सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

मैं क्यों लिखता हूँ ?


तुर्की लेखक ओरहान पामुक ने नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय `माय फादर्स सूटकेस´ शीर्षक से अपना `नोबेल लेक्चर´ दिया था। इस लंबे भाषण का एक हिस्सा पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें लिखने के लिए जो आस्था, कारण और प्रतिबद्धता प्रकट की गई है, वह कुछ खास मायनों में अधिसंख्य लेखकों की आकांक्षा से मेल खा सकती है। उनके अपने औचित्य के साथ भी खड़ी हो सकती है।

पैराग्राफिंग बदलते हुए मैंने इसका अनुवाद किया है। यह छोटा सा गद्य मुझे बहुत प्रिय है। इसे रुचिवान लोगों के बीच रखते हुए मुझे खुशी हो रही है।

मैं क्यों लिखता हूँ ?

मैं लिखता हूँ क्योंकि लिखना मेरी एक आंतरिक आवश्यकता है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं वे सारे साधारण कामकाज नहीं कर सकता जो अन्य दूसरे लोग करते हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं आप सबसे नाराज हूँ, हर एक से नाराज हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं इसी तरह वास्तविक जीवन में बदलाव लाने में अपनी हिस्सेदारी कर सकता हूँ।


मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे कागज, कलम और स्याही की गंध पसंद है।


मैं लिखता हूँ क्योंकि अन्य किसी भी चीज से ज्यादा मुझे साहित्य में विश्वास है। मैं लिखता हूँ क्योंकि यह एक आदत है, एक जुनून है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं विस्मृत कर दिये जाने से डरता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं उस यश और अभिरुचि को चाहता हूँ जो लिखने से मिलती है।


मैं अकेला होने के लिये लिखता हूँ।


मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह मैं समझ सकूँगा कि मैं आप सबसे, हर एक से, बहुत, बहुत ज्यादा नाराज क्यों हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पढ़ें। मैं लिखता हूँ क्योंकि जब एक बार कुछ लिखना शुरू कर देता हूँ तो मैं उसे पूरा कर देना चाहता हूँ।


मैं लिखता हूँ क्योंकि हर कोई मुझसे लिखने की अपेक्षा करता है।


मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे पुस्तकालयों की अमरता में एक नादान-सा विश्वास है, और मेरी उन पुस्तकों में, जो अलमारी में रखी हुई हैं। मैं लिखता हूँ क्योंकि जीवन की सुंदरताओं और वैभव को शब्दों में रूपायित करना एक उत्तेजक अनुभव है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका हूँ।


मैं खुश होने के लिये लिखता हूँ।
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ओरहान पामुक
नोबेल लेक्चर से एक संपादित अंश:

अनुवाद: कुमार अम्‍बुज

नया मोबाईल नम्‍बर-09424474678

11 टिप्‍पणियां:

ravindra vyas ने कहा…

मैं लिखता हूँ क्योंकि जीवन की सुंदरताओं और वैभव को शब्दों में रूपायित करना एक उत्तेजक अनुभव है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका हूँ।...
पामुक का यह टुकड़ा आपकी निगाह का परिचय भी देता है और उस लेखका का भी जिसने अपने मन की बातें इस सादगी से कही है कि मर मर जाएं। और अनुवाद की लय उस लय को पकड़ती है जिसमें डोलते हुए यह लेखक ने लिखा था।

Pratyaksha ने कहा…

कितनी ईमानदार बात कही है पामुक ने ..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बात बहुत सही है, वह बदलाव के लिए लिखता है, स्वान्त सुखाय लिखता है, वह दुनियाँ को समझने के लिए लिखता है।
सब इसी लिए लिखते हैं, यदि वे लिखते हैं, किसी और के लिए प्रचार नहीं करते।

डॉ .अनुराग ने कहा…

ईमानदार अभिव्यक्ति !

Geet Chaturvedi ने कहा…

कितनी सुंदर बात है...

याद आ गया कि सार्त्र ने कहीं लिखा था- मेरे नानाजी के कमरे में इतनी किताबें थीं कि उन्‍हें देखकर मुझे लगता था, जो लोग किताबें लिखते हैं, वे अमर हो जाते हैं. और तब से मैंने सोच लिया था कि मुझे भी अमर होना है...

Geet Chaturvedi ने कहा…

और जब एमस ओज़ कहता है कि किसी किताब को नहीं मारा जा सकता, सबसे बुरी परिस्थितियों में यह संभावना बनी रहती है कि दुनिया के दूर किसी कोने में, किसी लाइब्रेरी में उस किताब की कोई एक प्रति बची रहे...

तो विश्‍वास बढ़ता ही है.

anurag vats ने कहा…

bahut sundar chayan aur anuvad hai yah ambuji...maine pamuk ki kathetar gadya ki wah pustak padhi hai jismen yah lecture shamil hai...usmen chote-bade aise kai ansh hain jo ek lekhak ki niji aur sarwjanik ruchi,lagaaw aur aakaakshaon ke shabd roop hain...main hamesha se chahta tha ki anubhaw aur lekhan ka yah tatkapan jo pamuk ke gadya men hai...hindi ke pathakon ke sammukh bhi aaye...

सचिन .......... ने कहा…

वे सारे साधारण कामकाज नहीं कर सकता जो अन्य दूसरे लोग करते हैं।
धन्यवाद...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

इस शानदार गद्य की प्रस्तुति के लिए आपको बधाई

इतनी साफगोई, इतनी इमानदारी और इतनी स्पष्टता ही एक मामूली आदमी को बड़ा और महत्वपूर्ण ही नहीं उपयोगी लेखक बनती है।

संभव हो तो हमारा ब्लॉग देखें।
www.naidakhal.blogspot.com

फिरदौस, बात बोलेगी हम नहीं ने कहा…

sab sayed isiliye likhte hai??

रंगनाथ सिंह ने कहा…

sudhanshu ne sahi hi kaha h sab isiliye likhta hai.
uski bat ko thoda sampadit karke likhu to kahunga ki jo is ke siva kisi aur vajah se likhte h wo lekhak hote hi nhi. akhbari kalamghissuvo aur sabdo ko nachane wale madariyo ko lekhak ke roop me koi nhi yad rakhta.
yah gadya prerana dayak tha. kisi nye lekhak ke liye aatm-sansay se ubarne me iski bhumika banati h.