बुधवार, 10 जून 2009

धर्म एक अंधविश्‍वास है


धर्म के विकल्‍प पर पु‍नर्विचार की श्रंखला में यह चौथी किश्‍त।
अंतिम किश्‍त जल्‍दी ही।


धर्म की अपराजेयता
अभी तक धर्म अपराजेय चला आ रहा है। उसके कुछ प्रमुख कारणों पर, संक्षेप में विचार करें तो सबसे पहला बिंदु यही उभरकर आता है कि वह एक अंधविश्वास है और उसे कुछ भी सिद्ध नहीं करना है। उसे आस्थामूलक, तर्कातीत बनाया गया है। धर्म के अंतर्गत जो लिखा है, जिन ग्रंथों में लिखा है उन्हें अपार प्रतिष्ठा दी जा चुकी है इसलिए अब वे प्रश्नातीत हैं।
दूसरा, वह ऐसे वायवीय प्रश्नों पर अचूक उत्तर देने का भ्रम फैलाता है, जिनका उत्तर देना वस्तुत: किसी के लिए भी लगभग असंभव है। जैसे मृत्यु, मृत्यु के बाद का जीवन, स्वर्ग-नरक की अवधारणा, पुनर्जन्म आदि की कपोल कथायें। (इन उत्तरों के जरिये भी उसे कुछ सिद्ध नहीं करना है, सिर्फ कह देना है और सुनने-जानने वाले को मान लेना है।)
तीसरे, उसमें संस्थागत लक्षण है और प्रचारक का गुण है। श्रद्धा का विषय तो वह बना ही दिया गया है अतएव उसे सुनने, मानने का सहज क्रियाकलाप समाज में मौजूद होता गया है।
चौथा, हर परिवार में, प्रत्येक घर में बच्चा पैदा होते ही उसे धार्मिक वातावरण एवं शिक्षा देना शुरू हो जाता है। बच्चा अपनी अबोध अवस्था में ही, धीरे-धीरे, रोज-रोज धार्मिक और कर्मकांडी बना दिया जाता है। धर्म के खिलाफ कुछ भी सोचने के लिए उसका वंध्यकरण कर दिया जाता है। और अंत में यह कि धर्म को `विश्वास का विषय´ बनाकर पेश किया जाता है।
बर्टेण्‍ड रसेल ने विश्वास के बारे में ठीक ही इंगित किया है: विश्वास अर्थात् किसी चीज को बिना प्रमाण के मानना। ऐसा विश्वास आखिर अंधविश्वास तो है ही।
वास्तविकता यह है कि संसार के किसी भी धर्म के सूत्र, आदेश या नियम कतई ईश्वरीय नहीं हैं बल्कि वे प्रकरांतर से अपने युग के अभिजात्यों, सामंतों, पुरोहितों, सत्ताधारकों अथवा सत्ता का प्रतिरोध कर रहे विचारकों, विद्वानों के आदेश भर हैं जो उन्होंने अपने पीढ़ी दर पीढ़ी चल सकनेवाले वर्चस्व के लिए, यश कामना के लिए अथवा पंथनिर्माण के लिए बनाये, उन्हें महिमामंडित किया और दंड-विधान के साथ लागू किया। विद्वान दार्शनिकों ने भी बीच-बीच में धर्म में सुधारात्मक रवैया अपनाया और प्राय: अपना एक धर्म खड़ा कर दिया। इसलिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन ठीक ही निष्कर्ष निकालते हैं कि धर्म को ईश्वर से अलग करने पर वह महज एक बेहद पुराने जमाने के, अब अप्रासंगिक हो चुके आचरणसूत्र में विघटित और न्यून होकर रह जाएगा।
धर्म को ईश्वर से जोड़ देने के कारण ही वह आदेशात्मक और प्रभुत्ववादी हो उठता है। अब वह वैसा सर्प हो जाता है जिसमें मारक विष भी है। अब वह भयोत्पादक है और पूजनीय भी। इसी कारण वह परंपरा, स्मृति और संस्कृति से भी उच्चतर एवं अनुलघंनीय गरिमा प्राप्त कर लेता है। एक बार फिर मार्क्‍स का ही कथन यहाँ सहज याद आता है: `विश्व से परे किसी दर्शन का कोई अस्तित्व नहीं होता, जैसे कि मनुष्य के परे मस्तिष्क का कोई अस्तित्व नहीं होता।.....आप (धर्माचार्य) लोक-परलोक का आश्वासन देते हैं, दर्शन सत्य के अतिरिक्त किसी चीज का आश्वासन नहीं देता।´ जाहिर है कि यहाँ दर्शन का व्यापक भौतिकवादी अर्थ है और उसे इस उद्धरण की पहली पंक्ति में देखा जा सकता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण
मोती जैसा कोहरा
