गुरुवार, 19 अगस्त 2010

क्‍योंकि हम हमेशा ही पराजित हुए

हम कहानी क्‍यों कहते हैं

यह अनुवाद वरिष्‍ठ कवि, मित्र आग्‍नेय जी के लिए


लाइजेल म्‍यूलर


1
क्‍योंकि हमारे पास कभी पत्तियॉं हुआ करती थीं
और सीलन भरे दिनों में
टीस उठती थी हमारी माँसपेशियों में
जो अब बहुत तकलीफदेह है, तबसे जब हमें
मैदान में विस्‍थापित कर दिया गया

और क्‍योंकि हमारे बच्‍चे विश्‍वास करते थे
कि वे उड़ सकते हैं, एक आदिम इच्‍छा हमारे भीतर बनी रही
तबसे जब हमारी बाहों की अस्थियॉं
तंतुवाद्य के आकार की थीं और साफ टूट गईं थीं
उनके पंखों के नीचे

और क्‍योंकि हमारे पास फेंफड़े होने से पहले ही
हम जानते थे कि यह तलहटी से कितना दूर है
हम खुली ऑंखों से तैरे
जैसे सपनों के रंगीन दुपटटे किसी चित्र दृश्‍य में तैरते हैं
और क्‍योंकि हम जाग गए थे

और सीख चुके थे बोलना

2
हम गुफाओं में आग के पास बैठे
और क्‍योंकि हम गरीब थे, हमने
एक विशाल खजाने की एक कहानी बनायी
जो केवल हमारे लिए ही खुलेगा

और क्‍योंकि हम हमेशा ही पराजित हुए
हमने असंभव पहेलियों का आविष्‍कार किया
जिन्‍हें केवल हम ही हल कर सकते थे
और ऐसे राक्षस जिन्‍हें केवल हम मार सकते थे
ऐसी स्त्रियां जो किसी और को प्‍यार नहीं कर सकती थीं

और क्‍योंकि हम जीवित बने रहे
बहनें और भाई, बेटियॉं और बेटे,
हमने ऐसी अस्थियों को खोजा जो धरती के
अँधेरे कोनों से जीवित हो सकीं
और पेड़ की सफेद चिडि़यों की तरह गीत गाये

3
क्‍योंकि हमारे जीवन की कहानी ही
हमारा जीवन हो गई

क्‍योंकि हममें से हर कोई
एक ही कहानी कहता है
लेकिन अलग तरह से कहता है

और हममें से कोई भी
एक तरह से दुबारा नहीं कहता है

क्‍योंकि नानी मकड़ी की तरह किस्‍से बुनती है
कि अपने बच्‍चों को मंत्रमुग्‍ध कर सके
और दादा हमें समझाना चाहते हैं
कि जो कुछ भी घटित हुआ
वह उनकी वजह से ही घटित हुआ

और हालॉंकि हम बेतरतीबी से सुनते हैं
एक कान से सुनते हैं,
हम शुरू करेंगे हमारी कहानी इस शब्‍द से-
'और'

4 टिप्‍पणियां:

अजेय ने कहा…

अद्भुत. अनेक बार पढ़ा . कवि का परिचय देते तो अच्छा था.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

sunder , lajavb hai
bdhai aur sadhuwad hum tak pahuchane ke liye
saadar

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

विचारोत्तेजक और जीवन से जुड़ी कविताएं है।

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आपके ब्लॉग को आज चर्चामंच पर संकलित किया है.. एक बार देखिएगा जरूर..
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