शनिवार, 27 अगस्त 2016

किताबें और साहित्‍य

 यह एक पन्‍ना मेरे हाथ लगा है जिस मैंने पिछले बीस साल से सँभालकर रखा है। आज उसे सार्वजनिक करता हूँ।

किताबें

एर्विन श्ट्रिटमाटर

मेरे अध्‍ययन कक्ष में बहुत सी किताबें रखी हैं। कुछ को देखकर मुझे लगता है, उनमें मुझसे कहने के लिए कुछ नहीं है, उन्‍हें बंद करता हूँ और भूल जाता हूँ।

कुछ दूसरी किताबों में इधर-उधर कोई सच मिल जाता है या फिर यदा-कदा मेरे अपने विचार की कोई पुष्टि। कभी मुझे उनकी कथावस्‍तु पसंद आती है तो कभी वाक्‍य-संरचना। सालों बाद एक बार फिर उन्‍हें हाथ में लेता हूँ, सिर्फ वही पढ़ने के लिए जो मुझे उनमें पसंद आया था।

ऐसी भी किताबें हैं जो अजनबियों की तरह मेरे कमरे में खड़ी हैं किंतु एक दिन वे अपनी ओर आकर्षित करती हैं। क्‍या मैं उनकी मा‍नसिक-क्षमता की सीमा में आ गया हूँ ?  उन्‍हें खोलता हूँ, एक सॉंस में पढ़ जाता हूँ। हफ्तों बाद एक बार फिर पढ़ता हूँ। उनमें से बहुत सी बहुत पुरानीं हैं, न जाने कितने वर्ष पार कर चुकी हैं किंतु फिर भी वे मुझे युवकों-सी ऊर्जा देती हैं और मेरे समय को समझने में मेरी मदद करती हैं। यह युवकों-सी ऊर्जा देने की शक्ति जो इन किताबों में बसती है, यही साहित्‍य कहलाती है।

                                                   मूल जर्मन से अनुवाद: महेश दत्‍त 

2 टिप्‍पणियां:

मनोज भारती ने कहा…

बहुत सुंदर ... कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी है।

Radha Shrotriya ने कहा…

Very true