सबसे पहले `गेलीलियो का जीवन´ (बेर्टोल्ट ब्रेष्ट) नाटक में से गेलीलियो के बड़े डॉयलाग के कुछ अंश देखे जाएँ, जो संशलिष्ट रूप में धर्म की साजिश, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिकों के दायित्वबोध पर भी प्रकाश डालता है : `.....विज्ञान का अनुसरण भी मेरे मुताबिक, संदेह द्वारा पाये गये ज्ञान से है। विज्ञान सभी लोगों को सभी चीजों के बारे में ज्ञान उपलब्ध कराकर उनको अविश्वासी बनाने की कोशिश करता है। (यह अविश्वासी बनाना ही उनके विवेक को जाग्रत करना है तथा तर्क पद्वति का, स्वतंत्र चेतना का विकास करना है।-कुअं) जनसंख्या का एक बड़ा भाग उनके राजकुमारों, जमींदारों और पादरियों द्वारा (सत्ताधारी, अभिजात्य एवं पुरोहित वर्ग द्वारा) अंधविश्वासों और प्राचीन शब्दों के उस मोती जैसे कोहरे में रखा जाता है जो इन लोगों की साजिशों को ढक लेता है। अनेक लोगों की दरिद्रता पर्वतों की तरह पुरानी है और चर्च (धर्म) के प्रवचन-मंच और डेस्क से इसे पर्वतों की तरह अनश्वर बताया जाता है। सितारों की गतियाँ तो स्पष्ट हो गयी हैं मगर जनसाधारण के लिए अभी तक उनके मालिकों की गतियों का अनुमान लगाना असंभव है। संदेह के (ज्ञान के) द्वारा नक्षत्रों को नाप लेने की लड़ाई तो जीत ली गयी है लेकिन गृहणी की दूध के लिए लड़ाई, उसके (अंध)विश्वास के कारण बार-बार हारी जा रही है। विज्ञान का वास्ता दोनों तरह की लड़ाइयों से है। हजारों साल पुराने इस मोती जैसे सफेद कोहरे में ठोकर खाती यह मानवजाति, जो अपनी ही शक्तियों को पूरी तरह विकसित करना नहीं जानेगी तो यह तुम्हारे द्वारा दिखाई गयी प्राकृतिक शक्तियों को भी विकसित करने में असमर्थ होगी। तुम लोग किसलिए काम कर रहे हो? मेरा विश्वास है कि विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ मानवीय अस्तित्व के घोर कष्टों को कम करना है। स्वार्थी सत्ताधारियों से डरकर जब वैज्ञानिक सिर्फ ज्ञान के लिए ही ज्ञान संचय करने लग जाते हैं तो विज्ञान विकलांग हो जाता है और तुम्हारी नयी मशीनें सिर्फ अत्याचर के नये तरीकों का प्रतिनिधित्व करती हैं।´
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जाहिर है मनुष्य को प्रश्नाकुल बनाता है, रहस्यों का उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है लेकिन रहस्यवादी होने से बचाता है। अवैज्ञानिक दृष्टिकोण (जैसे धर्म) डराता है, उलझाता है, बहकाता है, ठगी करता है और ऐसे उत्तर देता है जिन्हें सिद्ध न किया जाए, स्वयंसिद्ध मान लिया जाएँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही हमारे समय-समाज की प्रमुख समस्याओं का निदान बता सकता है। जैसे: गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्यावृद्धि, बेरोजगारी, गैर-बराबरी के वस्तुगत और सच्चे उत्तर दे सकता है। किसी भी देश में ये सब समस्यायें बेहतर प्रबंधन, नियोजन, शिक्षाप्रसार, युक्तियुक्त कानून-नियमों-दंडप्रावधानों और अंधविश्वासों को दूर करते हुये खतम की जा सकती हैं। इसी संसार में अनेक समाजों-देशों में यह संभव हुआ है और कुछ देशों ने इन समस्याओं पर काफी हद तक विजय पायी है। यहाँ तक कि बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदायें भी किस तरह मनुष्यनिर्मित हैं अथवा किस तरह इन आपदाओं से पार पा सकते हैं, यह भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानना संभव है। प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्‍य सेन को इसी केंद्रीय काम के लिए ही नोबेल पुरस्कार दिया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिये मनुष्य अपने सुख-दुख के कारणों को, दुर्घटनाओं और अवसरों के कारणों को बेहतर तरीके से समझ सकता है, उन्हें