आए हैं। मानवतावाद की आड़ में आप पक्षधर होने से बचना चाहते हैं। अपनी राय और अपनी सहानुभूति को जाहिर नहीं करना चाहते। साहित्य में और जीवन में भी वंचित समाज के साथ खड़े नहीं होना चाहते। लेखक को विचारशील, पक्षधर की तरह पेश होना होता है, मानवाधिकार आयोग के माननीय सदस्य की तरह नहीं।

यहीं वे कारण हैं कि इधर वे तमाम पत्रिकाएँ, जिनमें हमारी अनेक आदर्श लघु पत्रिकाएँ भी शामिल हैं, जिन्हें अब हर तरफ से विज्ञापन चाहिए, आर्थिक सहारे चाहिए, अफसरों-व्यापारियों की कृपा चाहिए क्योंकि उन्हें पत्रिका से कमाई करना है, उन सबमें आप देख सकते हैं कि पिछले रास्तों से समावेशी दृष्टि प्रवेश कर चुकी है। उनकी विचारधारा क्षीण हो गई है और एक उदार छबि बनती जा रही है। वामपंथ या पक्षधरता उनके स्वभाव और आकांक्षा से विलोपित हो रही है। भले ही वे आज भी पक्षधर पत्रिका होने की घोषणा करती हैं। वे सच्ची आलोचना का एक प्रखर वाक्य भी हजम नहीं कर सकतीं। तुरंत वमन देखने को मिलेगा। लेकिन मजे की बात है कि वे लेखकों को मौके-बेमौके गरियाती-लतियाती रहती हैं कि लेखक प्रतिरोध नहीं कर रहे हैं। जबकि जितना भी प्रतिरोध सामने आ रहा है वह लेखकों की तरफ से ही संभव हुआ है। यद्यपि उस प्रतिरोध को समाज में तवज्जो नहीं मिल रही है, यह एक पृथक विचारणीय प्रश्न है, इसकी अनेक वजहें समाज में हैं। यह पराभव भी सामने है कि ऐसी पत्रिकाओं में दक्षिणपंथी विचार के लेखकों और दोयम दर्जे के रचनाकारों को जगह मिलना शुरू हो गई है, जबकि कुछ समय पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वे हर हाल में लोकप्रियता की तरफ बढ़ना चाहती हैं, उनके लिए श्रेष्ठता का और परिर्वतनकामी स्वप्न भंग हो चुका है। वे संतुलनवादी हो रही हैं।

दरअसल, यह पूॅंजीवाद है और धनलिप्सा है जो रिसकर सब दूर शिराओं में पैठ गई है। इसलिए इधर साहित्यिक गोष्ठियों में, पत्रिकाओं में कहीं कोई विचारोत्तेजक विमर्श नहीं है, कोई मतभेद नहीं, कोई झगड़ा-टंटा नहीं, चिंता की कोई लकीर नहीं है, एक सहज आश्वस्ति है, मित्रभाव है, बेधड़क आशा है और ‘हाई-टी’ है। तथा जो प्रतिवाद, यथार्थ और स्‍वप्‍न से संचालित लेखन है, उसके प्रति अवहेलना है।
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1 टिप्पणी:

girijesh tiwari ने कहा…

विचारधारा इतनी हल्की चीज़ नहीं है कि पैसा उसे फालतू महसूस करवा ले जाये. इसके विपरीत विचारधारा इतनी सशक्त चीज़ है कि जितना पैसा होता है, उससे अधिक काम होता है और जितना काम होता है, हमेशा उससे कम ही पैसा होता है. पैसे की हुकूमत के विरुद्ध लड़ाई के घेरे में अगर ज़िन्दगी की उठापटक के चलते कमज़ोर लोग आ भी जाते हैं, तो जल्दी ही किनारे लग जाते हैं. यह अन्तिम सीमा तक ज़िद्दी लोगों के बस का रोग है. शेष तो केवल किनारे खड़े होकर उपहास कर सकते हैं. हम उनके उपहास पर ईसा मसीह के शब्दों में केवल इतना कह सकते हैं - " खुदाबाप, इनको माफ़ करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं."