शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भुनगा भी कुछ बड़ा होता है


एक घर, एक शहर


रहने के लिए एक घर चाहिए।
यह एक अधूरा वाक्य है।
दरअसल, पूरा वाक्य यह हो सकता है कि रहने के लिए शहर चाहिए और उस शहर में एक घर चाहिए। होता भी यही है कि हम पहले एक शहर खोजते हैं। किसी उल्लास में और किसी आकांक्षा के साथ हम उसे खोज लेते हैं। या कभी-कभी हमें शहर यों भी मिल जाता है कि हमने भी सोचा भी न था कि हम वहाँ, उस शहर में जाएँगे। वहाँ जाने का हम विरोध करते हैं, मातम मनाते हैं और लाख जतन करते हैं कि हम वहाँ न जाएँ। लेकिन तमाम अनिच्छा, तमाम अनमनेपन से हम वहाँ जाते हैं और कुछ समय तक लगातार खुद को दिलासा देते रहते हैं कि शायद यहीं का अन्न-पानी कुछ दिनों के लिए बदा है। फिर हम भूलते चले जाते हैं कि यह वही शहर है, जहाँं हम आना ही नहीं चाहते थे और इसके लिए हमने बहुत सारी ताकत, बहुत सारे संबंधों का जोर लगा दिया था। कभी-कभार कोई पूछे या याद करें तो ही यह सब याद आता है। इस तरह भी कोई शहर हमें खोज लेता है, समाहित कर लेता है या एक तरह से हमें बंधक बना लेता है। हम ही उस शहर को नहीं छोड़ना चाहते। फिर हमें पता चलता है कि शहर में रहना चाहते हैं तो किसी घर में ही रहना होगा। इस तरह हम एक शहर में और एक घर में एक साथ रह पाते हैं।

कुछ मुश्किल तब होती है जब शहर बढ़ता ही चला जाता है। इतना कि उसके नक्शे में आपका घर एक छोटे-से धब्बे की तरह दिखता है। फिर वह धब्बा एक बिंदुनुमा छींटे में बदल जाता है और फिर वह छींटा भी गायब हो जाता है और उसका एक हल्का सा निशान दिखता है जो दरअसल नक्शे में नहीं आपकी स्मृति में कहीं होता है। फिर आप खुद गायब होना शुरू होते हैं। धीरे-धीरे आप लुप्त होते चले जाते हैं। कहीं आपकी निशानी भी नहीं रहती है। केवल आपको ही पता रहता है कि आप इस शहर में हैं। लेकिन अकसर ही लग सकता है कि यह आपका कोई भ्रम है। मनोरोग जैसा है कि आप नहीं हैं लेकिन अपने होने को अनुभव करते हैं। फिर कुछ चीजों से आप इस भ्रम को दूर करने की कोशिश करते हैं और आखिर जानकर गहरी साँस लेते हैं कि आप वाकई हैं और यह कोई सायकी नहीं है।

राशन कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली बिल या फिर ड्राइविंग लायसेंस, बैंक पास-बुक, पासपोर्ट या पेन कार्ड आपके पास हैं। इनमें से कुछ चीजों पर तो आपकी तस्वीर भी है, पता-ठिकाना है। यह आपके होने का सच्चा प्रमाण है। इतना कि हर कोई इस पर विश्वास करता है। जो आपको जानता नहीं, जिसका आपसे किसी तरह का रिश्ता नहीं, वह भी मान लेता है कि आप इस शहर में हैं और इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता। इस समय ये सब प्रमाण, जो आप अपने घर में देख रहे हैं, आपके लिए संतोष और आश्वस्ति का विषय हैं। सबसे अधिक तो यही कि इनसे एक भ्रम, एक संशय दूर होता है। लेकिन कुछ चीजें नए सिरे से गडड्मड्ड होना शुरू होती हैं। जैसे यही कि यदि ये नहीं होंगे तो क्या आप वाकई नहीं रहेंगे! कि आपका होना इतना कागजी और इतना वायवीय है। कि हवाएँ आपको उड़ाकर ले जा सकती हैं, पानी आपको गला सकता है और अग्नि आपको भस्म कर सकती है। और गीता का ज्ञान अजीब लौकिक अर्थ में आपको याद आने लगता है। कि ये चीजें चोरी हो जाएँ तो कई दिनों तक आपका होना स्थगित हो जाए। और शहर में आपकी वापसी बेहद कठिन साबित हो।

शहर इतना विशाल, विस्तृत और अलभ्य हो चुका है कि आपको रोज-रोज अचरज होता है कि यह वही शहर है जिसे हमने इतना छोटा और कुलाँचे भरते हुए देखा था। जब इसने पहली बार अपनी देह बढ़ाई थी तो आपने भी अपनी सक्रियता के बल पर अपनी देह फुला ली थी। लेकिन जल्दी ही पता चल गया था कि यह कोई मिथकीय खेल नहीं है। आपने जब लघु रूप धारण किया तो फिर वापस अपने रूप में आ नहीं सके। और अब आप दरअसल भुनगे हैं।

नहीं, भुनगा भी कुछ बड़ा होता है।
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5 टिप्‍पणियां:

prafull shiledar ने कहा…

भाई अम्बुज जी, शहर के और उसमे रहेने के बारेमे आप ने बड़ी गहरी बात कह दी. मै महसूस कर रहा हु इस बात को अभी इस बम्बई शहर में. यहाँ से जब जब नागपुर लौट जाता हु तो वहा घर होने के बावजूद यही एहसास होते रहता है के अपना कोई छीटा- या दाग ही कहो- इस शहर पर बचा है या नहीं. समय की वाशिंग मशीन में सब धुल रहा है. साफ़ हो रहा है. याने की बेदाग ... - प्रफुल्ल शिलेदार

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

बहूत सार्थक लेख | आभार


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Tamasha-E-Zindagi
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ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन ये कि मैं झूठ बोल्यां मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Anita (अनिता) ने कहा…

कुछ बातें हमें याद ही नहीं रहतीं... जैसे कि एक वक़्त ऐसा भी आता है.. जब हम होकर भी नहीं होते..! बड़ी ही अजीब सी बात है... मगर एक बहुत बड़ा सत्य!
सोचने को विवश कर गयी आपकी ये रचना...
~सादर!!!

Mamta Bajpai ने कहा…

बहुत बढ़िया लेख ....शहरी विकाश का सत्य चित्रण