बुधवार, 25 मई 2011

अन्तिम आदमी

किंचित निराशापूर्ण अंत के बावजूद यह कविता वर्षों से मुझे प्रिय है। शायद यह अंत दुखद यथार्थ का एक पहलू है, जिसे आशावाद में ढालने से कवि का इंकार है।
राजेन्‍द्र धोड़पकर की कविताओं में भाषा, लय, संगीत और मार्मिकता के विरल दृश्‍य सहज उपलब्‍ध हैं। और यह कविता उसका विलक्षण उदाहरण है।

अन्तिम आदमी
राजेन्‍द्र धोड़पकर


उस वक्‍त सारी कुर्सियां खाली हो चुकी थीं
सबसे अन्‍त में उनके बीच से निकला वह आदमी
और बीच रात में चलने लगा
उसके दोनों हाथ अपनी जेबों में थे
उसकी उंगलियों के इर्दगिर्द सवाल लिपटे थे
अन्तिम आदमी अकेला था सड़कों पर
कई सड़कों और गलियों से गुजरा वह
उसे रास्‍ते मालूम थे
उसे मालूम था कोई रास्‍ता उसके घर तक नहीं जाता

अन्तिम आदमी का कोई घर नहीं था
अन्तिम आदमी का कोई घर नहीं होता
उसके पास सिर्फ सवाल होते हैं जिन्‍हें
हल करते-करते जवाब में और सवाल पाता है वह
बहुत ठंडी थी वह रात
कोहरे के समुद्र में एक विशाल गेंद की तरह तैर रही थी पृथ्‍वी
जिसे सबसे अन्‍त में छोड़कर गया वह।

9 टिप्‍पणियां:

Vivek Rastogi ने कहा…

वाकई कविता बहुत अच्छी लगी ।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

namaskaar !
baat saadhaaran ho kar bhi ek bodh pradan karti hai , apne gahre bhaav liye '' wo antim aadami '' kavi mohday ko aur ambuj saab , aap ka bhi aabhar is rachnaa ko padhawe k liye . badhai
saadar !

piyush a thakkar ने कहा…

aek akeli achhi kavita ki tarah!

वंदना शुक्ला ने कहा…

Dr Rajendr dhodapkar ki kavita arse bad padhne ko mili ... lagbhag har kavita ki tarah laazawaab..kumar ambuj ji bahut 2 dhanywad ...

ravindra vyas ने कहा…

yah kavita meri pasandida kavita hai!

अजेय ने कहा…

बहुत असरदार् . कुमार विकल याद आए. फेस्बुक पर शेयर कर रहा हूँ .

जवाहर चौधरी ने कहा…

अंतिम आदमी का मुकाम कभी खाली नहीं होता है .
चूँकि अंतिम आदमी हैं , इसलिए हम अंतिम आदमी नहीं हैं . अच्छी कविता , अच्छा चयन .

Ishwar Dost ने कहा…

बहुत अच्छी कविता। अंत भी देर तक साथ रहने वाला।

hemant shesh ने कहा…

मैं श्री ईश्वर दोस्त की उपर्युक्त टीप से सहमत हूँ.

मेरे प्रिय कवि राजेंद्र, आप को कभी-कभी बुरी कविता भी लिखनी चाहिए!
पर वह आप के नसीब में नहीं.... शायद!

प्रिय अरुण देव के 'समालोचक' पर आपकी कविताओं के गहरे रंग में देर से डूबा हूँ, देर तक डूबा रहूँगा, जब तक आपकी ही फिर एक और रचना मुझे वहां से उबार न ले!

याद है १९८८ का भोपाल,गोष्ठी में ही आपका लगातार चित्र बनाना या लोगों के रेखांकन ? युवा अशोक वाजपेयी, भारत भवन की शायद तीसरी 'अंतर्भारती' और हम सब के स्ट्रिक्ट हैड मास्टर- कृष्ण बलदेव वैद साहब! उदयन, मदन, ध्रुव, कृष्णा बसु, अंजन सेन, मल्लिका सेनगुप्ता,भरत नायक, ए.ब्रह्मराजन,युवा पुरुशोत्तम अग्रवाल......


नदियों में कित्ता पानी बह गया, तब से पर लगती है ये कल जैसी ही बात, ऐसा क्यों
?