विश्लेषित कर सकता है और सबसे बड़ी बात, भाग्यवादी या नियतिवादी न होकर, अपनी परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए और आवश्यकतानुसार उन्हें बदलने के लिए उद्यत हो सकता है। तब उसे किसी झूठे ईश्वरीय सहारे की जरूरत नहीं रहेगी और न ही किसी काल्पनिक सत्ता के होने की सांत्वना की जरूरत। यह सब एक दिन में नहीं होगा किंतु वैज्ञानिक दृष्टि के प्रसार, प्रचार और वातावरण बनाये जाने की गति और उत्साह पर निर्भर करेगा कि कितने समय में यह जगह बन सकेगी। संभव है इसमें दो सौ बर्ष भी लगें। या पचास वर्ष भी। यदि इसके पक्ष में काम नहीं किया जाएगा तो जाहिर है कि हजार सालों में भी कुछ नहीं होगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान मिलकर उन सब चीजों की वास्तविक व्याख्या कर सकने में समर्थ हैं, जिसका झूठा दावा धर्म करता है। एक उदाहरण से बात स्पष्ट की जा सकती है। मृत्यु के बाद क्या होता है, मनुष्य (प्राणी) कहाँ जाता है?? इसके संभव धार्मिक उत्तर हैं कि वह 1. पुनर्जन्म के जरिये अपनी योनि में वापस आता है। 2. किसी दूसरी योनि में चला जाता है। 3. स्वर्ग या नर्कवासी होता है और फिर बाद में कभी किसी योनि में जन्म लेता है। 4. मोक्ष/निर्वाण को प्राप्त होकर परमपिता का अंश बनता है।
ये सारे उत्तर काल्पनिक हैं और आज तक इन्हें कोई सिद्ध नहीं कर सका है, न संत, न योगी, न मठाधीश और न ही संसार का कोई धर्म। बहरहाल, वैज्ञानिक संभव उत्तर यह हो सकता है: संसार में जितने भी जीवित प्राणी हैं, वे अपने `जैविक अवयवों के समुच्चय´ ( biological setup) होने के कारण जीवित, ऊर्जावान और सक्रिय हैं। । जैसे मनुष्य को ही लें, तो अकेले हृदय, किडनी, लीवर, हाथ, पैर या मस्तिष्क को मनुष्य नहीं कहा जा सकता, ये सब और अनंत शिराओं-कोशिकाओं से मिलकर ही मनुष्य का `जैविक संयोजन´ बनता है। हर संयोजन का या उसके अवयवों का, विकासमान अवस्था के साथ एक आयुष्य होता है, चाहे वह जैविक प्रकृति हो या पदार्थों/तत्वों का संयोजन। यह संयोजन जैसे ही गड़बड़ाता है उसे हम बीमारी कहते हैं और उसका इलाज भी संभव है लेकिन जैसे ही वह प्राकृतिक तौर पर या दुर्घटना में नष्ट होता है या आयुष्य को पूरा होता है, मनुष्य/प्राणी का जीवन समाप्त हो जाता है। इसमें किसी अन्य लोक में जाने या मृत्योपरांत जीवन का प्रश्न ही कहाँ उठता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कंप्यूटर या रोबोट के जीवन के साथ होता है। फर्क यह है कि ये `इलेक्ट्रॉनिक सेटअप´ हैं। इनके अवयवों की भी एक आयु होती है, एक सीमा तक इन्हें ठीक (repair) किया जा सकता है और अंतत: एक दिन इनका भी जीवन पूरा हो जाता है। जैसे ये किसी अन्य लोक में नहीं जाते हैं, उसी तरह मनुष्य भी मृत्यु के बाद कहीं नहीं जाता।
लेकिन धर्म ठीक उलटी, मनगढंत बातें प्रचारित कर, जनता का जीवन लगातार दुखमय करता है। झूठे आश्वासन देकर, कष्टों के मूल कारणों से उसे अपरिचित रखता है। ब्राह्मणों, पुरोहितों, पंडों का जीवन-यापन तो इसी तरह के अनेक गपोड़पनों पर चल रहा है। इस तरह के तमाम सवालों, शंकाओं का उत्तर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही दिया जाना संभव है। यदि किसी बात का उत्तर विज्ञान के पास आज नहीं है तो कल जरूर होगा, जैसे सौ-पचास वर्ष पहले उठे सैंकड़ों प्रश्नों के उत्तर उस समय के विज्ञान के पास भले न रहे हों किंतु आज उनके उत्तर विज्ञान के पास हैं। लेकिन धर्म के पास न तो आज उसके उत्तर हैं और न ही भविष्य में कभी हो सकते हैं क्योंकि वह विशुद्ध अंधविश्वास है।

