मंगलवार, 6 मार्च 2012

चौराहे पर लोहार

नरेन्‍द्र जैन की कविताऍं

अभी आधार प्रकाशन,एस सी एफ 267, सेक्‍टर 16, पंचकूला, 134 113 हरियाणा से वरिष्‍ठ कवि नरेन्‍द्र जैन का सातवां कविता संग्रह 'चौराहे पर लोहार' प्रकाशित हुआ है। मध्‍यम और निम्‍नवर्गीय जीवन के दैनिक प्रसंगों से नरेन्‍द्र जैन की कविता अपना उत्‍स ग्रहण करती रही है। आज जब हिन्‍दी कविता का अधिकांश कलावाद को प्रगतिशील मुखौटे और अभिनय के साथ अपने भीतर सुखद जगह देने में व्‍यस्‍त दिखता है और उस कविता से अपने समाज और वृहत्‍तर यथार्थ की दृश्‍यावली लगभग विलुप्‍त है, नरेन्‍द्र जैन उन थोड़े से कवियों में हैं जिनकी कविता वंचित, उपेक्षित और असहाय वर्ग के लोगों को, उनके कार्य व्‍यापार को, विडंबनाजन्‍य और विवश फाकामस्‍ती को जगह देती है। भूमण्‍डलीकरण को वे अपने कस्‍बे के भूखण्‍ड में घट रही घटनाओं के माध्‍यम से चिन्हित करते हैं। उनकी कविता एकवचनीय स्‍थानीयता को बहुवचनीय विपुलता से भर देती है और विशाल कांपती हुई परिधि को जैसे केन्‍द्रीयता प्रदान करती है। नरेन्‍द्र अपने चिर परिचित मुहावरे में ही अपनी बात कहते आ रहे हैं,कथ्‍य की विविधता पर ही उन्‍हें कहीं अधिक विश्‍वास है बजाय शिल्‍पाश्रित होने के।
इस संग्रह से शीर्षक कविता सहित दो कविताऍं, यहॉं।

चौराहे पर लोहार

विदिशा का लोहाबाजार जहॉं से शुरू होता है
वहीं चौराहे पर सड़कें चारों दिशाओं की ओर जाती हैं
एक बॉंसकुली की तरफ
एक स्‍टेशन की तरफ
एक बस अड्डे
और एक श्‍माशनघाट

वहीं सोमवार के हाट के दिन
सड़क के एक ओर लोहार बैठते हैं
हँसिये,कुल्‍हाड़ी,सरौते
और खुरपी लेकर
कुछ खरीदने के लिए हर आने-जानेवाले से
अनुनय करते रहते हैं वे
शाम गये तक बिक पाती हैं
बमुश्किल दो-चार चीजें

वहीं आगे बढ़कर
लोहे के व्‍यापारी
मोहसीन अली फखरुद्दीन की दुकान पर
एक नया बोर्ड नुमायां है
'तेज धार और मजबूती के लिये
खरीदिये टाटा के हँसिये'

यह वहीं हँसिया है टाटा का
जिसका शिल्‍प वामपंथी दलों के चुनावी
निशान से मिलता जुलता है
टाटा के पास हँसिया है
हथौड़ा है, गेहूँ की बाली और नमक भी है

चौराहे पर बैठे लोहार के पास क्‍या है
एक मुकम्मिल भूख के सिवा।
000000


विदिशा डायरी सीरीज से नवीं कविता

जिन घरों में बड़े भाई की कमीज
छोटे भाई के काम आ जाती है
इसी तरह जूते, चप्‍पल और पतलून तक
साल दर साल उपयोग में आते ही रहते हैं
वे कभी कभार आते हैं बांसकुली
पतलून कमर से एक इंच छोटी करवाने
या घुटने पर फटे वस्‍त्र को रफू करवाने

अक्‍सर इन घरों में यदि पिता हुए तो
वे बीसियों बारिश झेल चुकी जैकिट पहनते हैं
और फलालैन की बदरंग कमीज
जिन्‍हें सूत के बटन भी अब मयस्‍सर नहीं होते

रफूगर की दुकान से
दस कदम आगे रईस अहमद
पुराने वाद्ययंत्रों के बीच बैठे
क्‍लेरनेट पर बजाते रहते हैं कोई उदास धुन

यह धुन होती है कि
अपने चाक वक्‍त को रफू कर रहे होते हैं वे।
00000

8 टिप्‍पणियां:

brajesh kanungo ने कहा…

नरेन्द्र जैन और उनकी कविताओं से पहली बार सांची के एक रचना शिविर मे मिलना हुआ था. एक चाय की दुकान पर पेपर नेपकीन पर कविता का स्रजन वे चाय पीते हुए कर रहे थे. आज अम्बुज जी की टिप्पणी के साथ कविताएँ पढते हुए सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है।

brajesh kanungo ने कहा…

नरेन्द्र जैन और उनकी कविताओं से पहली बार सांची के एक रचना शिविर मे मिलना हुआ था. एक चाय की दुकान पर पेपर नेपकीन पर कविता का स्रजन वे चाय पीते हुए कर रहे थे. आज अम्बुज जी की टिप्पणी के साथ कविताएँ पढते हुए सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है।

सत्येन्द्र रघुवंशी ने कहा…

achhi kavitaye hai .chayan bhi acchha hai.

सत्येन्द्र रघुवंशी ने कहा…

achhi kavitaaye hai.

विजय गौड़ ने कहा…

bahut sundar chahyan hai. badhai, padhwane ke liye.

विजय गौड़ ने कहा…

bahut hi sundar chayan hai kavitaon ka. badhai padhwane ke liye.

प्रदीप कांत ने कहा…

चौराहे पर बैठे लोहार के पास क्या है
एक मुकम्मल भूख के सिवा

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सचमुच

कविता की यही ताकत है कि वह कहाँ कहाँ से जाकर विसंगतियों को उठा लाती है?

Ek ziddi dhun ने कहा…

नरेंद्र जैन की कविताएं और आपकी टिपण्णी दोनों पढ़ने लायक हैं। उनका पिछला संग्रह भी शानदार था। नया संग्रह दो-चार दिन में मेरे पास पहुंच जाएगा। चौराहे पर लोहार और विदिशा डायरी...दोनों कविताएं लगभग हर शहर-कस्बे की कविताएं हैं, हमारे नए चमकीले समाज की कटु-मार्मिक हकीकत। पुराने वाद्ययंत्रों से फूटती एक उदास धुन।