सोमवार, 20 अक्तूबर 2008

मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।


'पहल-71' में जो डायरी प्रकाशित हुई थी, उसमें से यह एक अंश यहाँ दे रहा हूँ। इसमें केवल एक पंक्ति अभी तीन महीने पहले और शामिल हुई है। शायद यह दिलचस्‍प लगे।

मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।
27-06-98
रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है।

जिस तरह एक मौलिक मनुष्य असंभव है उसी तरह एक मौलिक रचना नामुमकिन है। मौलिकता एक अवस्थिति भर है। (जैसे शतरंज के चौसठ खानों में बत्तीसों या कम ज़ादा मोहरों के रहते, तमाम स्थितियॉं बनती-बिगड़ती रह सकती हैं और एक मोहरा इधर-उधर करने से भी एक नितांत नई अवस्थिति बन जाती है।) एक दी हुई दुनिया है जिसमें आपको अपनी एक दुनिया को जन्म देना है। अपनी अवस्थिति का निर्माण करना है। दी हुई दुनिया का अतिक्रमण भी करना है। यही रचनाशीलता है। यह अवस्थिति मौलिकता है।

सर्जक अपनी रचनाशीलता में कुछ ऐसा ही करते हैं कि एक मोहरे को, कुछ मोहरों को इस तरह रखते हैं कि वह एक नया संयोजन हो जाए। पूरा जीवन विस्तृत खानों से भरा संसार है। शब्द मोहरे हैं। विचार, संयोजन की आधारशिलाऍं हैं। कारक हैं। गणित में संख्याऍं हैं। उनसे असीमित संभावनाओं को, अनगिन संयोजनों को जन्म दिया जाना संभव है। वह सब कुछ अगण्य है। इस सब कुछ में से रचनाकार अपनी सर्जनात्मकता के जरिए, एक परिप्रेक्ष्य देता है। यह परिप्रेक्ष्य कुछ हद तक `मौलिकता´ जैसा समझा जा सकता है।

मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है। मेरी चाल में मेरे पितामह हैं। और मेरी जल्दबाजी मुझे मेरे नाना से मिली है। यही मेरी मौलिकता है। एक नया संयोजन। मैं इसमें कुछ अपनी तरफ से भी जोड़ रहा होउँगा। जिसके बारे में यह दावा भी हास्यास्पद होगा कि वह वस्तुत: सिर्फ मेरा ही है। लेकिन उससे एक नयी अवस्थिति बनती है। यह मौलिकता का मिथ है।

अवयव मौलिक नहीं हो सकते। वे हमारे माध्यम के हिस्से हैं। संयोजन नया हो सकता है। तथाकथित मौलिकताऍं यदि कुछ हैं भी तो वे समाज में, जीवन में बनती हैं, साहित्य में उनकी छायाओं को दर्ज भर किया जा सकता है। इसी सब के बीच रचना की कोई मौलिकता, यदि वह वाकई हो सकती है तो, छिपी हो सकती है। यही सर्वाधिक नैसर्गिक है। एक रचनाकार सबका कर्ज़दार होता है। उसके आसपास की हर जीवित-अजीवित चीज का। दृश्य-अदृश्य का। वही उसकी पूँजी है। कर्ज की पूँजी मौलिक नहीं होती। और यह पूँजी समाज में लंबे कालखंड से विद्यमान है। उसके निवेश और उसके उपयोग का तरीका अलग हो सकता है। यही मौलिकता का मिथ है।

मैं और मेरी रचना उतनी ही मौलिक है जितना कि इस संसार में मेरा अस्तित्व मौलिक है। मेरी मौलिकता पूरे जड़-चेतन से सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं। इसलिए ही वह किसी शुद्ध मौलिकता की तरह मौलिक नहीं।

हॉं, एक बात और: हमारी अज्ञानता भी कई चीजों को, मौलिकता के पद (Term) में `मौलिक´ घोषित कर सकती है।
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पुन:

17 जुलाई 2008
रचनाशीलता में मौलिकता दरअसल एक तरह का अंधविश्‍वास है।
कुमार अम्‍बुज

8 टिप्‍पणियां:

Arun Aditya ने कहा…

एकदम मौलिक टिप्पणी है....
पहल में पहले ही पढ़ लिया था। यहां एक पंक्ति और जुड़ जाने से संयोजन की अवस्थिति फिर बदल गई है।

अंशुमाली ने कहा…

अंबुजजी
पहल दफा आपके ब्लॉग पर आया हूं। एक ममस्पर्शी अंश पढ़ने को मिला है।

जितेन्द़ भगत ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जितेन्द़ भगत ने कहा…

अच्‍छी बात लगी कि‍-
'एक रचनाकार सबका कर्ज़दार होता है। उसके आसपास की हर जीवित-अजीवित चीज का। दृश्य-अदृश्य का। वही उसकी पूँजी है। कर्ज की पूँजी मौलिक नहीं होती।'
(क्‍या यहॉ एक शब्‍द छूट गया है- कर्ज की पूँजी पूर्णत:मौलिक नहीं होती।)

आपने मौलि‍कता को सही ढ़ग से वि‍वेचि‍त कि‍या। शुक्रि‍या।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अम्बुज जी ,
आप जैसे वरिस्थ रचनाकार की यह टिपण्णी हमें अपनी रचनाओं ही नहीं साहित्य को समझने की नई दृष्टि देगी। धन्यवाद

सचिन .......... ने कहा…

चलिए एक बोझ उतार दिया आपने. उधार लेने में कैसी कोताही. मौलिकता से ज्यादा जरूरी तो रचनाशीलता ही है न....
शुक्रिया

Neelashi ने कहा…

kshama keejiyega, par mujhe nahi lagta ki rachna mein maulikta ya phir manushya mein maulikta ek mithak hai. har insaan mein kuchh na kuchh maulik hota hai jo doosron se pare hota hai, aap mein bhi hoga, tabhi aap likhte hain..isi prakar se ek rachna kabhi rachna kehlaii hi nahi jaa sakti agar usmein originality na ho. yehan mein plagiarism ki baat nahi kar rahi hun, par ham apni paristhition aur manosthiti se hi likhne ke liye prerit hote hain, aur har insaan ka ek apna alag tareeka hota hai ek paristhiti par respond karne ka, aur yeh science mein bhi sweekari gayi baat hai.

कुमार अम्‍बुज ने कहा…

नीलाशी के लिए
अब भी कहूँगा कि मौलिकता एक समुच्‍चय में कुछ खास होने का भ्रम है। अंधविश्‍वास है। जबकि यह एक अवस्थिति मात्र है। जिस भाषा में आप रचते हैं, वह भाषा ही आपने नहीं बनाई है, आप उसमें केवल संयोजन करते हैं। इस संयोजन की भी एक लंबी परंपरा आपको पहले से प्रदत्‍त मिलती है। अब उस परंपरा में कुछ जोडते हैं, कुछ इधर-उधर करते हैं। वह कुछ अलग दिखने लगता है और आप समझते हैं कि यह मौलिकता है। यही मौलिकता का मिथ है। एक उपमा, एक रूपक संसार की अनेक भाषाओं में एक साथ घटित होता रहता है, हम अपनी सीमाओं के कारण, अज्ञानता के कारण भी उसका संज्ञान नहीं ले पाते हैं। मौलिकता के भ्रम में बहुत सी चीजें मिलती हैं। जैसे नदी में कई तरह का पानी मिलता है और अपशिष्‍ट भी। फिर हम कहते हैं कि यह गंगा का पानी है, यह टेम्‍स का या यह अमेजन का। यही मौलिकता का मिथ है।