8 टिप्‍पणियां:

ravindra vyas ने कहा…

मेरे लिए कुछ चीजें साफ थीं, कुछ साफ हो रही हैं और कुछ चीजें साफ हो रही हैं।
शुक्रिया।

verma8829 ने कहा…

vaigyanik soch se chizon ko dekhne ka yah nazariya bahut zaroori hai.

pratibha ने कहा…

अंबुज जी, मैं लगातार पढ़ रही हूं यह सीरीज. सचमुच सही समय पर सही काम करना इसी को कहते हैं. बहुत पहले इस संदर्भ में पहला लेख राजेन्द्र यादव का पढ़ा था, उनके संपादकीय में. तबसे कई सवाल, कई कन्फ्यूजन दिमाग में गाढ़े होने लगे. फिर गोरखपांडे को पढ़ा. फिर इक्का-दुक्का, लेख और पढ़े. हाल ही में स्त्री और धर्म को लेकर भी मैंने काफी पढ़ा और कुछ काम किया है. बहरहाल, मेरे काफी कन्फ्यूजन्स दूर हुए हैं आपके इन लेखों से. इन्हें प्रिंटआउट्स के रूप में अपने पास सुरक्षित रख रही हूं. आपका शुक्रिया!

विनय ने कहा…

विश्लेषण ज्ञानवर्धक था, शुक्रिया

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

जैसे जैसे ज्ञान का प्रकाश फैलता है, धर्म अपनी चादर समेटता है।

शरद कोकास ने कहा…

जो बातें मनुष्य समझ नहीं सका उसने उन्हे धारण कर लिया और वह उसका धर्म कहलाया. विज्ञान मनुष्य के कर्म में शामिल है जो उसने करके देखा और अपने निष्कर्ष निकाले. अगर धर्म से ही सब सम्भव होता तो एरोप्लेन से लेकर मोबाइल तक् सारे आविष्कार ध्यानावस्था में ही हो जाते,मनुष्य को प्रयोग नही करने पडते .इस अन्धविश्वास से मनुष्य का मुक्त होना ज़रूरी है.

रंगनाथ सिंह ने कहा…

धर्म पर कार्ल मार्क्स के विचारों को आपने प्रयुक्त किया है। धर्म को लेकर मार्क्स की अवधारणा पर एक पोस्ट के माध्यम से प्रकाश डालें तो हमें काफी लाभ होगा।
आप अन्यथा न लें तो पूछना चाहुँगा कि मार्रकस के अलावा जिन स्कालरों ने धर्म पर काम किया है उनमें से आप किन-किन को धर्म के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। यदि उनकी किताब विशेष को उल्लेखनीय पाएं तो उसका भी जिक्र करें।
इन प्रश्नों का जवाब देकर आप एक जिज्ञासु युवा की बड़ी मदद करेंगे

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

काफ़ी देर से आ पाया।
धर्म को लेकर आमतौर पर वामपंथी खेमे में भी चुप रहना बेहतर माना जाता है। आपने वसुधा में चली बहस में हस्तक्षेप किया था…पर उस पर भी अपेक्षित बातचीत नहीं हो पायी थी (हालांकि मैने एक विस्तृत प्रतिक्रिया लिखी थी पर पता नहींक्यूं वह छपी नहीं)।
आपके विश्लेषण से मोटे तौर पर सहमत होते हुए बस इतना जोडना चाहूंगा कि धर्म जो एक सुरक्षा घेरा उपलब्ध कराता है उसका विकल्प ढूंढना बेहद ज़रूरी है। संगठन इस काम को कर सकता है, पर वह एक लंबे दौर का और मुश्किल काम है। माना जाता था कि ज्ञान-विज्ञान के प्रसार का अंध्विश्वासों और धार्मिक कर्मकाण्डों पर विपरीत असर होगा। पर ठीक-ठीक ऐसा हुआ नहीं। शायद अंधविश्वास के सामाजिक-सांस्कृतिक स्रोतों पर हमला किये बिना यह संभव नहीं।