सोमवार, 20 जून 2011

प्रतीक्षा

करीब एक दशक पहले अपने मित्र के लिए लिखी यह कविता अभी तक अप्रकाशित ही है।
आज अचानक य‍ह कागजों में मिली तो यहां प्रकाशित कर रहा हूं।

प्रतीक्षा
(एस.एन. के लिये)


दूर तैरता दिखता है बादल का टुकड़ा
और तुम जो यहाँ इतने करीब हो हृदय के
एक इस याद ने मुझे बना दिया है ताकतवर

कल भी मेरे बुखार में चला आया वह पेड़
जो तुम्हारे साथ रहने से ही बरगद था
अब तुम्हें देखे इतने बरस हुए कि उम्मीद होती है
मेरे पास पिछले सालों की हजार बातें हैं
जो सिर्फ तुम्हें बतायी जा सकती हैं
जिन्हें समझ सकते हो सिर्फ तुम ही
इस बीच मैंने कई चीजों को सहन किया
और चुप रहा कि एक दिन तुम मिलोगे

पिछली रात आकाश में अनुपस्थित
चंद्रमा ने जैसे मुझे समझायाः
‘कृष्ण पक्ष में हमें इंतजार करना चाहिए’
धीरे-धीरे पार हो रहा है जीवन का पठार
पीछे मुड़कर देखने पर केवल तुम हो
जो दिखाई देते हो मित्र की तरह रोशन
और चुपचाप करते हो मेरी प्रतीक्षा

मुझे मालूम है एक दिन अचानक
मैं पहुँच ही जाऊँगा तुम्हारे पास
या किसी रात खटखटाये जाने पर
जब दरवाजा खोलूँगा तो तुम ही दिखोगे सामने
वैसे ही सिमटे हुए और व्याकुल
वैसे ही अपरम्पार।
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7 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

खूबसूरत कविता ! अम्बुज सर आपको अरसे से पढ़ रहा हूँ पत्रिकाओं में...

अजेय ने कहा…

चुप रहा कि एक दिन तुम मिलोगे

veerubhai ने कहा…

सुंदर , मनोहर आभार .

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

ऐसे ही की होगी कभी
कालीदास ने
प्रतीक्षा।

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

अम्बुज जी .. सकारात्मक विचारों से भरी कविता अच्छी लगी.. सादर

सुनील गज्जाणी ने कहा…

namaskaar !
apne mitr ko naye roop me hamare samksh prastut kiya . wo mitr bhi damdaar hogaa jinko aap ne shabdo me dhaalaa hai ' tabhi ped ho karbhi bargad se lagte hai .
naman !
saadar !

Ankita Chauhan ने कहा…

thoughtful..and full of reverie..amazing..